Friday, September 25, 2009

"भगवान मनु स्त्री विरोधी थे, ये कहना कितना जायज"

हमारे समाज में कुछ प्रगतिशील महिलाओं का मानना है कि भगवान मनु स्त्री विरोधी थे। क्या जो मनु मनु-स्मृति हम पढ़ते और देखते है वह प्रमाणिक है ,, और अगर है तो कितने प्रतिशत ,, क्या ये वही मनु-स्मृतिहै जो भगवान् मनु ने लिखी थी और पूर्ण शुद्ध रूप में हमारे सामने है ,,,, अगर ऐसा है तो इसके श्लोको में इतना विरोधा भाष कैसे ,,, लिखने वाला एक चतुर्थ श्रेनी का लेखक भी जब अपने विषय के प्रतिकूल नहीं होता तो भगवान् मनु ने अपनी एक ही पुस्तक में इतना विरोध भाष कैसे लिख दिया ,,, एक जगह वो स्त्रियों की पूजा की बात करते है और दूसरी जगह उनकी दासता की ,, कही न कही कोई न कोई घेल मेल तो है,,,, अब वो घेल मेल क्या है उसे देखने के लिए हमें कुछ विद्वानों की ओर ताकना होगा और उनके कई शोध ग्रंथो को खगालना होगा ,,, यहाँ पर ये बहुत महत्व पूर्ण तथ्य है की हमारे जयादातर गर्न्थो का पुनर्मुद्रण और पुनर्संस्करण अग्रेजी शासन में हुआ और जयादातर अंग्रेज विद्वानों के द्बारा ही हुआ ,,, जिनका एक मात्र उद्देश्य भारत को गुलाम बनाना और भारतीय सभ्यता और संस्क्रती को नस्ट करना था,, कहीं कहीं पर उनका आल्प ज्ञान भी अर्थ को अनर्थ करने के लिए काफी था यथा

यत्पुरुषं व्यदधु: कतिधा व्यकल्पयन्।
मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते॥ (ऋग्वेद क्0.90.क्क्)


अर्थात बलि देने के लिए पुरुष को कितने भागो मे विभाजित किया गया? उनके मुख को क्या कहा गया, उनके बांह को क्या और इसी तरह उनकी जंघा और पैर को क्या कहा गया? इस श्लोक का अनुवाद राल्फ टी. एच. ग्रिफिथ ने भी कमो-बेश यही किया है।

रह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य कृ त:।
ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भयां शूद्रो अजायत॥ (ऋग्वेद क्0.90.क्ख्)


इस श्लोक का अनुवाद एचएच विल्सन ने पुरुष का मुख ब्राह्मण बना , बाहु क्षत्रिय एवं जंघा वैश्य बना एवं चरण से शूद्रो की उत्पत्ती हुई किया है। ठीक इसी श्लोक का अनुवाद ग्रिफिथ ने कुछ अलग तरह से ऐसे किया है- पुरुष के मुख मे ब्राह्मण, बाहू मे क्षत्रिय, जंघा मे वैश्य और पैर मे शूद्र का निवास है। इसी बात को आसानी से प्राप्त होने वाली दक्षिणा की मोटी रकम को अनुवांशिक बनाने के लिए कुछ स्वार्थी ब्राह्मणो द्वारा तोड़-मरोड़ कर मनुस्मृति मे लिखा गया कि चूंकि ब्राह्मणो की उत्पत्ती ब्रह्मा के मुख से हुई है, इसलिए वह सर्वश्रेष्ठ है तथा शूद्रो की उत्पत्ती ब्रह्मा के पैर से हुई है इसलिए वह सबसे निकृष्ट और अपवित्र है।


