Tuesday, December 29, 2009

हिन्दी गांनो की तरह होता जा रहा हिन्दी ब्लोगिंग , शर्मा जी बेचारे परेशान

आप लोग भी सोच रहे होंगे कि ये मैं कौन सा नया शिगुफा छोड़ रहा हुँ , तो सच बताऊं ये बिल्कुल सच है कि हमारा हिन्दी ब्लोग जगत कहीं कहीं हिन्दी फिल्मो के गांनो की तरह होता जा रहा है अच्छा छोड़िये अब आप लोगो को बता ही देता हूँ आप लोग हिन्दी गांने तो जरुर सूनते ही होंगे , हाँ मैं भी क्या पूछ रहा हूँ , हिन्दी गांने तो सभीको बहुत पसन्द आते होंगे एक बात जिसपर मेरी नजर पड़ी , शायद आप लोगो नें भी ध्यान दिया होगा लेकिन भुल गयें होंगे , ये एक ऐसी कड़ी है जो अब धीरे-धीरे हिन्दी ब्लोगिंग को भी अपने शिकंजे मे ले रही है अच्छा अब मुद्दे पर ही जाता हूँ , आप लोगो ने अगर देखा होगा तो आजकल के हिन्दी गांनो में आधा से ज्यादा गांना अंग्रेजी मे होता है , वह भी ऐसा कि जो उपर से निकल जाता है मुद्दा उपर से निकलने का नहीं है मुद्दा हैं अंग्रेजी का प्रयोग हिन्दी गांनो में

पहले हम देखते थे कि एकाक ऐसे गाने आते थे जिसमे अंग्रेजी का प्रयोग होता था , परन्तु अब स्थिति पहले जैसे नहीं रह गयी , अब तो आपको हर गांनो में अंग्रेजी की झलक दिख ही जायेगी'''' तो क्या यह मान लिया जाये कि आने वाले समय में बस नाम ही रह जायेगा हिन्दी गाना , होगा सब कुछ अंग्रेजी में हो भी सकता है , क्योंकि जिस तरह से अंग्रेजी शब्दो का इस्तेमाल बढ रह है हिन्दी गांनो में ये दिंन भी ज्यादा दूर नहीं होगा अब पता नहीं हमारे यहाँ के हिन्दी गानो के लेखको को क्या दिखता है ऐसा कि वे अंग्रेजी शब्दो का इस्तेमाल जोरो शोरो से कर रहे है हिन्दी गांनो में , शायद अब इनको वे अर्थ वाले शब्द ही नहीं मिल रहें जो इन्हे प्रयोग में लाने होते है गांनो में , और ये इन्हे अंग्रेजी में आसानी से मिल रहे हैं

अब बात आती है कि हिन्दी ब्लोगिंग से भला इसका कैसा सम्बन्ध , तो ये भी बताये देता हूँ , जिस तरह से हिन्दी गांनो में तड़क भड़क डालने के लिए अंग्रेजी शब्दो का प्रयोग किया जा रहा है उसी तरह अब धीर-धीरे हिन्दी ब्लोगिंग में भी अंग्रेजी का प्रयोग तेजी से हो रहा है , अभी तो यह शैसाअवस्था में है , बढ़ती तरक्की से ये अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में हिन्दी ब्लोगिंग में भी बस नाम ही रह जायेगा हिन्दी ब्लोगिंग , होगा सबकुछ अंग्रेजी में । मुद्दा शायद आपको लगे ले , लेकिन ध्यान देंने पर हमें पता चलेगा कि किस तरह से यहाँ भी हाबी होता जा रहा अंग्रेजी । तो क्या हम यहाँ भी अंग्रेजी को ही ज्यादा तवज्जो दे रहें है । जबकि यहाँ तो ऐसा नहीं होना चाहिए , ज्यादातर लोगो से अग़र आप ये सवाल पूछेगे कि आपने हिन्दी ब्लोगिंग ही क्यो चुना , तो जवाब होगा कि हिन्दी हमारी मातृ भाषा है , इसका अस्तर गिर रहा है , इसे ऊठाने के लिए मै हिन्दी ब्लोगिंग के रहा हूँ , । बढ़िया है , प्रयास हो भी रहा हैं , । लेकिन जब इतना प्यार है ,तो हिन्दी ब्लोगिंग में अग्रेजी को स्थान क्यों दिया जा रहा है ? मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि आप हिन्दी ब्लोगिंग ही करिए , अंग्रेजी में भी करिए , लेकिन वो हिन्दी में ना हो तो अच्छा लगेगा ।

मैं अंग्रेजी का विरोधी नहीं हूँ , लेकिन एक स्थान जिसका मूल उद्देश्य ही यही है " हिन्दी विकास " अब ऐसी जगहो पर
अंग्रेजी का प्रयोग कितना करना सही है , ये आप लोग भँली भाती जानते होंगे । और अंग्रेजी का क्या हाल है ये हम सब जानते ही है , कई बार मैंने देखा है कि ब्लोगरो नें शीर्षक या बहुत से हिन्दी शब्दो को अंग्रेजी में रुपानतरण किया है , तो इनका विरोध किया गया ये लेकर कि आपनें अंग्रेजी गलत लिखी है । मैं कहता हूं कि अगर आपको अंग्रेजी से प्रेम है और अंग्रेजी मे लिखना चाहते हैं तो आप लिखिए परन्तु हिन्दी ब्लोगिंग वह स्थान हो अच्छा नहीं लगता , वह अंग्रेजी ब्लोगो पर भी हो सकता है । अंग्रेजी है ही ऐसा कि बस पुछिये मत , बोलनें में कुछ और , मतलब कुछ और हमेशा परेशान ही करता है ,। हिन्दी सिखने के खातीर हिन्दी ब्लोगिंग शुरु किया , थोडा बहुत सीख भी रहा हूँ , लेकिन यहाँ अंग्रेजी का बढता दायरा देखकर दुःख बहुत हो रहा है।

अब बात करता हूँ शर्मा जी की , वो भी बेचारे अंग्रजी के मारे हैं । ये हमेशा कहते है कि अंग्रेज तो चले गये लेकिन
अंग्रेजी छोड़ गये हमें मारने के लिए , और भईया इसके मतलब तो समझ ही नहीं आते , इक ही शब्द के कई मतलब होते हैं , इसे लेकर शर्मा जी और परेशान रहते हैं । ऐसी ही एक बार एक घटना हो गयी शर्मा जी के साथ , और वे बेचारे बहुत परेशान हुए ।

हुआ ये कि शर्मा जी के एक बचपन के दोस्त हैं , बर्मा जी । शर्मा जी तो गाँव में ही रहते है , इनका गाँव वाराणसी में है , और वहाँ के प्राइमरी स्कूल में हिन्दी पढ़ाते है , और अंग्रेजी भी थोड़ी बहुत जानते है , और बहुत सीखना भी चाहते हैं । बर्मा जी अब इलहाबाद में जाकर बस गये हैं और वहा वकील बन गये है। एक पिछली बार जब वर्मा जी गाँव आयें थे तो उन्होनें शर्मा जी को इलहाबाद आने का न्योता दिया था । तो क्या एक दिंन शर्मा जी नें मुड बनाया और निकल गये इलहाबाद के लिए । वहाँ उनके घर पहुँचे , तो दरवाजा श्रीमती जी नें खोला , फिर नमस्ते वगैरह हुआ । फिर वो बैठ कर चाय पी रहे थे , वर्मा जी घर से बाहर गये थे , श्रीमती जी से पता चला कि शाम तक आयेंगे । अभी शर्मा जी चाय पी ही रहे थे कि वर्मा जी का बेटा कपड़े जुते मस्त सजधज के निकला , श्रीमती जी उस समय किचन में थी , कुछ बना रहीं थी शर्मा जी के लिए । शर्मा जी नें उस लड़के को पहली बार देखा था , वह इलहाबाद ही रहता था , फिर शर्मा जी नें उसका परिचय लिया तो पता चला कि वह वर्मा जी का बेटा है । वह बड़ी जल्दी में था , शर्मा जी
नें उससे पुछा कि बेटा तुम्हारे पापा कब तक आ जायेंगे , तो उसने जवाब दिया कि पापा तो तारिख पर गये है , हो सकता है कि देर हो जाये,। फिर बातचीत आगे बढ़ी , बेटा बहुत जल्दी में था , तो शर्मा जी से रहा नहीं गया उन्होंने पुछ लिया कि बेटा तुम बड़े जल्दी में हो कहीं जा रहे हो क्या ?

