Sunday, September 6, 2009

"विश्वास नहीं होता, लेकिन सच है"

विश्वास तो नही होता लेकिन करना पङ रहा है, शायद आप भी पढने के बाद विश्वास कर लेंगे। क्या आपको पता है विकसित देशो में जितना खाना बर्बाद होता है उससे 1.5 अरब लोगो का साल भर तक पेट भर तक सकता है जी हाँ सही सुना आपने। इन देशो की सूची मे अमरिका और ब्रिटेन सबसे आगे है, यहाँ संपन्न लोग रेस्त्रां मे थोङा बहुत खाना शेष छोङ देते है। वे एक छङ के लिए भी नही सोचते कि इस भोजन को बनाने मे विभिन्न स्तरो पर कितनी मेहनत करनी पङी होगी। यदि इस बचे हुए भोजन को गरिब लोगो को खिला दिया जाता तो इसका सदुपयोग हो जाता। अगर देखा जाये तो हम भी इससे कम नही है हमारे घर से भी न जाने कितना खाना प्रतिदिन कुङेदान मे जाता है।

अगर हम अपने अतित को देंखे तो हमे इस बात का एहसास होगा की जो हम कर रहें है वह कितना भयानक हो सकता है। मैं आपको लोगो बताना चाहूंगा कि 1840 के दशक मे आयरलैंड मे अनाज की कमी के कारण हजारो लोग मौत के मुंह मे समा गये थे, । खाना बर्बाद करने वाले शायद यह भुल जाते है कि 1950 के दशक मे यूरोप और एशिया के कई देशो मे भयानक अकाल पङा था, जिस कारण हजारो लोगो की मौत हो गई थी। विवाह समारोह मे भी खाने की बर्बादी जोर सोर से होती है, इस बर्बादी को रोकने के लिए विनोबा भावे की दत्तक पुत्री निर्मला देशपाडें ने कुछ लोगो को मिलाकर एक ग्रुप बनाया, इनका कहना था कि जितना हम खा सकें उतना ही खाना लें , और जो खाना जूठा ना हो या जो बचा हो उसे किसी अनाथयालय या गरिब बस्तियों में भेज दि जाये,। लेकिन अफसोस निर्मला जी का निधन हो गया और ये प्रयास सफल न हो सका। बात जब भोजन की बर्बादी की आती है तो बङा दुःख होता, उत्तर प्रदेश व बिहार मे अब भी मृत्यु के बाद तेरहवाँ करते है और उसमे ना जानें कितना भोजन का नुकसान होता है। दुःख तब और होता है जब ये लोग इस दिखावे के लिए साहूकारो व मंहाजनो से रुपये ऊधार लेते है, और वे कर्ज अदा करते-करते चले जाते है, और उनकी भावी पीढी़ उस कर्ज को भरने मे लग जाती है।

कर्ज का बोझ पीढी़ दर पीढी़ चलता रहता है और अंत मे उस किसान को शहर जाकर मजदूरि करने को मजबूर होना पङता है। क्या समाज के ठेके दार इस गंभीर समस्या पर कभी ध्यान देगें।
विकासशील देशो के जागरुक लोग यदी इस बात को जल्द ही ना संमझे तो उन्हे इसका गंभीर परीणाम देखने को मिल सकता है। यदि भोजन की बर्बादी अविलंब नहीं रोकी गई तो वह दिन दूर नहीं जब संसार के विभिन्न देशो को पहले की तरह ही अकाल का सामना करना पङेगा।

19 comments:

  1. आप हमेशा से एक सार्थक पोस्ट लेकर हाजिर होते है .........मुझे बहुत ही अच्छा लगता है ......बेहद सार्थक...

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  2. दुवे जी,

    अच्छे रचना प्रस्तुत करते है ।

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  3. जल संकट तो उत्पन हो ही चुका है.....अगर यही हाल रहा तो निकट भविष्य में अन्न संकट पैदा होना भी निश्चित ही है....

