Wednesday, October 14, 2009

रिश्ते बंद है आज चंद कागज के टुकड़ो में

रिश्ते बंद है आज

चंद कागज के टुकड़ो में,

जिसको सहेज रखा है मैंने

अपनी डायरी में,

कभी-कभी खोलकर

देखता हूँ उनपर लिखे हर्फों को

जिस पर बिखरा है

प्यार का रंग,

वे आज भी उतने ही ताजे है

जितना तुमसे बिछड़ने से पहले,

लोग कहते हैं कि बदलता है सबकुछ

समय के साथ,

पर

ये मेरे दोस्त

जब भी देखता हूँ

गुजरे वक्त को,

पढ़ता हूँ उन शब्दो को

जो लिखे थे तुमने,

गूजंती है तुम्हारी

आवाज कानो में वैसे ही,

सुनता हूँ तुम्हारी हंसी को

ऐसे मे दूर होती है कमी तुम्हारी,

मजबूत होती है

रिश्तो की डोर

इन्ही चंद पन्नो से,

जो सहेजे है मैंने

न जाने कब से।।

Monday, October 12, 2009

"अविनाश वाचस्पति जी और समीर लाल जी हाजीर है आपके के लिए चाय और चटनी, सभी ब्लोगर आमंत्रित"




हाँ तो भैया हम का बताये आप लोगो को ब्लोगरो ने तो ऐसी की तैसी कर दी है। अब देखिये पहले जलेबी खिलाये तो कुछ लोगो का कहना था कि हम डाबटिज के रोगी है तो हमने उनके लिए समोसे का इन्तजाम किया सोचा ऐसा नहीं करुगा तो उनके साथ ना इंसाफी होगी। अब यही सब कुछ फ्री मे मिल रहा है तो फरमान पर फरमान चालू है। कोई ये तो कहता नहीं दुबे जी आप ने बहुत मेहनत किया और पैसे भी खर्च हुए होंगे अभी हम आपके के लिए पैसे भेजवा देते है। ऐसा तो कोई करेगा नहीं, वही है हमारे यहाँ एक कहावत कहते है जो की भोजपुरी में है "सेती के चन्दन रगण मोरे लल्लन" ।
अब जलेबी और समोसे खाने के बाद लोगो ने और भी फरमाइसे कीं समीर लाल जी का कहना था कि अब पान होना चाहिए तभी राजभटिया जी ने कहा कि पान खिलाने का मतलब अब चलते बनिये, क्योंकि पान तो सब कुछ खिलाने के बाद दिया जाता है। राज भाटिया जी बिल्कुल सही कहा आपने अब समीर जी का मन है तो पान भी खिलायेगें वैसे भी हम बनारस से है जहाँ का पान विश्व प्रशिद्ध है।
इन सब के बीच अविनाश वाचस्पति जी का कहना था कि समोसे के बाद चाय और चटनी के इतिहास के बारे मे भी बतया जाये तो अच्छा रहता । और कुछ लोगो का ये भी कहना था कि बनाने की बिधि भी बतायी जाये तो और भी अच्छा रहता । लेकिन भाई ये अन्तिम होगा, नहीं तो लगता है आप लोग हमे शेप बनाने कर ही छोडे़गे। तो लीजिए चाय और चटनी हाजीर है। आशा है कि आप लोगो को पसन्द आयेगी।चटनी, चाय के साथ कुछ समोसे भी लाया हूँ फिर से, नहीं तो आप लोग कहते कि चटनी को किसके साथ खाऊं। हाँ तो अब इन्तजार किसका लीजिए चटनी समोसे और चाय । लग जाईये एक बार फिर

चाय एक लोकप्रिय पेय है। यह चाय के पौधों की पत्तियों से बनता है।सबसे पहले सन् १८१५ में कुछ अंग्रेज़ यात्रियों का ध्यान असम में उगने वाली चाय की झाड़ियों पर गया जिससे स्थानीय क़बाइली लोग एक पेय बनाकर पीते थे। भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड लॉर्ड बैंटिक ने १८३४ में चाय की परंपरा भारत में शुरू करने और उसका उत्पादन करने की संभावना तलाश करने के लिए एक समिति का गठन किया। इसके बाद १८३५ में असम में चाय के बाग़ लगाए गए।
कहते हैं कि एक दिन चीन के सम्राट शैन नुंग के सामने रखे गर्म पानी के प्याले में, कुछ सूखी पत्तियाँ आकर गिरीं जिनसे पानी में रंग आया और जब उन्होंने उसकी चुस्की ली तो उन्हें उसका स्वाद बहुत पसंद आया। बस यहीं से शुरू होता है चाय का सफ़र। ये बात ईसा से २७३७ साल पहले की है। सन् ३५० में चाय पीने की परंपरा का पहला उल्लेख मिलता है। सन् १६१० में डच व्यापारी चीन से चाय यूरोप ले गए और धीरे-धीरे ये समूची दुनिया का प्रिय पेय बन गया। चाय से जुडे़ कुछ आकड़े------- वर्ष २००३ तक पूरे विश्व में चाय का उत्पादन ३.१५ मिलियन टन वार्षिक था। प्रमुख उत्पादक देशों में भारत, तथा उसके बाद चीन का स्थान था (अब चीन ने भारत से इस क्षेत्र में बाजी मार ली है), अन्य प्रमुख उत्पादक देशों में श्रीलंका एवं कीनिया इसके बाद महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। चीन ही अभी एकमात्र ऐसा देश है जो लगभग हर तरह की चाय का बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन करता है। जब से जैविक खेती का प्रचलन बढा है जैविक चाय के उत्पादन में भी काफी बढोत्तरी देखी गयी है। २००३ में ३,५०० टन जैविक चाय की खेती की गयी थी। जैविक चाय के उत्पादन का ज्यादातर हिस्से की खरीदारी (लगभग ७५%) फ्रांस, जर्मनी, जापान, अमरीका एवं ब्रिटेन द्वारा की जाती है। और लीजिए