मनुस्मृति के 5/132 वे श्लोक मे कहा गया है कि शरीर मे नाभि के ऊपर का हिस्सा पवित्र है जबकि नाभि से नीचे का हिस्सा अपवित्र है। जबकि ऋग्वेद मे इस तरह का कोई विभाजन नही है। इतना ही नही इस प्रश्न पर इतिहासकारो के भी अलग-अलग विचार है। संभवत: मनुस्मृति मे पुरुष के शरीर के इस तरह विभाजन करने के पीछे समाज के एक वर्ग को दबाने, बांटने की साजिश रही होगी। मनुस्मृति के श्लोक सं1.31 के अनुसार ब्रह्मा ने लोगो के कल्याण(लोकवृद्धि)के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र का क्रमश: मुख, बाहू, जंघा और पैर से निर्माण किया। जबकि ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के रचयिता नारायण ऋषि के आदेश इसके ठीक उलट है। उन्होने सरल तरीके से (10.90.11-12)यह बताया है कि यदि किसी व्यक्ति के शरीर से मुख, बाहू, जंघा और पैर अलग कर दिया जाए तो वह ब्रह्मा ही क्यो न हो मर जाएगा। अब जब येसा है तो मनु स्मरति के किन श्लोको को प्रमाणिक कहा जाए और किन्हें नहीं इसको ले कर बहुत लम्बी बहस हो सकती है,, परन्तु इसका उत्तर भी
मनु-स्मृति में ही छिपा है ,,,



मनुस्मृति मे श्लोक (II.6) के माध्यम से कहा गया है कि वेद ही सर्वोच्च और प्रथम प्राधिकृत है। मनुस्मृति (II.13) भी वेदो की सर्वोच्चता को मानते हुए कहती है कि कानून श्रुति अर्थात वेद है। ऐसे मे तार्किक रूप से कहा जा सकता है कि मनुस्मृति की जो बाते वेदो की बातो का खंडन करती है, वह खारिज करने योग्य है। चारों वेदो के संकलनकर्ता/संपादक का ओहदा प्राप्त करने वाले तथा महाभारत, श्रीमद्भागवत गीता और दूसरे सभी पुराणो के रचयिता महर्षि वेद व्यास ने स्वयं (महाभारत 1-V-4) लिखा है-

श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते।
तत्र श्रौतं प्रमाणन्तु तयोद्वैधे स्मृति‌र्त्वरा॥


अर्थात जहां कही भी वेदो और दूसरे ग्रंथो मे विरोध दिखता हो, वहां वेद की बात की मान्य होगी। 1899 मे प्रोफेसर ए. मैकडोनेल ने अपनी पुस्तक ''ए हिस्ट्री आफ संस्कृत लिटरेचर'' के पेज 28 पर लिखा है कि वेदो की श्रुतियां संदेह के दायरे से तब बाहर होती है जब स्मृति के मामले मे उनकी तुलना होती है। पेज 31 पर उन्होने लिखा है कि सामान्य रूप मे धर्म सूत्र भारतीय कानून के सर्वाधिक पुराने स्त्रोत है और वेदो से काफी नजदीक से जुड़े है जिसका वे उल्लेख करते है और जिन्हे धर्म का सर्वोच्च स्त्रोत स्थान हासिल है। इस तरह मैकडोनेल बाकी सभी धार्मिक पुस्तको पर वेदो की सर्वोच्चता को स्थापित मानते है। न्यायमूर्ति ए.एम. भट्टाचार्य भी अपनी पुस्तक ''हिंदू लॉ एंड कांस्टीच्यूशन'' के पेज 16 पर लिखा है कि अगर श्रुति और स्मृति मे कही भी अंतर्विरोध हो तो तो श्रुति (वेद) को ही श्रेष्ठ माना जाएगा
,,



