Sunday, December 20, 2009

बिन ब्याहे मां बनना , क्या यही है नारी की स्वतन्त्रा ???

वर्तमान युगमें सब ओर स्वतन्त्राकी आकाक्षां जाग्रत हो गयी है । नारी ह्रदयमें भी इसका होना स्वाभावीक है । इसमे सन्देह नहीं कि स्वतन्त्रता परम धर्म है और नर तथा नारी दोनों ही स्वतन्त्र होना भी चाहिए । यह भी परम सत्य है कि दोंनो जबतक स्वतन्त्र नहीं होंगे , तबतक यथार्त प्रेम भी नहीं होगा । परन्तु विचारणीय प्रश्न यह है कि दोंनो की स्वतन्त्रताके क्षेत्र एक हैं या दो ? सच्ची बात यह हैं की नर और नारीका शारीरिक और मानसिक संघटन नैसर्गिक दृष्टिसे कदापि एक-सा नहीं हैं । तो दोंनो की स्वतन्त्रा कें सव्तन्त्रा मार्ग भी निश्चय नहीं हैं । दोनों अपने-अपने क्षेत्रमें अपने मार्ग से चलकर ही स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकते हैं । यही स्वधर्म है। जब तक स्वधर्म नहीं समझा जायेगा तबतक कल्याणकी आशा नहीं है । स्त्री घर की रानी है , साम्रागी है , घरमें उसका एकछत्र राज्य चलता है , पर वह गर की रानी स्नेहमयी माता और आदर्श गृहिणीके ही रुप में । नारीका यह सनातन मातृत्व ही उसका स्वरुप है । वह मानवता की नित्यमाता है । भगवान राम - कृष्ण , भीष्म-युधिष्ठिर , कर्ण , अर्जु, बुद्ध, महावीर , शंकर , रामानुज , गांधी आदि जगतके सभी बड़े- पुरुषको नारीने ही ने सृजन किया और बनाया है । उसका जीवन क्षणिक वैषयिक आनन्दके लिए नहीं , वह तो जगत् को प्रतिक्षण आनन्द प्रदान करनेवाली स्नेहमयी जननी है । उसमे प्रधानता है प्राणोंकी ह्रदयकी और पुरुषमें प्रधानता है शरिरकी ।

इसीलिए पुरुषकी स्वतन्त्राका क्षेत्र है शरीर और नारीकी स्वतन्त्रा क्षेत्र है प्राण- ह्रदय़ ! नारी शरीरसे चाहे दुर्बल हो , परन्तु प्राणसे वह पुरुष अपेक्षा सदा ही अत्यन्त सबल है। इसीलिए पुरुष उतने त्यागकी कल्पना नहीं कर सकता , जितना त्याग नारी सहज ही कर सकती है , अर्थात पुरुष और स्त्री सभी क्षेत्रोंमें समान भावसे स्वतन्त्र नहीं है । कोई जोश में आकर चाहे यह न स्वीकार करें , परन्तु होशमें आनेपर तो यह तय ही मानना पड़ेगा कि नारी देहके क्षेत्र में कभी पूर्णतया स्वाधीन नहीं हो सकती । प्रकृति ने उसके मन , प्राण और अवयवोंकी रचना ही ऐसी की है । नारी अपने एक विशिष्ट क्षेत्र में रह कर प्रकारान्तरसे सारे जग की सेवा करती है । यदी नारी अपनी इस विशिष्टता को भूल जाये तो जगत् का विनाश जल्द ही संभव है ।

जिन पाश्चात देशोंमें नारी स्वतन्त्रा के गान गाये जा रहे है वहाँ भी स्त्रियाँ परुषोकीं भांती निर्भिक रुप से विचरण नहीं कर पाती । नारी में मातृत्व है , गर्भ धारण करना ही पड़ता है । प्रकृति नें पुरष को इस दायित्व से मुक्त रखा है । इसलिए स्वतन्त्रा स्वाधिनता सर्वत्र सुरक्षित नहीं है, नारी अपने इस दायित्व से बच नहीं सकती ।जो बचना चाहती हे , उसमे विकृतरुपसे एसका उदय होता है । यूरोपमें नारी स्वतन्त्र है , पर वहाँ की स्त्रियाँ क्या इस दायित्व से बचती है ? क्या वासनाओं पर उनका नियत्रंण है ? वे चाहे विवाह करे या ना करे परन्तु पुरुष संसर्ग किये बिना रही नहीं सकती । इग्लैंड़ में बीस वर्षकी आयुवाली कुमारीयों में चालीस प्रतिशत विवाहके पहले ही गर्भवती पायी जाती है , क्या देश का ऐसा नैतिक पतक कहीं देखने कि मिल सकता है ?? क्या ऐसी स्त्र स्वतन्त्रा भारतीय महिलायें चाहती है ?? विदेशियोंका पारिवारिक जिवन भी नष्ट होता जा रहा है ।