अब हाजीर है चटनी। चटनी का अर्थ होता है दो या उससे अधिक चीजों का मिश्रण। आम बोलचाल में चटनी या खिचड़ी शब्द का इस्तेमाल वैसी चीजों के लिये किया जाता है जिसमें आनुपातिक मात्रा का कोई खास खयाल नहीं रखा जाता। चटनी मूल रूप से भारत का सौस है जो मूल रूप से हरी मिर्च और नमक से बनी होती है और इसके अतिरिक्त इसमें खुली प्रयोग की छूट ली जा सकती है। ज्यादातर चटनियों के बनाने में हरी मिर्च और नमक के अलावा अपने पसंद की किसी भी खास सब्ज़ी को चुना जा सकता है। ज्यादातर सब्ज़ियों की चटनियाँ यूँ तो कच्ची सब्ज़ी को सिल-बट्टे पर पीसकर या ब्लेंडर में ब्लेंड कर के बनायी जा सकती हैं लेकिन किसी किसी फलों की चटनी बनाते समय उन्हें पकाने की जरूरत पड़ सकती है। कुछ लोकप्रिय चटनियों में ये चटनियाँ शामिल हैं:- नारियल की चटनी प्याज की चटनी इमली की चटनी टमाटर की चटनी धनिये की चटनी पुदीने की चटनी आम की चटनी लहसुन की चटनी चटनी बनाते समय जिन मुख्य मसालों का इस्तेमाल किया जाता है उनमें नमक, अदरख सौंफ, हींग, जीरा इत्यादि प्रमुख हैं। अपने मूल स्थान (भारत) तथा पड़ोसी देशों में चटनी को खाने से पहले ताज़ा तैयार किया जाता है जो आसानी से उपलब्ध या मौसमी चीजों से तुरत फुरत तैयार की जाती है। अमरीका और यूरोप के देशों में चटनी को मुख्य रूप से चटनी को फ्रीजो में रखकर लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाता है।

Sunday, October 11, 2009

जलेबी के बाद सभी ब्लोगरो को समोसे खाने का न्योता





कल मैंने कड़वाहट मिटाने के बहाने आप लोगो को जलेबी खाने के लिए आमंत्रित किया और सभी लोगो ने आमंत्रण स्वीकार भी किया और खुब जमकर फ्री वाली जलाबी उड़ाई। जहाँ कुछ लोगो को जलेबी का स्वाद पंसद आया तो वहीं कुछ लोगो ने उसके रंग को पंसद किया। कुछ लोगो नें जलेबी के इतिहास की तरह उसे भी पेचिदा बताया। अब भाई मूहँ तो मिठा हो गया तो इसके साथ कुछ चटकारे भी होने चाहिए क्यों जनाब क्या ख्याल है। तो मैंने सोचा वैसे चटकारे के लिए तो बहुत कुछ उपलब्ध है लेकिन जो मजा समोसे में है वो और किसी में कहाँ सही कहाँ ना। जलेबी को लेकर कुछ लोग काफी रुष्ट भी थे उनका कहना था की हम तो डायबटिज के रोगी है तो हम कैसे खायें और आपने जलेबियां दिखा के मूहँ में पानी भरवा दिया मन तो खुब हुआ खाने को लेकिन श्रीमती जी के डर से एक भी ना खा पायें। तो मैंने सोचा भाई ये तो वास्तव में इनंके साथ गलत हुआ तभी दिमाग में ख्याल आया मिठा नहीं लेकिन नमकीन तो हो सकता है ना। इसलिए आज आप लोगो के लिए गरमा-गरम समोसे । अब समोसे खाने से पहले उसके बारे में कुछ जान लें तो और अच्छा रहेगा।
समोसा दक्षिण एशिया का एक लोकप्रिय व्यंजन है। इस लज़ीज़ त्रिभुजाकार व्यंजन को आटा या मैदा के साथ आलूके साथ बनाया जाता है और चटनी के साथ परोसा जाता है। ऐसा माना जाता है कि समोसे की उत्पत्ति उत्तरी भारत में हुई ऑर फिर यह धीरे-धीरे पूरे भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश सहित आस-पास के क्षेत्रों में भी काफी लोकप्रिय हुआ। यह भी माना जाता है कि समोसा मध्यपूर्व से भारत आया और धीरे-धीरे भारत के रंग में रंग गया। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि दसवीं शताब्दी में मध्य एशिया में समोसा एक व्यंजन के रूप में सामने आया था। 13-14वीं शताब्दी में व्यापारियों के माध्यम से समोसा भारत पहुँचा। महान कवि अमीर खुसरो (1253-1325) ने एक जगह जिक्र किया है कि दिल्ली सल्तनत में उस दौरान स्टड मीट वाला घी में डीप फ्राई समोसा शाही परिवार के सदस्यों व अमीरों का प्रिय व्यंजन था। १४ वीं शताब्दी में भारत यात्रा पर आये इब्नबतूता ने मो0 बिन तुगलक के दरबार का वृतांत देते हुए लिखा कि दरबार में भोजन के दौरान मसालेदार मीट, मूगंफली और बादाम स्टफ करके तैयार किया गया लजीज समोसा परोसा गया, जिसे लोगों ने बड़े चाव से खाया। यही नहीं 16वीं शताब्दी के मुगलकालीन दस्तावेज आईने अकबरी में भी समोसे का जिक्र बकायदा मिलता है। समोसे का यह सफर बड़ा निराला रहा है। समोसे की उम्र भले ही बढ़ती गई पर पिछले एक हजार साल में उसकी तिकोनी आकृति में जरा भी परिवर्तन नहीं हुआ। आज समोसा भले ही शाकाहारी-मांसाहारी दोनों रूप में उपलब्ध है पर आलू के समोसों का कोई सानी नहीं है और यही सबसे ज्यादा पसंद भी किया जाता है। इसके बाद पनीर एवं मेवे वाले समोसे पसंद किये जाते हैं। अब तो मीठे समोसे भी बाजार में उपलब्ध हैं। समोसे का असली मजा तो उसे डीप फ्राई करने में है, पर पाश्चात्य देशों में जहाँ लोग कम तला-भुना पसंद करते हैं, वहां लोग इसे बेक करके खाना पसंद करते हैं। भारत विभिन्नताओं का देश है, सो हर प्रांत में समोसे के साथ वहाँ की खूबियाँ भी जुड़ती जाती हैं। उ0प्र0 व बिहार में आलू के समोसे खूब चलते हैं तो गोवा में मांसाहारी समोसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। पंजाबी समोसा खूब चटपटा होता है तो चाइनीज क्यूजीन पसंद करने वालों के लिए नूडल्स स्टड समोसे भी उपलब्ध हैं। बच्चों और बूढ़ों दोनों में समोसे के प्रति दीवानगी को भुनाने के लिए तमाम बहुराष्ट्रीय कम्पनियां इसे फ्रोजेन फूड के रूप में भी बाजार में प्रस्तुत कर रही हैं। उम्मीद है कि आपलोगो को जलेबी की तरह समोसा भी खुब पसंद आयेगा।

