Tuesday, October 6, 2009

महिलायें बनेंगी पुरुष तो बच्चे पैदा कैसे होंगे ??

कोई पचास-साठ साल पहले अमेरिका में एक "Freedom of women" आन्दोलन चला था जिसका असर सारी दुनियां पर पड़ा । उसका कहना यह था कि महिलायें पुरुषों से किसी मामले में कम नहीं हैं फिर वे क्यों घर पर बैठी रहें और मर्दों की गुलामी करें ? बात तो गलत नहीं थी पर उसकी दिशा कुछ बदल सी गई । मर्दों जैसे ही कपड़े पहनने, उन्हीं जैसे भारी-भरकम मेहनत वाले काम करने का शौक महिलाओं में पैदा हुआ जिससे काफी सामाजिक समस्यायें पैदा हुई जिनको पश्चिमी समाज आज तक भुगत रहा है । और जब जिस तरह से हमारे यहाँ कि महिलायें पाश्चात संस्कृति को अपनानें में लगी है लगता है कि अब बारी हमारी है।
कुछ देशों की जनसंख्या का ग्राफ गड़बड़ा गया जो आजकल चिन्ता का विषय बनता जा रहा है । इटली और स्पेन को चिन्ता है कि उनके यहां बच्चे कम पैदा हो रहे हैं और Immigration के कठोर कानूनों के बावजूद मुस्लिम देशों की आबादी वहां आ कर बस रही है । स्कैंडिनेविया, बेल्जियम और रूस आदि देशों में महिलाओं को बच्चे पैदा करने के incentive दिये जा रहे हैं । पश्चिमी संस्कृति ने पहले महिलाओं के परिवार-केन्द्रित सहज स्वभाव को "कैरियर" के चक्कर में तोड़ा । उन्हें कहा गया कि आप अपना कैरियर बनाइये, पैसा कमाइये और "स्वतंत्र जीवन शैली" अपनाइये । अब उन्हें प्रलोभन देकर वापस प्रजनन की तरफ मोड़ा जा रहा है ।

जीस तरह से पश्चिमी संस्कृति हमारे यहाँ पैर पसार रही है अब ये दिन भी दूर नहीं होगा। एक नजारा भारत का देखिये । जनगणना के मुताबिक भारत में पारसी समुदाय गायब होता जा रहा है । टाटा जैसे अमीर पारसी घरानों को भी इसकी चिन्ता सताये जा रही है । इसका मूल कारण पारसी महिलाओं का बहुत ऊंची शिक्षा लेना और पश्चिमी रंग में ढ़लना बताया जा रहा है । कहते हैं कि पारसी अमीर इसलिए हुए हैं कि उन्होंने ब्रिटिश राज्य से सहयोग करके ऊंचे पद हासिल किये और अपने बच्चों को भी ऐसे ओहदे दिलवाने के लिए अपने बच्चों को इंग्लैंड में शिक्षा के लिए भेजा और यह परंपरा आज भी जारी है । पारसियों की अमीरी ही आज उनके लुप्त होने का कारण बन रही है । पश्चिमी संस्कृति में महिलाओं के लिए रोल माडल कैरियर और पैसे का है, उस महिला को बुद्धू और पिछड़ा माना जाता है जिसने घर बैठ कर बच्चे पैदा किये । इसी संस्कृति को पारसी महिलाओं ने बखूबी अपनाया और इसीलिये आज उनका समुदाय लुप्त होने के कगार पर है ।

