Monday, August 31, 2009

"तेरी याद में"

तुझसे मिलने को बेकरार रहता है कोई
हर पल मेरे ख्वाबो मे रहता है कोई
मरना तो है एक-न-एक दिन
लेकिन याद में तेरे हर पल मरता है कोई।।


हम वो नही जो धोखे दिया करते हैं
हम उनमे से हैं जो वफा किया करते है
दूर रहकर मिल ना शंकू शायद पर
याद बनकर साँसो मे बस जाया करते है।।


आवाज नही निकलती खफा होने के डर से
हम इजहार नही करते है रुसवा होने के डर से
बङी मुश्किल से पाया है तुमको
हम मिलने की बात नही करते जुदा होने के डर से।।

Wednesday, August 26, 2009

"मियाँ-मियाँ राजी तो क्या करेगा काजी "

क्या हुआ, क्या कहा आपने मै कहावत भुल गया हूँ, अरे नही ऐसी कोई बात नही है। अगर आपको लगता है कि मै कहावत भूल गया हूँ तो आप ऐसा बिल्कुल ना सोचें मुझे भलिभाँती कहावत याद है। आखिर क्या करुं हम और आप ही तो कहते है कि बदलाव व परिवर्तन बहुत जरुरी है हम और आप कहते है कि हमें जमाने के साथ-साथ चलना चाहिये नही तो हम दुनियाँ मे पीछे हो जायेगें। हम और आप बस परिवर्तन की बात करते है लेकिन हम परिवर्तन करते नही , इस चिज को लेकर हमारी सरकार बहुत जागरुक है। अगर देखाँ जाये तो हामरे सरकार के साथ कुछ और इसका ख्याल रखते है, जैसे उच्च न्यायालय , और कोई है जो इस परिवर्तन के लिए आन्दोलन तक करने को तैयार है कौन नही पता चलिए तो मै आपको बताता हूँ वह हैं हमारे बालीवुड की हाट व सेक्सी हिरोईन सेलिना जेटली वैसे आप इनको जानते जरुर होगें गरम जो ठहरी। अगर देखाँ जाये तो इस कङी मे फिल्म जगत का एक और नाम आता है, आता है या आती है इसमे थोङा सा सशंय है, हाँ तो वो और कोई नही डार्लिंग है नही समझे अरे हमारा या हमारी बोबी डार्लिग, इनको भी ये बदलाव चाहिये।
चलिए बहुत हो चुका अब मै बताता हूँ कि मै किस बदलाव की बात कर रहाँ हूँ।
मै बात कर रहा हूँ समलैंगिक संबंधों की, जिसे कुछ लोग समय के साथ समय की माँग कहते है। जी हाँ अब हमारे समाज मे पुरुष के लिए महिला और महिला के लिए पुरुष कि आवश्यकता नही है क्यो की अब हमारे समाज में एक पुरुष के दूसरे पुरुष अथवा एक महिला के दुसरी महिला के साथ सहमति पर आधारित यौन संबधों को अपराध नहीं माना जा सकता, क्यों की ये दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला है। उच्च न्यायालय ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखने वाली भारतीय दण्ड संहिता की धारा-377 को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानते हुए इसे रद्द कर दिया है। अब तो आप मेरे कहावत का मतलब समझ ही गयें होगें। समलैंगिक सेक्स को कानूनी मान्यता देने वाला भारत दुनिया का 127 वां देश बन गया है. दुनिया के कई अन्य देश इसे पहले से ही मान्यता दे चुके हैं वहीं अभी भी 80 देश ऐसे हैं जहाँ यह मान्य नही है
