Saturday, November 14, 2009

सावधान! " आपके शरीर में "काकटेल" जहर है "

क्या आपको पता है हम और आप नित्य ही जहर का सेवन करते हे, । आप लोग सोच रहें होंगे कि ये कैसे हो सकता है। अगर हम नित्य जहर खाते तो मर नहीं जाते क्या ? बात तो सही है, जिस जहर का सेवन हम नित्य कर रहे है वह हमें इतने आसानी से थोड़ीं न मरने देगा। श्रृष्टि के आंरभ से ही भोजन की एक अनिवार्य आवश्यकता रही है। मानव के लिए ही नहीं, पशु-पक्षियों एंव वनस्पतियों के लिए। प्राचिनकाल में मनुष्य शिलाग्रहों (गुफाओं) में निवास करते थे, । पशु पक्षियों का माश भी उनके उदरपोषण का साधन था। वैदिक युग में कृषि की शुरुआत हुई। वैदिक सूक्तों में कृषि तथा अन्न से संबधित इंद्र, वरुण अग्नि आदि देवो की प्रार्थना विशद् रुप से वर्णित है। आज प्रत्येक खाद्दपदार्थो में कीटनाशक एंव दूसरे हानिकारक पदार्थ पाये जा रहे हैं। डिब्बाबंद भोजन, बोतलबंद पेय यहाँ तक कि रोटी, दाल, चावल एंव सब्कियाँ भी हानिकारक जहर से नहीं बच पा रही है। हमारा पूरा खान-पान इतना जहरीला हो गया है कि हमारे अपने शरिर में भी कीटनाशकों की खासी मात्रा जमा होती जा रही है।
अधिक पैदावार के लिए कीटनाशक दवाओं के अंधाधुंध प्रयोग के कारण हमारे शरीर में एक अनोखी विष "काकटेल" इकट्ठी होती जा रही है। सामान्यतः कीटनाशक दवाओं का छिड़काव उचित रीति से नहीं किया जाता, परिणामस्वरुप अस्सी से नब्बे पतिशत कीटनाशक कीटों को मारने की बजाय फसंलो पर चिपक जाते है या फिर आस-पास की मिट्टी पर इक्टठे हो जाते है। जिस पर से इनकों हटाने का कोई प्रयास नहीं किया जाता हैं। मांसपेशियों एवं चरबी में जहर इकत्रित होता रहता है या फिर खून में मिलकर धीमें-धीमें जहर के रुप में कार्य करता है और अनेकं बीमारियों को जन्म देता है।
कीटनाशक दवाँ कैसंर और ट्यूमर को बढ़ावा देती है, जबकि कुछ सीधे दिमाग और इससे जुड़ी तंत्रिकाओंपर प्रहार करती है। दौरे पड़ना, दिमाग चकराना और याददाश्त की कमंजोरी जैसे लक्षण कीटनाशक दवाओं के कारण हो सकते हे। कुछ किटनाशक दवाईयाँ शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को भी समाप्त कर देती है। कुछ हारमोन बनाने वाले ग्रंथियों पर चोट करके शरीर की सारी गतिविधियों में उलट-फेर कर देती है।

कीटनाशको के इतने खतरनाक परिणामो के बाद भी इसका उपयोग बिना किसी अवरोध के व्यापक मात्रा में किया जा रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् द्वारा करवाए गये एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार गाय-भैंस के दूध के लगभग वाईस सौ नमूनो में से 82% मे तथा शिशुओ के डिब्बाबंद आहार के बीस व्यावसायिक ब्राड़ों के १८० नमूनें मेम 70% में डी.डी.टी. अवशेष रुप में मौजूद था। बोतलबंद पानी में किटनाशको की मात्रा स्वीकार्य सीमा से 15% अधिक थी। रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ गेहूँ और चावल के द्वारा हम प्रतिदिन कोई आधा मिली ग्राम (.5mg) डी.डी.टी. और बी.एच.सी खा जाते है। सबसे ज्यादा कीटनाशक हम सब्जियों के द्वारा अपने शरीर में पहुचाते हैं। बैगन को चमकदार बनाने के लिए कार्बोफ्यूरान में डुबाया जाता है। गोभी को चमकदार सफेदी देने के लिए मेथिलपैराथियान डाला जाता है। इसी तरह भिंडी तथा परवल को चमकीला हरा बनाने के लिए कापर सल्फेट और मैलाथियान का इस्तेमाल किया जाता है, जो की हमारे शरीर के लिए जहर का काम करती है। कीटनाशको के बाद हमारे शरीर को सबसे ज्यादा नुकसान आर्सेनिक, कैडियम, सीसा, ताँबा, जिंक और पारा जैसी धातुओं से है। फलों, सब्जियों, मसालों आदि से लेकर शिशु आहार तक ये पर्याप्त मात्रा में पाये जाते है।