प्रसिद्ध पारसी हस्ती बहराम दस्तूर ने एक बार कहा था कि पारसी महिलायें तब ही विवाह करना चाहती हैं जब वे जीवन में 'settle' हो जायें और तब तक उसकी प्रजनन की आयु समाप्त हो चुकी होती है । उन्होंने कहा कि आखिर इतना पैसा होने पर भी वे 'settle' क्यों होना चाहती हैं ? भारतीय परम्परा में महिला को आर्थिक तौर पुरुष पर आधीन रहना होता है यानि पुरुष कमाये और वह घर बैठी खाये । वह सही उम्र में विवाह करती है, अपने पति के घर को संभालती है, बच्चे पैदा करती है और इसी से उसको सम्मान मिलता है । खुद पैसा कमाने के चक्कर से वह बेफिक्र होती है, खुद अपनी 'व्यक्तितत्व' की परवाह न करके अपने पति के स्थिति को ही अपना सुख मानती है और सुखी रहती है ।
पारसियों ने गलती यह की कि पश्चिमी संस्कृति के मुताबिक अपनी महिलाओं के "कैरियर" को अधिक महत्व दिया, मातृत्व को नहीं । जो कौमें इस पश्चिमी संस्कृति को अपनायेंगी वे इसी तरह लुप्त होंगी जैसे भारत में पारसी एवं पश्चिमी देशों में सफेद चमड़ी वाली कौमें । जो व्यक्ति अपने सुख और कैरियर को ज्यादा अहमीयत दे और कौम को अनदेखा करे, उसका लुप्त होना आश्चर्यजनक नहीं । एक प्रसिद्ध अमेरिकन मानववैज्ञानिक हुई हैं, जिनका नाम था 'Margaret Mead' । उसने 39 पुस्तकें लिखी जिनमें से एक थी "Male and Female" जो 1948 में छपी थी । मार्गारेट लिखती है कि पुरुषों की तरह महिलायें भी बचपन में सीखती हैं । जैसे एक संयुक्त परिवार में एक जेठानी है जो घरेलू महिला है और कई बच्चों की मां है । दूसरी तरफ उसकी देवरानी है जो काफी पढ़ी लिखी है और अच्छी नौकरी करती है । घर में उस जेठानी को बार-बार ताने दिये जाते हैं कि वह तो बस एक बच्चे पैदा करने की मशीन है । और उस देवरानी को सम्मान दिया जाता है कि वह खूब कमाती है । Margaret Mead लिखती है कि उस घर में यदि कोई 5-10 साल की लड़की है जो रोज यह सब सुनती है तो उसके मन में यह बात बैठ सकती है और वह बड़ी होने पर शायद कोई बच्चा पैदा न करे ।
यह समस्या पशुओं में भी देखी जा सकती है । एक चिड़ियाघर में नर और मादा शेर को साथ में रखने पर भी उनमें संभोग की इच्छा उत्पन्न नहीं हो रही थी । शेरों की संख्या कम होने का एक कारण यह भी हो सकता है कि मादा शेरनी प्रजनन की ओर अनासक्त हो गई है । किसी भी समुदाय को अपना अस्तित्व बनाने के लिये महिलाओं के प्रजनन कार्य को सम्मान देना चाहिये । अगर महिलाओं के कैरियर को ज्यादा सम्मान मिलेगा और मातृत्व को कम, तो महिलायें प्रजनन में रुचि खो सकती हैं और यही बात समाज के लिए घातक है । आजकल वैसे भी एक या दो बच्चों का रिवाज हो चला है । यह रिवाज किसी एकाध परिवार के लिए निजी तौर पर आर्थिक दृष्टि से ठीक हो सकता है पर समाज के लिए ऐसी वृत्ति घातक है, ऐसा कुछ विद्वानों का मत है ।

