Wednesday, November 4, 2009

क्या आप हिन्दू हैं ?

'हिन्दू' शब्द मानवता का मर्म सँजोया है। अनगिनत मानवीय भावनाएँ इसमे पिरोयी है। सदियों तक उदारता एवं सहिष्णुता का पर्याय बने रहे इस शब्द को कतिपय अविचारी लोगों नें विवादित कर रखा है। इस शब्द की अभिव्यक्ति 'आर्य' शब्द से होती है। आर्य यानि कि मानवीय श्रेष्ठता का अटल मानदण्ड। या यूँ कहें विविध संसकृतियाँ भारतीय श्रेष्ठता में समाती चली गयीं और श्रेष्ठ मनुष्यों सुसंस्कृत मानवों का निवास स्थान अपना देश अजनामवर्ष, आर्याव्रत, भारतवर्ष कहलाने लगा और यहाँ के निवासी आर्या, भारतीय और हिन्दू कहलाए। पण्डित जवाहर लाल नेहरु अपनी पुस्तक 'डिस्कवरी आफ इण्डिया' मे जब यह कहते है कि हमारे पुराने साहित्य मे तो हि्दू शब्द तो आता ही नहीं है, तो वे हिन्दूत्व में समायी भावनाओं का विरोध नहीं करते। मानवीय श्रेष्ठता के मानक इस शब्द का भला कौन विरोध कर सकता है और कौन करेगा। उदारता एवं सहिष्णुता तथा समस्त विश्व को अपने प्यार का अनुदान देने वाले हिन्दूत्व के प्रति सभी का मस्तक अनायास ही झुक जाता है। हाँ इस शब्द का अर्थ पहले-पहल प्रयोग जिस ग्रंथ में मिलता है, वह आठवीं शदी का ग्रन्थ है 'मेरुतन्त्र'। इसमें भी हिन्दू शब्द का अर्थ किसी धर्म विशेष से नहीं हैं । इसके तैतीसवें अध्याय में लिखा है "शक एवं हूण आदि का बर्बर आंतक फैलेगा। अतः जो मनुष्य इनकी बर्बरता से मानवता की रक्षा करेगा वह हिन्दू है"। मेरुतन्त्र के अतिरिक्त भविष्य पुराण, मेदिनी कोष, हेमन्त कोसी कोष ब्राहस्पत्य शास्त्र, रामकोष, कालिका पुराण , शब्द कल्पद्रुम अद्भुत रुपकोष आदि संस्कृत ग्रंन्थो में इस शब्द का प्रयोग मिलता है। ये सभी ग्रंन्थ दसवीं शताब्दी के आस पास के माने जाते है।
इतिहासकारों एंव अन्वेषण कर्ताओ का एक बड़ा वर्ग इस विचार से सहमत है कि हिन्दू शब्द का प्रेरक सिन्धु नदी है। डा० वी डी सावरकर की पुस्तक 'स्लेक्ट इन्सक्रिप्सन' में कहा गया है, सिन्धु नदी के पूर्वी एवं पश्चिमी दिशाओ के बीच के क्षेत्र एंव पश्चिमी दिशाओं के बीच के क्षेत्र के निवासियों को फारस अर्थात वर्तमान ईरान के शासक जिरक एंव दारा हिन्दू नाम से पुकारते थे। आचार्य पाणिनी ने अष्टाध्यायी में सिन्धु का अर्थ व्यक्तियों की वह जाती बतायी है, जो सिन्धु देश में रहते हैं। पण्डित जवाहर लाल नेहरु के अनुसार हिन्दू शब्द प्रत्यक्षतः सिन्धु से निकलता है, जो इसका पुराना और नया नाम है। इसी सिन्धु शब्द से हिन्दू, हिन्दुस्थान या हिन्दुस्तान बने है और इण्डस इण्डिया भी। समकालीन इतिहासकार हिन्दू को फारसी भाषा का शब्द मानते है। फारसी भाषा में हिन्दू एंव हिन्दू से बने अनेक शब्द मिलते है। हिन्दुवी, हिन्दनिया, हिन्दुआना, हिन्दुकुश, हिन्द आदि फारसी शब्दो में यह झलक देखी जा सकती है। फारस की पुरब दिशा का देश भारत ही वास्तव मे हिन्द था।