तो बेटे ने कहां हाँ अंकल जा ही रहा हूँ , फिर शर्मा जी पुछा कहाँ , तो उसने बोला कि मै डेट पर जा रहा हूँ । तो क्या शर्मा जी थोड़ा सकते में आगये , और पुछा कि बेटा अभी तो तुम्हारी उम्र भी नहीं हुई है , तो तुम कैसे तारीख पर जाने लगे, तो बेटे ने बताया कि मैं अपनी गर्लफ्रेण्ड के साथ डेट पर जा रहा हूँ , मतलब घूंमने, पापा तारीख पर गयें है और मै डेट पर जा रहा हूँ , इतना कहके वह वहां से चला गया ,। अब बेचारे शर्मा जी परेशान कि ये क्या माजरा भाई । उन्होनें सोचा कि जहाँ तक मुझे पता है कि डेट को हिन्दी में तारीख कहते हैं , तो एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ , फिर शर्मा जी कहाँ कि ये अंग्रेजी है हि ऐसी अगडम-बगड़म ।
ये तो कहानी रही शर्मा जी , और भी बहुत से ऐसे शब्द आते है जो कि अंग्रेजी को समझ से परे करता है , । जैसे कोई बड़ा अच्छा नाच रहा है , तो आप अगर उसे ये कहते हैं कि आप बड़े अच्छे डांसर है तब तो ठिक है , और आप डा़सर की हिन्दी से उसे रुबरु करा दिजीये तो देखिये , अभी आप उसे ये कहिए कि आप बड़े अच्छे नचनियाँ है , तो भाव ही बदल जायेंगे , अब भाषा का क्या फयदा ।

और अन्त में सभी ब्लोगरो से यही निवेदन है कि हिन्दी को भी अगडम-बगडम ना बनायें उसे साफ सुथरा ही रहंने दे ।

Saturday, December 26, 2009

"पति-पत्नी के निजी एकांतिक संसार की तरह बच्चो में भी प्राइवेसी का आग्रह बढ़ने लगा है "

सभ्यता और संस्कृति के विकास का आरंभ परिवारसंस्था के साथ जोड़ा जा सकता है । पौराणिक और आध्यात्मिक दृष्टि से इसके उद् भव की जो भी गाथायें या कारण हैं, समाज शास्त्रीय दृष्टि से मनुष्य के भीतर जन्मे सहयोग और अनुराग को परिवार का आधार कहा जाता है । सहयोग और सदभाव का जन्म ना होता तो न स्त्री-पुरुष साथ रहते , न संतानों का जिम्मेदारी से पालन होता और न ही इस तरह बनं कुटुंब के निर्वाह के लिए विशिष्ट उद्दम करते बनता । बच्चो को जन्म और प्राणी भी देते है । एक अवस्था तक वे साथ रहते हैं और अपना आहार खुद लेने लायक स्थिति में पहुचने पर अपने आप अलग हो जाते हैं , उन्हे जन्म देने वाले को भी तब उनकी चिंता नहीं रहती ,। विकास की इसी यात्रा के पिछे कहीं न कहीं परिवारसंस्था ही विद्दमान है । यदि वह संस्था ना होती तो सीधे प्रकृति से आहार लेने और अपने शरिर का रक्षण करने के सिवा कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं थी । मनुष्य सभ्यता का इतिहास परिवार बसाने और उसकी आवश्यकता पूरी करने , उसके सदस्यो मे विकास की चिंता करने के बिंदु से आरंभ होता है । एक दुसरे के लिए त्याग , बलिदान , उदारता , सहिष्णुता , सेवा और उपकार जैसे मानवीय आध्यात्मिक मूल्यो की प्रयोगशाला भी परिवार का परिकार ही है ।

विकास किया । अब परिवार संस्था टूटने के कगार पर है । समाजशास्त्रि कहते हैं कि इस दुर्घटना के कारण परिवार के सदस्य एक दूसरे के प्रति सेवा और समाजशास्त्रि मानते हैं कि समाज , देश और विश्वमानवता जैसी धारणाँये भी परिवार का ही विकसित रुप हैं । पति-पत्नि और उनकी संतान से बनी इकाई में जब संतानो के पत्नि - बच्चे भी जुड़े तो संयुक्त परिवार का उदय हुआ । संयुक्त परिवारों के समूह ने बस्ती , ग्राम , और नगर के रुप में उत्सर्ग का भाव रखने के स्थान पर स्वार्ती-संकीर्ण होने लगे हैं । अपने सुख और भोग के लिए अंत्यन्त आत्मीय स्वजन की बलि चढ़ाने में अब हिचक भी मिटती जा रही हैं ,।

परिवार के विकास का एक प्रयोग इस सदी के आरंभ में ' कम्यून लार्जर फैमिली ' के रुप में किया गया था । साम्यवादी व्यवस्था के शुरुआती दिंनो मे प्रयोग चले भी । जहाँ साम्यवादी व्यस्था नहीं थी , वहां सहकारी प्रयोगो में उसका प्रभाव दिखाई दिया ,। आँठवा दशक पूरा होने तक साम्यवादी व्यवस्था दम तोड़ने लगी ।। उसके साथ 'कम्यून' और 'सहकारी' जीवन के प्रयोग भी लड़खड़ा गये । परिवारसंस्था का आधार खिसकने लगने का यह एक उपलक्षण मात्र हैं , मुख्य समस्या इसके अस्तित्व पर मँडराने लगे संकट और गहराते जाने की है । संकट का स्वरुप कुछ इस तरह है । इस शताब्दी का उत्तरार्द्ध शुरु होने तक भारत में संयुक्त परिवारों का प्रचलन लोकप्रिय था । माता पिता अपने बच्चों और उनकी संतानो के साथ मजे में रहते थे । तीन और उससे ज्यादा पीढ़ीयाँ भी एक ही परिसर में रहती , एक ही चौके में बना भोजन करतीं और सुख-दुःख को हार्दिक स्वीकृति से निभाती चलती थीं । छ़ठे सातवें दशक में संयुक्त परिवार बिखरने लगे । ये अपवाद पहले भी थे , जिनमें पति पत्नि और उनके बच्चे माँ-बाप से अलग बस जाते थे , लेकिन अनुपात बीच-पच्चिस प्रतिशत ही था । गाँव, समाज और रिशतेदारी में उन्हे निंदित भाव से देखा जाता था । सातवें दशक में सॅयुक्त परिवार की टूट को सहज भाव से देखा जाने लगा , क्योंकि वह यत्र-तत्र बहुतायत में घटने लगी थी ।