लोग कहते है कि वहां की महिलायें शिक्षित हुई उनका विकास हुआ है । इसमें इतना तो सत्य है कि वहाँ स्त्रियोंमें अक्षर-ज्ञानका पर्याप्त विस्तार है , परन्तु इतने मात्र से कोई सुशिक्षित और विकसि हो जाये , ऐसा नहीं माना जा सकता ।

अस्वतन्त्रा भवेत्रान्त्ररी सलज्जा स्मितभाषिणी ।
अनालस्या सदा स्त्रिग्धा मितवाग्लोभवर्जिता ।। (उत्तराखण्ड ८-२)

"नारी को स्वच्छन्दतासे शून्य , लज्जायुक्त , मन्द मुदकानहीन वाणी बोलनेवाली , सदा प्रेम पूर्वक भाषण करने वाली और लोभसे हीन होनी चाहिए "। वास्तव में शिक्षा वह है जो मनुष्यमें उसके स्वधर्मानुकूल कर्तव्य जाग्रत करके उसे कर्तव्यका पूरा पालन करने योग्य बना दें। प्रकृति के विरुद्द शिक्षासे कोई लाभ नहीं हो सकता है ये भी सत्य है । इस युग में जो सिक्षा महिलाओं को दी जा रही है क्या उनका स्वधर्मिचित विकास हुआ है ?? एक बड़ा सवाल हो सकता है ।

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्दिमवाप्रोती न सुखं न परां गतिम् ।




"जो मुनुष्य शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है वह सुख को कभी प्राप्त नहीं कर सकता ।"
सच पूछिये तो सैकड़ो वर्षोसे चली आ रही है यूरोपकी शिक्षाने वहाँ कितनी महान् प्रतिभाशालिनि जगत की नैसर्गिक रक्षा करने वाली महिलाओं को उतपन्न किया है ? बल्कि यह प्रत्यक्ष है कि इस शिक्षासे वहाँ नारियों में गृहणीत्व तथा मातृत्व हास हुआ है । अमेरिका में 77 प्रतिशत महिलायें घर के कामों मे असफल होती है , । 60 प्रतिशन महिलायें ज्यादा उम्र हो जाने के कारण वैवाहिक योग्यता खो देती हैं । विवाह की उम्र साधारतः 16 से 20 वर्ष की मानी जाती है , इसके बाद ज्यों-ज्यो उम्र बढ़ती जाती है त्यों-त्यों विवाह की योग्यता भी कम होती जाती है । इसी का परिणाम है कि वहाँ स्वेक्षाचार , अनाचार, व्यभिचार और अत्याचार लगातार बढ़ते जा रहे हैं । अविवाहिता माताओंकी संख्या क्रमशः बढती जा रही है । घर का सुख किसी को नहीं । बिमारी तथा बुढापे में कौन किसकी सेवा करें ? वहां की शिक्षिता स्त्रियो में लगभग 50 प्रतिशत कुमारी रहना पड़ता है । यही क्या बहुमुखी विकास है ।

19 comments:

  1. वो मारा पापड वाले को .....

    ReplyDelete
  2. सुचिंतित विमर्श -हम केवल पश्चिम के प्रतिगामी मूल्यों को अपनाना चाहते हैं !

    ReplyDelete
  3. सच पूछिये तो सैकड़ो वर्षोसे चली आ रही है यूरोपकी शिक्षाने वहाँ कितनी महान् प्रतिभाशालिनि जगत की नैसर्गिक रक्षा करने वाली महिलाओं को उतपन्न किया है?
    इसके आंकड़े तो नहीं हैं मगर इन्टरनेट, ब्लॉगिंग और आधुनिक काल की अधिकाँश आवश्यकताओं की जननी यही शिक्षा है. पश्चिमी सभ्यता के धुर दुश्मन जिहादी भी अपने ऊँट और खंजर भूलकर इस सभ्यता से खोजे गए अस्त्र ही प्रयोग करते हैं, क्या इससे इस शिक्षा और सभ्यता का एक शुक्ल पक्ष ज़ाहिर नहीं होता. कमियाँ सब जगह हैं. हमारे देश में कितनी नारियां प्रसव में ही मर जाती हैं. भारत में बालिकाओं की तस्करी एक बहुत बड़ी समस्या है. घूसखोरी और भ्रष्टाचार में हम बहुत ऊपर बैठे हैं. हिंसा हमारे जीवन का एक अंग सा बन गयी है. हमारी प्रमुख नदियों का जल और भूजल भी पश्चिमी माप से पीने योग्य भी नहीं है, मगर इसके लिए हम भारतीय संस्कृति को दोष नहीं दे सकते हैं. सत्य यही है कि हमारी अपनी समस्याएं बहुत बड़ी हैं और किसी और पर उंगली उठाने से पहले हमें अपना घर धोने का प्रयास शुरू कर देना चाहिए.