यह कानून करीब 150 साल पुराना है. धारा 377 का समावेश लार्ड मैकॉले ने किया किया था. इस धारा के अनुसार समलैंगिक संबंध और अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करना गैर कानूनी और सजापात्र गुनाह माना गया है. धारा 377 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध स्वैच्छा से ही सही – स्थापति करता है तो यह अपराध है. सन 1935 में इस धारा में सुधार किया गया और इसमे मुखमैथुन भी जोड दिया गया.।
देखाँ जाये तो ये कोई नया नही है, इसको लेकर विद्वानो मे हमेशा विवाद रहें है। प्राचीन धर्मग्रथों में शीव के अर्धनारिश्वर अवतार और विष्णु के मोहिनी अवतार का काफी जिक्र आता है. पौराणिक इतिहास का सबसे चर्चित समलिंगी पात्र शायद शिखंडी है. भीष्म की मृत्यु में महत्वपूर्ण पात्र निभाने वाले शिखंडी का जन्म कन्या के रूप में हुआ था, परंतु उसके पिता द्रुपद को यकीन था कि शिव के वचनानुसार शिखंडी एक दिन पुरूष बन जाएगा और उसे उसी तरह से पाला गया था, इससे शिखंडी महिला और पुरूष के बीच में पीस गया।
कई इस्लामी विद्वान भी समलैंगिकता की हिमायती थे अथवा स्वयं समलैंगिक थे. प्रसिद्ध लेखक सलीम किदवई के अनुसार मीर तकी मीर इसका एक उदाहरण है,. इसके अलावा शरमद शाहीद जिन्हे हरे भरे शाह के नाम से भी जाना जाता है और जिनकी कब्र दिल्ली की जामा मस्जिद में है, वे भी समलैंगिक थे ऐसी मान्यता है। वास्तव में यह विषय काफी जटील है. लगभग हर धर्म के अगुवा इसका विरोध कर रहे हैं वहीं समाज का एक ऐसा वर्ग भी है जो इसका प्रखर हिमायती है. इस सब को देखते हुए आने वाले समय में इस विषय पर जोरदार बहस होने की सम्भावना है. और सरकार के लिए यह एक एक चुनौती है।
जहाँ तक मेरा मानना है हम इस घिनौने काम को क़ानूनी रूप देकर हम भविष्य मे और एड्स के मरीज़, दिमागी मरीज़ पैदा करेंगे, इस से ज़्यादा कुछ नही दे सकते. ये समलैंगिकता एक ज़ेहनी बीमारी है और कुछ नही है. इसे नाजायज़ ही कर देना चाहिए. हम पश्चिम देशों के अंधे पैरोकार होते जा रहे हैं, अगर कल को ये मा बहन से भी संबंध जायज़ कर देंगे तो क्या हम, नही ना । समलैंगिकता पर बहस हो सकती है, अपने अपने विचार हो सकते हैं, लेकिन प्राकृतिक नहीं है। इस फैसले के बाद तो लगता है कि जल्‍दी ही पशुओं के साथ, सेक्‍स को भी अदालत की मान्‍यता मिल जाएगी। किन अधिकारों का हनन होता है, हनन नहीं होता है लेकिन सभ्‍यता और संस्‍कृति भी कोई चीज होती है। अदालत से यह भी आज्ञा ली जानी चाहिए कि बेडरुम के बजाय आम चौराहों पर कुत्तों की तरह सेक्‍स किया जाए तो क्‍या एतराज है। जब वह आम सहमति से हो रहा हो। पूरे देश को महासत्ता बनने के बजाय सेक्‍स सत्ता बना दो........... क्यों क्या ख्याल है।

