Thursday, September 17, 2009

"रामसेतु "

हम भारतीय विश्व की प्राचीनतम सभ्यता के वारिस है तथा हमें अपने गौरवशाली इतिहास तथा उत्कृष्ट प्राचीन संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। किंतु दीर्घकाल की परतंत्रता ने हमारे गौरव को इतना गहरा आघात पहुंचाया कि हम अपनी प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति के बारे में खोज करने की तथा उसको समझने की इच्छा ही छोड़ बैठे। परंतु स्वतंत्र भारत में पले तथा पढ़े-लिखे युवक-युवतियां सत्य की खोज करने में समर्थ है तथा छानबीन के आधार पर निर्धारित तथ्यों तथा जीवन मूल्यों को विश्व के आगे गर्वपूर्वक रखने का साहस भी रखते है। श्रीराम द्वारा स्थापित आदर्श हमारी प्राचीन परंपराओं तथा जीवन मूल्यों के अभिन्न अंग है। वास्तव में श्रीराम भारतीयों के रोम-रोम में बसे है। रामसेतु पर उठ रहे तरह-तरह के सवालों से श्रद्धालु जनों की जहां भावना आहत हो रही है,वहीं लोगों में इन प्रश्नों के समाधान की जिज्ञासा भी है। हम इन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयत्‍‌न करे:- श्रीराम की कहानी प्रथम बार महर्षि वाल्मीकि ने लिखी थी। वाल्मीकि रामायण श्रीराम के अयोध्या में सिंहासनारूढ़ होने के बाद लिखी गई। महर्षि वाल्मीकि एक महान खगोलविद् थे। उन्होंने राम के जीवन में घटित घटनाओं से संबंधित तत्कालीन ग्रह, नक्षत्र और राशियों की स्थिति का वर्णन किया है। इन खगोलीय स्थितियों की वास्तविक तिथियां 'प्लैनेटेरियम साफ्टवेयर' के माध्यम से जानी जा सकती है। भारतीय राजस्व सेवा में कार्यरत पुष्कर भटनागर ने अमेरिका से 'प्लैनेटेरियम गोल्ड' नामक साफ्टवेयर प्राप्त किया, जिससे सूर्य/ चंद्रमा के ग्रहण की तिथियां तथा अन्य ग्रहों की स्थिति तथा पृथ्वी से उनकी दूरी वैज्ञानिक तथा खगोलीय पद्धति से जानी जा सकती है। इसके द्वारा उन्होंने महर्षि वाल्मीकि द्वारा वर्णित खगोलीय स्थितियों के आधार पर आधुनिक अंग्रेजी कैलेण्डर की तारीखें निकाली है। इस प्रकार उन्होंने श्रीराम के जन्म से लेकर 14 वर्ष के वनवास के बाद वापस अयोध्या पहुंचने तक की घटनाओं की तिथियों का पता लगाया है। इन सबका अत्यंत रोचक एवं विश्वसनीय वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक 'डेटिंग द एरा ऑफ लार्ड राम' में किया है।




महर्षि वाल्मीकि ने बालकाण्ड के सर्ग 18 के श्लोक 8 और 9 में वर्णन किया है कि श्रीराम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ। उस समय सूर्य,मंगल,गुरु,शनि व शुक्र ये पांच ग्रह उच्च स्थान में विद्यमान थे तथा लग्न में चंद्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान थे। ग्रहों,नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति इस प्रकार थी-सूर्य मेष में,मंगल मकर में,बृहस्पति कर्क में, शनि तुला में और शुक्र मीन में थे। चैत्र माह में शुक्ल पक्ष नवमी की दोपहर 12 बजे का समय था।

जब उपर्युक्त खगोलीय स्थिति को कंप्यूटर में डाला गया तो 'प्लैनेटेरियम गोल्ड साफ्टवेयर' के माध्यम से यह निर्धारित किया गया कि 10 जनवरी, 5114 ई.पू. दोपहर के समय अयोध्या के लेटीच्यूड तथा लांगीच्यूड से ग्रहों, नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति बिल्कुल वही थी, जो महर्षि वाल्मीकि ने वर्णित की है। इस प्रकार श्रीराम का जन्म 10 जनवरी सन् 5114 ई. पू.(7117 वर्ष पूर्व)को हुआ जो भारतीय कैलेण्डर के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि है और समय 12 बजे से 1 बजे के बीच का है।



वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड (2/4/18) के अनुसार महाराजा दशरथ श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते थे क्योंकि उस समय उनका(दशरथ जी) जन्म नक्षत्र सूर्य, मंगल और राहु से घिरा हुआ था। ऐसी खगोलीय स्थिति में या तो राजा मारा जाता है या वह किसी षड्यंत्र का शिकार हो जाता है। राजा दशरथ मीन राशि के थे और उनका नक्षत्र रेवती था ये सभी तथ्य कंप्यूटर में डाले तो पाया कि 5 जनवरी वर्ष 5089 ई.पू.के दिन सूर्य,मंगल और राहु तीनों मीन राशि के रेवती नक्षत्र पर स्थित थे। यह सर्वविदित है कि राज्य तिलक वाले दिन ही राम को वनवास जाना पड़ा था। इस प्रकार यह वही दिन था जब श्रीराम को अयोध्या छोड़ कर 14 वर्ष के लिए वन में जाना पड़ा। उस समय श्रीराम की आयु 25 वर्ष (5114- 5089) की निकलती है तथा वाल्मीकि रामायण में अनेक श्लोक यह इंगित करते है कि जब श्रीराम ने 14 वर्ष के लिए अयोध्या से वनवास को प्रस्थान किया तब वे 25 वर्ष के थे।


वाल्मीकि रामायण के अनुसार वनवास के 13 वें साल के मध्य में श्रीराम का खर-दूषण से युद्ध हुआ तथा उस समय सूर्यग्रहण लगा था और मंगल ग्रहों के मध्य में था। जब इस तारीख के बारे में कंप्यूटर साफ्टवेयर के माध्यम से जांच की गई तो पता चला कि यह तिथि 5 अक्टूबर 5077 ई.पू. ; अमावस्या थी। इस दिन सूर्य ग्रहण हुआ जो पंचवटी (20 डिग्री सेल्शियस एन 73 डिग्री सेल्शियस इ) से देखा जा सकता था। उस दिन ग्रहों की स्थिति बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी वाल्मीकि जी ने वर्णित की- मंगल ग्रह बीच में था-एक दिशा में शुक्र और बुध तथा दूसरी दिशा में सूर्य तथा शनि थे।




किसी एक समय पर बारह में से छह राशियों को ही आकाश में देखा जा सकता है। वाल्मीकि रामायण में हनुमान के लंका से वापस समुद्र पार आने के समय आठ राशियों, ग्रहों तथा नक्षत्रों के दृश्य को अत्यंत रोचक ढंग से वर्णित किया गया है। ये खगोलीय स्थिति श्री भटनागर द्वारा प्लैनेटेरियम के माध्यम से प्रिन्ट किए हुए 14 सितंबर 5076 ई.पू. की सुबह 6:30 बजे से सुबह 11 बजे तक के आकाश से बिल्कुल मिलती है। इसी प्रकार अन्य अध्यायों में वाल्मीकि द्वारा वर्णित ग्रहों की स्थिति के अनुसार कई बार दूसरी घटनाओं की तिथियां भी साफ्टवेयर के माध्यम से निकाली गई जैसे श्रीराम ने अपने 14 वर्ष के वनवास की यात्रा 2 जनवरी 5076 ई.पू.को पूर्ण की और ये दिन चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी ही था। इस प्रकार जब श्रीराम अयोध्या लौटे तो वे 39 वर्ष के थे (5114-5075)।



वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम से श्रीलंका तक समुद्र के ऊपर पुल बनाया। इसी पुल को पार कर श्रीराम ने रावण पर विजय पाई। हाल ही में नासा ने इंटरनेट पर एक सेतु के वो अवशेष दिखाए है, जो पॉक स्ट्रेट में समुद्र के भीतर रामेश्वरम(धनुषकोटि) से लंका में तलाई मन्नार तक 30 किलोमीटर लंबे रास्ते में पड़े है। वास्तव में वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि विश्वकर्मा की तरह नल एक महान शिल्पकार थे जिनके मार्गदर्शन में पुल का निर्माण करवाया गया। यह निर्माण वानर सेना द्वारा यंत्रों के उपयोग से समुद्र तट पर लाई गई शिलाओं, चट्टानों, पेड़ों तथा लकड़ियों के उपयोग से किया गया। महान शिल्पकार नल के निर्देशानुसार महाबलि वानर बड़ी-बड़ी शिलाओं तथा चट्टानों को उखाड़कर यंत्रों द्वारा समुद्र तट पर ले आते थे। साथ ही वो बहुत से बड़े-बड़े वृक्षों को, जिनमें ताड़, नारियल,बकुल,आम,अशोक आदि शामिल थे, समुद्र तट पर पहुंचाते थे। नल ने कई वानरों को बहुत लम्बी रस्सियां दे दोनों तरफ खड़ा कर दिया था। इन रस्सियों के बीचोबीच पत्थर,चट्टानें, वृक्ष तथा लताएं डालकर वानर सेतु बांध रहे थे। इसे बांधने में 5 दिन का समय लगा। यह पुल श्रीराम द्वारा तीन दिन की खोजबीन के बाद चुने हुए समुद्र के उस भाग पर बनवाया गया जहां पानी बहुत कम गहरा था तथा जलमग्न भूमार्ग पहले से ही उपलब्ध था। इसलिए यह विवाद व्यर्थ है कि रामसेतु मानव निर्मित है या नहीं, क्योंकि यह पुल जलमग्न, द्वीपों, पर्वतों तथा बरेतीयों वाले प्राकृतिक मार्गो को जोड़कर उनके ऊपर ही बनवाया गया था।


25 comments:

  1. बहूत अच्छा लेख है
    यदि भारत को बचाना है तो आप जैसे युवाओ को अपनी कलम की लडाई लड़नी पड़ेगी
    लेख के लिए शुभकामना !

    और हाँ
    विरोधी सदा विरोध ही करंगे इसमे से आगे का रास्ता ही मिलता है

    नहीं रुकना नहीं थकना सतत चलना सतत चलाना सतत चलना

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  2. सलीम मै ये बात तुम्हे बताना जरुरी नही समझता । क्योंकी जहाँ तक मुझे लगता है कि तुम पुर्वाग्रह से पिड़ीत हो अच्छा होगा कि किसी जानकर डाक्टर से मिलकर अपना इलाज करवा लो। मै तुम्हे ये इसलिए कह रहा हूँ क्योकीं तुम हिन्दी ब्लोग से है, और यहाँ एक दुसरो का ख्याल रखा जाता है।

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  3. मिथिलेश भाई.........गज़ब कर दिया
    बहुत ही कमाल का आलेख लिखा । पढ़ कर आनन्द भी मिला और गहन जानकारी भी...

    आपका बहुत बहुत धन्यवाद इस अनुपम पोस्ट के लिए

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  4. कृपया डेटिंग द एरा ऑफ राम पुस्तक के प्रकाशक का नाम पता दे तथा नासा की साइट का पता भी यहाँ दे । धन्यवाद ।

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  5. बहुत ही शानदार लेख लिखा है आपने! बढ़िया लगा और अच्छी जानकारी भी प्राप्त हुई!

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  6. बेजोड जानकारी .. बहुत अच्‍छा आलेख !!

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  7. मिथिलेश भाई,
    लेख के लिए शुभकामना !

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  8. पर चैत्र मास .. दस जनवरी को .. ऐसा तो नहीं होता !!

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  9. जन्‍म का वर्ष 5114 की जगह 5164 होना चाहिए .. क्‍यूंकि तब ही 5189 में वे 25 वर्ष के होंगे !!

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  10. बहुत सारगर्भित आलेख है। आभिभूत हूँ कि तुम जैसे युवा अब भी इस देश मे हैं और देश और अपनी संस्कृति के प्रति सजग हैं। बहुत अच्छी जानकारी है। बहुत बहुत शुभकामनायें

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  11. @ संगीता पुरी जी,

    5114 ई.पू. से 5089 ई.पू. तक हमें तो सही लगा,

    @'(20 डिग्री सेल्शियस एन 73 डिग्री सेल्शियस इ)'

    पर यहाँ डिग्री के साथ सेल्शियस शब्द तो नहीं होना चाहिए,

    क्रमश: 'अक्षांश' और 'देशांतर' शब्दों का प्रयोग होना चाहिए,

    ( यह टिप्पणी विनम्र समझी जाय )

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  12. जी बिवेक जी सहमत हूँ आपके बातो से। मैंने ध्यान नहीं दिया वरना वह हिन्दी मे ही होता।

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  13. काफी समय बाद इतना अच्छा आलेख पढ़ने को मिला। खूब मेहनत से तैयार किया गया लगता है। एक अच्छे आलेख के लिए धन्यवाद।
    हमारी शुभकामनाएं सदा आपके साथ हैं। ईश्वर आपकी लेखनी को और सशक्त करें।

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  14. @ विवेक जी .. सारी , वर्ष के लिए मैने गलत गणना कर ली .. पर चैत्र महीना तो जनवरी में नहीं आता !!