ऐसे मे मैकडोनेल सलाह देते है कि अच्छा होगा यदि स्मृति मे किसी बाहरी स्त्रोत के दावे/बयान को जांच लिया जाए। पर ब्रिटिश भारतीय अदालतो ने उनकी इस राय की उपेक्षा कर दी। साथ ही मनुस्मृति के वास्तविक विषय वस्तु के साथ भी खिलवाड़ किया गया जिसे ईस्ट इंडिया के कर्मचारी सर विलियम जोस ने स्वीकार किया है जिन्होने मनु स्मृति को हिंदुओ के कानूनी पुस्तक के रूप में ब्रिटिश भारतीय अदालतो मे पेश और प्रचारित किया था। मनुस्मृति मे ऐसे कई श्लोक है जो एक दूसरे के प्रतिलोम है और ये साबित करते है कि वास्तविक रचना के साथ हेरफेर किया गया है, उसमे बदलाव किया गया है। बरट्रेड रसेल ने अपनी पुस्तक पावर मे लिखा है कि प्राचीन काल मे पुरोहित वर्ग धर्म का प्रयोग धन और शक्ति के संग्रहण के लिए करता था। मध्य काल में यूरोप मे कई ऐसे देश थे जिसका शासक पोप की सहमत के सहारे राज्य पर शासनरत था। मतलब यह कि धर्म के नाम पर समाज के एक तबके द्वारा शक्ति संग्रहण भारत से इतर अन्य जगहो पर भी चल रहा था।

यहाँ पर इतना लम्बा चौडा लिखने और कई लेखको की
सहायता लेने का उद्देश्य यही है की पहले हमें मनु-स्मृति के श्श्लोको की प्रमाणिकता को सिद्ध करना होगा और प्रमाणिक श्लोको में अगर हमें कोई विरोधा भाष मिलता है और वो स्त्री विरोधी या समाज के किसी वर्ग विशेष के विरोधी मिलते है तो हमें निश्चित ही उनका विरोध करना चाहिए ,,, और मनु-स्मृति प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए हमारे पास केवल एक मात्र प्रमाणिक पुस्तक वेद ही है ,,, जिनकी साहयता से हम मनु-स्मृति के श्लोको की प्रमाणिकता जांच सकते है ,,,,, वैसे वैदिक समय में स्त्रियों की स्थिति क्या थी मै यहाँ लिखना चाहूंगा ,,,,,



ऋग्वेद की ऋचाओ मे लगभग 414 ऋषियो के नाम मिलते है जिनमे से लगभग 30 नाम महिला ऋषियो के है। इससे साफ होता है कि उस समय महिलाओ की शिक्षा या उन्हे आगे बढ़ने के मामले मे कोई रोक नही थी, उनके साथ कोई भेदभाव नही था। स्वयं भगवान ने ऋग्वेद की ऋचाओ को ग्रहण करने के लिए महिलाओ को पुरुषो के बराबर योग्य माना था। इसका सीधा आशय है कि वेदो को पढ़ने के मामले मे महिलाओ को बराबरी का दर्जा दिया गया है। वैदिक रीतियो के तहत वास्तव मे विवाह के दौरान रस्मो मे ब्7 श्लोको के वाचन का विधान है जिसे महिला ऋषि सूर्या सावित्री को भगवान ने बताया था। इसके बगैर विवाह को अपूर्ण माना गया है। पर अज्ञानता के कारण ज्यादातर लोग इन विवाह सूत्र वैदिक ऋचाओं का पाठ सप्तपदी के समय नही करते है और विवाह एक तरह से अपूर्ण ही रह जाता है



16 comments:

  1. यहाँ पर ये बहुत महत्व पूर्ण तथ्य है की हमारे जयादातर गर्न्थो का पुनर्मुद्रण और पुनर्संस्करण अग्रेजी शासन में हुआ और जयादातर अंग्रेज विद्वानों के द्बारा ही हुआ ,,, जिनका एक मात्र उद्देश्य भारत को गुलाम बनाना और भारतीय सभ्यता और संस्क्रती को नस्ट करना था,, कहीं कहीं पर उनका आल्प ज्ञान भी अर्थ को अनर्थ करने के लिए काफी था यथा


    yahi to main kahta hoon......