अगर सभी के पास एक ही सन्तान होगी जो खूब पढ़-लिख कर सिविल में काम करेगी या व्यापार आदि करेगी तो फिर सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा कौन करेगा ? तीन-चार भाइयों में से एक अगर देश पर शहीद हो जाये तो मां-बाप सब्र कर सकते हैं कि चलो, दो-तीन और लाल तो हैं पास में । पर अकेली सन्तान को तो कोई सेना में भर्ती ही नहीं करवायेगा । (बढती जनसंख्या या परिवार नियोजन के मुद्दे दूसरे हैं, अच्छा है इनको इस बहस में शामिल न किया जाये) वैसे भी आजकल IT सेक्टर काफी तरक्की कर रहा है, दूसरे इलेक्ट्रानिक माध्यम भी काफी आ गये हैं । जवान बच्चे रातों को काम कर रहे हैं और दिन में सोते हैं । डाक्टरों का कहना है कि रात को काम करने के कारण उनका शरीर रोगों का घर बनता जा रहा है और उनकी कामशक्ति घट रही है । कैरियर के चक्कर में पड़कर लड़कियां कई साल नौकरी कर के तीस साल से ऊपर की उम्र में शादी कर रही हैं जो सन्तानोपत्ति में प्राकृतिक रुकावट साबित हो रही है । पारसियों की तरह कहीं हमारी कौम और देश तो इस खतरे की ओर नहीं बढ़ रहा ? हमारी संस्कृति में मां को सदा ही ऊंचा स्थान दिया गया है ।

एक अनपढ़ मां को भी उतनी ही इज्जत दो । मातृत्व को सम्मान दो, इसी में हमारी भलाई है - मां तुझे सलाम !
और आप लोगो से विनम्र निवेदन है कि इस लेख को अन्यथा ना ले और मैं जो कहना चाहता हूँ और जिसको लेकर मेरी चिन्ता है उसपे ध्यान दिजिएगा। .

18 comments:

  1. आपकी चिंता जायज है । लेकिन केवल मातृत्व को बढ़ावा देना ही काफी नही है । आप्को पता होगा प्रसव के दौरान महिलाओ की म्रत्यु के अलावा देश मे लाखो बच्चे उचित उपचार और कुपोषन की वजह से मर जाते है । औरत को मशीन समझने से बेहतर है उसके लिये स्वास्थ्य और शिक्षा की व्यवस्था की जाये । यह सम्पन्न लोगो की चिंता हो सकती है कि उनके कमाये धन को खाने के लिये संताने चाहिये । इसे जनरलाइज़ नही किया जा सकता ।

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  2. जब महिला बनेगी पुरुष तो पुरुष भी महिला बन सकते है ...... बच्चे तो पैदा होते रहेंगे पंडित जी आप और हम चौक मनाते रहेंगे . हा हा हा

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  3. पश्चिमी सभ्यता ने तो बहुत कुछ बदल डाला अपने संस्कृति और संस्कार वाले देश में .
    बढ़िया प्रसंग...सोचनीय स्थिति है..

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  4. महिलाओं का आत्मनिर्भर बनना किसी पश्चिमी सभ्यता की नक़ल नहीं है ...यह उनके लिए अति आवश्यक है, और आज की महिलायें घर और दफ्तर संभालना बखूबी जानती हैं. आपके ये शब्द थोड़े से संकुचित मनोवृति का परिचय देते हैं.....
    " भारतीय परम्परा में महिला को आर्थिक तौर पुरुष पर आधीन रहना होता है यानि पुरुष कमाये और वह घर बैठी खाये । वह सही उम्र में विवाह करती है, अपने पति के घर को संभालती है, बच्चे पैदा करती है और इसी से उसको सम्मान मिलता है । खुद पैसा कमाने के चक्कर से वह बेफिक्र होती है, खुद अपनी 'व्यक्तितत्व' की परवाह न करके अपने पति के स्थिति को ही अपना सुख मानती है और सुखी रहती है ।"......यानि कि महिलाओं को अपने लिए कुछ भी सोचने का कोई हक़ नहीं??...उनकी दुनिया सिर्फ पति और बच्चों तक सिमित होनी चाहिए??
    पारसी समुदाय के बारे में भी आपकी जानकारी अपूर्ण है.उनकी जनसँख्या इसलिए नहीं कम हो रही कि लड़कियां ज्यादा पढ़ लिख गयीं बल्कि उसकी वजह है उनकी कट्टर धर्मान्धता.पारसी समुदाय विजातीय विवाह को सन्मति नहीं देता.अगर कोई भी जाति से बाहर शादी कर ले तो उसे धर्म से बेदखल कर दिया जाता है. और आजकल कई लड़के धर्म के बाहर शादी कर रहें हैं.पारसी लड़कियोंमें को अपनी जाति में लड़के मिलने बहुत मुश्किल हो गए हैं.यही वजह है उनकी बड़ी उम्र तक अविवाहित रह जाने का.मैंने मुंबई में काफी करीब से ईनलोगों को जाना है..सिर्फ किताबों में पढ़कर नहीं.
    आपकी 'एक बच्चे पर' आपत्ति भी एक मजाक सी लगती है.कोई जरूरी है ४ बच्चों में से एक सेना में जाए?..चार लोगों में से एक एक की संतान चिकित्सक,अभियंता,शिक्षक और सेना नायक हो सकती है.