Sunday, August 23, 2009

"अमीर बढें और गरीब" ?

फोब्बर्स पत्रिका मे अमीरो की सूची मे लागातार भारतीयो की संख्या बढ रही है। जिस तरह से भारत विकास के पथ पर चल रहा है ये जानकर हैरानी नही होनी चाहिये। अगर देखा जाये तो ये एक आश्चर्य चकित करने वाला आकङा है, क्यो की अगर आकङे और रिपोर्ट देखे तो पुरे एशिया मे सबसे ज्यादा गरीब भी भारत मे ही बसते है।
आप कह सकते हैं कि ये कमाल हमारे बढते अर्थव्वस्था का है जिसका दायरा नित्य दिंन नये आयाम छू रहा है। जहाँ तक मेरा मानना है जिस तरह से अमीरों की सख्यां बढ रही है उसी प्रकार इनकी सामाजिक जिम्मेदारी भी बढनी चाहिए, जो की नही हो रही। अमीरों को कोशिश करनी चाहिए कि उनके पैसे से गरीबो का भला हो सके, लेकिन सामाजिक कल्याण तो दूर वे कौङी दिखा रहे है। मेरी बात उनको कङवी तो जरुर लगेगी लेकिन अगर देखा जाये तो हमारे विकास के लिए ये बहुत जरुरी है। जिस प्रकार से अमिरो की सख्यां बढ रही है साथ ही गरिबी भी है तो हमारे सामाज मे आर्थिक असमानतयें भी बढ रही है जो की सोचनिय है। हमारे यहाँ के अमीरों का कहना है अगर वे सामाजिक कार्य मे उलझे तो उनका व्यवसाय प्रभावित होगा , जो की सरासर गलत है इस बात मे देखा जाये तो कुछ भी सच्चाई नही है। अगर ऐसा होता तो बिलगेट्स अपने संपत्ति का ९५ प्रतिशत हिस्सा मानव सेवा मे जुङे फांउडेशन मे नही दे पाते। दुनियाँ के दूसरे सबसे अमीर आदमी वारेन वुफेट भी एक आदर्श के रुप मे है, उन्होने अपने समंत्ति का ९० प्रतिशत बिल गेट्स के फाउडेंशन को दान करने की बात कही है। वहीं अगर देखा जाये तो भारतियो अमीरों मे इस बात की भिन्नता है विदेशी अमिरो से, । अमेरिका मे कई ऐसे व विश्वविद्दालय है जो की चैरिटी के भरोसे चलते हैं। भारत मे भी चैरिटी का चलन है। गांधी जी के दौर मे जमशेद जी टाटा और घनश्याम बिंङला जैसे लोगो ने सामाजिक कार्य के लिए कई काम किये और चैरिटी दान भी दिया। लेकिन अब भूमडंलीकरण के चलते ये दौर रुक सा गया है और ये सामाजिक जिम्मेदारी को आज के अमीर लोग अपनाने से इनकार कर रहे हैं। आज भारत को बहूमुखी विकास (ग्रामीण विकास, शिक्षा , स्वास्थय आदि) के लिए इन उद्दोगकर्मियों के पैसो की जरुरत है । ऐसा नहीं है की सरकार ये बात समझती नही कितुं उसके पास कोई रोडमैप नही है कि वह कारॅपोरेट जगत को दिशा दे सके। अमीरों को याद रखना चाहिए कि उनकी जामत मे बढोत्तरी के कारण एक ऐसी सामानातंर व्यवस्था कायम हो रही है जो की देश के विकास के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। अमीरो की संख्या मे बढोत्तरी यकीनन अच्छी बात है लेकिन यह भी जरुरी है कि इसका लाभ सभी लोगो को को हासिल हो। कारपोरेट जगत खुद सोचे कि उनके कारोबार में इजाफे का प्रतिफल अगर वचिंत तबको मे वृद्धि के तौर पर हो रहा है तो ये कहां तक जायज है।।।

Saturday, August 22, 2009

"फलक तक तुम साथ चलो "

फलक तक तुम साथ चलो
दिल के अरमां कह देगें
जो बात जुबा से ना कह पाये
वो नजरो से कह देगें।।

सभी से मोहब्बत की नही जाती
सभी से हाले दिल बयां की नही जाती
जब मिलते है मोहब्बत करने वाले
तो बात लफ्जो से की नही जाती।।

मोहब्बत होगी तो आँखो से दिखाई देगी
सपनो मे हमारी परछाई दिखाई देगी
कदम रखना संभल के मोहब्बत मे
दिल टुटा तो दरारें दिखाई देगीं।।

Thursday, August 20, 2009

"एक बार और जिन्ना बने अलगाव का कारण"

मोहम्मद अली जिन्ना (जन्म- 25 दिसंबर, 1876 मृत्यु 11 सितंबर 1948) बीसवीं सदी के जाने-माने राजनीतिज्ञ थे। उन्हें पाकिस्तान के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। वे मुस्लिम लीग के नेता थे और पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल बने। पाकिस्तान में, उन्हें आधिकारिक रूप से कायद-ए-आज़म यानि महान नेता और बाबा-ए-कॉ़म यानि राष्ट्रपिता के नाम से जाना जाता है। उनके जन्म दिन को पाकिस्तान में अवकाश रहता है। भारतीय राजनीति में जिन्ना का उदय 1916 में कांग्रेस के एक नेता के रूप में हुआ था, जिन्होने हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर देते हुए मुस्लिम लीग के साथ लखनऊ समझौता करवाया था। वे अखिल भारतीय होम रूल लीग के मुख्य नेताओं में गिने जाते थे। भारतीय मुसलमानों के प्रति कांग्रेस के उदासीन रवैये को देखते हुए जिन्ना ने कांग्रेस छोड़ दी। उन्होंने देश में मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा और स्वशासन के लिए चौदह सूत्रीय संवैधानिक सुधार का प्रस्ताव रखा। लाहौर प्रस्ताव के तहत उन्होंने मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र का लक्ष्य निर्धारित किया. 1946 में ज्यादातर मुस्लिम सीटों पर मुस्लिम लीग की जीत हुई और जिन्ना ने पाकिस्तान की आजादी के लिए तत्वरित कार्रवाई का अभियान शुरू किया. कांग्रेस की कड़ी प्रतिक्रिया के कारण भारत में व्यापक पैमाने पर हिंसा हुई. मुस्लिम लीग और कांग्रेस पार्टी, गठबंधन की सरकार बनाने में असफल रहे, इसलिए अंग्रेजों ने भारत विभाजन को मंजूरी दी. पाकिस्तान के गवर्नर जनरल के रूप में जिन्ना ने लाखों शरणार्थियो के पुनर्वास के लिए प्रयास किया. साथ ही, उन्होंने देश की विदेशनीति, सुरक्षा नीति और आर्थिक विकास की नीति बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