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  2. बहुत दम है आपकी बात मे..अपने यहाँ वैसे भी कंठस्थ ज्ञान को वरीयता दी जाती रही है..तब ग्रंथों का प्रामाणिक अभिलेखन बहुत कम हुआ और जो हुआ वह भी समय और आक्रांताओं की मार से सुरक्षित नही रह पाया..आज भी हम अपने अतीत को विदेशी विद्वानों की नजर से ही जानते हैं..सो अर्थ के अनर्थ करने के सारे कारण मौजूद रहे..

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  3. kya baat hai bhai , bahut hi shandar post ke liye aapko badhai ...sacchai ke saath uthaya aapka ye kadam bahut hi sahi hai ....ye sach hai jo mahfooz bhai ne kaha hai mai unki baato se sahemat hu ..."

    "thanx fir se ki aapne aur ek acchi post di "

    ----- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogpost.com

    http://hindimasti4u.blogpost.com

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  4. दूबे जी, मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि ब्रिटिश काल में बहुत से संस्कृत ग्रन्थों की गलत व्याख्या की गयी, इस बात से भी सहमत हूँ कि मात्र कुछ बातों के कारण किसी भी ग्रन्थ को स्त्रीविरोधी कहना अनुचित है. परन्तु, मनुस्मृति में अनेक स्थलों पर स्त्रीविरोधी बातें हैं, यह कटु सत्य एक संस्कृत की विद्यार्थी होने के बाद भी मैं स्वीकार करती हूँ. वास्तव में, मनुस्मृति में स्त्रियों की प्रशंसा के स्थल बहुत कम हैं. मुझे मात्र उसमें एक श्लोक स्त्रियों के पक्ष में दिखता है. वह है-
    "द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत्‌
    अर्धेन नारी तस्यां च विराजमसृजत्प्रभुः"(१/३२)
    अर्थात्‌ "ब्रह्मा ने अपने शरीर के दो भाग किये, जिसमें से आधा पुरुष और आधी नारी हुयी. और उस नारी वाले आधे भाग से विराट्‍ पुरुष की रचना की." इसी पुरुष ने बाद में तपस्या करके मनु को उत्पन्न किया और मनु ने अन्य ऋषियों को. इस श्लोक से यह द्योतित होता है कि सृष्टि के आदि में पुरुष और स्त्री दोनों साथ उत्पन्न हुये, जिसमें नारी का महत्त्व अधिक है. यह पश्चिम के उस सिद्धान्त के विपरीत है, जहाँ पहले आदम और आदम की पसली से हौआ को पैदा किया गया.
    परन्तु जिस "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते" वाले श्लोक की प्रशंसा की जाती है, वहाँ पूजन का अर्थ स्त्रियों को वस्त्र-आभूषण द्वारा प्रसन्न करना है न कि उनकी उपासना करना. यह उस श्लोक के पहले के कुछ श्लोकों से स्प्ष्ट होता है. यह मेरे शोध का विषय है अतः इतना सब लिख दिया. शेष फिर कभी... ...