    ReplyDelete
  4. महत्प्रवचन अस्ति।
    आप के अनुसार कुमारी माता निश्चय ही पापिनी है।
    युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन की माता के बारे में क्या ख्याल है?
    विवाह बिना पिता बनना पाप है या नहीं?
    कुमारी तो बिना व्यभिचारी पुरुष के माँ नहीं बन सकती।
    कोई नारी जो स्वयं के पैरों पर खड़ी है। वह बिना विवाह के मां बन कर अपनी संतान को पालती है तो?
    जो पैदा होता है उस की मृत्यु निश्चित है। आदिम काल में विवाह नहीं था। संतानों का कोई निश्चित पिता भी नहीं था। संपत्ति के संचयन और उस पर पुरुष के आधिपत्य के उपरांत उस के उत्तराधिकार का प्रश्न उठा तब जरूरी हो गया कि पिता को पता हो कि उस की संतान कौन है? और विवाह का जन्म हुआ।
    विवाह मानव समाज के विकास की एक अवस्था में पैदा हुआ है और वह निश्चय ही समाप्त भी होगा।

    ReplyDelete
  5. दूबे भाई,
    आप एक ओर तो इस बात से बहुत चिन्तित होते हैं कि औरतें माँ नहीं बनना चाहतीं दूसरी ओर आप बिना विवाह किये उनके माँ बनने से परेशान हैं. मुझे बस इतना बता दीजिये कि भारत में कितने प्रतिशत औरतें ऐसी स्वतन्त्रता प्राप्त कर चुकी हैं जो अविवाहित माँ बनने का निर्णय ले सकें? कितने प्रतिशत लड़कियाँ पढ़-लिखकर बर्बाद हो गयी हैं. आप जिस बात से इतने चिन्तित हैं उसके बारे में सोचने की इतनी ज़रूरत नहीं जितना कि भ्रूण-हत्या, दहेज और लड़कियों की अशिक्षा के बारे में सोचने की. मैं दिनेश राय द्विवेदी जी से सहमत हूँ. विवाह-संस्था का जो होना होगा वह होगा इस विषय में हम कुछ नहीं कर सकते. तो बेहतर यही होगा कि हम उस विषय में बात करें जिसमें कुछ किया जा सकता है या करने की ज़रूरत है.

    ReplyDelete
  6. मिथिलेश,
    इस मुद्दे पर हमारा समाज बहुत भ्रमित है ...
    अब कुंती को देखो...बिना व्याही माँ....और उसने कर्ण को जन्म दिया....लेकिन उसके सम्मान में कोई कमी नहीं आई....
    दुनिया का सबसे पोपुलर धर्म ,...ईसाईयत की नींव ही बिना व्याही माँ पर है...मरियम से ईसा मसीह का जन्म ही बिना व्याह के हुआ....और इस बात पर कोई टिका-टिपण्णी नहीं करता....तो चुन-चुन कर भला-बुरा नहीं कहा जा सकता...इसका अर्थ यह भी नहीं है की मैं बिना व्याह के माँ बनने का समर्थन कर रही हूँ...बिलकुल भी नहीं....
    माँ बनना नारी का अधिकार है....किसी भी अवस्था...वियाह के बाद भी माँ बनना .......नहीं बनना सिर्फ और सिर्फ उसका अधिकार होना चाहिए.....यह सर्वथा उस स्त्री के विवेक पर छोड़ना चाहिए.....क्यूंकि मातृत्व जैसी चीज़ लादी नहीं जा सकती है....यह बहुत जिम्मेवारी की बात है और इसके लिए अन्दर से स्त्री को तैयार होना चाहिए....मेरा यही मानना है....

    ReplyDelete
  7. मिथिलेश,
    इस मुद्दे पर हमारा समाज बहुत भ्रमित है ...
    अब कुंती को देखो...बिना व्याही माँ....और उसने कर्ण को जन्म दिया....लेकिन उसके सम्मान में कोई कमी नहीं आई....
    दुनिया का सबसे पोपुलर धर्म ,...ईसाईयत की नींव ही बिना व्याही माँ पर है...मरियम से ईसा मसीह का जन्म ही बिना व्याह के हुआ....और इस बात पर कोई टिका-टिपण्णी नहीं करता....तो चुन-चुन कर भला-बुरा नहीं कहा जा सकता...इसका अर्थ यह भी नहीं है की मैं बिना व्याह के माँ बनने का समर्थन कर रही हूँ...बिलकुल भी नहीं....
    माँ बनना नारी का अधिकार है....किसी भी अवस्था...वियाह के बाद भी माँ बनना .......नहीं बनना सिर्फ और सिर्फ उसका अधिकार होना चाहिए.....यह सर्वथा उस स्त्री के विवेक पर छोड़ना चाहिए.....क्यूंकि मातृत्व जैसी चीज़ लादी नहीं जा सकती है....यह बहुत जिम्मेवारी की बात है और इसके लिए अन्दर से स्त्री को तैयार होना चाहिए....मेरा यही मानना है....