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  4. wakai main aankhen kholti post, jinka aakdon ke saath uchit samarthjan kiya gaya hai....

    खाना बर्बाद करने वाले शायद यह भुल जाते है कि 1950 के दशक मे यूरोप और एशिया के कई देशो मे भयानक अकाल पङा था, जिस कारण हजारो लोगो की मौत हो गई थी। विवाह समारोह मे भी खाने की बर्बादी जोर सोर से होती है, इस बर्बादी को रोकने के लिए विनोबा भावे की दत्तक पुत्री निर्मला देशपाडें ने कुछ लोगो को मिलाकर एक ग्रुप बनाया, इनका कहना था कि जितना हम खा सकें उतना ही खाना लें , और जो खाना जूठा ना हो या जो बचा हो उसे किसी अनाथयालय या गरिब बस्तियों में भेज दि जाये,

    delhi main to abhi bhi ek (ya shayad kai ngo's hain aisi)

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  5. बहुत ज्वलंत मगर उपेक्षित विषय उठाया आप ने..हमारे यहाँ अन्नदान महादान माना गया है...मगर फिर भी..

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  6. बहुत सही पोस्‍ट लिखा है आपने .. जहां एक ओर खाने की इतनी बर्वादी होती है .. वहीं कहीं लोग भूखे सोने को मजबूर हैं !!

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  7. बहुत अच्छा विषय उठाया है आपने. खाना बेकार होने से बचाना भी है और उसे वंचित मुखों तक पहुंचाना भी है, यह दोनों बातें हों तभी प्रयास सार्थक हो सकता है.

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  8. विचारणीय पोस्ट!

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  9. बहुत सुंदर ढंग से आपने सही मुद्दे को लेकर प्रस्तुत किया है! ये बात तो बिल्कुल सही है कुछ लोग एक वक़्त खाना खाने के लिए तरस जाते है और कुछ लोग खाना बरबाद करते हैं क्यूंकि उनके पास तरह तरह के खाने होते हैं जिसकी आवश्यकता नहीं होती!

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  10. YE KEVAL VIDESH HI NAHI HAMAARE DESH KI BHI SAMASYA HAI JAHAAN BHOOKH SE MARNE VAALE HAZAARON LOG HAIN AUR KOI SAMAADHAAN NAZAR NAI AATA ......
    IS BAAT KE LIYE SAMAAJIK MUHIM CALAANE KI JAROORAT HAI JO NIRMALA JI NE SURU KARI THEE ....

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  11. एकदम सही बात कही आपने जहा तक भोजन के दुरुपयोग का प्रश्न साल भर पहले तक था, और एक अलग परिपेक्ष में वाकई विचारणीय है! लेकिन शायद आपको मालूम हो कि आज स्थित एकदम उल्टी है, इनकी भी हालत पतली है ! शाम को ये लोग भी किफायती रेस्त्रा ढूँढ़ते फिरते लन्दन और न्युयोर्क की गलियों में नजर अ जायेंगे !

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  12. मिथिलेश जे कल ये पोस्ट देख नहीं पाई मगर देर आये दुरुस्त आये बहुत सार्थक विषय उठाया है बहुत खुशी होती जाब आज कल के किसी उवा को इतने गम्भीर विषय पर चिन्तन करते देखती हूँ । बहुत अच्छा लिख रहे हैं शुभकामनायें आभार्

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  13. thanx.chote ho par bada sochte ho.god bless u.


    ek jagah aur barbaad hota hai bhojan......

    yagyon mein phoonk
    dete hain ghee aur mithai ,
    lagata hai bura ,mang le
    roti jo bhikhari.

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  14. mithilesh ji,
    isee tarah sab log sochne lagen to duniya me koi bhookha na rahe. is sakaratmak chintan ka swagat hai.

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  15. Aapki baat sochne ko majboor karti hai.

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  16. सुन्दर आलेख। बहुत-बहुत बधाई

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