और इस तरह से मोहम्मद अली जिन्ना को भारत बंटवारे का सबसे बङा कारण माना जाता है। लेकिन उस समय किसी को ये न मालुम था कि मोहम्मद अली जिन्ना मरने के बाद भी अपने काम को करते रहेगें, जी हाँ काम से मेरा तातर्पय है अलगाव का इसका ताजा उदाहरण आपको मिल जायेगां जसवंत सिंह की किताब को लेकर भारतिय जनता पार्टी और जसवंत सिहं के बिच हुए अलगाव का, मतलब मोहम्मद अली आज भी अलगाव का कारण बन रहें हैं।। जसवंत सिंह को अपनी पुस्तक- 'जिन्ना : इंडिया, पार्टिशन, इंडिपेंडेंस' में जिन्ना की तारीफ करने और देश के विभा जन के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल पर उंगली उठाए जाने के लिए बीजेपी ने बुधवार को पार्टी से निष्कासन का दंड दिया। इससे पहले बीजेपी ने खुद को जसवंत सिंह के विचारों से अलग कर लिया था। अपने सीनियर नेता की सदस्यता खत्म करने का फैसला लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में बीजेपी के संसदीय बोर्ड ने शिमला में लिया संसदीय बोर्ड का सदस्य होने के बावजूद जसवंत सिंह को फोन पर यह सूचना दी गई कि वह चिंतन बैठक में न आएं।


भारत का बंटवारा कराने के लिए नेहरू दोषी थे या फिर जिन्ना? जिन्ना हिंदू विरोधी थे या नहीं? सारे मुसलमानों को पाकिस्तान न भेजने का फैसला सही था या गलत? इस बात को अब 62 साल हो चुके हैं। नई पीढ़ी के लिए अब इस बहस का क्या मतलब है? इतिहास में जो हुआ सो हुआ, वह अब बदलने वाला नहीं है। तो फिर क्यों गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं? क्या अब हमें अतीत की बजाय भविष्य पर ध्यान नहीं देना चाहिए?

Tuesday, August 18, 2009

"कविता प्रतियोगिता को सफल बनायें, सहयोग आपका "

हिन्दी साहित्य मंच "द्वितीय कविता प्रतियोगिता " सितंबर " माह से शुरू हो रही है । इस कविता प्रतियोगिता के लिए किसी विषय का निर्धारण नहीं किया गया है अतः साहित्यप्रेमी स्वइच्छा से किसी भी विषय पर अपनी रचना भेज सकते हैं । रचना आपकी स्वरचित होना अनिवार्य है । आपकी रचना हमें अगस्त माह के अन्तिम दिन तक मिल जानी चाहिए । इसके बाद आयी हुई रचना स्वीकार नहीं की जायेगी ।आप अपनी रचना हमें " यूनिकोड या क्रूर्तिदेव " फांट में ही भेंजें । आप सभी से यह अनुरोध है कि मात्र एक ही रचना हमें कविता प्रतियोगिता हेतु भेजें ।


प्रथम द्वितीय एवं तृतीय स्थान पर आने वाली रचना को पुरस्कृत किया जायेगा । दो रचना को सांत्वना पुरस्कार दिया जायेगा । सर्वश्रेष्ठ
कविता का चयन हमारे निर्णायक मण्डल द्वारा किया जायेगा । जो सभी को मान्य होगा । आइये इस प्रयास को सफल बनायें ।
हमारे इस पते पर अपनी रचना भेजें -hindisahityamanch@gmail.com .आप हमारे इस नं पर संपर्क कर सकते हैं- 09818837469, 09891584813, 09368499921 .