    ReplyDelete
  8. kalyug me aur kaun-kaun se vikaro ko dekhna padega?

    ReplyDelete
  9. मित्र आपके इस लेख से पूर्णत: सहमत नही हुआ जा सकता है, क्‍योकि नारी और पुरूष स्‍वयं एक दूसरे के पूरक है बिना एक दूसरे संसर्ग से कोई अपने आप माँ नही बन सकता चाहे नारी ब्‍याही ही क्‍यो न हो।

    इस लेख के माध्‍यम से आप कुकृत्‍यो पर प्रहार कर सकते है किन्‍तु इस प्रकार नारी जाति पर आरोप लगाना गलत है। अगर नारी बिन व्‍याही माँ बनती है तो पुरूष भी बिन ब्‍याहा बाप बनता है फर्क इतना है कि नारी को बोझ ढोना पड़ता है और पुरूष इससे मुक्‍त है।

    ReplyDelete
  10. मिथिलेश भाई..
    नारी तथा नारी जीवन पर काफी गहन अध्ययन करके ये लेख लिखा है आपने ये दिख रहा है...
    क्या इस तरह के एक और लेख की अपेक्षा आपसे की जा सकती है जो पुरूषो के इसी तरह के कुछ शाश्वत सत्य को स्वीकार करता हो...
    महिलाओं पर बहुत कुछ लिखा है कृप्या पुरूषों पर भी कुछ लिखिए भाई..वो भी देखना चाहेंगे...
    शुभकामनाएँ...

    ReplyDelete
  11. महिलाओं पर बहुत कुछ लिखा है कृप्या पुरूषों पर भी कुछ लिखिए भाई..वो भी देखना चाहेंगे...
    शुभकामनाएँ...

    ReplyDelete
  12. महफूज़ अली said...
    वो मारा पापड वाले को .....

    मेरी इस टिपण्णी से ज्यादा बोलने की औकात नहीं !

    ReplyDelete
  13. आपकी चिंता जायज है.
    वैसे चीज़े तेजी से बदल रही हैं. पहले सामजिक संरचना को समझना होगा विमर्श जारी रखिये.


    ...अब नर विमर्श का इंतज़ार है.

    ReplyDelete
  14. मिथिलेश,
    आपका ये लेख पढ़ कर निराशा हुई। ऐसा लगा मानो आप स्त्री को लेकर किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। मुझे लगता है कि अब समय आ गया है जब वह खुद इस बात का निर्णय करे की उसे क्या करना है और क्या नहीं। बहुत हो गया अब उसे अपने ढंग से जीने दीजिए।

    ReplyDelete
  15. वाह क्या विचार हैं....स्त्री बिना ब्याही माँ बने तो नैतिक पतन...पुरुष बिना ब्याह के पिता बने तो कुछ नहीं.....हालाँकि माँ बनने से किसी औरत का सम्मान कम नहीं हुआ है हमारे इतिहास में हर चाहे वो ब्याहता हो या कुमारी.मुझे जो कहना था दिनेश राइ जी,अदा जी और महाशक्ति जी ने कह दिया है .............बहुत हुआ अब आप लोग इसकी चिंता मत कीजिये की नारी के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा ...वो नारी खुद सोच लेगी.बहुत शुक्रिया.

    ReplyDelete
  16. दिनेश राय जी से पूरी तरह सहमत हूँ।शुभकामनायें

    ReplyDelete
  17. मेरी बात यार, अदा जी ने रख दी। मुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं। वैसे चर्चा तो हर मुद्दे पर करनी ही चाहिए, चाहे वो देश का हो चाहे विदेश का।

    कैमरॉन की हसीं दुनिया 'अवतार'

    शौचालय और बेसुध मैं

    अहिंसा का सही अर्थ

    बाजारवाद में ढलता सदी का महानायक

    ReplyDelete
  18. जब रेखाएं धुमिल हो जाती हैं तो अनिष्ट निश्चित है... देश की रेखाएं धुमिल हुईं तो लडाई शुरू, समाज की रेखाएं धुमिल हुई तो अराजकता शुरू, स्त्री-पुरुष की रेखाएं घुमिल हुई तो परिवार का ढहना शुरू.......

    ReplyDelete
  19. सच है भाई .....वो मारा पापड वाले को.

    ReplyDelete

आपकी राय हमारे लिये महत्तवपूर्ण है । अपनी बात को बेबाकी से कहें ।