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  5. दूबे जी,
    सबसे पहले मैं आपको यह बता दूँ कि मैं आपको महिला-विरोधी नहीं समझती क्योंकि मैं किसी भी स्त्री या पुरुष को इकाई के रूप में नहीं देखती, बल्कि समाज के एक अभिन्न भाग के रूप में देखती हूँ. दूसरी बात मैं किसी महिला उत्थान के लिये बने किसी संगठन से फिल्हाल नहीं जुड़ी हूँ, बल्कि एक रिसर्च स्कॉलर हूँ और महिला-मुद्दों पर शोध कर रही हूँ. तीसरी बात, एक शोध्च्छात्रा होने के कारण जानती हूँ कि अनेक संगठन चुपचाप महिलाओं के लिये काम कर रहे हैं और उन्हें कोई जानता भी नहीं सिवाय कुछ शोधकर्ताओं के. चौथी और आपके इस पोस्ट से सम्बन्धित बात कि पारसियों की संख्या सिर्फ़ इस एक कारण से नहीं घट रही है कि औरतें बच्चा पैदा नहीं करना नहीं चाहतीं, बल्कि उनकी संख्या घटने का एक बड़ा कारण यह भी है कि वे अपने समुदाय के अतिरिक्त बाहर विवाह नहीं करते और इसलिये बहुत अधिक उम्र तक लड़के-लड़कियाँ अविवाहित रहते हैं. ...आपकी शेष बातों का उत्तर मैं अपने लेख में "नारीवादी बहस" में दूँगी. एक सार्थक बहस के लिये धन्यवाद एवं साधुवाद!

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  6. और हाँ,
    मनुस्मृति से उदाहरण देते समय सावधान रहिये. इसके एक-एक श्लोक की भिन्न-भिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न व्याख्या की है. "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते... ... देवता." इस श्लोक में "पूज्यन्ते" पद में "पूजन" का अर्थ "उपहार देना" है, न कि पूजा (अर्चना, आराधना). ये तो आप जानते ही होंगे कि "पूज्‌" धातु के कई अर्थों में से एक अर्थ उपर्युक्त भी है.

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  7. सच ,श्रेष्ठ चिंतन परम्परा को जागृत करता आलेख -महलाओं को अपने पैर पर खडा होने में कोई गुरेज नहीं है मगर उसके आनुषंगिक प्रभावों में पुरुष द्रोह और प्रजनन विरक्ति बड़े खतरे हैं जिनका दुष्परिणाम निश्चित ही मानवता के विरुद्ध होगें ! ममत्व और वात्सल्य उसकी अतुलनीय निधि है -इससे बड़ी कोई सौगात प्रक्रति ने उसे ही नहीं शायद ही किसी को सौपी हो !
    क्या कोई मेरी इस बात से असहमत हो सकता है ? हाँ तो कृपया हाथ उठायें !

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  8. Dar asal hona chahiye" freedom of human beings"...chahe auraten hon,yaa daba hua,peedit insaan ho...mai 'insaanse insaan barabaree ho' is baat ko maan tee hun...gar sach poochho to maatrusattak padhatee sabse badhiya hai...!

