Sunday, August 23, 2009

"अमीर बढें और गरीब" ?

फोब्बर्स पत्रिका मे अमीरो की सूची मे लागातार भारतीयो की संख्या बढ रही है। जिस तरह से भारत विकास के पथ पर चल रहा है ये जानकर हैरानी नही होनी चाहिये। अगर देखा जाये तो ये एक आश्चर्य चकित करने वाला आकङा है, क्यो की अगर आकङे और रिपोर्ट देखे तो पुरे एशिया मे सबसे ज्यादा गरीब भी भारत मे ही बसते है।
आप कह सकते हैं कि ये कमाल हमारे बढते अर्थव्वस्था का है जिसका दायरा नित्य दिंन नये आयाम छू रहा है। जहाँ तक मेरा मानना है जिस तरह से अमीरों की सख्यां बढ रही है उसी प्रकार इनकी सामाजिक जिम्मेदारी भी बढनी चाहिए, जो की नही हो रही। अमीरों को कोशिश करनी चाहिए कि उनके पैसे से गरीबो का भला हो सके, लेकिन सामाजिक कल्याण तो दूर वे कौङी दिखा रहे है। मेरी बात उनको कङवी तो जरुर लगेगी लेकिन अगर देखा जाये तो हमारे विकास के लिए ये बहुत जरुरी है। जिस प्रकार से अमिरो की सख्यां बढ रही है साथ ही गरिबी भी है तो हमारे सामाज मे आर्थिक असमानतयें भी बढ रही है जो की सोचनिय है। हमारे यहाँ के अमीरों का कहना है अगर वे सामाजिक कार्य मे उलझे तो उनका व्यवसाय प्रभावित होगा , जो की सरासर गलत है इस बात मे देखा जाये तो कुछ भी सच्चाई नही है। अगर ऐसा होता तो बिलगेट्स अपने संपत्ति का ९५ प्रतिशत हिस्सा मानव सेवा मे जुङे फांउडेशन मे नही दे पाते। दुनियाँ के दूसरे सबसे अमीर आदमी वारेन वुफेट भी एक आदर्श के रुप मे है, उन्होने अपने समंत्ति का ९० प्रतिशत बिल गेट्स के फाउडेंशन को दान करने की बात कही है। वहीं अगर देखा जाये तो भारतियो अमीरों मे इस बात की भिन्नता है विदेशी अमिरो से, । अमेरिका मे कई ऐसे व विश्वविद्दालय है जो की चैरिटी के भरोसे चलते हैं। भारत मे भी चैरिटी का चलन है। गांधी जी के दौर मे जमशेद जी टाटा और घनश्याम बिंङला जैसे लोगो ने सामाजिक कार्य के लिए कई काम किये और चैरिटी दान भी दिया। लेकिन अब भूमडंलीकरण के चलते ये दौर रुक सा गया है और ये सामाजिक जिम्मेदारी को आज के अमीर लोग अपनाने से इनकार कर रहे हैं। आज भारत को बहूमुखी विकास (ग्रामीण विकास, शिक्षा , स्वास्थय आदि) के लिए इन उद्दोगकर्मियों के पैसो की जरुरत है । ऐसा नहीं है की सरकार ये बात समझती नही कितुं उसके पास कोई रोडमैप नही है कि वह कारॅपोरेट जगत को दिशा दे सके। अमीरों को याद रखना चाहिए कि उनकी जामत मे बढोत्तरी के कारण एक ऐसी सामानातंर व्यवस्था कायम हो रही है जो की देश के विकास के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। अमीरो की संख्या मे बढोत्तरी यकीनन अच्छी बात है लेकिन यह भी जरुरी है कि इसका लाभ सभी लोगो को को हासिल हो। कारपोरेट जगत खुद सोचे कि उनके कारोबार में इजाफे का प्रतिफल अगर वचिंत तबको मे वृद्धि के तौर पर हो रहा है तो ये कहां तक जायज है।।।

12 comments:

  1. आपने सही मुद्दा उठाया है | पर आज इस बात पे चर्चा तक नहीं होती | सभी लगभग ये मान बैठे हैं की उद्योग जगत का समाज के प्रति कोई दायित्वा नहीं उसे सिर्फ अपने व्यापार से मतलब है | ये दुर्भाग्यपूर्ण स्थिती है |

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  2. समाज के प्रति चिंतनशील पोस्ट
    सार्थक मुद्दे उठाये हैं आपने
    आभार


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  3. एक अतिसम्वेदनशील रचना का परिचायक है यह रचना ......बेहद खुबसूरत लेख

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  4. बहुत ही सुंदर तरीके से आपने सच्चाई का आलेख किया है! बिल्कुल सही मुद्दे पर आपने बात छेड़ा है! बहुत बढ़िया लगा आपका ये लेख!

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  5. मिथिलेशजी ये ज्वलंत मुद्दा है इसके लिए सार्थक कदम की जरूरत है हमारा कार्पोरेट जगत भी नेताओं की तरह सिर्फ अपने स्वार्थ को ही देखता है ,इसके लिए एक आन्दोलन की जरूरत है |

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  6. चिंतनशील पोस्ट...बढ़िया लगा आपका ये लेख.

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  7. समाज के लिये चिन्तनशील आलेख बहुत सही और संवेदनशील विषय है। मगर हर कोई मौन साधे बैठा है बोले कौन सभी उद्दमी और नेता एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं आभार्

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  8. समाज के लिये चिन्तनशील आलेख बहुत सही और संवेदनशील विषय है। मगर हर कोई मौन साधे बैठा है बोले कौन सभी उद्दमी और नेता एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं आभार्

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  9. इस बारे में सोचने के लिए किसके पास फुरसत है, वो कहावत है कि हर कोई उगते सूरज को ही नमस्कार करने की जुगत में रहता है ! एक अच्छे सवाल की और लोगो का ध्यान खींचने के लिए बधाई !

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  10. आपके द्वारा उठाया गया मुद्दा बहुत ही लाजवाब होता है,। बहुत खुब लिखा है आपने।

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  11. गंभीर मुद्दा है दुबे जी। आपका लेख बङा ही शस्कत है।

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