Saturday, November 21, 2009

गाली के बदले चुप रहना कितना जायज है ।।

जी हाँ आपने बिल्कुल सही सूना मुझे । गाली के बदले चुप रहना कितना सही होगा । ये एक ऐसा सवाल है जिस पर बहुत से लोगो के बहुत से मत हो सकते है । यहाँ कोई महात्मा गाधीं तो बन नहीं सकता, और न ही उनके जैसा किसी में सहनशीलता ही है । मेरा ऐसा प्रश्न पुछने का बस एक ही मकसद् है, और वह है एकदूसरे के धर्म पर प्रत्यारोपण करना । जैसा की बहुत से लोगो को मालुम है कि आजकल ब्लोग जगत में धर्म के उपर बहुत से लेख आ रहे है और काफी कुछ भड़काऊं भी लिखा जा रहा है इस लेख के अन्दर । मैं इन सबमें शामिल हूँ , इससे इनंकार नहीं किया जा सकता । मुझे ब्लोग जगत में आये हुये मुश्किल से पाँच या छ महिनें ही हुए । जब मैंने ब्लोगिगं शुरु किया था तब मैं बस सामाजिक मुद्दो पर ही लिखता था , लिखता क्या था कोशिश करता था । तब मैंने ये कभी नहीं सोचा था कि मैं धर्म से जुड़े मुद्दे पर कुछ भी लिखूँगा । समय बदल गया , मैंने भी धर्म को मुद्दा बनया और लिखना शुरु किया , बहुत से लोगो नें मेरा विरोध किया और से लोगो नें शाबासी भी दी । धर्म का मुद्दे पर लिखना मतलब विरोध का सामना करने जैसा है ।

मैंने हिन्दुत्व को लेकर कुछ लेख लिखे , जिसपर मुझे तिखी टिप्पणीयों का सामना करना पड़ा और वह जायज भी था । मैं खूद इन सबके पक्ष में कभी नहीं रहा । लेकिन आखिर कोई कब तक चुप रह सकता है । हर चीज की कोई हद सिमा होती है । लगातार हिन्दुओं के खिलाफ, हिन्दू धर्म के खिलाफ लेख लिखे जा रहे हैं, क्या ये सब देख कर कोई चुप रह सकता है ? बहुत से लोगो का कहना होता है कि आप चुप रहिए और ऐसे लेखो को नजरअन्दाज करिए । ठिक है मैं नहीं बोलता या मेरे जैसे बहुत से लोगो नें उस लेख को नहीं पढ़ा और न ही टिप्पणी दी । नतिजा क्या मिलता है सबको मालुम है । लेख ब्लोगवाणी पर सबसे उपर रहेगा , पसन्द में, सबसे ज्यादा पढे जाने में , ज्यादा टिप्पणी में । तो अब बताईये कौन पढ़ता है उन्हे कौन पसन्द और टिप्पणी देता है । और अगर आप वहाँ टिप्पणी देखते है तो शायद आप और भी निराश हो जायें। ठिक है मैं ये नहीं कहता कि ऐसे लेखो को लिखा जाना चाहिए या मै खूद इस चिज के खिलाफ हूँ । लेकिन आप जिस धर्म से है अगर उसके खिलाफ लिखा जाता है तो आप अपना बचाव तो जरुर करना चाहेंगे । मै हिन्दू हूँ , मैंने भी पहले ऐसे लेखो को नजरअन्दाज किया लेकिन कोई कब तक सह सकता है ।

कल अमृत पाल सिंह जी ने अपने ब्लोग पर एक लिखा था " अब समय आ गया है धर्मनिरपेक्षता विरोधी और साम्प्रदायिक भावना का प्रचार करने वाले ब्लागर्स एवं ब्लाग के प्रचार को खत्म करने का" पहल तो काफी अच्छी है और सराहने लायक भी है । उन्हे किसी ने मेल किया था मेरे ब्लोग को लेकर कि मैं भड़काऊं लेख लिख रहा हूँ , या मेरे जैसे बहुत से लोग हैं जो इस तरह से लिखते है । वहाँ अमृत पाल जी ने मेरा लिंक भी दिया और कहा कि ये जरुरी है ,। अच्छी बात है आपने मेरा लिंक दिया , उससे लोगो को ये तो मालुम हो जायेगा कि मैंने क्या गलत लिखा है । अमृत पाल जी भी नये है ब्लोगिंग में , लेकिन जब उन्हे ये पता है कि ऐसे बहुत से लोग है लिखने वाले तो उन्होनें बस मेरा ही लिंक क्यों दिया । भाई इन सबमें सलीम , आसिफ कारीफ , और कैरानवीं भी आते हैं , तो आप उनका भी लिंख देते तो और भी अच्छा होता ।

जनाब की चिन्ता बिल्कुल जायज है और होनी भी चाहिए । जिस तरह से हिन्दू समाज को घसिटा जा रहा है क्या वो सही या इस्लाम को घसिटा जा रहा है वो सही है । किसी भी धर्म को लेकर लिखना उसकी बुराई करना बिल्कुल सही नहीं कहा जा सकता । लेकिन बात फिर बात वहीं आकर रुक जाती है "कब तक" । इस चिज की गारंटी कौन देगा कि अगर मैं लिखना बन्द कर देता हूँ इस तरह के लेखो को तो हिन्दूओं के खिलाफ कोई नहीं लिखेगा , बताना जरा मुश्किल है। बस आपसी एकता की बात करने से कुछ नहीं हो सकता , । पता तो उन्हे चलता जो इसको महशुश करते है । और अन्त में अमृत भाई से यही कहना चाहूगा कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती ।