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  9. चिंता तो आपकी जायज है सरकार इसका भी किओई ना कोई हल निकाल देगी

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  10. सन्तानोत्पत्ति से ही दुनिया कायम है इसलिए किसी समाज और देश की नकल करना वहीं तक जायज जहां हमारे लिए किसी प्रकार की समस्या न हो । अतएव महिलाएं पुरूष की बराबरी अवश्य कर रही है लेकिन इस तरह के विषय में आपसी सहयोग जरूरी है ।

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  11. पश्चिमी सभ्यता ने जरूर बहुत कुछ बदल डाला है पर उन्होंने बहुत कुछ दिया भी है । बहुत सी बातों का साईड इफ़ेक्ट तो होता हीं है ।

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  12. दुबे जी मै आप के लेख से काफी हद तक सहमति रखता हूँ ,,, नारी उत्थान और समाज में उनकी स्थितिक बराबरी का मै पछ धर हूँ पर परम्पराओं व्यवस्थाओं के अवमूल्यन और उन्मूलन की शर्त पर नहीं ,,, आज समाज में स्त्रियों की दशा सोचनीय है ,(यहाँ पर मै वैश्विक समाज की बात कर रहा हूँ ) उनका शोषण होता है शत प्रतिशत सही है ,, उनकी क्षमता, योग्यता , और कार्यशीलता का मूल्यांकन पक्षपात पूर्ण है,,,,लेकिन इसके लिए दोषी कौन है ये विचारणीय प्रश्न है,,, सम्पूर्ण पुरुष समाज की सहभागिता और पुरातन परम्पराओं , व्यवस्थाओं को अगर एक तरफ धकेल भी दिया जाए (जैसे की पश्चिमी समाज में काफी हद तक है ) फिर भी स्त्रियों उनकी दशा में १ प्रतिशत का सुधार होने बाला नही ,, समाज को बाँट कर और एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप लगा कर किसी भी समस्या के हल पर नहीं पंहुचा जा सकता,,, पश्चिमी समाज में जहा स्त्री स्वंतत्र है, आत्म निर्भर है (यहाँ आत्म निर्भरता से मतलब सेक्सुअल आत्म निर्भरता से भी लिया जाए ) और पुरुषों से किसी मामले में कम तर नहीं है (जैसा की कथित स्त्रीवादी कहते है ) स्त्रियों की दशा क्या है मै दू लायनो में स्पस्ट करना चाहूंगा ,,,,
    कुछ तथ्य देखिये
    १--हर ६ में से एक अमेरिकन स्त्री अपनी जिन्दगी में बलात्कार की शिकार होती है,,,
    २--१७.७ मिलियन अमेरिकन औरते पूर्ण या आंशिक बलात्कार की शिकार है ,,,
    ३-१५ % बलात्कार की शिकार १२ साल से कम उम्र की लड़किया है ,,,
    ४--लगभग ३ % अमेरिकन पुरुषों ने हर ३३ में १ ने अपनी जिन्दगी में कभी न कभी पूर्ण या आंशिक बलात्कार किया है ...
    एक चाइल्ड प्रोटेक्शन संस्था की १९९५ की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में १२६००० बच्चे बलात्कार के शिकार है जिनमे से 75 % लड़किया है और लगभग ३० % शिकार बच्चे ४ से ७ की उम्र के बीच के है
    ये आकडे कम नहीं है अगर हम इन की अन्य विपत्तियों से तुलना करते है तो स्तिथि की भयानकता स्पस्ट हो जाती है ,,, ,,
    जरा देखे
    बलात्कार की शिकार महिलाओं की संख्या डिप्रेशन के शिकार रोगियों से तिगुनी ,,शराब पीकर गाली देने वालो से १३ गुनी ,, नशीला पदार्थ ले कर गाली देने वालो से २६ गुनी और आत्म हत्या करने वालो से चौगुनी है ,,,
    ये तो बहुत कम आकडे है ,,,,
    अगर इसी प्रगति के लिए हमारे कथित प्रगति वादी (जिन्हें पश्चिमी की हवा लगी है ) हाय तोबा मचा रहे है तो येसी प्रगति को हम तो बर्दास्त नहीं कर सकते
    हाँ नारी उत्थान और बराबरी आबश्यक है पर उसके मानक भारतीय हो