हिन्दी साहित्य मंच एक प्रयास कर रहा है राष्ट्रभाषा " हिन्दी " के लिए । आप सब इस प्रयास में अपनी भागीगारी कर इस प्रयास को सफल बनायें । आइये हमारे साथ हिन्दी साहित्य मंच पर । हिन्दी का एक विरवा लगाये जिससे आने वाले समय में एक हिन्दीभाषी राष्ट्र की कल्पना को साकार रूप दे सकें ।

Sunday, August 16, 2009

" देश स्वतंत्र, और नारी" ??

प्रसून जोशी
देश की आजादी के इतने साल बाद भी स्त्री की ऐसी दशा अविश्वसनीय लगती है। मगर यह कड़वा सच है कि इतने सालों बाद भी भारत में महिला वहीं की वहीं हैं। हमारे देश मे स्त्री को मां, देवी, त्याग की मूर्ति और न जाने कितने ही ऐसे दर्जे देकर जरूरत से ज्यादा उठा दिया गया है। दरअसल इन दर्जों के बोझ से स्त्री उठने की बजाय दब गई है। इन खोखले दर्जों के भार तले वह पिस रही है। अपनी आम इच्छाओं का गला दबाकर वह लगातार समाज द्वारा तय किए अपने तथाकथित कर्तव्यों को निभाए चली जा रही है। उसे ऐसी परिभाषाओं में जकड़ दिया गया है, जहां समाज की उस पर पूरी पकड़ हो। मगर वह बेचारी यह समझ ही नहीं पाती कि यह पुरुष प्रधान समाज का षड्यत्रं है। हमारे समाज न जाने कितनी गलत मान्यताये है, जैसे शादी के बाद अपने पति को नाम से न बुलाना, घर के सदस्यों को खिलाए बगैर खाना न खाना और न जाने कितनी ही ऐसी मान्यताएं हैं, जिन्हें वह सदियों से जस-का-तस निभा रही है। संस्कार के नाम पर व्यक्तित्व को बांध देना कहां का न्याय है? बचपन से ही नारी को इन्हीं संस्कारों की घुटी पिलाई जाती है और वह भूल जाती है कि आखिर वह खुद क्या चाहती है। सदियों से यही होता आ रहा है। मैं इसे नारी की परतंत्रता समझता हूं, जिससे उसे मुक्ति मिलनी ही चाहिए। यह हालत तो हमारे तथाकथित शहरी और सभ्य समाज की है। हालांकि गांवों का तो मैं जिक्र ही नहीं कर रहा हूं। वहां तो स्थिति इससे भी बदतर है। नौकरीपेशा महिलाओं का जिक्र करें तो नौकरी उनके लिए एक अतिरिक्त जिम्मेदारी है। खाना बनाने से लेकर बच्चों के लालन-पालन, और बाकी घरेलू जिम्मेदारियां के बीच वह नौकरी भी करती है। साथ ही घर और ऑफिस के बीच सामंजस्य बैठाना भी उसके जिम्मे है। विडंबना तो यह है कि खुद औरत ने ही इसे अपनी नियति मान लिया है। उसे कभी नहीं पूछा जाता कि वह क्या चाहती है? वह स्वयं की अपेक्षाओं में ही पिसी जा रही है। अपने आप को खोजने की इस यात्रा में वह नितांत अकेली है। आज भी वह अपने मायने ढूंढ रही है। लोग शायद भ्रमित हैं कि जिस देश में एक महिला राष्ट्रपति हो, वहां यह कैसे हो सकता है। मगर मैं साफ कर दूं कि अपवाद के आधार पर समाज का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। दरअसल, सदियों से औरत के दिमाग की इस तरह कंडिशनिंग कर दी गई है कि अगर वह अपनी बंधी-बंधाई मर्यादाओं के खिलाफ आवाज उठाए तो खुद उसे अपराधबोध होने लगता है कि ऐसा करके मैं नारी कहलाने लायक नहीं रहूंगी। स्त्री की क्षमता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता क्योंकि प्रकृति ने खुद नारी को सबसे बड़ी कृति की जिम्मेदारी सौंपी है। वह है, एक बच्चे को जन्म देने की जिम्मेदारी। व्यक्ति अपनी मां के हाथ का स्वाद हमेशा याद करता है। यह एक परंपरा-सी है। मैं ऐसे समाज की कल्पना करता हूं, जहां व्यक्ति अपने पिता के हाथ के खाने को हमेशा याद रखे। यह सिर्फ एक उदाहरण है। मेरा सपना एक ऐसे समाज का है, जहां स्त्री और पुरुष को बराबरी का दर्जा हासिल हो। स्त्री को अपने हक के बारे में सोचने की और अपने फैसले लेने की स्वतंत्रता हो। हर एक संस्कृति तरल होती है., वह सतत प्रवाहित रहती है। उसमें लगातार बदलाव आता रहता है। कबीर की तरह चदरिया को ज्यों-की-त्यों धर देने की बजाय उसमें बदलाव लाना जरूरी है।

