Monday, November 23, 2009

कट्टरताओं मत बाँटो देश ---- धर्म , जाती और क्षेत्र के नाम पर

नया युग वैज्ञानिक अध्यात्म का है । इसमें किसी तरह की कट्टरता मूढता अथवा पागलपन है। मूढताए अथवा अंधताये धर्म की हो या जाति की अथवा फिर भाषा या क्षेत्र की पूरी तरह से बेईमानी हो चुकी है । आज से पाँच-छह सौ साल पहले यूरोप जिस अंधविश्वास दंभ एंव धार्मिक बर्बरता के युग में जी रहा था, उस युग में आज अपने देश को घसीटने की कोशिश करना किसी भी तरह से उचित ना होगा। जो मूर्खतायें अब तक हमारे निजी जीवन का नाश कर रही थी वही अब देशव्यापी प्रागंण में फैलकर हमारी बची-खुची मानवीय संवेदना का ग्रस कर रही है । जिनकें कारण अभी तक हमारे व्यक्तित्व का पतन होता रहा है , अब उन्ही के कारण हमारा देश तबाह हो रहा है । धर्म के नाम पर , जाति के नाम पर,क्षेत्र के नाम, और भाषा के नाम पर जो झगड़े खड़े किए जा रहे है उनका हश्र सारा देश देख रहा है । कभी मंदिर और कभी मस्जिद तो कभी जातीयता को रिझाने की कशिश ।दुःख तो तब और होता है जब इस तरह के मामलो में शिक्षित वर्ग भी शामिल दिखता है । ये सब किस तरह की कुटिलताएँ है और इनका संचायन वे लोग कर रहे है जो स्वयं को समाज का कर्णधार मानते हैं । इन धर्मो एवं जातियो के झगड़ो को हमारी कमजोरियों दूर करने का सही तरीका केवल यही है कि देश के कुछ साहसी एंव सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन कट्टरताओं की कुटिलता के विरुद्ध एक महासंग्राम छेड़ दें।

जब तक यह मूर्खता नष्ट न होगी, तब तक देश का कल्याण-पथ प्रशस्त ना होगा । समझौता कर लेनें, नौकरियों का बँटवारा कर लेने और अस्थायी सुलह नामों को लिखकर, हाथो में कालीख पोत लेने से कभी राष्ट्रीयता व मानवीयता का उपवन नहीं मंहकेगा । हालत आज इतनी गई-गुजरी हो गई है कि व्यापक महांसंग्राम छेडे बिंना काम चलता नहीं दिखता । धर्म , क्षेत्र एवं जाति का नाम लेकर घृणित व कुत्सित कुचक्र रचनें वालों की संख्या रक्तवीचकी तरह बढ रही है । ऐसे धूर्तो की कमी नहीं रही, पर मानवता कभी भी संपूर्णतया नहीं हुई और न आगे ही होगी, लेकिन बीच-बीच में ऐसा अंधयूग आ ही जाता है , जिसमें धर्म , जाति एवं क्षेत्र के नाम पर झूठे ढकोसले खड़े हो जाते हैं । कतिप्रय उलूक ऐसे में लोगो में भ्रातियाँ पैदा करने की चेष्टा करने लगते है । भारत का जीवन एवं संस्कृति वेमेल एवं विच्छन्न भेदभावों की पिटारी नहीं है । जो बात पहले कभी व्यक्तिगत जीवन में घटित होती थी, वही अब समाज की छाती चिरने लगें । भारत देश के इतिहास में इसकी कई गवाहिँया मेजुद हैं । हिंसा की भावना पहले कभी व्यक्तिगत पूजा-उपक्रमो तक सिमटी थी, बाद में वह समाज व्यापिनी बन गयी । गंगा, यमुना सरस्वती एवं देवनंद का विशाल भू-खण्ड एक हत्याग्रह में बदल गया । जिसे कुछ लोग कल तक अपनी व्यक्तिगत हैसियत से करते थे, अब उसे पूरा समाज करने लगा । उस समय एक व्यापक विचार क्रान्ति की जरुरत महसूस हुई । समाज की आत्मा में भारी विक्षोभ हुआ ।