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  13. हाय हाय ...अरे नास्‍पीटों जब महिलायें पुरूष बनेंगी तो हम कर लेंगे बच्‍चे पैदा, आजमा के देख लो हम ने तुम्‍हें खुब आजमाया है नमक हरामों, अरे कर्मजले वैज्ञानिकों अभी से क्‍यूं नहीं सोचते ऐसा समय आयेगा तब हम ही काम आयेंगे, हाय हाय ,,, दे ताली

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  14. प्रवीण जी पता नहीं इन तथ्यों से क्या साबित करना चाहते हैं??....स्त्रियों की स्वतंत्रता,आत्म निर्भरता से इन तथ्यों का कोई लेना देना ही नहीं है....क्या वे कहना चाहते हैं कि स्त्रियाँ आत्मनिर्भर हो रही हैं,जीवन के हर क्षेत्र में आगे बाद रही हैं,इसलिए इन अमानुषिक अत्याचारों का शिकार हो रही हैं.?...उनके द्वारा दिए गए कुछ तथ्य यहाँ उधृत करना चाहूंगी....

    ."३-१५ % बलात्कार की शिकार १२ साल से कम उम्र की लड़किया है ,,,
    ४--लगभग ३ % अमेरिकन पुरुषों ने हर ३३ में १ ने अपनी जिन्दगी में कभी न कभी पूर्ण या आंशिक बलात्कार किया है ...
    एक चाइल्ड प्रोटेक्शन संस्था की १९९५ की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में १२६००० बच्चे बलात्कार के शिकार है जिनमे से 75 % लड़किया है और लगभग ३० % शिकार बच्चे ४ से ७ की उम्र के बीच के है"

    प्रवीण जी इन १२६००० बच्चों ने कौन सी स्वतंत्रता का स्वाद चख लिया कि ऐसे जघन्य कृत्य का सामना करना पड़ा उन्हें?४ से ७ साल के बच्चों का क्या कसूर, इसे स्त्री जाति कि स्वतंत्रता के परिपेक्ष्य में कैसे देखा जा सकता है?
    और मैं ये बता दूँ,ये सब आंकडे आपको इसलिए मिल गए क्यूंकि अमरीका में इनकी रिपोर्ट दर्ज की गयी है.भारत में तो इन अमानुषिक अत्याचारों की रिपोर्ट ही नहीं की जाती और अत्याचारी खुले घूमते रहते हैं.कि सारे केस दर्ज किये जाएँ तो कहीं हम अमरीका को पीछे न छोड़ दें.

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  15. आपकी चिंता एक हद तक जायज है,परन्तु फिर भी प्रत्युत्तर में मैं रश्मि रवेजा जी की बात ही दुहराना चाहूंगी....

    सिद्धांततः यह सही है कि स्त्री पुरुष मिलकर यदि घर और बहार सम्हालें तो ही गृहस्थी ठीक से चल पाती है,परन्तु व्यवहार में देखिये...जो स्त्री घर बच्चे परिवार को सम्हालती है,उसे उसके मुकाबले जो कि परिवार के लिए धन कमाता/जुटाता है, कितनी इज्जत दी जाती है ????
    जब तक अर्थ ही सामान और प्रतिष्ठा का आधार रहेगा,घरेलू स्त्रियाँ दासियाँ ही समझी जायेंगी....इसलिए आवश्यक है कि स्त्रियाँ शिक्षित और आत्मनिर्भर बने...