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  5. वेदों मे सर्वत्र नारी की महानता और समानता का वर्णन है।स्वार्थी एव्म रूढीवादी लोग और विदेशी प्रभाव से इनमे कई मन्त्रों को संक्षिप्त किया गया और् बदला गया है महर्षी हरीत जैसे कई रिशियों ने स्त्री विरोधी मन्त्रों का डट कर विरोध किया है इन्हों ने कहा था कि स्त्री शूद्र नहीं हो सकती। शूद योनि से भला एक ब्राहमण या क्षत्रिय आदि की उत्पति कैसे हो सकती हैशस्त्रिय खोज से विदुयानो ने ये तथ्य निकाला था किमध्य कालीन सांमन्त वादी युग मेस्त्री विरोधी मन्त्रों को घदा गया हैतथा स्त्री विरोधी अनेक मन्त्र घड कर इस मे डाले गये हैंसत्य सनातन धर्म के वेदोक्त वास्त्विक विचार्धारा स्त्री विरोधी नहीं है।वेदों मे मन्त्र द्रश्टा जिस प्रकार् पुरुश रिशी हैं उसी प्रकार अन ऋषिकायें भी है ऋाग्वेद मे इनकी लम्बी सूची है जैसे घोशा,जूहू,इन्द्राणी,विश्ववारा, अर्शी, सूर्या,सावित्री यनी,रोमणा शाश्वती,लोप मुद्रा आदि। आपका आलेख बहुत सार्थक है। महामना मालविय जी ने भी स्त्री विरोधी प्रचार का डट कर विरोध किया और अपने विश्वविद्दालय मे इस पर शोध भी करवाया था ।धन्य्वाद्

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  6. वेदों मे सर्वत्र नारी की महानता और समानता का वर्णन है।स्वार्थी एव्म रूढीवादी लोग और विदेशी प्रभाव से इनमे कई मन्त्रों को संक्षिप्त किया गया और् बदला गया है महर्षी हरीत जैसे कई रिशियों ने स्त्री विरोधी मन्त्रों का डट कर विरोध किया है इन्हों ने कहा था कि स्त्री शूद्र नहीं हो सकती। शूद योनि से भला एक ब्राहमण या क्षत्रिय आदि की उत्पति कैसे हो सकती हैशस्त्रिय खोज से विदुयानो ने ये तथ्य निकाला था किमध्य कालीन सांमन्त वादी युग मेस्त्री विरोधी मन्त्रों को घदा गया हैतथा स्त्री विरोधी अनेक मन्त्र घड कर इस मे डाले गये हैंसत्य सनातन धर्म के वेदोक्त वास्त्विक विचार्धारा स्त्री विरोधी नहीं है।वेदों मे मन्त्र द्रश्टा जिस प्रकार् पुरुश रिशी हैं उसी प्रकार अन ऋषिकायें भी है ऋाग्वेद मे इनकी लम्बी सूची है जैसे घोशा,जूहू,इन्द्राणी,विश्ववारा, अर्शी, सूर्या,सावित्री यनी,रोमणा शाश्वती,लोप मुद्रा आदि। आपका आलेख बहुत सार्थक है। महामना मालविय जी ने भी स्त्री विरोधी प्रचार का डट कर विरोध किया और अपने विश्वविद्दालय मे इस पर शोध भी करवाया था ।धन्य्वाद्

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  7. वाह दूबे जी...ये क्या किया आपने। प्रवीण जी ने प्रतिक्रिया स्वरुप जो पोस्ट मेरे ब्लाग के लिए लिखी, उसे आपने अपने ब्लाग पर लगा दिया, वो भी बिना नाम के..एक बार प्रवीण से पूछ तो लेते। ये बहस मेरे ब्लाग पर चल रही है..आपने बिना संदर्भ के छाप दिया। हम इसे क्या मानें..। आपको मेरे विचारो से बड़ी कोफ्त होती है लेकिन जो आपने किया उसे जानकर कैसे रिएक्ट करना चाहिए। आप खुद तय करें।
    हम स्त्रियों आपको प्रगतिशील लगती हैं तो हम हैं..हम गर वक्त समाज के टेकेदारों की तरह नारे नहीं उछालते कि हमारी संस्कृति खतरे में हैं..। आप कूएं में पड़े रहे, हमें कोई आपत्ति नहीं..मगर हमारी प्रतिशीलता पर दूसरो के विचारो के माध्यम से ऊंगली ना उठाएं। कुछ अपनी कहें..। कब तक दूसरो के विचारो को ओढते बिछाते रहेंगे।
    इस कृत्य के लिए मैं आपकी निदा करती हूं..
    गीताश्री