बीस-पच्चीस वर्षो में संयुक्त परिवारो का काम तमाम हो गया । अब बारी एकल परिवारो की है । जिन्हे 'वास्तविक ' और' 'मूल' जैसे विशेषणो से संबंधित किया जाता है । पति -पत्नि पहले भी कामो में हाथ बटाते और एक दूसरे के दायित्वों को संभालते हुए स्वतन्त्र व्यक्तित्व बनाये रखते थे । परन्तु अब स्वतन्त्र का आग्रह अलग रुप ले चुका है । अब इसका मतलब ही 'अंह' से शुरु हो रहा है । अब पति-पत्नी के निजी एकांतिक संसार की तरह बच्चो में भी प्राइवेसी का आग्रह बढ़ने लगा है ।

महानगरो में बिना विवाह के साथ रहने और संतान को जन्म देने की प्रवृत्ति भी जड़े जमाने लगी हैं । इस तरह का सहजीवन जब तक मन करे साथ रहने और बाद में अलग हो जाने की छूट देता है । उस स्थिति में किसी का भी किसी के प्रति दायित्व नहीं बनता । न आपस में और न ही बच्चो के प्रति । ये प्रवृत्तिया परिवार संस्था पर मँडराते जा रहे संकट की पहचान हैं । जिस आत्मियता , स्नेह और उत्सर्ग की भावना ने उसका आधार रखा वहीं लुप्त हो गया तो संकट की विभीषिका का सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है ।

Wednesday, December 23, 2009

बने तो मौत बने इसके सिवा कुछ भी नहीं




जब लगा खत्म हुई अब तलाश मंज़िल की।
धोका था नज़रों का वो इसके सिवा कुछ भी नहीं।।


समझा था क़ैद है तक़दीर मेरी मुट्ठी में;
रेत के दाने थे वे इसके सिवा कुछ भी नहीं।


मैं समझता रहा एहसास जिसे महका सा;
एक झोंका था हवा का वो और कुछ भी नहीं।


मैं समझता हूँ जिसे जान,जिगर,दिल अपना;
मुझे दिवाना वो कहते हैं और कुछ भी नहीं।


आजकल प्यार मैं अपने से बहुत करता हूँ;
होगा ये ख़्वाब और इसके सिवा कुछ भी नहीं।


लगा था रोशनी है दर ये मेरा रोशन है;
थी आग दिल में लगी इसके सिवा कुछ भी नहीं।

तेरे सिवाय जो कोई बने महबूब मेरी ;
बने तो मौत बने इसके सिवा कुछ भी नहीं।।

Sunday, December 20, 2009

बिन ब्याहे मां बनना , क्या यही है नारी की स्वतन्त्रा ???

वर्तमान युगमें सब ओर स्वतन्त्राकी आकाक्षां जाग्रत हो गयी है । नारी ह्रदयमें भी इसका होना स्वाभावीक है । इसमे सन्देह नहीं कि स्वतन्त्रता परम धर्म है और नर तथा नारी दोनों ही स्वतन्त्र होना भी चाहिए । यह भी परम सत्य है कि दोंनो जबतक स्वतन्त्र नहीं होंगे , तबतक यथार्त प्रेम भी नहीं होगा । परन्तु विचारणीय प्रश्न यह है कि दोंनो की स्वतन्त्रताके क्षेत्र एक हैं या दो ? सच्ची बात यह हैं की नर और नारीका शारीरिक और मानसिक संघटन नैसर्गिक दृष्टिसे कदापि एक-सा नहीं हैं । तो दोंनो की स्वतन्त्रा कें सव्तन्त्रा मार्ग भी निश्चय नहीं हैं । दोनों अपने-अपने क्षेत्रमें अपने मार्ग से चलकर ही स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकते हैं । यही स्वधर्म है। जब तक स्वधर्म नहीं समझा जायेगा तबतक कल्याणकी आशा नहीं है । स्त्री घर की रानी है , साम्रागी है , घरमें उसका एकछत्र राज्य चलता है , पर वह गर की रानी स्नेहमयी माता और आदर्श गृहिणीके ही रुप में । नारीका यह सनातन मातृत्व ही उसका स्वरुप है । वह मानवता की नित्यमाता है । भगवान राम - कृष्ण , भीष्म-युधिष्ठिर , कर्ण , अर्जु, बुद्ध, महावीर , शंकर , रामानुज , गांधी आदि जगतके सभी बड़े- पुरुषको नारीने ही ने सृजन किया और बनाया है । उसका जीवन क्षणिक वैषयिक आनन्दके लिए नहीं , वह तो जगत् को प्रतिक्षण आनन्द प्रदान करनेवाली स्नेहमयी जननी है । उसमे प्रधानता है प्राणोंकी ह्रदयकी और पुरुषमें प्रधानता है शरिरकी ।

इसीलिए पुरुषकी स्वतन्त्राका क्षेत्र है शरीर और नारीकी स्वतन्त्रा क्षेत्र है प्राण- ह्रदय़ ! नारी शरीरसे चाहे दुर्बल हो , परन्तु प्राणसे वह पुरुष अपेक्षा सदा ही अत्यन्त सबल है। इसीलिए पुरुष उतने त्यागकी कल्पना नहीं कर सकता , जितना त्याग नारी सहज ही कर सकती है , अर्थात पुरुष और स्त्री सभी क्षेत्रोंमें समान भावसे स्वतन्त्र नहीं है । कोई जोश में आकर चाहे यह न स्वीकार करें , परन्तु होशमें आनेपर तो यह तय ही मानना पड़ेगा कि नारी देहके क्षेत्र में कभी पूर्णतया स्वाधीन नहीं हो सकती । प्रकृति ने उसके मन , प्राण और अवयवोंकी रचना ही ऐसी की है । नारी अपने एक विशिष्ट क्षेत्र में रह कर प्रकारान्तरसे सारे जग की सेवा करती है । यदी नारी अपनी इस विशिष्टता को भूल जाये तो जगत् का विनाश जल्द ही संभव है ।

जिन पाश्चात देशोंमें नारी स्वतन्त्रा के गान गाये जा रहे है वहाँ भी स्त्रियाँ परुषोकीं भांती निर्भिक रुप से विचरण नहीं कर पाती । नारी में मातृत्व है , गर्भ धारण करना ही पड़ता है । प्रकृति नें पुरष को इस दायित्व से मुक्त रखा है । इसलिए स्वतन्त्रा स्वाधिनता सर्वत्र सुरक्षित नहीं है, नारी अपने इस दायित्व से बच नहीं सकती ।जो बचना चाहती हे , उसमे विकृतरुपसे एसका उदय होता है । यूरोपमें नारी स्वतन्त्र है , पर वहाँ की स्त्रियाँ क्या इस दायित्व से बचती है ? क्या वासनाओं पर उनका नियत्रंण है ? वे चाहे विवाह करे या ना करे परन्तु पुरुष संसर्ग किये बिना रही नहीं सकती । इग्लैंड़ में बीस वर्षकी आयुवाली कुमारीयों में चालीस प्रतिशत विवाहके पहले ही गर्भवती पायी जाती है , क्या देश का ऐसा नैतिक पतक कहीं देखने कि मिल सकता है ?? क्या ऐसी स्त्र स्वतन्त्रा भारतीय महिलायें चाहती है ?? विदेशियोंका पारिवारिक जिवन भी नष्ट होता जा रहा है ।