वर्तमान भारत, पाकिस्तान बंग्लादेश एवं अफगानिस्तान इसी क्षेत्र का भाग है। फारसी शब्दावली के नियमानुसार संस्कृत का अक्षर 'स' फारसी भाषा के अक्षर 'ह' में परिवर्तित हो जाता है। इसी कारण सिन्धु शब्द परिवर्तित होकर हिन्दू हो गया। हिन्दू शब्द जेन्दावेस्ता या धनदावेस्ता जैसी फारसी की प्राचीन धार्मिक पुस्तक में सर्वप्रथम मिलता है। संस्कृत एवं फारसी भाषा के अतिरिक्त भी अनेकों ग्रंन्थो में हिन्द या हिन्दू शब्द का प्रयोग किया गया है।

श्री वासुदेव विष्णुदेवदयाल ने अपनी पुस्तक 'द एसेन्स आफ द वेदाज एण्ड एलाइड स्क्रिपचर्स' में पृष्ठ ३-४ पर आचार्य सत्यदेव वर्मा ने 'इस्लामिक धर्म ग्रंन्थ पवित्र कुरान के संस्कृत अनुवाद की भूमिका में श्रीतनसुख राम ने अपनी पुस्तक 'हिन्दू परिचय' के पृष्ठ ३१ पर लिखा है कि अरबी भाषा के एक अँग्रेज कवि लबी बिन अखतब बिन तुरफा ने अपने काव्य संग्रह में हिन्द एंव वेद शब्द का प्रयोग किया है। ये महान कवि इस्लाम से २३०० वर्ष पूर्व हुए है। अरबी 'सीरतुलकुल' में हिन्दू शब्द का मिलना यह अवश्य सुनिश्चित करता है कि यह शब्द यूनान, फारस एंव अरब देशों में प्रचलित था और यह भी कि विश्व की परीक्रमा में विभाजित अधिकतर समकालीन राष्ट्र इस शब्द को धर्म विशेष अथवा सम्प्रदाय विशेष के अर्थ में नहीं बल्कि सद् गुण सम्पन्न मानव जाति या क्षेत्र विशेष के अर्थ में प्रयोग करते थे।
हिन्दू शब्द से मानवीय आदर्शो का परिचय मिलता है। साथ ही सिन्धु क्षेत्र सम्बन्धित होने के कारण इससे हम अपना राष्ट्रीय परिचय भी पाते है। हिन्दू शब्द को जब हम साम्प्रदायिकता संकीर्णताओं से जोड़ते है तो हम अपनी महानता, विशालता एवं गर्व को संकुचित मानसिकता मे बन्दी बना देना चाहते है। भारत में अपना अस्तित्व रखने वाले सभी धर्मों, सम्प्रदायों की मान्यताएँ एंव उपासना विधि भाषा, वेशभुषा, रीतिरिवाज, धार्मिक विश्वास भले ही आपस मे न मिलते हो, परन्तु सभी अपना सम्मिलित परिचय एक स्वर में गाते हुए यही देते है, सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा । हो भी क्यों न, हिन्दू और हिन्दुस्तान इन सभी जातियों प्रजातियों एवं उपजातियों की मातृभूमी है। जहाँ सभी को रहने का समान अधिकार है।