इस क्रम में सबसे बडा हास्यापद सच तो यह है कि जो लोग अपने हितो के लिए धर्म , क्षेत्र की की दुहाई देते है उन्हे सांप्रदायिक कहा जाता है, परन्तु जो लोग जाति-धर्म क्षेत्र के नाम पर अपने स्वार्थ साधते हैं , वे स्वयं को बडा पुण्यकर्मि समझते हैं । जबकि वास्तविकता तो यह है कि ये दोंनो ही मूढ हैं , दोनो ही राष्ट्रविनाशक है । इनमें से किसी को कभी अच्छा नहीं कहा जा सकता । ध्यान रहे कि इस तरह की मुढतायें हमारे लिए हानिकारक ही साबित होंगी , अंग्रजो ने तो हमारे कम ही टुकडे किय, परन्तु अब हम अगर नहीं चेते तो खूद ही कई टूकडों में बँट जायेंगे, क्या भरोसा है कि जो चन्द स्वार्थि लोग आज अलग राज्य की माँग कर रहे हैं वे कल को अलग देश की माँग ना करे, इस लिए अब हमें राष्ट्रचेतना की जरुरत है, हो सकता है शुरु में हमें लोगो का कोपाभजन बनना पड़े , पर इससे डरने की जरुरत नही है । तो आईये मिलकर राष्ट्र नवसंरचना करने का प्रण लें ।

10 comments:

  1. बहुत सुन्दर आलेख मिथिलेश... बिलकुल दिल की बात कह दी...
    हाँ कल मैंने जवाब दिया था तुम्हारे सवाल का..
    देखा???
    जय हिंद... जय बुंदेलखंड...

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  2. सही बात कही आपने.
    इन कट्टरतावादी नारों की आड़् में राजनैतिक रोटियां बढ़िया सिकती हैं

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  3. पढ़ने वाले में नैतिक ऊहापोह पैदा करे, तयशुदा प्रपत्तियां हिला दे, ऐसी रचना कम ही मिलती हैं।

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    नया युग वैज्ञानिक अध्यात्म का है । इसमें किसी तरह की कट्टरता मूढता अथवा पागलपन है। मूढताए अथवा अंधताये धर्म की हो या जाति की अथवा फिर भाषा या क्षेत्र की पूरी तरह से बेईमानी हो चुकी है।

    प्रिय मिथिलेश,

    यह लिखा तो अच्छा है पर इस पर अमल कौन कर रहा है ?... आपकी इसी पोस्ट के नीचे दूसरी एक पोस्ट का लिंक दिख रहा है, शीर्षक है..."क्यों न गाय काटने वालों का सर कलम कर दिया जाये?"... यह भी तो एक तरह की कट्टरता मूढता अथवा पागलपन है।


    कि जो चन्द स्वार्थि लोग आज अलग राज्य की माँग कर रहे हैं वे कल को अलग देश की माँग ना करे, इस लिए अब हमें राष्ट्रचेतना की जरुरत है,

    अलग राज्य की माँग के प्रति यह नजरिया सही नहीं है...प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्... उत्तराखंड, हरियाणा आदि आदि सबूत हैं कि बडे राज्यों को विभाजित कर बनाये छोटे राज्य बेहतर व समग्र विकास व नियोजन कर पाते हैं...विकेन्द्रीकरण आज के दौर की सबसे बड़ी जरूरत है...कहते हैं कि जिस विचार का समय आ जाता है उसे रोका नहीं जा सकता...अत: स्थानीय अपेक्षाओं को पूरा करते हुऐ छोटे राज्य बन कर रहेंगे...और कुछ भी गलत नहीं है इसमें।

    आभार!

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  5. तो आईये मिलकर राष्ट्र नवसंरचना करने का प्रण लें ....
    सत्य वचन.

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  6. वैज्ञानिक आध्‍यात्‍म .. बहुत सुंदर शब्‍द इस्‍तेमाल किया आपने .. वैसे आध्‍यात्‍म हमेशा वैज्ञानिक होता है .. समय समय पर कुछ खामियां आकर इसके स्‍वरूप को गंदा करती हैं .. जिन्‍हें समय समय पर साफ कर आध्‍यात्‍म के वैज्ञानिक स्‍वरूप को बरकरार रखा जा सकता है !!

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  7. सही लिखा है मिथिलेश. आज मुम्बई में मराठी सीखने के लिये जिस तरह से धमकी भरे पोस्टरों का प्रयोग हो रहा है, वह भी एक कट्टरता ही है. इस सबके विरुद्ध सिविल सोसाइटी को आगे आना चाहिये.

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  8. " behatarin vicharoan ko sahi tarike se ...sahi waqt per sab ke samne rakha hai ...aapne bilkul sahi kaha hai ...mukti aur dipak ne bahut hi sahi kaha hai ...aur ye bhi sahi hai ki rajneta o ko is katterta wadi pan se bahut hi fayada hota hai ...magar hum aam aadmi kya kuch nahi kar sakte ..aao milker pran le ."

    badhai
    ----- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

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