( नव भारत टाईम्स )

Saturday, August 15, 2009

"जरा याद इन्हे भी कर लें"

आजादी की सालगिरह में आजादी के परवानों को तो याद किया ही जा रहा है, लेकिन उन गुमनाम हीरोज़ को भी याद करने की जरूरत है, जिन्होंने अपने तरीके से आजादी की मशाल जलाई।
हम आजादी के अवसर पर बङे लोगो को याद तो करते हैं, लेकिन इनके बिच कुछ नाम ऐसे भी है जिनको बहुत कम ही लोग जानते है। वहीं देखा जाये तो हमारे आजादी मे इनका योगदान कम नही है। इनका नाम आज भी गुमनाम है, लेकीन इन्होने जो किया वह काबिले तारीफ है। ये वे लोग जिन्होने आजादी के लिए बिगूल फुकंने का काम किया और ये लोग अपने काम मे सफल भी हुये। तो आईये इस आजादी के शुभ अवसर पे इनको याद करें और श्रद्धाजंली अर्पित करें।
ऊधम सिंह- ऊधम सिंह ने मार्च 1940 में मिशेल ओ डायर को मारकर जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लिया। इस बाग में 4,000 मासूम, अंग्रेजों की क्रूरता का शिकार हुए थे। ऊधम सिंह इससे इतने विचलित हुए कि उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और एक देश से दूसरे देश भटकते रहे। अंत में वह लंदन में इस क्रूरता के लिए जिम्मेदार गवर्नर डायर तक पहुंच गए और जलियांवाला हत्याकांड का बदला लिया। ऊधम सिंह को राम मोहम्मद सिंह आजाद के नाम से भी पुकारते थे। जो हिंदू, मुस्लिम और सिख एकता का प्रतीक है।

जतिन दास - जतिन को 16 जून 1929 को लाहौर जेल लाया गया। जेल में स्वतंत्रता सेनानियों के साथ बहुत बुरा सुलूक किया जाता था। जतिन ने कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार करने की मांग पर भूख हड़ताल शुरू कर दी। जेल के कर्मचारियों ने पहले तो इसे अनदेखा किया, लेकिन जब भूख हड़ताल के 10 दिन हो गए तो जेल प्रशासन ने बल प्रयोग करना शुरू किया। उन्होंने जतिन की नाक में पाइप लगाकर उन्हें फीड करने की कोशिश की। लेकिन जतिन ने उलटी कर सब बाहर निकाल दिया और अपने मिशन से पीछे नहीं हटे। जेल प्रशासन ने जबरदस्ती दवाई देने की कोशिश की। लेकिन जतिन ने अपनी तपस्या जारी रखी। जतिन की हालत बिगड़ती गई और 13 सितंबर 1929 को अंग्रेजों के काले कानून से लड़ते हुए जतिन शहीद हो गए।

हिंदुस्तानी लाल सेना- एक ग्रुप नागपुर के जंगलों में गुरिल्ला वॉर के लिए खुद को तैयार कर रहा था। ब्रिटिश शासन के खिलाफ गुरिल्ला वॉर छेड़ने वाला यह शायद उस वक्त इकलौता ग्रुप था।



Thursday, August 13, 2009

"अगर तु कह दे"

मैं परछाई बन के रहूँ अगर तू कह दे


ना करु मै याद तुझे अगर तू कह दे


भेजू वफा का पैगाम सरेआम अगर तू कह दे


युं ही जमाने से गुजर जाउं अगर तू कह दे



मै ना तुझसे मिलूं अगर तू कह दे


मै तेरे ख्वाबो से मिल आउं अगर तू कह दे

खुले आम कर दू इजहार अगर तू कह दे


अजनबी बन के गुजर जाउं अगर तू कह दे


जी लुं जिन्दगी मै अपनी अगर तू कह दे



तेरी नंजरो के सामने दे जान अगर तू कह दे


गमे जुदाई सह जाउं अगर तू कह दे


ना निकलेगी आहं अगर तू कह दे।।

Sunday, August 9, 2009

"मैं तन्हा"