मानवीय गौरव के प्रतीक इस शब्द से अपना नाता जोड़ने में महाराणा प्रताप एवं शिवाजी सरीखे देशप्रेमियों ने गर्व का अनुभव किया। गुरु गोविन्दसिंह ने भी इस शब्द के निहितार्थ का भावबिभोर होकर गान किया है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार हीन दुष्याति इति हिन्दू अर्थात जो अपनी हीनता एवं बुराई को स्वीकार कर उसे छोड़ने के लिए तैयार होता है वह हिन्दू है। 'द धर्मस्मृति' के अनुसार हिंसा से बचने वाला , सदाचारी ईश्वर की राह पर चलने वाला हिन्दू है। आचार्य माधव के अनुसार ओंकार मूलमन्त्र मे आस्था रखने वाले हिन्दू होते है। आचार्य बिनोबा भावे का कहना था, वर्णाश्रम को मानने वाला, गो सेवक, वेदज्ञान का पुजारी , समस्त धर्मो को सम्मान देने वाला , दैवी शक्तियों का उपासक , मोक्ष प्राप्ति की जिज्ञासा रखने वाला जीवन में आत्मसात करने वाला ही हिन्दू है। आज बदले हुए परिवेश में मान्यताएँ बदली हुई हैं। कतिपय चतुर लोग बड़ी चतुराई से अपने स्वार्थ के लिए, अहं की प्रतिष्ठा के लिए शब्दों का मोहक जाल बिछाते रहते है। बहेलिए की फाँसने वाली वृत्ति, लोमड़ी की चाल की अथवा फिर भेड़ियों की धूर्तता कभी उन आदर्शो को स्थापित नहीं कर सकती जिनकी स्थापना के लिए इस देश के सन्तो, ऋषियों, बलिदानियों ने अपने सर्वस्व की आहुति दे दी।

हिन्दुत्व की खोज आज हमें आदर्शवादी मान्यताओं में करनी होगी। इसमें निहित सत्य को मानवीय जीवन की श्रेष्ठता मे, सद् गुण-सम्वर्धन में खोजना होगा। धार्मिक कट्टरता एंव साम्प्रसायिक द्वेश नहीं 'वसुधैव कुटुम्ब कम्' का मूलमंत्र है। यह विवाद नहीं विचार का विषय है। स्वार्थपरता एंव सहिष्णुता अपनाकर ही हम सच्चे और अच्छे इन्सान बन सकते है। मानवीय श्रेष्ठता का चरम बिन्दु ही हमारे आर्यत्व एवं हिन्दुत्व की पहचान बनेगा,।

18 comments:

  1. मै गर्व के साथ कह सकता हूँ की मै एक हिन्दू हूँ. बहुत बढ़िया आलेख . बधाई

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  2. क्या यार, शाम के टाइम पे इस तरह का मजाक करके पैग का भी मजा किरकिरा कर रहे है ! इस देश में वास्तविक हिन्दू , मेरा मतलब जो वाकई हिन्दू है वो कुल आवादी का सिर्फ १० % है बाकी सब तो ....... रहने दो यार ,गाली जैसा लगेगी, इसलिए नहीं लिख रहा !

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  3. bahut achcha laga yeh aalekh.............

    welcum back........

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  4. इस विस्तृत और सारगर्भित आलेख के लिए मैं अंतर्मन से आपका अभिनन्दन करता हूँ

    क्या बात है !

    वाह !

    बधाई !

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  5. अच्छे आलेख के लिए बधाई.....खूब पढ़ो और समझ कर लिखो ।

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  6. इस आलेख को लिखने में आपने बहुत मेहनत की है .. बहुत बढिया लिखा .. बधाई !!

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  7. मिथिलेश बाबु...
    बाप रे बाप....कहाँ से इतना गहन अध्ययन करके आ गए बउवा...
    अरे हम तो बस फलाट हो गए.... और हाँ....आज लगा है कि कुछ हुआ है ब्लॉग जगत में....
    नहीं तो बहुत सूना सूना रहा सब कुछ तुम्हरे बिना....
    अयते साथ छक्का लगे दिए हो ...
    जियो जियो...
    दीदी...