दिल्ली विश्वविद्दालय और वाराणसी हिंदू विश्वविद्दालया द्वारा किए गये सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार सब्जियों में सीसे की मात्रा स्वीकार्य सीमा मात्रा से 73% ज्यादा पाई गयी । रिपोर्ट के अनुसार, सब्जियों को बहुत अच्छी तरह पर भी इनके जहरीलेपन को सिर्फ 55% तक ही कम किया जा सकता है। सीसा की अधिकता गुरदा खराब करनेण के अलावा उच्च रक्तचाप भी पैदा करती है। इसका सबसे खतरनाक असर बच्चो के मस्तिष्क पर पड़ता है। सिसायुक्त आहार का सेवन करनेसे बच्चो की बुद्धि का विकास अवरुद्ध हो जाता है, । साथ ही उनकीं बुद्धि मंद पड़ने लगती है। बच्चो की मनपसंद चाकलेट भी खतरे से खाली नहीं है। इसमें मौजूद निकिल त्वचा का कैंसर पैदा करता है। यदि डिब्बा प्लासटिक का है तो यह खतरा और बढ़ जाता है , क्योकिं प्लास्टिक धीरे-धीरे जहरीले रसायन छोड़ता है। प्लास्टिक में मौजूद थेलेन वर्ग के रसायन शरीर के हारमोन संतुलन को तहस नहस कर देते है।

मांसाहार तो शाकाहार से और भी खतरनाक स्थिति में पहुँच चुका है। मांस पर ब्लीचिंग पाउडर लपेट दिया जाता है, ताकि पानि सूखने से मांस का वजन कम न हो जाए। इसी तरह से खून के बहाव पर रोक लगाने के लिए कापर सल्फेट का इस्तेमाल किया जाता है। मछलियों में चमकदार ताजगी लंबे समय तक बनाये रखने के लिए अमोनियम सल्फेट में डुबाया जाता है। इस प्रकार मांसाहार यो तो खतरनाक है ही। अब वह विषयुक्त हो गया है। साथ ही खाद्दपदार्थो मे मिलाये गये कृत्रिम रंग भी शरीर के लिए खतरनाक होते है, तथा बहुत से रोगो का कारण भी बनते है। हमारे शरीर में घुलते-मिलते इस जहर से बचाव का एक ही उपाय है कि हम अपनी प्राचिन पद्धति को पुनः अपनाएँ। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम अनियमित अनुचित खान पान से बचकर ही अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं।

22 comments:

  1. बहुत अच्छी जानकारी है मगर लोग खायें क्या। हर चीज़ मे मिलावट है। धन्यवाद इस जानकारी के लिये। और आशीर्वाद्

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  2. कीटनाशक को लेकर काफी अच्छी जानकारी दी है...लेकिन अब ये जहर इतना फैल चुका है कि इस पर रोक किसी एक आदमी के वश की बात नहीं है। अब सरकार को जाग जाना चाहिए।

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  3. शायद यह भी हमारे भोजन का अंग बन गए हैं और हम इसके इम्यून हो गए हैं.... तभी तो जीवन रेखा भी बढती जा रही है :)