लोग कहते है कि वहां की महिलायें शिक्षित हुई उनका विकास हुआ है । इसमें इतना तो सत्य है कि वहाँ स्त्रियोंमें अक्षर-ज्ञानका पर्याप्त विस्तार है , परन्तु इतने मात्र से कोई सुशिक्षित और विकसि हो जाये , ऐसा नहीं माना जा सकता ।

अस्वतन्त्रा भवेत्रान्त्ररी सलज्जा स्मितभाषिणी ।
अनालस्या सदा स्त्रिग्धा मितवाग्लोभवर्जिता ।। (उत्तराखण्ड ८-२)

"नारी को स्वच्छन्दतासे शून्य , लज्जायुक्त , मन्द मुदकानहीन वाणी बोलनेवाली , सदा प्रेम पूर्वक भाषण करने वाली और लोभसे हीन होनी चाहिए "। वास्तव में शिक्षा वह है जो मनुष्यमें उसके स्वधर्मानुकूल कर्तव्य जाग्रत करके उसे कर्तव्यका पूरा पालन करने योग्य बना दें। प्रकृति के विरुद्द शिक्षासे कोई लाभ नहीं हो सकता है ये भी सत्य है । इस युग में जो सिक्षा महिलाओं को दी जा रही है क्या उनका स्वधर्मिचित विकास हुआ है ?? एक बड़ा सवाल हो सकता है ।

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्दिमवाप्रोती न सुखं न परां गतिम् ।




"जो मुनुष्य शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है वह सुख को कभी प्राप्त नहीं कर सकता ।"
सच पूछिये तो सैकड़ो वर्षोसे चली आ रही है यूरोपकी शिक्षाने वहाँ कितनी महान् प्रतिभाशालिनि जगत की नैसर्गिक रक्षा करने वाली महिलाओं को उतपन्न किया है ? बल्कि यह प्रत्यक्ष है कि इस शिक्षासे वहाँ नारियों में गृहणीत्व तथा मातृत्व हास हुआ है । अमेरिका में 77 प्रतिशत महिलायें घर के कामों मे असफल होती है , । 60 प्रतिशन महिलायें ज्यादा उम्र हो जाने के कारण वैवाहिक योग्यता खो देती हैं । विवाह की उम्र साधारतः 16 से 20 वर्ष की मानी जाती है , इसके बाद ज्यों-ज्यो उम्र बढ़ती जाती है त्यों-त्यों विवाह की योग्यता भी कम होती जाती है । इसी का परिणाम है कि वहाँ स्वेक्षाचार , अनाचार, व्यभिचार और अत्याचार लगातार बढ़ते जा रहे हैं । अविवाहिता माताओंकी संख्या क्रमशः बढती जा रही है । घर का सुख किसी को नहीं । बिमारी तथा बुढापे में कौन किसकी सेवा करें ? वहां की शिक्षिता स्त्रियो में लगभग 50 प्रतिशत कुमारी रहना पड़ता है । यही क्या बहुमुखी विकास है ।

Saturday, December 19, 2009

प्रतीक संस्कृति मे ""ध्वज"" का महत्व

सनातन भारतीय संस्कृति प्रतिको की संस्कृति मानी जाती है । इसके चिन्हों एवं प्रतिको के अर्थ गुहा , रहस्यपूर्ण एँ वैज्ञानिक हैं । प्रतीकों के तातपर्य बड़े ही रोचक एंव अनोखे होते हैं ।, इनका आशय न संमझ में आंने के कारण ही हमें ये बेढब और अटपटे लगते हैं । प्रतीकों के इसी क्रम में पताका , धव्ज या केतु को यश , प्रतिष्ठा तथा आस्था का प्रतीक माना जाता है । अपने यहाँ ध्वज का महत्व वैदिककाल से है । राजा के लिए ध्वज शौर्य , सर्वस्य एंव राज्योत्कर्ष का प्रतिक है ,। धर्मायतनों में लहराती-फहराती हुई पताकाएं अलग-अलग आस्था और आस्तिकता की परिचायक होती हैं । ध्वज जातीय ऊँचाईयो का प्रतिक है , जो अंनत आकाश में अपनी उत्कृष्ठता का उद्घोष करता है । ध्वज में पट का वर्ण , अकार और अंकित प्रतीक किसी महत् अभिप्राय को अंतर्हित किए होते हैं । ध्वज का उदभव् मूलतः धर्म एंव राजनीति के लिए हुआ । धार्मिक मान्यताओं में प्रार्थना-अभ्यर्थना हेतु तथा राजनीति में युद्ध-क्षेत्र में इसका प्रयोग हुआ । विश्व के सबसे प्राचिन ग्रंथ ऋगवेद में ध्वज का उल्लेख मिलता है

अस्माकमिन्द्रः समृतेषु धव्जेष्वस्माकं

या इषवस्ता जयन्तु ।

अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्माँ
उ देवा अवता हवेषु ।।

यहाँ पर धव्ज और विजयी वाणों की सन्नद्धता के साथ जिस प्रकार देव सहयोग की प्रार्थना करते हुए युद्ध भूमि में वीरो को अपनी पताका फहराते हुए प्रस्तुत होने का चित्रण किया गया है , उससे उनके अद्भुत धौर्य, साहस का सहज परिचय मिलता है ।

अथर्वेद तो जागरण का शंख फूँकते हुए पताकाओं सहित युद्ध में कुद पड़ने और सर्प जैसे कुटिल तथा राक्षसों के समान क्रूर शत्रुओं पर धावा बोल देने का आह्वान करता है-

उत्तिषठता सं सह्वाध्वमुदाराः केतुभिः सह ।
सर्पा इतरजना रक्षांस्यमित्राननु धावत ।।

पताकाओं को व्यक्तित्व का अलंकरण और तेजस्वी का तेज माना जाता है । सभी देवशक्तियों की अपनी पताकाएँ होती है। सूर्य की पताकाएँ उसकी किरणें होती हैं , जिन के अधार पर वह विश्व को उद्भाभाषित करते हुए शोभित होता है । यजुर्वेद के एक मंत्र में यह तथ्य प्रतिपादित होता है --

उदु त्यं जातवेदसं देंव वहन्ति केतवः ।
दृशे विश्वाय सूर्यम् ।

परव्रति साहित्य से स्पष्ट होता है कि पताकाओं में बहुमूल्य कपड़ो का प्रयोग किया जाता था । कालिदास ने चीनांदुक के उल्लेख द्वारा सुँदर रेशमी कपड़ो के प्रयोग का उल्लेख किया है । महाभारत में अनेकों रंगो कओ पताकाओ का परिचय मिलता है । पताकाओं में इन रंगो का विशिष्ट महत्व होता है । ये किसी विशेष वस्तु के प्रतीक के रुप में अपनायी जाती थी । मुख्य रुप से लाल रंग की पताकाओं का प्रतिपादनन है । कुछ पताकाएँ रजतवर्णी भी होती थी । कैकेय राजकुमारों की पताकाएँ भी रक्तवर्णी थीं ।