    अपने देश की अभी अगले पचास वर्षों तक यह स्थिति नहीं होने जा रही है कि इसमें यदि कम बच्चे पैदा किये जायेंगे तो जनसँख्या रूपी इस महासमुद्र में लोटे भर भी पानी घटेगा...

    मनुष्य चाहे जितना भी आधुनिक और यन्त्र सा बन जाय,उसके अन्दर जब तक संवेदनाएं,ममत्व का आस्तित्व रहेगा,संतान की कामना भी रहेगी..

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  16. " aapki chinta jayaj hai ....maine padha ki kai tippaniyon me " BALATKAR " ko leker anyay ki baat ki ja rahi hai ..america ki khaber hume mili ..ye bahut hi accha hai ..magar kyu koi ye nahi sochata hai ki ...

    AMERICA ME MAHILA SANGHTHAN HUMSE JYADA ACCHA HOGA ?"

    MAHILA PER HOTE ATYACHAR HUM BHI DEKH RAHE HAI ...dekh rahe hai ki aparadhi khule aam sadko per ghum rahe hai ..to iska matlab ye nahi ki purush hi gunhegar hai ...khina kahi jaroor hamare kayde me ...gadbadi hai ..kahi na kahi ..hamare MAHILA AAYOG DAL me bhi kami hai ..IN KAMIYO KE BAARE ME SOCHO .."

    " hum mahila o ke virodhi nahi hai ..magar galti hai kanoon me aur purush per aarop kyu ? ..galti hai mahila dal ki ...kyu ki kabhi mahila dal ne ..kisi garib ka saath dete suna hai aap logo ne ..."

    " izzat karte hai hum mahila o ki ..unko apane pairo per khada hote dekh hume khusi ho rahi hai .."

    " magar hume aapas me IS TARAH SE VIVAD NAHI KARNA CHAHIYE ...kanoon ki vo galti ko dhundhana chahiye ..jis se gunhegar sareey aam ghum te hai..."
    " dubey ji ki chinta jayaj hai ..busss arth ka anarth ho gaya hai ....vivad KO GALAT JAGAH MOD DIYA HAI "

    eksachai { aawaz }

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  17. मैं रंजना जी की बात से सहमत हूँ । जब तक पुरुश नारी के समान अधिकारों को दिल से समर्थन नहीं देता तब तक कोई समस्या नहीं सुलझ सकती परिवार मे दोनो की सहभागिता हो काम मे अर्थ मे और घर के हर निर्णय में आज नारी ने अपने बल पर अगर हर जिम्मेदारी ले रखी है नौकरी और घर की संटअन की तो कितने प्रतिशत पुरुश पत्नि से सहयोग करते हैं वो अकेले ही खटती है सब जिम्मेदारियों मे । समान व्यवस्था से ही सब सम्भव होगा। नई पीढी मे शायद ये समझ आ रही है मिलजुल कर रहने की। तो आशा है कि शायद ये विवाद कभी खत्म हो सकें अगर पुरुश अब भी अपना अहं नहीं छोडेगा तो घातक परिणाम के लिये भी तयार रहे। नारी ही क्यों सब अत्याचार सहे? अच्छी चरचा है अगर इसका कोई नतीजा निकले और सब की एक राय बने।

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  18. mahila ko samman kee najroo sai dekha jana chayai. lakin mahila or pursho ka kam alag alag hai ager mahila bhar ka kam karti hai to usko bachai peda karnai ka koi adhikar nahi hai kyokee issay bacho ke jendagi barbad hoti hai or dais ko ek awara olad melti hai, kyokee jo aurtai ghar nahi samhal sakti wo dais kya samhalagee seema par ladnay kai liya purush kee hi jarorat padagi na ki yoni kee, mera mat to yaha hai kee purush ko bhar ka kam dekhna chaiyi or mahila ko apnay bachoo ko es kabil banana chiyai kee that dais kee trakee mai apna shayog dai, our unko achai sanskar dai.pursho ko apna kam karnai dai. or batai bad mai lekhuga,thank

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