Wednesday, December 23, 2009

बने तो मौत बने इसके सिवा कुछ भी नहीं




जब लगा खत्म हुई अब तलाश मंज़िल की।
धोका था नज़रों का वो इसके सिवा कुछ भी नहीं।।


समझा था क़ैद है तक़दीर मेरी मुट्ठी में;
रेत के दाने थे वे इसके सिवा कुछ भी नहीं।


मैं समझता रहा एहसास जिसे महका सा;
एक झोंका था हवा का वो और कुछ भी नहीं।


मैं समझता हूँ जिसे जान,जिगर,दिल अपना;
मुझे दिवाना वो कहते हैं और कुछ भी नहीं।


आजकल प्यार मैं अपने से बहुत करता हूँ;
होगा ये ख़्वाब और इसके सिवा कुछ भी नहीं।


लगा था रोशनी है दर ये मेरा रोशन है;
थी आग दिल में लगी इसके सिवा कुछ भी नहीं।

तेरे सिवाय जो कोई बने महबूब मेरी ;
बने तो मौत बने इसके सिवा कुछ भी नहीं।।

18 comments:

  1. मैं समझता हूँ जिसे जान,जिगर,दिल अपना;मुझे दिवाना वो कहते हैं और कुछ भी नहीं।
    are kaun hai wo naaspiti batana to hamko zara.:)

    तेरे सिवाय जो कोई बने महबूब मेरी ;बने तो मौत बने इसके सिवा कुछ भी नहीं।।
    aur i kaahe baabu...??
    ek dam galat baat hai...
    lekin kul mila kar kavita zabardast bani hai..
    didi..

    ReplyDelete
  2. वाकई हर मंजि‍ल धोखे की तरह ही लगती है... उसके आगे फि‍र उतना ही लंबा रास्‍ता मि‍लता है।

    ReplyDelete
  3. Bahut hi dard bhari dastaan hai aapki jo aap galatfahmi me na jaane kya khwab dekhne lage aur aankh khuli to sab kuch gayab! Hope this is only your imagination and not reality.

    ReplyDelete
  4. आजकल प्यार मैं अपने से बहुत करता हूँ;
    होगा ये ख़्वाब और इसके सिवा कुछ भी नहीं।
    वाह बहुत सुन्दर


    तेरे सिवाय जो कोई बने महबूब मेरी ;बने तो मौत बने इसके सिवा कुछ भी नहीं।।
    क्या कहने बहुत अच्छा लगा दिन पर दिन कवि बनते जा रहे हो। बधाई और आशीर्वाद्

    ReplyDelete
  5. मजबूर तेरी तरह मै भी हूँ
    न चाहकर भी तुझसे दूर हूँ
    कभी समझो खा़मोशियों को मेरी
    क्या कहूँ और मै..?
    इसके सिवा और कुछ नहीं...

    मिथिलेश भाई हो सकता है वो ये कहना चाहती हो..पर आपकी तरह शब्दों से खेल न पाती हो..

    बहुत सुन्दर लगी कविता...

    ReplyDelete
  6. बहुत सुन्दर लगी कविता..

    ReplyDelete
  7. बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

    लगा था रोशनी है दर ये मेरा रोशन है;
    थी आग दिल में लगी इसके सिवा कुछ भी नहीं।

    ReplyDelete
  8. किसी एक पंक्ति को उठाई तो बेईमानी होगी

    मुझे ज्यादा पढकर खुश वो दीवानी होगी,
    जिसके लिए लिखी गई ये कविता सुहानी होगी

    "हैप्पी अभिनंदन" में राजीव तनेजा

    ReplyDelete
  9. बहुत अच्छी ग़ज़ल लिखी है मिथिलेश भाई आपने.

    ReplyDelete
  10. '' तेरे सिवाय जो कोई बने महबूब मेरी ''
    अरे या तो '' महबूबा मेरी '' का प्रयोग होगा या
    '' महबूब मेरे '' का .......
    ......... तुक मिलाने में '' लिंग-विधान '' शिथिल
    नहीं होना चाहिए ..
    ............. प्रयास ठीक हो तो और अच्छा ,,,

    ReplyDelete
  11. गज़ल वैसे भी कठ‍िन व‍िधा है। इस व‍िधा में ल‍िखने से मैं भी घबड़ाता हूॅ। लेक‍िन बड़‍ि बात यह है क‍ि आप ल‍िख रहे हैं। ल‍िखते-ल‍िखते व्याकरण संबंधी कम‍ियॉं स्वत: दूर हो जाएंगी।
    -मेरी शुभकामना है।

    ReplyDelete
  12. मैं समझता हूँ जिसे जान,जिगर,दिल अपना;
    मुझे दिवाना वो कहते हैं और कुछ भी नहीं।

    बहुत खूब मिथलेश.. तुम्हारी कलम में बहुत दर्द है.. अच्छा लिखते हो..

    ReplyDelete
  13. तेरे सिवाय जो कोई बने महबूब मेरी ;
    बने तो मौत बने इसके सिवा कुछ भी नहीं ..

    प्यार की इंतेहा है ........ बहुत खूबसूरत शेर ..........

    ReplyDelete
  14. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

    ReplyDelete
  15. जब लगा खत्म हुई अब तलाश मंज़िल की।धोखा था नज़रों का वो इसके सिवा कुछ भी नहीं।।
    वाह बहुत खुब...बधाई ।

    ReplyDelete

आपकी राय हमारे लिये महत्तवपूर्ण है । अपनी बात को बेबाकी से कहें ।