वीरों के रथो के ध्वंजो के प्रतीकार्थ भिन्न-भिन्न होते हैं । इस संदर्भ मे शल्य के ध्वज पर हल से भूमी पर खींची गई रेखा का चिन्ह था । जयद्रथ के ध्वज में चाँदी का बना हुआ वाराह विद्दमान ता । शल का ध्वज चाँदी के महान गजराज तथा विचित्र अँगो वाला वाले मयूरों से शोभित था । दारुक का छोटा भाई जिस रथ को लाया और जिस पर सात्यार्क आरुढ़ था उसके ध्वज मेम सिंह का निशान चमकता था । महाप्रतापी भीष्म के विसाल ध्वज पर पाँच तारो कर साथ ताड़ का वृक्ष अंकित था । एक स्थान पर उनका रथ उनका रथ ताल चिन्हित चंचल पताकाओं वाला बनाया गया है । बलराम की पताका में भी ताड़वृक्ष अंकित था । महाभारत के एक अन्य योद्दा धृष्टद्दुम्न के स्वर्णभूषित में जो ध्वजा फहराती थी , उमसें कचनार का वृक्ष अंकित था । पुरुषोत्तम राम के भ्राता भरत के धव्ज मे भी कचनार की आकृति का उललेख मिलता है । यही प्रतिक लक्षमण पुत्त चंद्रकेतु की पताका में भी विद्दमान था । इस तरह वीरों की पताकाओं में अलग-अलग आभाओं और चिन्हो के उल्लेख मिलते है और इन सभी के अपने-हपने विशिष्ट अभिप्राय होमग । पताकाओ के इन प्रतिकों को आधुनिक काल में भी उतनी ही प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त है , क्योंकि हर जाती , संस्था , वर्ग समाज , प्रतिष्ठान , सेनाओं की अपनी-अपनी टुकडीयों तथा देशों के हपने प्रतीकरूपी ध्वज होते हैं । इन सभी को पूर्ण सम्मान दिया जाता है ।

खेल स्काउट एंव गाइड , एन सी सी आदि प्रतिष्ठिनों में तो ध्वजा को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है । भारतीय स्वतंत्रा आंदोलन के क्रान्तकारियों के लिए तिरंगा प्राणो से भी बढ़कर था । समरांगण में पताकाओ का कट जाना अनिष्टक एंव झुक जाना अमंगलकारी माना जाता है । प्राणोत्सर्ग करते हुए भी योद्धा अपनी पताका की रक्षा करते हैं । आज भी इसकी सर्वाधिक आवश्यकता है। अपने तिरंगे पर अनगिनत देशों की गिद्धदृष्टि लगी हुई है । आज आंतक एंव कूटनीति से साये में इसकी प्रतिष्ठा खतरे में पड़ गयी है । ऐसे में भारतीय रणबांकुरो का आह्वान है कि वे अपने राष्ट्र के सर्वोच्च सम्मान के प्रतिक तिरंगे की रक्षा के लिए आगे आएँ ,। समाज एवं राष्ट्र के विकास में सहायक होकर ही इसके प्रति सच्चा आदर एंव सम्मान दिया जा सकता है ।

Sunday, December 13, 2009

तुम ही कहो मैं क्या करूँ ? ये मेरे दिलनसीं

एक अहसास ,


एक विश्वास,


टूट रहा है,


साथ तुम्हारा छूट रहा है।


एक भरोसा ,


एक उम्मीद ,


जो दी थी तुमने,


वो तो धूमिल हो चली।


करूँ मैं क्या ?


ये मेरे दिलनसीं।



"रोशन दिये बुझने को है",


मंजिल से रास्ते छूटने को है,


हौसला अब टूटने को है,


सांसे अब थमने को है,


जिंदगी हमसे रूठने को है"


तुम ही कहो मैं क्या करूँ ?


ये मेरे दिलनसीं।।

Monday, November 30, 2009

अजय झा जी आप हमें यूँ छोड़ के नहीं जा सकते , अलविदा ब्लोगिंग

अजय झा जी एक ऐसा नाम जो हिन्दी ब्लोग जगत में अपनी एक अलग पहचान रखता है । अजय झा जी ने हिन्दी ब्लोग जगत को बहुत कम समय वो दिया जिसे देनें में हमें शायद बहुत ज्यादा समय लग जाये । अभी-अभी कुछ देर पहले ही अजय झा जी का मेसेज आया मेरे मोबाईल पर कि "ब्लोगिंग को अलविदा कह रहा हूँ आप सब के स्नेह के लिए शुक्रिया " जैसे ही ये मैसेज मेरे मोबाईल पर आया मैं एक दम से हिल गया मैंने सोचा अरे ये कैसा मैसेज है ।

मैंने तुरन्त अजय जी को फोन लगाया , परन्तु उन्होनें कोई जवाब नहीं दिया और अपना मोबाईल भी बंद कर दिया । मैंने फिर कई बार कोशिश की परन्तु सारी कोशिश नाकाम रही । तब रहा नहीं गया और ये अन्त में ये पोस्ट लिखना पड़ रहा है । अजय जी हमें आप ऐसे छोड़ के नही जा सकते , अभी आपको बहुत कुछ देना है हिन्दी ब्लोगिंग जगत को । अभी आपको हिन्दी ब्लोगिंग को उसके सर्वश्रेठ सिमा तक पहुचाना है । आखिर ऐसा क्या हो गया कि आप ऐसा कदम उठाने को मजबूर हो गये । आप ऐसे कोई फैसले नहीं ले सकते , आखिर आप ऐसे ही बिना कुछ बताये कैसे जा सकता है । हमें आपकी जरुरत है अजय जी। अगर आपका किसी विवाद हुआ हैं तो आप उसे सार्वजनिक किजीए ताकी सच्चाई सबके सामने आये । और आप ऐसा कदम उठाते हैं तो हम भी आपका विरोध करेंगे । आपको ये फैसला जल्द से जल्द बदलना पड़ेगा । नहीं तो हम भी आपके साथ हो जायेंगे । और अन्त में आपसे निवेदन है कि आप अपना फैसला जल्द से जल्द बदलीये , और हमारे चेहरे पर खूशी लाईये । और अगर आप ऐसा नहीं करते तो आज ब्लोगिंग का ये मेरा भी लास्ट पोस्ट होगा , अलविदा।

Friday, November 27, 2009

महिलायें बनेंगी पुरुष तो बच्चे पैदा कौंन करेगा ????????????

बहुत दिंनो से ब्लोग जगत में महिलाओं को लेकर बहस छिड़ी हुई है । कुछ कथीत प्रगतीवादी महिलाएं कहती हैं कि हम किसी से कम नहीं । हम पुरुषो से कहीं भी पिछे नहीं है । बात तो ठिक है और होना भी चाहिए क्यों पिछे रहें , लेकिन जब बात आती है बराबरी की तो यहाँ जरा मतभेद होंना स्वाभाविक है । क्योंकि महिलाएं पुरुष बन हीं नहीं सकती । इसके बहुत से कारण है , अब चाहे वह प्राकृतिक हो या शारीरिक ।



कोई पचास-साठ साल पहले अमेरिका में एक
"Freedom of women" आन्दोलन चला था जिसका असर सारी दुनियां पर पड़ा । उसका कहना यह था कि महिलायें पुरुषों से किसी मामले में कम नहीं हैं फिर वे क्यों घर पर बैठी रहें और मर्दों की गुलामी करें ? बात तो गलत नहीं थी पर उसकी दिशा कुछ बदल सी गई । मर्दों जैसे ही कपड़े पहनने, उन्हीं जैसे भारी-भरकम मेहनत वाले काम करने का शौक महिलाओं में पैदा हुआ जिससे काफी सामाजिक समस्यायें पैदा हुई जिनको पश्चिमी समाज आज तक भुगत रहा है । और जब जिस तरह से हमारे यहाँ कि महिलायें पाश्चात संस्कृति को अपनानें में लगी है लगता है कि अब बारी हमारी है।

