Monday, November 30, 2009

अजय झा जी आप हमें यूँ छोड़ के नहीं जा सकते , अलविदा ब्लोगिंग

अजय झा जी एक ऐसा नाम जो हिन्दी ब्लोग जगत में अपनी एक अलग पहचान रखता है । अजय झा जी ने हिन्दी ब्लोग जगत को बहुत कम समय वो दिया जिसे देनें में हमें शायद बहुत ज्यादा समय लग जाये । अभी-अभी कुछ देर पहले ही अजय झा जी का मेसेज आया मेरे मोबाईल पर कि "ब्लोगिंग को अलविदा कह रहा हूँ आप सब के स्नेह के लिए शुक्रिया " जैसे ही ये मैसेज मेरे मोबाईल पर आया मैं एक दम से हिल गया मैंने सोचा अरे ये कैसा मैसेज है ।

मैंने तुरन्त अजय जी को फोन लगाया , परन्तु उन्होनें कोई जवाब नहीं दिया और अपना मोबाईल भी बंद कर दिया । मैंने फिर कई बार कोशिश की परन्तु सारी कोशिश नाकाम रही । तब रहा नहीं गया और ये अन्त में ये पोस्ट लिखना पड़ रहा है । अजय जी हमें आप ऐसे छोड़ के नही जा सकते , अभी आपको बहुत कुछ देना है हिन्दी ब्लोगिंग जगत को । अभी आपको हिन्दी ब्लोगिंग को उसके सर्वश्रेठ सिमा तक पहुचाना है । आखिर ऐसा क्या हो गया कि आप ऐसा कदम उठाने को मजबूर हो गये । आप ऐसे कोई फैसले नहीं ले सकते , आखिर आप ऐसे ही बिना कुछ बताये कैसे जा सकता है । हमें आपकी जरुरत है अजय जी। अगर आपका किसी विवाद हुआ हैं तो आप उसे सार्वजनिक किजीए ताकी सच्चाई सबके सामने आये । और आप ऐसा कदम उठाते हैं तो हम भी आपका विरोध करेंगे । आपको ये फैसला जल्द से जल्द बदलना पड़ेगा । नहीं तो हम भी आपके साथ हो जायेंगे । और अन्त में आपसे निवेदन है कि आप अपना फैसला जल्द से जल्द बदलीये , और हमारे चेहरे पर खूशी लाईये । और अगर आप ऐसा नहीं करते तो आज ब्लोगिंग का ये मेरा भी लास्ट पोस्ट होगा , अलविदा।

Friday, November 27, 2009

महिलायें बनेंगी पुरुष तो बच्चे पैदा कौंन करेगा ????????????

बहुत दिंनो से ब्लोग जगत में महिलाओं को लेकर बहस छिड़ी हुई है । कुछ कथीत प्रगतीवादी महिलाएं कहती हैं कि हम किसी से कम नहीं । हम पुरुषो से कहीं भी पिछे नहीं है । बात तो ठिक है और होना भी चाहिए क्यों पिछे रहें , लेकिन जब बात आती है बराबरी की तो यहाँ जरा मतभेद होंना स्वाभाविक है । क्योंकि महिलाएं पुरुष बन हीं नहीं सकती । इसके बहुत से कारण है , अब चाहे वह प्राकृतिक हो या शारीरिक ।



कोई पचास-साठ साल पहले अमेरिका में एक
"Freedom of women" आन्दोलन चला था जिसका असर सारी दुनियां पर पड़ा । उसका कहना यह था कि महिलायें पुरुषों से किसी मामले में कम नहीं हैं फिर वे क्यों घर पर बैठी रहें और मर्दों की गुलामी करें ? बात तो गलत नहीं थी पर उसकी दिशा कुछ बदल सी गई । मर्दों जैसे ही कपड़े पहनने, उन्हीं जैसे भारी-भरकम मेहनत वाले काम करने का शौक महिलाओं में पैदा हुआ जिससे काफी सामाजिक समस्यायें पैदा हुई जिनको पश्चिमी समाज आज तक भुगत रहा है । और जब जिस तरह से हमारे यहाँ कि महिलायें पाश्चात संस्कृति को अपनानें में लगी है लगता है कि अब बारी हमारी है।

कुछ देशों की जनसंख्या का ग्राफ गड़बड़ा गया जो आजकल चिन्ता का विषय बनता जा रहा है । इटली और स्पेन को चिन्ता है कि उनके यहां बच्चे कम पैदा हो रहे हैं और Immigration के कठोर कानूनों के बावजूद मुस्लिम देशों की आबादी वहां आ कर बस रही है । स्कैंडिनेविया, बेल्जियम और रूस आदि देशों में महिलाओं को बच्चे पैदा करने के incentive दिये जा रहे हैं । पश्चिमी संस्कृति ने पहले महिलाओं के परिवार-केन्द्रित सहज स्वभाव को "कैरियर" के चक्कर में तोड़ा । उन्हें कहा गया कि आप अपना कैरियर बनाइये, पैसा कमाइये और "स्वतंत्र जीवन शैली" अपनाइये । अब उन्हें प्रलोभन देकर वापस प्रजनन की तरफ मोड़ा जा रहा है ।