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  8. गीता जी सहमत हूँ आपकी बातो से कि मैंने प्रवीण जी की टिप्पणी को पोस्ट के रुप में प्रकाशित किया हैं, । लेकिन आप भी कमाल करती हैं आप कह रहीं हैं की मुझे प्रवीण जी से पुछना चाहिए थे तो क्या आपको ये लगता हैं कि मैंने बिना उनकी इजाजत के पोस्ट कर दी अगर आपको ये लगता है तो ये सरासर आपकी गलत फैमी है। और आप तो मुद्दे से भठक ही गयीं यहा पर, आप इससे इत्तेफाक ना रखिये की ये किसने लिखा है, आप बस यह देखिये की ये क्या लिखा है। और आप भगवान मनु जी की विरोधी है, तो कृपया आप इन बातो को गलत ठहराईये और अपना तर्क प्रस्तुत किजिये। और ये कहना की मैंने प्रवीण जी टिप्पणी प्रकाशित की है तो ये तो बच निकलने जैसा। मुझे उम्मीद है कि आप संमझचूकी होंगी।

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  9. इतने कमेंटरकर्ताओं में एकमात्र दीप्ती ऐसी हैं जिन्होने बताया है कि वो संस्कृत की विद्वान है। और एक संस्कृत विद्वान ने साफ कहा कि यह लेख थोथा है। मिथिलेश आप को ऐसे लेख लगाने से बचना चाहिए।

    मैं सभी भावुक पाठकों से कहुगा कि आप भावना को नियंत्रित करके सोचिए। आप को मैं बता दूं कि भारत को जिन ग्रंथो पर आज हमें नाज है उन्हें ऊपर करने और दुनिया के सामने प्रस्तुत करने में अंग्रेजों ने बहुत श्रम किया है। अंग्रेजो के कमीनेपन को गाली देते वक्त हमें यह नहंी भूलना चाहिए कि उनमें कुछ अच्छे लोग भी थे। प्रवीण को यह नहीं पता कि इण्डालजी को सर्वाधिक खाद-पानी जर्मन विद्वानों ने दिया। जाहिर है कि वो अंग्रेज नहीं थे। उसके बाद फ्रांस ने कई बड़े इण्डोलाजिस्ट पैदा किए। संस्कृत भाषा को विश्व की महान भाषाआंे मे सबसे उत्तम कहने वाला एक अंग्रेज था। भारत बौद्धिक विकलांगो का नहीं ज्ञानियों का भी देश है ऐसा घोषण करने भी एक विदेशी था। बुद्ध दक्षिण अफ्रीकी नहीं भारतीय हैं इसे साबित करने के लिए एक अंग्रेज ने ही बुद्ध के जन्म स्थान की खोज की। एक अंग्रेज ने हड़प्पा की खोज करके बताया कि भारत की सभ्यता पिछड़ी और मूरख सभ्यता नहीं बल्कि सबसे पुरानी सभ्यता में से एक है।

    मैक्समूलर ने किसी भी भारतीय से ज्यादा भारत की सेवा की है। कामिल बुल्के बेल्जियम के थे उन्होंने जो अंग्रेजी-हिन्दी डिक्शनरी लिखी उससे बेहतर डिक्शनरी आज तक कोई भारतीय नहीं लिख सका। जिन विवेकानन्द को देश में दुत्कार और भूखमरी मिली उन्हें अमरीका ने सराहा। स्वामी जी ने कहा कि मैं अमरीका न होता तो आज वो नहीं होता जो मैं हूं। स्वामी जी अमरीका वालों की कोटि-कोटि सराहना की है। यही हाल योगानंद,रामतीर्थ,कृष्णमूर्ती जैसे कई भारतियों का है।