कुछ देशों की जनसंख्या का ग्राफ गड़बड़ा गया जो आजकल चिन्ता का विषय बनता जा रहा है । इटली और स्पेन को चिन्ता है कि उनके यहां बच्चे कम पैदा हो रहे हैं और Immigration के कठोर कानूनों के बावजूद मुस्लिम देशों की आबादी वहां आ कर बस रही है । स्कैंडिनेविया, बेल्जियम और रूस आदि देशों में महिलाओं को बच्चे पैदा करने के incentive दिये जा रहे हैं । पश्चिमी संस्कृति ने पहले महिलाओं के परिवार-केन्द्रित सहज स्वभाव को "कैरियर" के चक्कर में तोड़ा । उन्हें कहा गया कि आप अपना कैरियर बनाइये, पैसा कमाइये और "स्वतंत्र जीवन शैली" अपनाइये । अब उन्हें प्रलोभन देकर वापस प्रजनन की तरफ मोड़ा जा रहा है ।

जीस तरह से पश्चिमी संस्कृति हमारे यहाँ पैर पसार रही है अब ये दिन भी दूर नहीं होगा। एक नजारा भारत का देखिये । जनगणना के मुताबिक भारत में पारसी समुदाय गायब होता जा रहा है । टाटा जैसे अमीर पारसी घरानों को भी इसकी चिन्ता सताये जा रही है । इसका मूल कारण पारसी महिलाओं का बहुत ऊंची शिक्षा लेना और पश्चिमी रंग में ढ़लना बताया जा रहा है । कहते हैं कि पारसी अमीर इसलिए हुए हैं कि उन्होंने ब्रिटिश राज्य से सहयोग करके ऊंचे पद हासिल किये और अपने बच्चों को भी ऐसे ओहदे दिलवाने के लिए अपने बच्चों को इंग्लैंड में शिक्षा के लिए भेजा और यह परंपरा आज भी जारी है । पारसियों की अमीरी ही आज उनके लुप्त होने का कारण बन रही है । पश्चिमी संस्कृति में महिलाओं के लिए रोल माडल कैरियर और पैसे का है, उस महिला को बुद्धू और पिछड़ा माना जाता है जिसने घर बैठ कर बच्चे पैदा किये । इसी संस्कृति को पारसी महिलाओं ने बखूबी अपनाया और इसीलिये आज उनका समुदाय लुप्त होने के कगार पर है ।


प्रसिद्ध पारसी हस्ती बहराम दस्तूर ने एक बार कहा था कि पारसी महिलायें तब ही विवाह करना चाहती हैं जब वे जीवन में 'settle' हो जायें और तब तक उसकी प्रजनन की आयु समाप्त हो चुकी होती है । उन्होंने कहा कि आखिर इतना पैसा होने पर भी वे 'settle' क्यों होना चाहती हैं ? भारतीय परम्परा में महिला को आर्थिक तौर पुरुष पर आधीन रहना होता है यानि पुरुष कमाये और वह घर बैठी खाये । वह सही उम्र में विवाह करती है, अपने पति के घर को संभालती है, बच्चे पैदा करती है और इसी से उसको सम्मान मिलता है । खुद पैसा कमाने के चक्कर से वह बेफिक्र होती है, खुद अपनी 'व्यक्तितत्व' की परवाह न करके अपने पति के स्थिति को ही अपना सुख मानती है और सुखी रहती है ।
पारसियों ने गलती यह की कि पश्चिमी संस्कृति के मुताबिक अपनी महिलाओं के "कैरियर" को अधिक महत्व दिया, मातृत्व को नहीं । जो कौमें इस पश्चिमी संस्कृति को अपनायेंगी वे इसी तरह लुप्त होंगी जैसे भारत में पारसी एवं पश्चिमी देशों में सफेद चमड़ी वाली कौमें । जो व्यक्ति अपने सुख और कैरियर को ज्यादा अहमीयत दे और कौम को अनदेखा करे, उसका लुप्त होना आश्चर्यजनक नहीं । एक प्रसिद्ध अमेरिकन मानववैज्ञानिक हुई हैं, जिनका नाम था 'Margaret Mead' । उसने 39 पुस्तकें लिखी जिनमें से एक थी "Male and Female" जो 1948 में छपी थी । मार्गारेट लिखती है कि पुरुषों की तरह महिलायें भी बचपन में सीखती हैं । जैसे एक संयुक्त परिवार में एक जेठानी है जो घरेलू महिला है और कई बच्चों की मां है । दूसरी तरफ उसकी देवरानी है जो काफी पढ़ी लिखी है और अच्छी नौकरी करती है । घर में उस जेठानी को बार-बार ताने दिये जाते हैं कि वह तो बस एक बच्चे पैदा करने की मशीन है । और उस देवरानी को सम्मान दिया जाता है कि वह खूब कमाती है । Margaret Mead लिखती है कि उस घर में यदि कोई 5-10 साल की लड़की है जो रोज यह सब सुनती है तो उसके मन में यह बात बैठ सकती है और वह बड़ी होने पर शायद कोई बच्चा पैदा न करे ।
यह समस्या पशुओं में भी देखी जा सकती है । एक चिड़ियाघर में नर और मादा शेर को साथ में रखने पर भी उनमें संभोग की इच्छा उत्पन्न नहीं हो रही थी । शेरों की संख्या कम होने का एक कारण यह भी हो सकता है कि मादा शेरनी प्रजनन की ओर अनासक्त हो गई है । किसी भी समुदाय को अपना अस्तित्व बनाने के लिये महिलाओं के प्रजनन कार्य को सम्मान देना चाहिये । अगर महिलाओं के कैरियर को ज्यादा सम्मान मिलेगा और मातृत्व को कम, तो महिलायें प्रजनन में रुचि खो सकती हैं और यही बात समाज के लिए घातक है । आजकल वैसे भी एक या दो बच्चों का रिवाज हो चला है । यह रिवाज किसी एकाध परिवार के लिए निजी तौर पर आर्थिक दृष्टि से ठीक हो सकता है पर समाज के लिए ऐसी वृत्ति घातक है, ऐसा कुछ विद्वानों का मत है ।


अगर सभी के पास एक ही सन्तान होगी जो खूब पढ़-लिख कर सिविल में काम करेगी या व्यापार आदि करेगी तो फिर सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा कौन करेगा ? तीन-चार भाइयों में से एक अगर देश पर शहीद हो जाये तो मां-बाप सब्र कर सकते हैं कि चलो, दो-तीन और लाल तो हैं पास में । पर अकेली सन्तान को तो कोई सेना में भर्ती ही नहीं करवायेगा । (बढती जनसंख्या या परिवार नियोजन के मुद्दे दूसरे हैं, अच्छा है इनको इस बहस में शामिल न किया जाये) वैसे भी आजकल IT सेक्टर काफी तरक्की कर रहा है, दूसरे इलेक्ट्रानिक माध्यम भी काफी आ गये हैं । जवान बच्चे रातों को काम कर रहे हैं और दिन में सोते हैं । डाक्टरों का कहना है कि रात को काम करने के कारण उनका शरीर रोगों का घर बनता जा रहा है और उनकी कामशक्ति घट रही है । कैरियर के चक्कर में पड़कर लड़कियां कई साल नौकरी कर के तीस साल से ऊपर की उम्र में शादी कर रही हैं जो सन्तानोपत्ति में प्राकृतिक रुकावट साबित हो रही है । पारसियों की तरह कहीं हमारी कौम और देश तो इस खतरे की ओर नहीं बढ़ रहा ? हमारी संस्कृति में मां को सदा ही ऊंचा स्थान दिया गया है ।