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  15. बहुत अच्छा लेख !

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  16. बहु खूब...राम पर भी सर्च चल रही है। ये तो अच्छी बात है। कुछ नया तो होना चाहिए। बहुत खूब लिखा है।

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  17. बहुत प्रशंसनीय काम किया है आपने. भारतीय विज्ञान, दर्शन और रामसेतु के बारे में नई जानकारी दी है. उम्मीद है देश की नई पीढ़ी अपनी धरोहर बचाने के लिए आगे आएगी.

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  18. नमस्कार, आपने मुझे देखा है इस बात का मै यकीन करना तो चाहता हूँ लेकिन खैर जाने दीजिये, बाकि खैर ये बात आपकी बिलकुल सही है की मै काफी बुजुर्ग हूँ पुरे 32 साल का बुढा हूँ मै और जहां तक रही बात की मै क्या दिखाना चाहता हूँ तो मै कुछ नहीं दिखाना चाहता मै सिर्फ अपने ब्लॉग को सबकी रूचि का बनाना चाहता हूँ और ये भी चाहता हूँ की युवा लोग भी ब्लॉग और ब्लोगिंग से जुड़े

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  19. post bahut badhi thi isliye padhe bina comment nahi kar sakti thi..aj poori post padhi..kyee cheeze jo hum nahi jante blog unke liye ek achha jariya hai...post achhi lagi...

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  20. " bahut kimti jankari ke liye aapka sukrgujar hu....kadi mahenat ki hai aapne aisa pratit hota hai ye padhker ...bahut badhiya bhai "

    ----- eksacchai {AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

    http://hindimasti4u.blogspot.com

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  21. मिथिलेश भाई आपने मिहनत तो की है पर तकलीफ इस बात का हो रहा है की आपने बिना जाने ही भटनागर जी का समर्थन कर दिया है |

    हमारे कुछ हिन्दू ब्लॉगर बंधू जाने अनजाने भटनागर जैसे लोगों का समर्थन कर देते हैं | हिन्दू ब्लॉगर बंधुओं से मेरा नम्र निवेदन है की वैदिक सभ्यता पर लिखने से पहले वैदिक सभ्यता की कुछ प्रमाणिक पुस्तक उठा कर जांच लें की आप जो लिखने जा रहे हैं वो सही है या नहीं |

    समय मिले तो मेरा आलेख पढिये की भटनागर जी कैसे गलत है : http://raksingh.blogspot.com/2009/09/blog-post_21.html

    आपके और मेरे आलेख पर कृपया सार्थक बहस कीजिये ताकि लोगों मैं भ्रम ना फैले |

    आशा है आप इस टिप्पणी को अन्यथा ना लेकर एक सर्तःज बहस मैं भाग लेंगे | धन्यवाद !

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  22. मिथिलेश जी, आपकी पसंदीदा पुस्तक मैं आपने 'रामायण' लिखा है | कभी पढा भी है या यूँ ही लिख दिया?

    यदि रामायण उल्टे होंगे तो ये आपको पता होना चाहिए की श्री राम जी त्रेता युग मैं अवतार लिए थे |

    यदि आपके और भटनागर जी के दिए तारीख 10 जनवरी, 5114 ई.पू. को यदि भगवान् राम का जन्म दिन मान लिए जाए तो फिर भगवन राम त्रेता नहीं द्वापरयुगिन हो जायेंगे |

    अब ये भी बताने की कृपा करें की आखिर भगवान् राम रामायण के अनुसार त्रेता युग मैं थे ये आपके (भटनागर जी) के कहे अनुसार द्वापरयुगिन ? आपके जवाब का इतजार रहेगा | जवाब इसी पोस्ट मैं टिप्पणी के रूप में दे दीजिये, मैं आके पढ़ लूंगा |

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  23. तार्किक और विश्लेषणपूर्ण ! हाँ ,रामसेतु एक पूर्व से उपस्थित कुदरती रास्ते का पुनरुद्धार /पुननिर्माण अवश्य था ! राम ने उस सेतु का नामकरण खुद नील सेतु किया था -यह थी एक महान व्यक्ति की विनयशीलता !

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  24. सुन्दर आलेख। बहुत-बहुत बधाई

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