अपनाने से पहले ठुकरा दिया होता
जैसा हूँ मेरे हाल पे छोङ दिया होता
मुझे कर के तन्हा हँसती हो मुझपे
काश तुने ये इकरार से पहले किया होता।।



आँखे नम हो जाती हैं मेरी उसके लिए
काश तुने मुझे तन्हाई ना दि होती
ना होता तन्हा, होता जिन्दगीं का पल खूशनुमा
अगर मोहब्बत् को उसने रुसवा ना किया होता।।



मैं अब भी जिता हूँ उसके इन्तजार मे
मैं बैठा रहता हूँ अब भी उसके ही आश मे
हे भगवान तुने मुझे तन्हाई ना दि होती है
काश तन्हाई की जगह मौत का पैगाम दिया होता है।।



तु क्या जाने ये दर्द क्या होता है
जमाना क्या जाने ये मोहब्बत् क्या होती है
तु छोङ जाती है मुझे हर रोज हि इस हाल मे
कभी मुङ के देखना, ये गमे जुदाई क्या होती है।।

Friday, August 7, 2009

"बलात्कार के बाद अबोध महिला बनेगी मां" - हक है?


सुप्रीम कोर्ट के तीन जज वकील की दलीलों के कायल हो गए और फैसला दे दिया कि बलात्कार की शिकार हुई लड़की को भी मा बनने का हक है
हक शब्द सुनते ही भावनाएं उमड़ने लगती हैं , रक्षकों के कान चौकन्ने हो जाते हैं। मगर अहम सवाल यह है कि क्या मानसिक अस्थिरता की शिकार उस लड़की ने यह हक मांगा है !क्या वह अपनी इच्छा से मां बनी है ?

किसी वहशी ने नारी निकेतन चंडीगढ़ में उसके साथ बलात्कारकिया , गर्भ ठहर गया और अब वकील साहिबा दलील दे रही हैं कि मां बनना उसका हक है और अदालत को उससे यह हक नहीं छीनना चाहिए। हम भी इस दलील के कायल हैं कि निजी मामलों में स्टेट या अदालत का कम से कम हस्तक्षेप हो। मगर अहम सवाल यह है कि यहां उस लड़की की बात हो रही है , जो समाज और स्टेट की जिम्मेदारी है। वह लड़की अपना अच्छा-बुरा नहीं सोच सकती और नारी निकेतन में रहकर जीवन गुजार रही है। रेप के मामले पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने भी माना था कि इस स्थिति में अबॉर्शन ही एकमात्र विकल्प है , मगर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला पलट दिया।

महिला के अबॉर्शन का विरोध कर रहीं वकील साहिबा ने तर्क दिया कि वह पहले से ही इस दुनिया में अकेली है और इस बच्चे के पैदा होने से उसे खालिस अपना कोई मिल जाएगा। बहुत ही अच्छा तर्क है। वैसे भी मां सुनते ही हमारी भावुकता हिलोरे लेने लगती है। सही बात है ,आखिर उस बेचारी औरत का कोई तो अपना होगा। मगर , इस सवाल का जवाब कौन देगा कि मानसिक रुप से अस्थिर इस औरत के बच्चे को पालेगा कौन , राज्य , अदालत या दूसरी कोई सरकारी संस्था ?

अगर बच्चा बेटी हुआ तो उसे नारी निकेतन में सक्रिय वहशियों से कौन बचाएगा ? कहीं उसका भी बलात्कार हो गया तो ? हो सकता है कि आपको मेरा तर्क अतिवादी लगे मगर क्या यह सच नहीं है कि बच्चा अनाथों की तरह , दूसरों की दया बटोरता पलेगा? और जब डॉक्टरों के तर्क से सहमत होकर अदालत भी यह मान रही है कि यह महिला अपना अच्छा-बुरा नहीं सोच सकती , तो वह बच्चे की परवरिश कैसे करेगी ?कैसे उसे अपनी ममता की छांह में लेगी और दुनिया की धूप से बचाएगी ?