एक अनपढ़ मां को भी उतनी ही इज्जत दो । मातृत्व को सम्मान दो, इसी में हमारी भलाई है - मां तुझे सलाम !
और आप लोगो से विनम्र निवेदन है कि इस लेख को अन्यथा ना ले और मैं जो कहना चाहता हूँ और जिसको लेकर मेरी चिन्ता है उसपे ध्यान दिजिएगा।

Thursday, November 26, 2009

अनजाने रिश्ते का एहसास

अनजाने रिश्ते का एहसास,

बयां करना मुश्किल था ।

दिल की बात को ,

लबों से कहना मुश्किल था ।।


वक्त के साथ चलते रहे हम ,

बदलते हालात के साथ बदलना मुश्किल था ।

खामोशियां फिसलती रही देर तक,

यूँ ही चुपचाप रहना मुश्किल था ।।


सब्र तो होता है कुछ पल का ,

जीवन भर इंतजार करना मुश्किल था ।

वो दूर रहती तो सहते हम ,

पास होते हुए दूर जाना मुश्किल था ।।


अनजाने रिश्ते का एहसास ,
बयां करना मुश्किल था ।।

Monday, November 23, 2009

कविता प्रतियोगिता सूचना

हिन्दी साहित्य मंच "तृतीय कविता प्रतियोगिता " दिसंबर " माह से शुरू हो रही है । इस कविता प्रतियोगिता के लिए किसी विषय का निर्धारण नहीं किया गया है अतः साहित्यप्रेमी स्वइच्छा से किसी भी विषय पर अपनी रचना भेज सकते हैं । रचना आपकी स्वरचित होना अनिवार्य है । आपकी रचना हमें नवम्बर माह के अन्तिम दिन तक मिल जानी चाहिए । इसके बाद आयी हुई रचना स्वीकार नहीं की जायेगी ।आप अपनी रचना हमें " यूनिकोड या क्रूर्तिदेव " फांट में ही भेंजें । आप सभी से यह अनुरोध है कि मात्र एक ही रचना हमें कविता प्रतियोगिता हेतु भेजें । रचना के साथ अपना फोन नम्बर और पता भी जरुर संलग्न करें, जिससे संपर्क किया जा सके। प्रथम द्वितीय एवं तृतीय स्थान पर आने वाली रचना को पुरस्कृत किया जायेगा । दो रचना को सांत्वना पुरस्कार दिया जायेगा । सर्वश्रेष्ठ कविता का चयन हमारे निर्णायक मण्डल द्वारा किया जायेगा । जो सभी को मान्य होगा । आइये इस प्रयास को सफल बनायें । हमारे इस पते पर अपनी रचना भेजें -hindisahityamanch@gmail.com .आप हमारे इस नं पर संपर्क कर सकते हैं- 09818837469, 09891584813, हिन्दी साहित्य मंच एक प्रयास कर रहा है राष्ट्रभाषा " हिन्दी " के लिए । आप सब इस प्रयास में अपनी भागीगारी कर इस प्रयास को सफल बनायें । आइये हमारे साथ हिन्दी साहित्य मंच पर । हिन्दी का एक विरवा लगाये जिससे आने वाले समय में एक हिन्दीभाषी राष्ट्र की कल्पना को साकार रूप दे सकें ।

कट्टरताओं मत बाँटो देश ---- धर्म , जाती और क्षेत्र के नाम पर

नया युग वैज्ञानिक अध्यात्म का है । इसमें किसी तरह की कट्टरता मूढता अथवा पागलपन है। मूढताए अथवा अंधताये धर्म की हो या जाति की अथवा फिर भाषा या क्षेत्र की पूरी तरह से बेईमानी हो चुकी है । आज से पाँच-छह सौ साल पहले यूरोप जिस अंधविश्वास दंभ एंव धार्मिक बर्बरता के युग में जी रहा था, उस युग में आज अपने देश को घसीटने की कोशिश करना किसी भी तरह से उचित ना होगा। जो मूर्खतायें अब तक हमारे निजी जीवन का नाश कर रही थी वही अब देशव्यापी प्रागंण में फैलकर हमारी बची-खुची मानवीय संवेदना का ग्रस कर रही है । जिनकें कारण अभी तक हमारे व्यक्तित्व का पतन होता रहा है , अब उन्ही के कारण हमारा देश तबाह हो रहा है । धर्म के नाम पर , जाति के नाम पर,क्षेत्र के नाम, और भाषा के नाम पर जो झगड़े खड़े किए जा रहे है उनका हश्र सारा देश देख रहा है । कभी मंदिर और कभी मस्जिद तो कभी जातीयता को रिझाने की कशिश ।दुःख तो तब और होता है जब इस तरह के मामलो में शिक्षित वर्ग भी शामिल दिखता है । ये सब किस तरह की कुटिलताएँ है और इनका संचायन वे लोग कर रहे है जो स्वयं को समाज का कर्णधार मानते हैं । इन धर्मो एवं जातियो के झगड़ो को हमारी कमजोरियों दूर करने का सही तरीका केवल यही है कि देश के कुछ साहसी एंव सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन कट्टरताओं की कुटिलता के विरुद्ध एक महासंग्राम छेड़ दें।

जब तक यह मूर्खता नष्ट न होगी, तब तक देश का कल्याण-पथ प्रशस्त ना होगा । समझौता कर लेनें, नौकरियों का बँटवारा कर लेने और अस्थायी सुलह नामों को लिखकर, हाथो में कालीख पोत लेने से कभी राष्ट्रीयता व मानवीयता का उपवन नहीं मंहकेगा । हालत आज इतनी गई-गुजरी हो गई है कि व्यापक महांसंग्राम छेडे बिंना काम चलता नहीं दिखता । धर्म , क्षेत्र एवं जाति का नाम लेकर घृणित व कुत्सित कुचक्र रचनें वालों की संख्या रक्तवीचकी तरह बढ रही है । ऐसे धूर्तो की कमी नहीं रही, पर मानवता कभी भी संपूर्णतया नहीं हुई और न आगे ही होगी, लेकिन बीच-बीच में ऐसा अंधयूग आ ही जाता है , जिसमें धर्म , जाति एवं क्षेत्र के नाम पर झूठे ढकोसले खड़े हो जाते हैं । कतिप्रय उलूक ऐसे में लोगो में भ्रातियाँ पैदा करने की चेष्टा करने लगते है । भारत का जीवन एवं संस्कृति वेमेल एवं विच्छन्न भेदभावों की पिटारी नहीं है । जो बात पहले कभी व्यक्तिगत जीवन में घटित होती थी, वही अब समाज की छाती चिरने लगें । भारत देश के इतिहास में इसकी कई गवाहिँया मेजुद हैं । हिंसा की भावना पहले कभी व्यक्तिगत पूजा-उपक्रमो तक सिमटी थी, बाद में वह समाज व्यापिनी बन गयी । गंगा, यमुना सरस्वती एवं देवनंद का विशाल भू-खण्ड एक हत्याग्रह में बदल गया । जिसे कुछ लोग कल तक अपनी व्यक्तिगत हैसियत से करते थे, अब उसे पूरा समाज करने लगा । उस समय एक व्यापक विचार क्रान्ति की जरुरत महसूस हुई । समाज की आत्मा में भारी विक्षोभ हुआ ।