Saturday, October 10, 2009

सभी ब्लोगरो को आमंत्रण आयें और जलेबीयां खाये


आज शाम को बाजार गया था कुछ सामान लानें तभी देखा कि जलेबीयां बन रही थी तो देखते ही मूहं में पानी भर आया। तब का भाई हम भी गये दूकान पर और न मोल किया न भाव बस छक गये खाने में और खाया खूब मजे से। तभी खाते-खाते अचानक आप लोगो का ख्याल आया तो सोचा आप लोगो के लिए भी पैक करवा लेता हूँ और लीजिए हाजिर है शुरु करिए। वैसे भी आजकल ब्लोग जगत में सबका मूहं कड़वा हो गया है, जहाँ देखो वहाँ कड़वाहट ही कड़वाहट फैला है। सब एक दूसरे के उपर आरोप पे आरोप लगाये जा रहें हैं। कोई इनके धर्म की बुराई कर है तो कोई उनके। तब दिमाग में एक ख्याल आया कि क्यों ना सभी को एक जगह पर बुलाया जाये। अब भाई इतने लोग आयेंगे तो कुछ खिलाना भी पड़ेगा क्यों सही कहा की नहीं। अब बड़े-बड़े लोग आयेंगे तो मूहं बाँध के तो बैठेंगे नहीं तो मैंने कहा आप लोगो के लिए जलेबीयां ले चलता हूँ। इससे दो काम हो जायेगा एक तो आप लोगो का मूहँ भी मिठा हो जायेगा और मेरे पैसे भी बच जायेंगे। क्यों रहा ना मस्त आईडिया। तो फिर मैंने सोचा कि क्यों ना आप लोगो को जेलेबी के इतिहास के बारे में भी बताया जाये। ये भी तो जाना जाये की ये आया कहाँ से इसका नाम जलेबी कैसे पड़ा। तो अभी खाने से पहले आईये थोड़ा इसके बारे में जान लेते है।

जलेबी उत्तर भारत" style="text-decoration: none; background-image: none;">भारत, पाकिस्तान" style="text-decoration: none; background-image: none;">पाकिस्तान व मध्यपूर्व का एक लोकप्रिय व्यंजन है। इसका आकार पेंचदार होता है और स्वाद करारा मीठा। इस मिठाई की धूम भारतीय उपमहाद्वीप" class="mw-redirect" style="text-decoration: none; background-image: none;">भारतीय उपमहाद्वीप से शुरू होकर पश्चिमी देश स्पेन" style="text-decoration: none; background-image: none;">स्पेन तक जाती है। इस बीच भारत, बांग्लादेश" style="text-decoration: none; background-image: none;">बांग्लादेश, पाकिस्तान, ईरान" style="text-decoration: none; background-image: none;">ईरान के साथ तमाम अरब मुल्कों में भी यह खूब जानी-पहचानी है। आमतौर पर तो जलेबी सादी ही बनाई व पसंद की जाती है, पर पनीर" style="text-decoration: none; background-image: none;">पनीर या खोया जलेबी को भी लोग बडे चाव से खाते हैं।

कुछ लोगों का मानना है कि जलेबी मूल रूप से अरबी भाषा" style="text-decoration: none; background-image: none;">अरबी शब्द है और इस मिठाई का असली नाम है जलाबिया। यूं जलेबी को विशुद्ध भारतीय मिठाई मानने वाले भी हैं। शरदचंद्र पेंढारकर (बनजारे बहुरूपिये शब्द) में जलेबी का प्राचीन भारतीय नाम कुंडलिका बताते हैं। वे रघुनाथकृत ‘भोज कुतूहल’ नामक ग्रंथ का हवाला भी देते हैं जिसमें इस व्यंजन के बनाने की विधि का उल्लेख है। भारतीय मूल पर जोर देने वाले इसे ‘जल-वल्लिका’ कहते हैं । रस से परिपूर्ण होने की वजह से इसे यह नाम मिला और फिर इसका रूप जलेबी हो गया। फारसी और अरबी में इसकी शक्ल बदल कर हो गई जलाबिया। उत्तर पश्चिमी भारत और पाकिस्तान में जहां इसे जलेबी कहा जाता है वहीं महाराष्ट्र में इसे जिलबी कहा जाता है और बंगाल में इसका उच्चारण जिलपी करते हैं। जाहिर है बांग्लादेश में भी यही नाम चलता होगा।

हाँ तो रहा ना मजेदार खाने और पढ़ने में आशा है कि आप लोगो को खुब पसन्द आया होगा। ठीक है तो आप लोग खाईये जमकर हम चलते है। और खाने के बाद ऐसे ही मत चले जाईयेगा कम से कम ये जरुर बताइयेगा कैसा रहा स्वाद।

"पत्रिका में प्रकाशन हेतू रचनायेँ भेजे"

विकलांगता एक अभिशाप यह धारणा समाज में बहुप्रचारित है , कहीं इसे पुर्नजन्म के कर्मों से जोड़कर देखा जाता है तो कहीं पाप और पुण्य से जोड़कर । परन्तु यह अवधारणा समाज में धीरे धीरे बदली है । शिक्षा का प्रभाव अपना असर दिखा रहा है । ऐसे में हमारा कर्तव्य हो जाता है कि हम ऐसे लोगों की मदद कर इसने जीवन को सही दिशा में लाने का प्रयास करें ।

दिसंबर माह के प्रथम सप्ताह में विकलांगता दिवस मनाया जाता है । जागरूकता फैलाकर समाज में विकलांग व्यक्ति को मुख्यधारा में शामिल करने की कोशिश की जाती है । लोगों की भ्रांतियों को दूर करने की कोशिश की जाती है ।

ऐसे में आप भी अपनी सहभागिता देकर इस प्रकार के कार्य को सही दिशा दे सकते हैं । आप अपने
विचार , लेख , आलेख , कविता , गीत ( जो विकलांगता पर केन्द्रित हो ) या भी अन्य विधाओं को भेज सकते हैं । इसके लिए ई-मेल पता है -hindisahityamanch@gmail.com . आपके आलेख , लेख , गीत , कविता या किसी भी विधा को समर्पण पत्रिका के " विकलांग विशेषांक" में प्रकाशित किया जायेगा ।

