Friday, August 7, 2009

"बलात्कार के बाद अबोध महिला बनेगी मां" - हक है?


सुप्रीम कोर्ट के तीन जज वकील की दलीलों के कायल हो गए और फैसला दे दिया कि बलात्कार की शिकार हुई लड़की को भी मा बनने का हक है
हक शब्द सुनते ही भावनाएं उमड़ने लगती हैं , रक्षकों के कान चौकन्ने हो जाते हैं। मगर अहम सवाल यह है कि क्या मानसिक अस्थिरता की शिकार उस लड़की ने यह हक मांगा है !क्या वह अपनी इच्छा से मां बनी है ?

किसी वहशी ने नारी निकेतन चंडीगढ़ में उसके साथ बलात्कारकिया , गर्भ ठहर गया और अब वकील साहिबा दलील दे रही हैं कि मां बनना उसका हक है और अदालत को उससे यह हक नहीं छीनना चाहिए। हम भी इस दलील के कायल हैं कि निजी मामलों में स्टेट या अदालत का कम से कम हस्तक्षेप हो। मगर अहम सवाल यह है कि यहां उस लड़की की बात हो रही है , जो समाज और स्टेट की जिम्मेदारी है। वह लड़की अपना अच्छा-बुरा नहीं सोच सकती और नारी निकेतन में रहकर जीवन गुजार रही है। रेप के मामले पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने भी माना था कि इस स्थिति में अबॉर्शन ही एकमात्र विकल्प है , मगर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला पलट दिया।

महिला के अबॉर्शन का विरोध कर रहीं वकील साहिबा ने तर्क दिया कि वह पहले से ही इस दुनिया में अकेली है और इस बच्चे के पैदा होने से उसे खालिस अपना कोई मिल जाएगा। बहुत ही अच्छा तर्क है। वैसे भी मां सुनते ही हमारी भावुकता हिलोरे लेने लगती है। सही बात है ,आखिर उस बेचारी औरत का कोई तो अपना होगा। मगर , इस सवाल का जवाब कौन देगा कि मानसिक रुप से अस्थिर इस औरत के बच्चे को पालेगा कौन , राज्य , अदालत या दूसरी कोई सरकारी संस्था ?

अगर बच्चा बेटी हुआ तो उसे नारी निकेतन में सक्रिय वहशियों से कौन बचाएगा ? कहीं उसका भी बलात्कार हो गया तो ? हो सकता है कि आपको मेरा तर्क अतिवादी लगे मगर क्या यह सच नहीं है कि बच्चा अनाथों की तरह , दूसरों की दया बटोरता पलेगा? और जब डॉक्टरों के तर्क से सहमत होकर अदालत भी यह मान रही है कि यह महिला अपना अच्छा-बुरा नहीं सोच सकती , तो वह बच्चे की परवरिश कैसे करेगी ?कैसे उसे अपनी ममता की छांह में लेगी और दुनिया की धूप से बचाएगी ?

राखी सावंत और राहुल गांधी पर बहस करने वाले हम भारतीयों को यह मसला गैरजरूरी लगता है ? मां दुनिया का सबसे सुंदर और पवित्र शब्द है और जन्म देना प्रकृति को विस्तार देने जैसा। मगर तभी जब यह अपनी इच्छा से किया गया हो , दुर्घटनावश या बिना सहमति के नहीं। अगर लड़की मानसिक रूप से स्वस्थ होती और किन्हीं परिस्थितियों में हुए रेप के चलते उसे गर्भ ठहरता , तो यह पूरी तरह से उसका अपना फैसला होता कि उसे बच्चे को जन्म देना है या नहीं।

आप इस बारे में क्या सोचते हैं ? इस बच्चे का भविष्य क्या होगा?कहीं यह बच्चा भी वही सब झेलने के लिए दुनिया में तो नहीं आएगा ,जो इसकी अबोध मां ने झेला ?

5 comments:

  1. यही तो है कि हम आज भी अपनी जिंदगी अपनी मर्जी से नहीं जी सकते...कोई बलात्कार करता है तो उसके मां बनने पर सुनवाई होने लगती है लेकिन अपराधियों के बारे में कड़े कानून बनाने से बाज आते हैं......

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  2. एक ने उस अबोध के साथ बलात्कार कर उसे गर्भवती बना दिया। उस गर्भ में अंड तो उस अबोध का ही था। यह ठीक है कि गर्भपात से उस पुरुष का अंश समाप्त हो जाएगा जिस ने बलात्कार किया। लेकिन वह अंड भी साथ ही समाप्त हो जाएगा जो उस अबोध के शरीर का अंश है। क्या उसे समाप्त करने का किसी को अधिकार है। है तो उस अबोध को। लेकिन वह तो अपना भला-बुरा नहीं सोच सकती है। उस में तो निर्णय लेने की क्षमता नहीं है। उस की ओर से कौन निर्णय ले? कानून कहता है कि अबोध, अवयस्क और विकृत मस्तिष्क की ओर से उस का संरक्षक या न्यायालय निर्णय ले सकता है। न्यायालय ने अपने विवेक और अधिकार से निर्णय लिया है। आप आलोचना कर सकते हैं। लेकिन यह निर्णय सही है। आखिर गर्भपात उस अबोध का दूसरा बलात्कार ही तो होगा?

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  3. दिनेश जी ने सही उत्तर दिया है ....अबार्शन एक मासूम की हत्या ही तो है .....भविष्य में क्या होगा क्या नहीं ये अभी से सोच कर फैंसला लेना सही नहीं ...!!

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  4. ACHHA LIKHA HAI..... MERE VICHAAR SE YE HAQ SIRF US LADKI KO MILCHNAA CHAHIYE JO ISKAA SHIKAAR HAI... JO VO KARNA CHAAHE VO KARE AUR SAB USKAA SAMMAAN KAREN.....

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