    प्रवीण स्पष्ट करें कि उनका इण्डालजी के फील्ड से क्या और कैसा संबंध है। यदि वो कुछ स्वयंभू किताबों को पढ़कर ही बात कर रहे हैं तो मुझे कुछ नहीं कहना। टाइम पास करने के लिए हर कोई कुछ न कुछ करता है। लेकिन यदि वो इस बहस को लेकर गंभीर हैं तो बात हो। कुछ छंदो को लेकर प्रवीण जी ने कहा कि वो मनु स्मृति के भाग नहीं है। वो बताए कि वो ऐसा किस आधार पर कह रहे हैं। मैं उन्हें भारतीय ब्राह्मण विद्वानों का रिफ्रंेस दूंगा जो उन श्लोंको का मनु स्मृति का भाग मानते हैं और उनका वही अर्थ बताते हैं जिसे प्रवीण गलत बता रहे हैं। प्रवीण तो मनु को भगवान बता रहे हैं। मैं उन्हें स्पष्ट कर दूं कि मनु एक मनुष्य थे। कुछ मान्यताओं के हिसाब से प्रलय पश्चात के प्रथम मनुष्य। जिस लेखक को इतनी बुनियादी बात नहीं पता उससे आगे क्या बात की जाए ???

    सभी पाठकों से कहना चाहता हूं। अपने अतीत के प्रति ऐसे अंधमोह ने ही भारत को ज्ञान के मामले में मीलों पीछे कर दिया है। दुनिया के किसी भी देश के अतीत से भारत का अतीत बेहतर या बराबर ठहरेगा। लेकिन वर्तमान !!

    आप सब ही बताइए कि शंकराचार्य जैसे दार्शनिक की बात रामनुजाचार्य ने काट दी। रामनुजा की माधवाचार्य ने,माधवाचार्य की बल्लभाचार्य और .........अब आप ही लोग बताएं कि जब वंेदांत में ही छह प्रमुख मत हैं। जो एक दूसरे को गलत मानते हैं तो बाकी भारतीय वंेदांग में कितनी परस्पर असहमतियां होंगी !!

    पाठकों भारत ने बौद्धिक असहमतियों को हमेशा स्वीकार किया है। विद्वान जानते हैं कि आने वाली पीढ़ीयां ज्ञान में सुधार करती जाती हैं। ऐसा तो मूर्ख कहते हैं कि हमने हजार साल पहले ही सब जान लिया था। अगर ऐसा है तो क्या दो हजार सालों से ज्ञान का शोधन करने में लगे लोग मूरख हैं ??

    बुद्ध और महावीर जैसों ने वेदों को सीधे सीधे नकार दिया तो वो मूरख थे क्या ??? पिछले हजार सालों में भारतीय वांग्मय में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ गीता रही है। शंकर से लेकर गांधी तक ने उसका भाष्य किया है। गीता तो वेद का भाग नहीं है। तो उसके कंेन्द्रिय महत्व के बारे में प्रवीण जैसों का क्या कहना है। वेद सम्मत नहीं होने के कारण गीता क्या किया जाए ??

    आप सब जानते हैं कि मैं रिलिजन में रिसर्च कर रहा हूं। इसलिए मेरे पास कहने को बहुत कुछ है जो नेट पर नहीं खत्म होगा। अपनी बात को समटते हुए कहुंगा कि साथियों इस तरह के मसलों पर भावुकता न दिखाएं। ऋृगवेद के उस श्लोक की याद सभी पाठकों को दिलाना चाहंुगा जिसका अर्थ होता है कि,

    अच्छाई दुनिया मे कहीं भी हो, मुझे प्राप्त हो।

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  10. ऋग्वेद की ऋचाओ मे लगभग 414 ऋषियो के नाम मिलते है जिनमे से लगभग 30 नाम महिला ऋषियो के है। इससे साफ होता है कि उस समय महिलाओ की शिक्षा या उन्हे आगे बढ़ने के मामले मे कोई रोक नही थी, उनके साथ कोई भेदभाव नही था। स्वयं भगवान ने ऋग्वेद की ऋचाओ को ग्रहण करने के लिए महिलाओ को पुरुषो के बराबर योग्य माना था। इसका सीधा आशय है कि वेदो को पढ़ने के मामले मे महिलाओ को बराबरी का दर्जा दिया गया है।

    बहुत ही शोधपरक आलेख. आभार.