आपको यदि विकलांग व्यक्तियों की मदद के लिए किसी संस्था या फिर अन्य माध्यम के बारे में जानकारी हो तो हमसे जरूर संपर्क करें ।
आप हमें इन नम्बरो पर संर्पक भी कर सकते हैं, 09891584813, 09818837469
संचालक ( हिन्दी साहित्य मंच
)

खामोश रात में तुम्हारी यादें

खामोश रात में तुम्हारी यादें,
हल्की सी आहट के
साथ दस्तक देती हैं,

बंद आखों से देखता हूँ तुमको,
इंतजार करते-करते
परेशां नहीं होता अब,

आदत हो गयी है तुमको देर से आने की,
कितनी बार तो शिकायत की थी तुम से ही,
पर
क्या तुमने किसी बात पर गौर किया ,
नहीं न ,

आखिर मैं क्यों तुमसे इतनी ,
उम्मीद करता हूँ ,
क्यों मैं विश्वास करता हूँ,
तुम पर,

जान पाता कुछ भी नहीं ,
पर तुमसे ही सारी उम्मीदें जुड़ी हैं,
तन्हाई में,
उदासी में ,
जीवन के हस पल में,

खामोश दस्तक के
साथ आती हैं तुम्हारी यादें,
महसूस करता हूँ तुम्हारी खुशबू को,
तुम्हारे एहसास को,

तुम्हारे दिल की धड़कन का बढ़ना,
और तुम्हारे चेहरे की शर्मीली लालिमा को,
महसूसस करता हूँ-

तुम्हारा स्पर्श,
तुम्हारी गर्म सांसे,
उस पर तुम्हारी खामोश और
आगोश में करने वाली मध्धम बयार को।
खामोश रात में बंद पलकों से,
इंतजार करता हूँ तुम्हारी इन यादों को..........

Tuesday, October 6, 2009

महिलायें बनेंगी पुरुष तो बच्चे पैदा कैसे होंगे ??

कोई पचास-साठ साल पहले अमेरिका में एक "Freedom of women" आन्दोलन चला था जिसका असर सारी दुनियां पर पड़ा । उसका कहना यह था कि महिलायें पुरुषों से किसी मामले में कम नहीं हैं फिर वे क्यों घर पर बैठी रहें और मर्दों की गुलामी करें ? बात तो गलत नहीं थी पर उसकी दिशा कुछ बदल सी गई । मर्दों जैसे ही कपड़े पहनने, उन्हीं जैसे भारी-भरकम मेहनत वाले काम करने का शौक महिलाओं में पैदा हुआ जिससे काफी सामाजिक समस्यायें पैदा हुई जिनको पश्चिमी समाज आज तक भुगत रहा है । और जब जिस तरह से हमारे यहाँ कि महिलायें पाश्चात संस्कृति को अपनानें में लगी है लगता है कि अब बारी हमारी है।
कुछ देशों की जनसंख्या का ग्राफ गड़बड़ा गया जो आजकल चिन्ता का विषय बनता जा रहा है । इटली और स्पेन को चिन्ता है कि उनके यहां बच्चे कम पैदा हो रहे हैं और Immigration के कठोर कानूनों के बावजूद मुस्लिम देशों की आबादी वहां आ कर बस रही है । स्कैंडिनेविया, बेल्जियम और रूस आदि देशों में महिलाओं को बच्चे पैदा करने के incentive दिये जा रहे हैं । पश्चिमी संस्कृति ने पहले महिलाओं के परिवार-केन्द्रित सहज स्वभाव को "कैरियर" के चक्कर में तोड़ा । उन्हें कहा गया कि आप अपना कैरियर बनाइये, पैसा कमाइये और "स्वतंत्र जीवन शैली" अपनाइये । अब उन्हें प्रलोभन देकर वापस प्रजनन की तरफ मोड़ा जा रहा है ।

जीस तरह से पश्चिमी संस्कृति हमारे यहाँ पैर पसार रही है अब ये दिन भी दूर नहीं होगा। एक नजारा भारत का देखिये । जनगणना के मुताबिक भारत में पारसी समुदाय गायब होता जा रहा है । टाटा जैसे अमीर पारसी घरानों को भी इसकी चिन्ता सताये जा रही है । इसका मूल कारण पारसी महिलाओं का बहुत ऊंची शिक्षा लेना और पश्चिमी रंग में ढ़लना बताया जा रहा है । कहते हैं कि पारसी अमीर इसलिए हुए हैं कि उन्होंने ब्रिटिश राज्य से सहयोग करके ऊंचे पद हासिल किये और अपने बच्चों को भी ऐसे ओहदे दिलवाने के लिए अपने बच्चों को इंग्लैंड में शिक्षा के लिए भेजा और यह परंपरा आज भी जारी है । पारसियों की अमीरी ही आज उनके लुप्त होने का कारण बन रही है । पश्चिमी संस्कृति में महिलाओं के लिए रोल माडल कैरियर और पैसे का है, उस महिला को बुद्धू और पिछड़ा माना जाता है जिसने घर बैठ कर बच्चे पैदा किये । इसी संस्कृति को पारसी महिलाओं ने बखूबी अपनाया और इसीलिये आज उनका समुदाय लुप्त होने के कगार पर है ।