इस क्रम में सबसे बडा हास्यापद सच तो यह है कि जो लोग अपने हितो के लिए धर्म , क्षेत्र की की दुहाई देते है उन्हे सांप्रदायिक कहा जाता है, परन्तु जो लोग जाति-धर्म क्षेत्र के नाम पर अपने स्वार्थ साधते हैं , वे स्वयं को बडा पुण्यकर्मि समझते हैं । जबकि वास्तविकता तो यह है कि ये दोंनो ही मूढ हैं , दोनो ही राष्ट्रविनाशक है । इनमें से किसी को कभी अच्छा नहीं कहा जा सकता । ध्यान रहे कि इस तरह की मुढतायें हमारे लिए हानिकारक ही साबित होंगी , अंग्रजो ने तो हमारे कम ही टुकडे किय, परन्तु अब हम अगर नहीं चेते तो खूद ही कई टूकडों में बँट जायेंगे, क्या भरोसा है कि जो चन्द स्वार्थि लोग आज अलग राज्य की माँग कर रहे हैं वे कल को अलग देश की माँग ना करे, इस लिए अब हमें राष्ट्रचेतना की जरुरत है, हो सकता है शुरु में हमें लोगो का कोपाभजन बनना पड़े , पर इससे डरने की जरुरत नही है । तो आईये मिलकर राष्ट्र नवसंरचना करने का प्रण लें ।

Saturday, November 21, 2009

गाली के बदले चुप रहना कितना जायज है ।।

जी हाँ आपने बिल्कुल सही सूना मुझे । गाली के बदले चुप रहना कितना सही होगा । ये एक ऐसा सवाल है जिस पर बहुत से लोगो के बहुत से मत हो सकते है । यहाँ कोई महात्मा गाधीं तो बन नहीं सकता, और न ही उनके जैसा किसी में सहनशीलता ही है । मेरा ऐसा प्रश्न पुछने का बस एक ही मकसद् है, और वह है एकदूसरे के धर्म पर प्रत्यारोपण करना । जैसा की बहुत से लोगो को मालुम है कि आजकल ब्लोग जगत में धर्म के उपर बहुत से लेख आ रहे है और काफी कुछ भड़काऊं भी लिखा जा रहा है इस लेख के अन्दर । मैं इन सबमें शामिल हूँ , इससे इनंकार नहीं किया जा सकता । मुझे ब्लोग जगत में आये हुये मुश्किल से पाँच या छ महिनें ही हुए । जब मैंने ब्लोगिगं शुरु किया था तब मैं बस सामाजिक मुद्दो पर ही लिखता था , लिखता क्या था कोशिश करता था । तब मैंने ये कभी नहीं सोचा था कि मैं धर्म से जुड़े मुद्दे पर कुछ भी लिखूँगा । समय बदल गया , मैंने भी धर्म को मुद्दा बनया और लिखना शुरु किया , बहुत से लोगो नें मेरा विरोध किया और से लोगो नें शाबासी भी दी । धर्म का मुद्दे पर लिखना मतलब विरोध का सामना करने जैसा है ।

मैंने हिन्दुत्व को लेकर कुछ लेख लिखे , जिसपर मुझे तिखी टिप्पणीयों का सामना करना पड़ा और वह जायज भी था । मैं खूद इन सबके पक्ष में कभी नहीं रहा । लेकिन आखिर कोई कब तक चुप रह सकता है । हर चीज की कोई हद सिमा होती है । लगातार हिन्दुओं के खिलाफ, हिन्दू धर्म के खिलाफ लेख लिखे जा रहे हैं, क्या ये सब देख कर कोई चुप रह सकता है ? बहुत से लोगो का कहना होता है कि आप चुप रहिए और ऐसे लेखो को नजरअन्दाज करिए । ठिक है मैं नहीं बोलता या मेरे जैसे बहुत से लोगो नें उस लेख को नहीं पढ़ा और न ही टिप्पणी दी । नतिजा क्या मिलता है सबको मालुम है । लेख ब्लोगवाणी पर सबसे उपर रहेगा , पसन्द में, सबसे ज्यादा पढे जाने में , ज्यादा टिप्पणी में । तो अब बताईये कौन पढ़ता है उन्हे कौन पसन्द और टिप्पणी देता है । और अगर आप वहाँ टिप्पणी देखते है तो शायद आप और भी निराश हो जायें। ठिक है मैं ये नहीं कहता कि ऐसे लेखो को लिखा जाना चाहिए या मै खूद इस चिज के खिलाफ हूँ । लेकिन आप जिस धर्म से है अगर उसके खिलाफ लिखा जाता है तो आप अपना बचाव तो जरुर करना चाहेंगे । मै हिन्दू हूँ , मैंने भी पहले ऐसे लेखो को नजरअन्दाज किया लेकिन कोई कब तक सह सकता है ।

कल अमृत पाल सिंह जी ने अपने ब्लोग पर एक लिखा था " अब समय आ गया है धर्मनिरपेक्षता विरोधी और साम्प्रदायिक भावना का प्रचार करने वाले ब्लागर्स एवं ब्लाग के प्रचार को खत्म करने का" पहल तो काफी अच्छी है और सराहने लायक भी है । उन्हे किसी ने मेल किया था मेरे ब्लोग को लेकर कि मैं भड़काऊं लेख लिख रहा हूँ , या मेरे जैसे बहुत से लोग हैं जो इस तरह से लिखते है । वहाँ अमृत पाल जी ने मेरा लिंक भी दिया और कहा कि ये जरुरी है ,। अच्छी बात है आपने मेरा लिंक दिया , उससे लोगो को ये तो मालुम हो जायेगा कि मैंने क्या गलत लिखा है । अमृत पाल जी भी नये है ब्लोगिंग में , लेकिन जब उन्हे ये पता है कि ऐसे बहुत से लोग है लिखने वाले तो उन्होनें बस मेरा ही लिंक क्यों दिया । भाई इन सबमें सलीम , आसिफ कारीफ , और कैरानवीं भी आते हैं , तो आप उनका भी लिंख देते तो और भी अच्छा होता ।

जनाब की चिन्ता बिल्कुल जायज है और होनी भी चाहिए । जिस तरह से हिन्दू समाज को घसिटा जा रहा है क्या वो सही या इस्लाम को घसिटा जा रहा है वो सही है । किसी भी धर्म को लेकर लिखना उसकी बुराई करना बिल्कुल सही नहीं कहा जा सकता । लेकिन बात फिर बात वहीं आकर रुक जाती है "कब तक" । इस चिज की गारंटी कौन देगा कि अगर मैं लिखना बन्द कर देता हूँ इस तरह के लेखो को तो हिन्दूओं के खिलाफ कोई नहीं लिखेगा , बताना जरा मुश्किल है। बस आपसी एकता की बात करने से कुछ नहीं हो सकता , । पता तो उन्हे चलता जो इसको महशुश करते है । और अन्त में अमृत भाई से यही कहना चाहूगा कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती ।

Thursday, November 19, 2009

फिर होगी अगले बरस मुलाकात


उनकी एक झलक पाने की ख़ातिर


हम नैन बिछाए रहते हैं,


न जाने कब वो आ जाएं


इस कारण एक आँख राह में


और दूजा काम में टिकाए रखते हैं,


इंतज़ार ख़त्म हुआ


उनका दीदार हुआ,


सोचा था जब वो मिलेंगे हमसे


दिल की बात बयाँ करेंगे,


अपने सारे जज़बात उनको बता देंगे,


हाय ये क्या गजब हुआ


जो सोचा था उसका विपरीत हुआ,


वो आए..थोड़ा सा मुस्कुराए


और कह दी उन्होने ऐसी बात


जिससे दिल को हुआ आघात,


कहा उस ज़ालिम ने


मेरा हमदम है कोई और,


मेरी मंज़िल है कोई और


बस कहने आयी थी दिल की बात


फिर होगी अगले बरस मुलाकात ।।