राखी सावंत और राहुल गांधी पर बहस करने वाले हम भारतीयों को यह मसला गैरजरूरी लगता है ? मां दुनिया का सबसे सुंदर और पवित्र शब्द है और जन्म देना प्रकृति को विस्तार देने जैसा। मगर तभी जब यह अपनी इच्छा से किया गया हो , दुर्घटनावश या बिना सहमति के नहीं। अगर लड़की मानसिक रूप से स्वस्थ होती और किन्हीं परिस्थितियों में हुए रेप के चलते उसे गर्भ ठहरता , तो यह पूरी तरह से उसका अपना फैसला होता कि उसे बच्चे को जन्म देना है या नहीं।

आप इस बारे में क्या सोचते हैं ? इस बच्चे का भविष्य क्या होगा?कहीं यह बच्चा भी वही सब झेलने के लिए दुनिया में तो नहीं आएगा ,जो इसकी अबोध मां ने झेला ?

Wednesday, August 5, 2009

" मेरी बहन तु सलामत रहे"

हे ईश्वर मै तुझसे बहुत प्यार करता हुं,
तुझ पर,मै अपना सबकुछ न्योछावर करता हुं,
पर मै अपनी बहन पे तुझसे ज्यादा विश्वास करता हुं।


हो अगर खता कभी तू माफ करना मुझे और मेरी बहन को,
देना पङे यदि सजा, तो देना मुझे, बचा लेना मेरी बहन को।


मेरी बहन लाखो, करोणो मे नही , बल्की इस दुनियां मे सिर्फ मे एक है,
लग जाये उसको मेरी सारी उम्र, यदि इस वसुन्धँरा मे कोई नेक है।


धन्यवाद देता हूं तुझको, है उस पर मुझे नाज ,
हे गुङिया गर्व करेगा तुझ पर आने वाला पूरा समाज ।


मेरी बहन होने पर आपको धन्यवाद देता हुं
इस दुनियां की सारी खूशिया उपहार देता हुं
रहो सलामत, रहो चाहे जहां भगवान से बस यही दुआ करता हुं।

Monday, August 3, 2009

" आंतकी, मुस्लिम होने के फायदे"

जी हाँ बिल्कुल सही सुना आपने, आंतकी मुस्लिम होते है तो उसके भी कई फयदे है। अब आप कहेंगे की ऐ कैसे हो सकता है, अरे जनाब आप अगर मुसलमान हैं तो आप को गैर मुस्लिम देश मे मु्सलमान होने के बहुत फायदे मिलेगें। जी हाँ ये बात शतप्रतिशत सही है। इसके ताजे उदाहरण के लिए आपको कहीं दुर जाने की भी जरुरत नही है, इसका ताजातरीन उदाहरण हमारे देश यानी अपने भारत देश मे ही मिल जायेगा। अभी हाल ही मे खबर आयी देश के आर्थिक राजधानी से यानी मुबंई से जहाँ एक मुसलमान बन्धु को सिर्फ इसलिए घर नही मिला क्यों की वे एक मुसलमान है। जी हां बात बिल्कुल सही है, बालीवुड के अभिनेता इमरान हाशमी का कहना है कि उन्हे मुसलमान होने की वजह से पाली हिल मे घर नही मिला। अब तो आप समझ ही गये होगें, जनाब समाचार पत्र या टिवी पे समाचार हो हर जगह इसी बात की चर्चा है क्यों की वह मुसलमान था। घटनायें तो ऐसी बहुत हुई होगीं लेकिन वह आपको या हमे इसलिए नही पता चला होगा क्यों की वे सब हिन्दु होगें। ये बात आजकल चर्चा का विषय बना हुआ है। इमरान हाशमी का कहना है की उन्हे मुसलमान होने की वजह से घर नही मिला, और उनका कहना है कि इसको लेकर उनके और घर के मालिक के साथ समझौता हुआ है, वहीं घर के मालिक का कहना है कि ऐसा कोई भी समझौता नही हुआ है, और उनका ये भी कहना है की उनके और इमरान के बिच घर बेचने को लेकर कोई बात ही नही हुयी है। तो भाई ये रहा मुसलमान के आंतकी होने के फयदे, अगर आप मुसलमान हो और आप गैर मुसलमान देश (मुस्लिम देश मे नही, वहां कोई नही सुनेगा) मे हो तो आप इसका भरपुर फयदा उठा सकते हो, अगर आप का कोई ऐसा काम जो नही हो रहा हो या उसके बिच कोई कानूनी अङचन आ रही हो तो तुरन्त आप कहे की आप मुसलमान हो इसलिए आपका काम नही हो रहा, फिर क्या जनाब फिर देखिये आप अपना कमाल अगले दिन आप समाचार के मुख्य पृष्ठ पे होगें और आपको जानने वालो की संख्या भी बढ जायेगीं।