प्रसिद्ध पारसी हस्ती बहराम दस्तूर ने एक बार कहा था कि पारसी महिलायें तब ही विवाह करना चाहती हैं जब वे जीवन में 'settle' हो जायें और तब तक उसकी प्रजनन की आयु समाप्त हो चुकी होती है । उन्होंने कहा कि आखिर इतना पैसा होने पर भी वे 'settle' क्यों होना चाहती हैं ? भारतीय परम्परा में महिला को आर्थिक तौर पुरुष पर आधीन रहना होता है यानि पुरुष कमाये और वह घर बैठी खाये । वह सही उम्र में विवाह करती है, अपने पति के घर को संभालती है, बच्चे पैदा करती है और इसी से उसको सम्मान मिलता है । खुद पैसा कमाने के चक्कर से वह बेफिक्र होती है, खुद अपनी 'व्यक्तितत्व' की परवाह न करके अपने पति के स्थिति को ही अपना सुख मानती है और सुखी रहती है ।
पारसियों ने गलती यह की कि पश्चिमी संस्कृति के मुताबिक अपनी महिलाओं के "कैरियर" को अधिक महत्व दिया, मातृत्व को नहीं । जो कौमें इस पश्चिमी संस्कृति को अपनायेंगी वे इसी तरह लुप्त होंगी जैसे भारत में पारसी एवं पश्चिमी देशों में सफेद चमड़ी वाली कौमें । जो व्यक्ति अपने सुख और कैरियर को ज्यादा अहमीयत दे और कौम को अनदेखा करे, उसका लुप्त होना आश्चर्यजनक नहीं । एक प्रसिद्ध अमेरिकन मानववैज्ञानिक हुई हैं, जिनका नाम था 'Margaret Mead' । उसने 39 पुस्तकें लिखी जिनमें से एक थी "Male and Female" जो 1948 में छपी थी । मार्गारेट लिखती है कि पुरुषों की तरह महिलायें भी बचपन में सीखती हैं । जैसे एक संयुक्त परिवार में एक जेठानी है जो घरेलू महिला है और कई बच्चों की मां है । दूसरी तरफ उसकी देवरानी है जो काफी पढ़ी लिखी है और अच्छी नौकरी करती है । घर में उस जेठानी को बार-बार ताने दिये जाते हैं कि वह तो बस एक बच्चे पैदा करने की मशीन है । और उस देवरानी को सम्मान दिया जाता है कि वह खूब कमाती है । Margaret Mead लिखती है कि उस घर में यदि कोई 5-10 साल की लड़की है जो रोज यह सब सुनती है तो उसके मन में यह बात बैठ सकती है और वह बड़ी होने पर शायद कोई बच्चा पैदा न करे ।
यह समस्या पशुओं में भी देखी जा सकती है । एक चिड़ियाघर में नर और मादा शेर को साथ में रखने पर भी उनमें संभोग की इच्छा उत्पन्न नहीं हो रही थी । शेरों की संख्या कम होने का एक कारण यह भी हो सकता है कि मादा शेरनी प्रजनन की ओर अनासक्त हो गई है । किसी भी समुदाय को अपना अस्तित्व बनाने के लिये महिलाओं के प्रजनन कार्य को सम्मान देना चाहिये । अगर महिलाओं के कैरियर को ज्यादा सम्मान मिलेगा और मातृत्व को कम, तो महिलायें प्रजनन में रुचि खो सकती हैं और यही बात समाज के लिए घातक है । आजकल वैसे भी एक या दो बच्चों का रिवाज हो चला है । यह रिवाज किसी एकाध परिवार के लिए निजी तौर पर आर्थिक दृष्टि से ठीक हो सकता है पर समाज के लिए ऐसी वृत्ति घातक है, ऐसा कुछ विद्वानों का मत है ।

अगर सभी के पास एक ही सन्तान होगी जो खूब पढ़-लिख कर सिविल में काम करेगी या व्यापार आदि करेगी तो फिर सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा कौन करेगा ? तीन-चार भाइयों में से एक अगर देश पर शहीद हो जाये तो मां-बाप सब्र कर सकते हैं कि चलो, दो-तीन और लाल तो हैं पास में । पर अकेली सन्तान को तो कोई सेना में भर्ती ही नहीं करवायेगा । (बढती जनसंख्या या परिवार नियोजन के मुद्दे दूसरे हैं, अच्छा है इनको इस बहस में शामिल न किया जाये) वैसे भी आजकल IT सेक्टर काफी तरक्की कर रहा है, दूसरे इलेक्ट्रानिक माध्यम भी काफी आ गये हैं । जवान बच्चे रातों को काम कर रहे हैं और दिन में सोते हैं । डाक्टरों का कहना है कि रात को काम करने के कारण उनका शरीर रोगों का घर बनता जा रहा है और उनकी कामशक्ति घट रही है । कैरियर के चक्कर में पड़कर लड़कियां कई साल नौकरी कर के तीस साल से ऊपर की उम्र में शादी कर रही हैं जो सन्तानोपत्ति में प्राकृतिक रुकावट साबित हो रही है । पारसियों की तरह कहीं हमारी कौम और देश तो इस खतरे की ओर नहीं बढ़ रहा ? हमारी संस्कृति में मां को सदा ही ऊंचा स्थान दिया गया है ।

एक अनपढ़ मां को भी उतनी ही इज्जत दो । मातृत्व को सम्मान दो, इसी में हमारी भलाई है - मां तुझे सलाम !
और आप लोगो से विनम्र निवेदन है कि इस लेख को अन्यथा ना ले और मैं जो कहना चाहता हूँ और जिसको लेकर मेरी चिन्ता है उसपे ध्यान दिजिएगा। .

Monday, October 5, 2009

टिप्पणियां काश मिलती खूब सारी.......................

टिप्पणियां काश मिलती खूब सारी,

कविता चाहे अच्छी न हो हमारी,

करता गुजारिश सभी ब्लागरों से,

टिपियाने की अब है आपकी बारी,




पढ़ता न कोई आग्रह करने पर,

लिखता हूँ मैं कूड़ा करकट,

कहते हैं वो सब,

फिर भी मैंने ना हिम्मत हारी,

कृपया टिपियाइये अब है आपकी बारी,




मूल्य का मूल्याकंन करो,

जो लिखा चाहो तो न पढ़ो,

दिया हुआ लिंक है,

उस पर क्लिक करो,

समय कम है , मालूम है,

फिर भी भाई कुछ ही टिपियाते चलो, ,




आपका भी नाम होगा,

मेरा भी काम होगा,

आपका भी ब्लाग देखूँगा,

हो सकेगा तो कुछ टिपिया दूँगा,





इसलिए करता हूँ मेल,

चर्चा करूँगा तो होगा विवाद,

होगी बेवजह बदनामी,

गुपचुप तरीके से की तैयारी,

चलिये कीजिए टिप्पणी,

मैं भी पडूं सब पर भारी,

आयी है आपकी बारी,

काश टिप्पणी मिले खूब सारी।।

Sunday, October 4, 2009

" ब्लोगिंग के खतरनाक वायरस जिससे डरते हैं ब्लोगर "