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  8. Ada ne sahee kahaa hai shayad chhution me yahee kaam kar ke aaye ho abhee mujh se itana bhaari bharkam padhaa nahin jaaye ga adhaa padha hai samay milate hi pooraa padhiingi aasheervaad

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  9. शक एवं हूण आदि का बर्बर आंतक फैलेगा। अतः जो मनुष्य इनकी बर्बरता से मानवता की रक्षा करेगा वह हिन्दू है

    बिल्कुल सही बात !

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  10. Dubey ji aapka shodh sahraneeya hai. Hindu shabd ko itini baariki se samajhane ke liye abhar. स्वार्थपरता एंव सहिष्णुता अपनाकर ही हम सच्चे और अच्छे इन्सान बन सकते है। मानवीय श्रेष्ठता का चरम बिन्दु ही हमारे आर्यत्व एवं हिन्दुत्व की पहचान बनेगा। agar ise koot-koot kar har insan mein bhar de to hi hum vasudev kutumb ko sthapit kar sakte hai.

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  11. हिन्दू कहलाने का गर्व तो है ही, यह निबंध भी गौरवान्वित करता है ........
    बहुत ही सम्पूर्णता में निबंध को लिखा है

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  12. क्या भारतवासी या सनातन धर्मी कहने से कोई संकुचित विचार लगता हैं ? गीता में कहीं हिन्दू शब्द का जिक्र नहीं आया ,हिन्दू कहने मात्र से ऐसा लगता हैं कि जाति प्रथा को मानते हुए उंच -नीच का प्रचार करो,क्या यह सच नहीं हैं कि भारत वर्ष में हिन्दू मत मानने का अर्थ जन्मजात ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य ,क्षुद्र को मान्यता देना ? जबतक गीता के अनुसार वर्ण व्यवस्था लागू नहीं हो जाता हैं तब तक जाति एक शोषण का अचूक अस्त्र ही साबित होता रहेगा ,मैं कर्म पर आधारित व्यवस्था को उचित मानता हूँ जैसे यदि कोई ब्राह्मण जूते कि दूकान करे तो उसे मोची कहना चाहिए ,क्या देश के हिंदूवादी लोग ऐसा करने को तैयार हैं ?

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  13. दूबे जी,
    आपकी इस बात से मैं भी सहमत हूँ कि हिन्दू शब्द एक धर्म से कहीं अधिक व्यापक है. हिन्दू एक सभ्यता है, एक संस्कृति है. यह शब्द किसी युग में एक निश्चित क्षेत्र में रहने वाले लोगों के विषय में बताता था, परन्तु आज जब हम इसे इस्लाम, ईसाई, सिख आदि धर्मों के साथ प्रयुक्त करते हैं तो यह एक धर्म को ही परिभाषित करता है, जो कि भारत देश के विभिन्न धर्मों में से एक है. आपकी परिभाषा के अनुसार तो भारत के अन्तर्गत रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू होना चाहिये या जैविक (आर्य वाली बात क्योंकि आज भारत में कोई भी शुद्ध आर्य नहीं है) दृष्टि से कोई भी हिन्दू नहीं. मैं यही कहना चाहती हूँ कि हमें पहले अपने भारतीय होने पर गर्व होना चाहिये. किसी धर्म की बात बाद में आनी चाहिये.

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  14. बहुत सुंदर और बहुत से भ्रमों के जाल को हटाता आलेख है। बधाई! आप ने अच्छा आरंभ किया है।

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  15. बहुत ही बढ़िया और महत्वपूर्ण आलेख! मुझे इस बात का गर्व है कि मैं हिंदू हूँ और आपने बड़े ही सुंदर रूप से प्रस्तुत किया है! इस बेहतरीन और शानदार पोस्ट के लिए बधाई!

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  16. प्यारे १९ साल पर यह कमाल................

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  17. गर्व से कहो हम भारतीय हैं...

    जय हिंद...

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