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  4. कीटनाशक दवाँ कैसंर और ट्यूमर को बढ़ावा देती है, जबकि कुछ सीधे दिमाग और इससे जुड़ी तंत्रिकाओंपर प्रहार करती है। दौरे पड़ना, दिमाग चकराना और याददाश्त की कमंजोरी जैसे लक्षण कीटनाशक दवाओं के कारण हो सकते हे। कुछ किटनाशक दवाईयाँ शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को भी समाप्त कर देती है। कुछ हारमोन बनाने वाले ग्रंथियों पर चोट करके शरीर की सारी गतिविधियों में उलट-फेर कर देती है।

    आपकी इस पोस्ट से बहुत सी जानकारी मिली .....हालांकि पता तो पहले भी था पर कुछ नयी जानकारी जैसे की ...." बैगन को चमकदार बनाने के लिए कार्बोफ्यूरान में डुबाया जाता है। गोभी को चमकदार सफेदी देने के लिए मेथिलपैराथियान डाला जाता है। इसी तरह भिंडी तथा परवल को चमकीला हरा बनाने के लिए कापर सल्फेट और मैलाथियान का इस्तेमाल किया जाता है, " ....आदि भी मिली .....शुक्रिया ....!!

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  5. अच्छी जानकारी. यही सब देख सुन कर ऑर्गेनिक फूड की दुकानें चल पड़ी हैं यहाँ जोरों से.

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  6. " behad sahi jankari ...anmol jankari "

    ----- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

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  7. अब तो हवा भी शुद्ध नहीं रह गई है कि इन्सान साँस तो ले सके.....खाद्य पदार्थों की तो बात ही न करें ।
    आज वक्त का तकाजा यही है कि अपनी संस्कृ्ति की ओर वापिस रुख किया जाए...वर्ना तो..

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  8. समस्‍या यही है पर समाधान नहीं है । सब कुछ जानते हुए भी खाना पडता है और शरीर और दिमाग में कॉकटेल इकटठा होता रहता है ।

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  9. jab kabhi iske baare me padhte ya sunte hai to khun khoul uthta hai ye soch kar ki kis tarah insan paiso ke liye aapni aur apnoki hi jaan lene pe tula hai. par hum aur aap helpless hai kuch bhi nahi kar sakte siway choti-moti sawdhani bartane ke atirikt? ab to GM food bhi market me aane lagega uske phalswaroop nayi-nayi bimariyo ke baare me pata chalega. ek taraf global warming aur dusari taraf ye lagata hai ab homo sapiens ki ulti ginti shuru ho gayi hai. :(

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  10. यहाँ अच्छी जानकारी दी है आपने। लेकिन हम कुछ कर भी तो नहीं कर सकते। खाना तो यही सब पडेगा। हर ओर यही हाल है।

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  11. और हाँ। इसी तरह लिखिये। इस बार आपकी दाद दूंगा। शुक्रिया अच्छी पोस्ट के लिये।

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  12. खुशी हुई इस बार का आपका विषय देखकर दूबे जी..तो अब तो आप मेरे छोटे भाई है..
    ध्यान रहे तारीफ के साथ साथ डाटती भी बहुत हूँ..
    खैर..शुक्रिया इस विषय में जानकारी देने के लिए..
    जानते तो हम सब है पर कोई अन्य विकल्प दिखाई ही नहीं देता...

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  13. बहुत ही अच्छी और महत्वपूर्ण जानकारी दी है आपने! हमारे देश में लोग इतना बीमार पड़ते हैं और इसका सिर्फ़ एकमात्र कारन ये है की हर खाने में मिलावट रहती है !

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  14. अच्छी जानकारी मगर साथ ही निर्मला जी की बात भी गौर फरमाने लायक ! TINA ( there is no alternative ) factor लागू है !

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  15. आपकी जानकारी बहुत अच्छी है ...... पर इस का उपाय क्या है .......

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  16. Upyogi jaankari ke liye dhanywaad.

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  17. यह अच्छी जानकारी है पढ़े-लिखों को तो कम से कन इसका ध्यान रखना ही चाहिये ।

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  18. दूबे जी आपके बहन कहने पर मुझे कोई ऐतराज़ नहीं...

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  19. Bahut badhiya janakaree ke liye dhnyavaad.

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  20. बहुत चिंता की बात है। कुछ बचने का रास्ता सूझे तो बताइएगा।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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