जी हाँ बिल्कुल सही सुना आप लोगो ने वायरस,वायरस,और वायरस जो की हमें और आपको बहुत परेशान करता है कभी-कभी । अब आप लोग कहेंगे कि ये वायरस ब्लोगिंग में कैसे और ब्लोगर भला क्यों डरने लगे। लेकिन भाई सच्चाई तो यही है कि ब्लोगर भी इससे डरते हैं और ब्लोगरो ने स्वीकार भी किया है। जैसा कि आप लोग जानते होंगे वायरस के बारे में कि ये हमारे कम्प्युटरवा को बड़ा नुकसान पहुचाता है। और हमारे सारे प्रोग्राम को भी खराब कर देता है, ये तो बात है उस वायरस की जिसे आप लोग जानते है। अब बात भाई है उस वायरस की जिससे ब्लोगर डरते हैं, अब आप लोग कहेंगे कि भला वायरस से क्यों डरे हम, हमारे पास तो उसको रोकने के लिए एटींवायरस है। ठीक है आप इस वायरस को भी रोकने के लिए एटींवायरस का प्रयोग कर सकते हो। लेकिन भईया इ जो वायरस है ना इ बहुत खतरनाक है।
ये ऐसा वायरस है जो कि हमारे कम्प्यूटर को कुछ नहीं करता कुछ भी नहीं, और ये वायरस बस ब्लोगरो को परेशान करता है। ये वायरस बड़ा खतरनाक होता है। इसे आप रोक तो लेंगे लेकिन ये आपके भेजे को हिला देगा और आपको मानसिक तौर पर भी परेशान कर देगा।
खैर छोड़िये इन बातो को बहुत हो चुका अब आपको बताता हूँ उस वायरस के बारे में जो कि ब्लोगरो को परेशान करता है। अब आप लोग सोच रहे होंगे कि मै आपको उस वायरस का नाम बताने वाला हूँ। अरे नहीं यही तो बात है उसका नाम भी ऐसा है कि जैसे बेनाम। अब बताता हूँ आप लोगो को कि उसका नाम क्यों नहीं है। होगा कैसे उसका तो नाम ही "बेनाम"(Anonymous) अब आपको कुछ याद आ रहा होगा, आ गया ना। हाँ सही समझे आप मैं बात कर रहा हूँ "बेनामी की" हाँ-हाँ वही जो बिना नाम के हमारे ब्लोग पर अनाप सनाब कह जाता है टिप्पणी स्वरुप। अब इस बेनामी वायरस से हमारे ब्लोगर बन्धु इतना डर गये है कि बस पुछिये मत।

इस बेनामी वायरस से बचने के लिए हमारे ब्लोगर बन्धुओं नें बहुत ही तगड़ा एंटीवायरस लगा रखा है। हुआ यूं कि मैं जब नया-नया ब्लोगर था तो एक दिन मैं एक महाशय के ब्लोग पर पहुचा टिप्पणी देने के लिए और मैंने टाइप की और फिर क्या मैने टिप्पणी पोस्ट कर दी लेकिन ये क्या मेरी टिप्पणी प्रकाशित नहीं हुयी मै परेशान हो गया फिर देखा कि ऊपर लिखा था "आपकी टिप्पणी ब्लोग स्वामी के स्वीकृति के बाद दिखने लगेगी" । फिर मैंने उनकी पुरानी पोस्टे देखीं और पाया कि वे बेचारे बेनामी टिप्पणी से बड़े परेशान थे। इस वायरस से कोई भी ब्लोगर अछुता ना होगा।

ये बात तो रही बेनामी की, अगर और देखा जाये तो इस प्रकार की सुरक्षा से बहुतो को बुरा भी लगता होगा। मेरा मतलब यह है कि क्या इस प्रकार के सुरक्षा मानक से सबको गुजारना अच्छा होगा क्या। बात समझ आती है कि आप बेनामी से परेशान है इसलिए इस प्रकार का मानक प्रयोग में ला रहे है। वहीं कुछ लोग इसका गलत उपयोग भी करते है जैसे कि उन्होने कोई रचना पोस्ट की जिसपर विवाद हो सकता है। जब उनके पास उस पोस्ट से जुड़ी टिप्पणी आती है तो वे बस उन्ही टिप्पणीयों को प्रकाशित करते है जो की उनके पक्ष में होते है।

अब बात यहाँ ये है कि क्या चन्द बेनामी टिप्पणीयो से बचने के लिए सब पर शक् किया जाना उचित होगा। मुझे तो नहीं लगता कि ये सही है । ब्लोग एक ऐसी जगह है जहाँ आप अपनी इच्छा स्वरुप लिख सकते है और पढ़ने वाले इच्छा स्वरुप टिप्पणी दे सकते है। तो फिर इस प्रकार डरने से क्या फायदा। अगर आप ने गलत लिखा है तो आपको गलत सुनने को मिलेगा और सही लिखा है तो सहीं। अगर आपको लगता है कि आपने सही लिखा है तो सुरक्षा क्यो ? सही लिखने पर यदि आपका विरोध होता है तो आप अपने तर्क से जवाब दीजिए। इस प्रकार बचने का क्या मतलब। ठिक है मैं मानता हूँ की अगर आप ऐसा नहीं करते तो आपको बेनामी से काफी कुछ सुनने को मिल सकता है। लेकिन जरा ध्यान दीजियेगा, उसके बातो का क्या बुरा मानना जिसमें नाम बताने तक की माद्दा ना हो तो ऐसे बुजदिलो से क्या डरना। इस तरह के सुरक्षा से सभी टिप्पणी देने वाले शक् के घेरे मे आते है।
अब मेरा मानना तो ये है कि इस तरह से हम कब तक डरते रहेंगे बेनामी वायरस से।

जिसका कोई अस्तित्व ही ना हो उससे किसलिए डरना। अब चन्द बेनामी वारयरस के चलते सभी ब्लोगरो को स्कैनिंग से गुजरना पड़े भला ये कहाँ का न्याय होगा।

Friday, October 2, 2009

ब्लोगवाणी के विरोधियो के नाम खुला पत्र

कई दिंनो से देख रहा हूँ कि ब्लोगवाणी पर लगातार आरोप लग रहें है। क्या सबकुछ बैठ कर देखना सही होगा। ब्लोगवाणी जो कर रहा है हिन्दी प्रमियो के लिए वह एक वरदान स्वरुप है।

