Tuesday, September 8, 2009

"न जाने क्यों"

न जाने क्यों हर पल याद आती है वो,

न जाने क्यों दिल में उतर आती है वो,



न जाने क्यों इतना सताती है वो,


न जाने क्यों इतना रुलाती है वो।।


न जाने क्यों नीदं नही आती ,


न जाने क्यों ख्वाबो मे आती है वो



न जाने क्यों मैं भुल नही पाता उसे,



न जाने क्यों इतना तङपाती है वो।।


न जाने क्यों पास नही आती है वो,



न जाने क्यों मिलने से कतराती है वो,


न जाने क्यों मैंने उससे प्यार किया ,


न जाने क्यों दिल ने उसपर एतबार किया।।

न जाने क्यों दिल बेवफा को पहचान नही पाया,

न जाने क्यों उसकी नियत को भाँप नही पाया,


न जाने क्यों अब भी प्यार है मुझे उससे ,


न जाने क्यों अब भी मिलने की आस है उससे।।

18 comments:

  1. आस बनाए रखने से मनचाही मुरादें ज़रूर पूरी होती हैं.

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  2. वाह बेटा जी जरा संभल के अब अच्छी तरह परख लेना फिर इतबार करना दुनिया बहुत खराब है। हा हा हा बहुत सुन्दर रचना है वैसे आशा ही जीवन है बहुत बहुत आशीर्वाद्

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  3. न जाने क्यों अब भी प्यार है मुझे उससे ,


    न जाने क्यों अब भी मिलने की आस है उससे।।

    aas kabhi nahi chhodna chahiye..... ummeed hi san kuch hai.....

    bahut khoob...... bhai....

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  4. दिल के भाव लिखे गए लगते हैं !!

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  5. दुबे साहब,

    एक शेर याद आ रहा है, पेश ए खिदमत है :

    बरसात में रेगिस्तान भी चहक जाते है !
    बहारो में कांटे भी महक जाते है !
    निर्दोष जवानी में मत झुंझलाओ ए दोस्त !
    इस उम्र में अक्सर सभी बहक जाते है !

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  6. DUBE SAAHAB ......... AKSAR PYAAR MEIN AISA HI HOTA HAI .... YE TO SHURUAAT HAI..... AAGE AAGE DEKHIYE HOTA HAI KYA ......

    SUNDARTA SE LAPETA AI DIL KE JAJBAATON KO ...... DILKASH RACHNA HAI .....

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  7. बहुत ही खुब्सूरत रचना है.......सिर्फ प्यार है दुबे जी .......और कुछ नही .....

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  8. बढिया लिखा है भाई | इश्क का दौर नाजुक होता है | जरा सम्हालो अपने आप को |

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  9. na jante hue bhi bahut khoobsurat rachna likh di jo jan jate to gazab ho jata...

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  10. Wah aapki kawita aur mehfooj Ali ji kee bhee kafi samantahai doo kee priy sirf kwabon me hee milati hain.

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  11. बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति से लिखी हुई आपकी ये कविता दिल को छू गई!

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  12. मिथिलेश जी,

    निर्मला जी ने बिल्कुल ठीक कहा है, जरा संभल के यह राहें चिकनी और फिसलन भरी हैं बहुत।

    वैसे, रचना अच्छी है और शिल्प, शब्द संयोजन भी अच्छा लगा।

    पत्रिका-गुंजन / मुकेश कुमार तिवारी

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  13. न जाने क्यों दिल ने उसपर एतबार किया।।
    न जाने क्यों दिल बेवफा को पहचान नही पाया,

    न जाने क्यों उसकी नियत को भाँप नही पाया,

    कहते हैं 'राज़'प्यार वफ़ा का है दूजा नाम!!!

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  14. yahi aas manzil tak pahunchayegi. lage raho mithilesh bhai.

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  15. लाजवाब व उम्दा रचना बहुत-बहुत बधाई।

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