11 comments:

  1. ये बात सही है कि अमृतपाल जी को तुम्हारे साथ उनका भी लिन्क देना चाहिये था। मगर मैं फिर भी यही कहूँगी कि अपनी बात जरूर रखो मगर इनके लहजे मे नहीं बस अपने धर्म के बारे मे बताओ गाली के बदले गाली देने का अर्थ है हम भी उन जैसे ही हैं । शुभकामनायें।

    ReplyDelete
  2. मैं भी यही कहूँग कि अपनी बात जरूर रखो मगर इनके लहजे मे नहीं बस अपने धर्म के बारे मे बताओ गाली के बदले गाली देने का अर्थ है हम भी उन जैसे ही हैं । शुभकामनायें।

    ReplyDelete
  3. मिथिलेश जी क्या लिखने को केवल ब्लागवाणी पर या चिट्ठाजगत पर ऊपर रखने के लिये लिखते हैं ? और ज़्यादा टिप्पणी आने का मतलब ये ज़रूर है कि आपका लेख ज़्यादा पढा जा रहा है लेकिन ये नहीं कि आप सही ही लिख रहे होगे। और हमेशा शाबासी का मतलब ये मत समझिये कि आप सही हैं। पीछे की कूटनीति तो समझिये। जो लोग आपको शाबासी दे रहे हैं वो आपको गलत ठहरा देंगे तो उन्हे मालूम है कि शायद आप कभी उनके ब्लाग की तरफ नजर भी ना उठा कर देखें।
    और अगर आपको मेरी बातें गाली लग रही हैं तो आप भी कौन सा चुप हैं। ज़वाब तो आपने भी दिया है।
    और केवल आपका लिंक देने का भी केवल यही मकसद था कि मैं आपको समझाऊँ। लेकिन आप समझ ही नहीं रहे।
    और ये धर्म की बखिया उधेड कर आपको क्या मिलता है ? ये बता दीजिये मुझे।
    दिक्कत ये है कि आप ग़लती नहीं मानते। ऐसे में मैं क्या समझाऊँ

    ReplyDelete
  4. @ महफूज जी
    आपने तो मेरी पोस्ट पर भी ये टिप्पणी की थी कि "मैंने आपको सोचने पर मजबूर कर दिया।" लेकिन यहाँ तो आप पलट गये। कोई बात नहीं। जानता हूँ ताकतवर के साथ हर कोई रहता है। ब्लागिंग की दुनिया में नया ज़रूर हूँ लेकिन ग़लत नहीं लिखा कुछ। इतना जानता हूँ। अपने मन से पूछिये।
    और किसी मसले पर तो कूटनीति छोडिये। कहीं तो खुल कर बोलिये।

    ReplyDelete
  5. महफूज़ भाई की बात से इत्तेफाक रखता हूँ..!!!

    ReplyDelete
  6. खुशी हुई जानकर की अब मुद्दे कुछ सुलझने लगे है।
    कोशिश रहेगी की आपसे जल्द से जल्द बात हो।

    ReplyDelete
  7. .
    .
    .
    मिथलेश जी,

    "गाली के बदले चुप रहना कितना सही होगा ?"
    बिलकुल सही नहीं होगा, गाली का जवाब दो और जोर से चिल्ला कर दो।

    समस्या तो तब आती है जब कोई गाली को ही पोस्ट का हेडर बना देता है।

    आओ 'शाश्वत सत्य' को अंगीकार करें........प्रवीण शाह

    ReplyDelete
  8. तथ्यपरक पोस्ट है मिथिलेश.. बहुत ही सुन्दर लिख रहे हो आजकल..... दिल खुश कर देते हो..
    जय हिंद बोलना शुरू करो यार तुम भी..
    जय हिंद...

    ReplyDelete
  9. आपने कितने ऐसे लोग देखे हैं जो जबरन गाली खाकर चुप रहते हैं। क्या आप स्वयं गाली खाकर चुप रह सकते हैं?

    यह सवाल सिर्फ इसलिये उठ रहा है क्योंकि धर्म का मुद्दा बीच में आ रहा है।

    मान लीजिये कि आप ट्रेन से यात्रा कर रहे हैं और कोई गाली गलौज करके आपको आपके आरक्षित बर्थ से हटाने की कोशिश करता है तो आप क्या करेंगे? समझाने की कोशिश करेंगे और फिर भी यदि वह न माने तो अवश्य ही आप प्रतिकारस्वरूप गाली गलौज में उतर आयेंगे। आपका यह कार्य जायज हैं क्योंकि इस गाली गलौज में कहीं धर्म का मुद्दा नहीं आ रहा है।

    सवाल यह भी उठता है कि कोई किसी को गाली देता ही क्यों है? किसी को भी अधिकार नहीं है किसी दूसरे को जबरन गाली देने का।

    स्वाभिमानी व्यक्ति जबरन किसी की गाली सह ही नहीं सकता।

    ReplyDelete
  10. धर्म जब तक अपने हृदय और घर तक सीमित थी तो कोई बात नहीं थी। अब उसका भी बाज़ारीकरण हो गया है तो ये गुल तो खिलने ही थे। हम अपने अपने धर्म का पालन करें... बस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स!

    ReplyDelete

आपकी राय हमारे लिये महत्तवपूर्ण है । अपनी बात को बेबाकी से कहें ।