ब्लोगवाणी हमें एक ऐसा प्लेटफार्म प्रदान करता है जहाँ से हम अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुचा सकते हैं,। हम जो भी लिखते हैं कहानी हो या कविता लोगो तक पहुचाने का काम करती है ब्लोगवाणी। लेकिन शायद कुछ लोगो को ये बात पसन्द नहीं है (वैसे ये लोग हैं कौन ये सब को मालुम हैं लेकिन विवाद ना हो इसलिए मैं नाम सार्वजनिक नही कर रहा हूँ) और ऐसे लोग लगातार ब्लोगवाणी के विरुद्ध कुछ न कुछ लिख रहें है और ब्लोगवाणी की खांमिया ढुढ़ने मे लगे है शायद इन्हे कुछ और काम नहीं है या तो इनके पास लिखने के लिए कुछ होता नहीं है।

जहाँ तक मेरा विचार ऐसे लोगो के प्रति तो ये लोग बस ये सब बता कर कुछ नाम चाहते है भले ये नाम गाली स्वरुप ही क्यों ना मिले। ब्लोगवाणी के विरोधी कहते है कि ब्लोगवाणी में कुछ खामिया है जिसे ब्लोगावाणी को दुर करना चाहिए। ठिक है मैं भी मान लेता हूँ कुछ गलतिया हो सकती है लेकिन उसमे जगजाहीर करने वाली क्या बात है। हम भारतीयो की शायद ये बहुत पुरानी आदत है कि अगर कोई निस्वार्थ काम कर रहा है तो उसे बदनाम करने के लिए बहाने ढुढ़ने लगते है। ब्लोगवाणी जो कर रहा है देखा जाये तो सब के बस की बात नहीं है, लेकिन तब पर भी क्या किसी ने आभार व्यक्त किया ब्लोगवाणी का अपने रचना के माध्यम से नहीं ना। तो विरोध किसलिए भाई। जो खामिया है वह हमें आसानी से दिख जाती है लेकिन जो ब्लोगवाणी कर रहा है जो उसकी खुबिया है वह कोई नहीं देखता। अगर ब्लगवाणी मे कुछ खराबी है , हो सकती है ऐसा क्या होगा जिसमे खामियां ना हो। अब मेरा सवाल उन लोगो से है जो की ब्लोगवाणी का विरोध करते है। वे कहते है की मैंने ब्लोगवाणी को बहुत से मेल भेजे लेकिन अभी तक कोई कार्यवाई नहीं की गई । सवाल यहाँ ये है कि ब्लोगावाणी को एक ही काम है क्या? वह जो कह रहा है वह कम है क्या। आप चले है विरोध करने कभी किसी सामूहिक ब्लोग का संचालन कर के दिखिये कितना दम है सब समझ आ जायेगी। ब्लोगवाणी न तो आपका गुलाम है और नही आप या हम उसे पैसे पहुचाते है। तब पर भी ब्लोगावाणी इतना कुछ कर रहा है हमारे लिए। अगर आपको ब्लोगवाणी में इतनी ही खामिया नजर आती है तो कोई ऐसा एग्रीगेटर आप ही बनाईये तब आपको मालुम चलेगा की क्या होता है एग्रीगेटर का संचालन करना।

ब्लोगावाणी का जितने लोग विरोध कर रहें है इनका मकस्द बस यही है कि किसी तरह से ब्लोगावाणी को परेशान किया जाये ताकी नेक काम करने वाला आदमी अपने मार्ग से बिचलीत हो जाये। इसलिए ब्लोगवाणी से मेरा विनम्र निवेदन है कि वे विचलीत ना हों। विरोध करने वाले लोग बस विरोध ही कर सकते है और कुछ नहीं। इसलिए आप अपना काम करते रहें।

Thursday, October 1, 2009

मजबूर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

जिस किसी ने भी 'मजबूरी का नाम, महात्मा गांधी' जैसी कहावत का आविष्कार किया, उसकी तारीफ की जानी चाहिए।
महात्मा गांधी का नाम जपना और नीलाम होती उनकी नितांत निजी वस्तुओं को भारत लाना सरकार की मजबूरी है। महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने गांधी जी की वस्तुओं को भारत लाने का मुद्दा इतना उछाल दिया कि विशुद्ध मजबूरी में मनमोहन सिंह सरकार को सक्रिय होना पड़ा। लेकिन इस सक्रियता के पीछे कितनी उदासीनता थी, इसका पता सरकार और नीलामी में इन वस्तुओं को खरीदने वाले शराब- निर्माता और प्रसिद्ध उद्योगपति विजय माल्या के दावों- प्रतिदावों से साफ हो जाता है। सरकार बढ़-चढ़कर कह रही थी कि गांधी जी की ऐनक, थाली, कटोरा और चप्पलें आदि खरीदने के लिए अमेरिका में अपने दूतावास को उचित निर्देश दे दिए गए हैं। जब नीलामी में विजय माल्या ने वस्तुएं खरीद लीं, तब बढ़-चढ़कर फिर कहा गया कि माल्या ने सरकार के कहने पर ही ऐसा किया है।

इस दावे पर माल्या ने कहा कि मेरे फैसले का सरकार से कोई लेना-देना नहीं है। मैं फोन के जरिए नीलामी में भाग ले रहा था। सरकार ने मुझसे न तो नीलामी से पहले और न ही बाद में कोई संपर्क किया। अलबत्ता माल्या इन चीजों को खरीदकर संतुष्ट हैं और इन्हें भारत को सौंपना चाहते हैं। उनकी एक ही इच्छा है कि इन वस्तुओं को भारत लाने पर सीमा शुल्क आदि नहीं लगे। माल्या ने टीपू सुल्तान की तलवार को भी नीलामी में खरीदा था लेकिन अभी भी वह सैन फ्रांसिस्को में ही है। मौजूदा कानूनों के अनुसार राष्ट्रीय धरोहर की वस्तुओं को भारत लाने के लिए भी आयात लाइसंस लेना पड़ता है और उस पर सीमा शुल्क आदि चुकाना पड़ता है।