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  11. मिथिलेश जी, प्रवीण जी ने ही बताया कि आपने उनसे बिना पूछे पोस्ट छाप दिया वो भी बिना उनके नाम के। वो ये जानकर खासे शर्मिंदा भी हुए हैं। उन्होंने अपना पोस्ट आपको पढने के लिए भेजा, आपने क्या किया वो लोग देख रहे हैं। वाहवाही आप लूटे। संदर्भ और असली लेखक गया नेपथ्य में..। पता नहीं, इस मामले में कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ..ये आप दोनो तय कर लें। रही बात मुद्दों की तो बात,तो जब आपने बीच में टांग अड़ाई है तो खुद ही तलाशिए जवाब। मैं अब बाध्य नहीं हूं..अच्छी खासी चल रही एक बहस को आपने हाइजैक कर लिया। मैं देख रही हूं, कुछ टिप्पणियां एसी आई हैं जिनमें आपको सवालो के जबाव मिल जाएंगे। उन्हें पढिए और बिना किसी सहायता के अपने विचार दीजिए..मेरी शुभकामनाएं..

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  12. गीता जी अब मैं आपको क्या कहूँ, आप बात को खामोखाहँ ही आगे बढाना चाहती है। आप जो कह रहीं है वह सरासर बेतुका है। मैने आपसे पहले ही कह दिया था कि मै आपसे से किसी भी प्रकार का विवाद नहीं चाहता। लेकिन अब मुझे लगता है कि आप इसी पर राजी हैं। रही बात कि मैने प्रवीण जी से बिना पुछे पोस्ट प्रकाशित की है तो मैं आपसे यही कहना चाहूगाँ की एक बार फीर से आप इस बात को ठीक से समझ लें तब किसी भी प्रकार का अवक्षेप लगायें।

    और भला मैं इसका जवाब क्यों दूँ मैं तो प्रवीण जी से पुर्णतः सहमत हूँ, विरोध तो आप करती है उनका अतः जवाब तो आपको ही देना चाहिए। रही बात वाहवाही की तो अगर मैंने इस लेख में आपका नाम लिख दिया होता तो शायद और वाहवाही मिल जाती। परन्तु मैंने विवाद न बढ़े इस नाते किसी का नाम नहीं दिया लेख में। और आपका कहना है की मै अपने विचार दूँ तो आपको यही कहना चाहूँगा की आप अपनी पुरानी पोस्टे देखें मेरे विचार आपको जरुर मिलेंगे।

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  13. हमारे जयादातर गर्न्थो का पुनर्मुद्रण और पुनर्संस्करण अग्रेजी शासन में हुआ और जयादातर अंग्रेज विद्वानों के द्बारा ही हुआ ,,, जिनका एक मात्र उद्देश्य भारत को गुलाम बनाना और भारतीय सभ्यता और संस्क्रती को नस्ट करना था,, कहीं कहीं पर उनका आल्प ज्ञान भी अर्थ को अनर्थ करने के लिए काफी था
    yah sahi jaan padta hai aur main bhi is tathya se sahmat hun.

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  14. बिल्कुल सही कहा आपने ।

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  15. उम्दा व लाजवाब लिखा है आपने। और इस बात में बिल्कुल सच्चाई है कि हमारे धर्म ग्रंथो के साथ छेड़ छाड़ जरुर हुआ होगा, अन्यथा इतना विचारो में मतभेद ना होता।

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आपकी राय हमारे लिये महत्तवपूर्ण है । अपनी बात को बेबाकी से कहें ।