सरकार चूंकि गांधी की वस्तुओं को भारत लाने के मामले में उदासीन नहीं दिखना चाहती, इसलिए यह संभव है कि आनन-फानन में आयात लाइसंस दे दिया जाए और कस्टम ड्यूटी माफ कर दी जाए, लेकिन विजय माल्या को निश्चय ही कोई जल्दी नहीं होगी। होती तो वह कहते कि मैं खुद ड्यूटी का पैसा भी भरूंगा। तो क्या उनके लिए भी मजबूरी का नाम ही महात्मा गांधी है? अभी तक कहीं कोई ऐसा साक्ष्य नहीं है, जिसके आधार पर कहा जा सके कि भारत में शराब को बढ़ावा देने में अपना विनम्र कारोबारी सहयोग देनेवाले विजय माल्या मद्य निषेध के प्रबल पैरोकार महात्मा गांधी के विचारों और जीवन मूल्यों में कोई यकीन रखते हैं। गांधी के सादा जीवन-उच्च विचार वाले जीवन मूल्यों के विपरीत विजय माल्या भोगवाद के जीवंत प्रतीक हैं। आज ऐसे चिंतकों की कमी नहीं है जो मानते हैं कि दुनिया में अगर लोभ-लालच न होते तो इतनी भौतिक तरक्की न हुई होती।

विजय माल्या व्यापारी हैं और आप समझ सकते हैं कि उनकी तमाम ब्रैंडों-उत्पादों-सेवाओं को विज्ञापन की जरूरत हमेशा रहती है। गांधी की वस्तुओं में निवेश करना एक ऐसा स्थायी विज्ञापन हथिया लेना है, जो सालों काम आएगा। आपने देखा होगा कि शीतल पेय बनानेवाली कंपनियां क्रिकेट मैच स्पॉन्सर करती हैं तो सिगरेट बनानेवाली कंपनियां साहस और वीरता के लिए पुरस्कार बांटती हैं। इसलिए अगर एक शराब बनानेवाला व्यापारी गांधी जी को इस तरह भुनाता है तो कौन आपत्ति करने वाला है? आखिर वह देश के लिए तो एक नेक काम कर ही रहा है।

गांधी जी ने साध्य के लिए साधना को या कहें लक्ष्य के लिए उसके जरिए का भी निष्कलुष होना जरूरी बताया था। अपने मूल्यों से गांधी ने कभी समझौता नहीं किया। असहयोग आंदोलन उन्होंने इसलिए वापस लिया क्योंकि अंग्रेजों के दमन के विरोध में उनके समर्थक चौरी-चौरा में हिंसा पर उतर आए थे। जरा सोचिए कि गांधी अगर जीवित होते और ऐसा कोई अवसर उपस्थित होता तो क्या गांधी इस तरह वापस आने वाली अपनी निजी वस्तुएं स्वीकार करते?

गांधी जी के बारे में उनके पोते राजमोहन गांधी ने लिखा है कि शुरू में गांधी को भी खाने, पहनने, अच्छी जगह रहने और समुद्री तथा अन्य यात्राएं करने का शौक था। उनके जीवन में गीत-संगीत के लिए भी जगह रही है, लेकिन एक बार जब उन्होंने सादगी अपना ली तो उसे पूरी तरह जीवन में उतार लिया। गोलमेज सम्मेलन के लिए जब वे लंदन गए थे, तब उनसे एक अंग्रेज पत्रकार ने पूछा कि अगर कल नंगे बदन होने के कारण महारानी आपसे मिलने से मना कर दें तो क्या आप उचित कपड़े पहनेंगे। तो गांधी जी ने कहा था : नहीं, मैं ऐसे ही मिलूंगा। गांधी संग्रह के खिलाफ थे और वे हर वस्तु का न्यायपूर्ण उपयोग करने के पक्षधर थे। समृद्धि की जगह सादगी और समानता। उनका गांधीवाद एक तरह से मार्क्सवाद की तरह ही एक यूटोपिया है, जिसे कोई देश अपने जीवन में उतार नहीं सकता। यही कारण है कि गांधीवाद को उनके पट्ट शिष्य जवाहरलाल नेहरू ने अपने मिश्रित अर्थव्यवस्था और उद्योगीकरण के प्रयोगों पर आधारित नेहरूवाद से विस्थापित कर दिया।

मनमोहन सिंह ने 1990 के दशक में अपनी नई आर्थिक नीतियों से गांधीवाद के ताबूत में अंतिम कील ठोक दी और गांधी आज मुक्कमिल तौर पर पूजा की वस्तु बना दिए गए हैं। आज गांधी के विचारों की नहीं उनकी वस्तुओं की जरूरत है क्योंकि विचार नहीं वस्तुएं गांधीवाद की झलक दिखानेवाली रोशनियां मान ली गई हैं- व्यक्ति नहीं मूर्ति, उसकी वस्तुएं, उसके प्रतीक ।

आप खुद सोचकर देखिए कि देश में क्या एक भी ऐसी राजनैतिक पार्टी है, जिसका गांधीवाद में जरा भी विश्वास हो। लेकिन गांधी का नाम लिए बगैर किसी का काम नहीं चल सकता। इसलिए बीजेपी जैसी उस परिवार की पार्टी भी जो गांधी जी के हत्यारों के साथ विचार-साम्य रखती है, गांधीवादी मानवतावाद का नाम जपती हैं और उसके अध्यक्ष राजनाथ सिंह कहते हैं कि गांधी की विरासत के असली वाहक तो हम हैं। कांग्रेस का आलम तो यह है कि वहां एक प्रतीक के रूप में भी गांधी टोपी दुर्लभ प्रजाति की वस्तुओं में शामिल हो गई है। तो क्या आपको नहीं लगता कि गांधी का नाम लेना हमारी पार्टियों के लिए विशुद्ध एक मजबूरी है? हमारी पार्टियों ने गांधी के खिलाफ अपनी-अपनी तरह से वीर सावरकर, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह और डॉ. भीमराव आंबेडकर को भी खड़ा करने की कोशिश की। लेकिन कोई भी गांधी से बड़ा साबित नहीं हुआ क्योंकि गांधी जहां एक ओर बिल्कुल अकेले और सबसे अलग हैं, वहीं दूसरी ओर ये सब उनमें उतने ही समाहित भी हैं। इसलिए गांधी अगर एक स्तर पर निरापद हैं तो दूसरे स्तर पर खतरनाक भी हैं।

हमने बड़ी चतुराई से निरापद गांधी को चुना है- एक आभासी गांधी को, उनकी जड़ वस्तुओं को, जो बदले जाने का आभास तो देती हैं लेकिन बदलाव नहीं लातीं। जैसे 'लगे रहो मुन्ना भाई' मार्का फिल्में जो पर्दे पर चमत्कार करती हैं और जीवन में मनोरंजन। हमारे राजनेताओं को भी गांधी नहीं उनकी थाली और कटोरा, ऐनक और घड़ी चाहिए।