जीस तरह से पश्चिमी संस्कृति हमारे यहाँ पैर पसार रही है अब ये दिन भी दूर नहीं होगा। एक नजारा भारत का देखिये । जनगणना के मुताबिक भारत में पारसी समुदाय गायब होता जा रहा है । टाटा जैसे अमीर पारसी घरानों को भी इसकी चिन्ता सताये जा रही है । इसका मूल कारण पारसी महिलाओं का बहुत ऊंची शिक्षा लेना और पश्चिमी रंग में ढ़लना बताया जा रहा है । कहते हैं कि पारसी अमीर इसलिए हुए हैं कि उन्होंने ब्रिटिश राज्य से सहयोग करके ऊंचे पद हासिल किये और अपने बच्चों को भी ऐसे ओहदे दिलवाने के लिए अपने बच्चों को इंग्लैंड में शिक्षा के लिए भेजा और यह परंपरा आज भी जारी है । पारसियों की अमीरी ही आज उनके लुप्त होने का कारण बन रही है । पश्चिमी संस्कृति में महिलाओं के लिए रोल माडल कैरियर और पैसे का है, उस महिला को बुद्धू और पिछड़ा माना जाता है जिसने घर बैठ कर बच्चे पैदा किये । इसी संस्कृति को पारसी महिलाओं ने बखूबी अपनाया और इसीलिये आज उनका समुदाय लुप्त होने के कगार पर है ।


प्रसिद्ध पारसी हस्ती बहराम दस्तूर ने एक बार कहा था कि पारसी महिलायें तब ही विवाह करना चाहती हैं जब वे जीवन में 'settle' हो जायें और तब तक उसकी प्रजनन की आयु समाप्त हो चुकी होती है । उन्होंने कहा कि आखिर इतना पैसा होने पर भी वे 'settle' क्यों होना चाहती हैं ? भारतीय परम्परा में महिला को आर्थिक तौर पुरुष पर आधीन रहना होता है यानि पुरुष कमाये और वह घर बैठी खाये । वह सही उम्र में विवाह करती है, अपने पति के घर को संभालती है, बच्चे पैदा करती है और इसी से उसको सम्मान मिलता है । खुद पैसा कमाने के चक्कर से वह बेफिक्र होती है, खुद अपनी 'व्यक्तितत्व' की परवाह न करके अपने पति के स्थिति को ही अपना सुख मानती है और सुखी रहती है ।
पारसियों ने गलती यह की कि पश्चिमी संस्कृति के मुताबिक अपनी महिलाओं के "कैरियर" को अधिक महत्व दिया, मातृत्व को नहीं । जो कौमें इस पश्चिमी संस्कृति को अपनायेंगी वे इसी तरह लुप्त होंगी जैसे भारत में पारसी एवं पश्चिमी देशों में सफेद चमड़ी वाली कौमें । जो व्यक्ति अपने सुख और कैरियर को ज्यादा अहमीयत दे और कौम को अनदेखा करे, उसका लुप्त होना आश्चर्यजनक नहीं । एक प्रसिद्ध अमेरिकन मानववैज्ञानिक हुई हैं, जिनका नाम था 'Margaret Mead' । उसने 39 पुस्तकें लिखी जिनमें से एक थी "Male and Female" जो 1948 में छपी थी । मार्गारेट लिखती है कि पुरुषों की तरह महिलायें भी बचपन में सीखती हैं । जैसे एक संयुक्त परिवार में एक जेठानी है जो घरेलू महिला है और कई बच्चों की मां है । दूसरी तरफ उसकी देवरानी है जो काफी पढ़ी लिखी है और अच्छी नौकरी करती है । घर में उस जेठानी को बार-बार ताने दिये जाते हैं कि वह तो बस एक बच्चे पैदा करने की मशीन है । और उस देवरानी को सम्मान दिया जाता है कि वह खूब कमाती है । Margaret Mead लिखती है कि उस घर में यदि कोई 5-10 साल की लड़की है जो रोज यह सब सुनती है तो उसके मन में यह बात बैठ सकती है और वह बड़ी होने पर शायद कोई बच्चा पैदा न करे ।
यह समस्या पशुओं में भी देखी जा सकती है । एक चिड़ियाघर में नर और मादा शेर को साथ में रखने पर भी उनमें संभोग की इच्छा उत्पन्न नहीं हो रही थी । शेरों की संख्या कम होने का एक कारण यह भी हो सकता है कि मादा शेरनी प्रजनन की ओर अनासक्त हो गई है । किसी भी समुदाय को अपना अस्तित्व बनाने के लिये महिलाओं के प्रजनन कार्य को सम्मान देना चाहिये । अगर महिलाओं के कैरियर को ज्यादा सम्मान मिलेगा और मातृत्व को कम, तो महिलायें प्रजनन में रुचि खो सकती हैं और यही बात समाज के लिए घातक है । आजकल वैसे भी एक या दो बच्चों का रिवाज हो चला है । यह रिवाज किसी एकाध परिवार के लिए निजी तौर पर आर्थिक दृष्टि से ठीक हो सकता है पर समाज के लिए ऐसी वृत्ति घातक है, ऐसा कुछ विद्वानों का मत है ।


अगर सभी के पास एक ही सन्तान होगी जो खूब पढ़-लिख कर सिविल में काम करेगी या व्यापार आदि करेगी तो फिर सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा कौन करेगा ? तीन-चार भाइयों में से एक अगर देश पर शहीद हो जाये तो मां-बाप सब्र कर सकते हैं कि चलो, दो-तीन और लाल तो हैं पास में । पर अकेली सन्तान को तो कोई सेना में भर्ती ही नहीं करवायेगा । (बढती जनसंख्या या परिवार नियोजन के मुद्दे दूसरे हैं, अच्छा है इनको इस बहस में शामिल न किया जाये) वैसे भी आजकल IT सेक्टर काफी तरक्की कर रहा है, दूसरे इलेक्ट्रानिक माध्यम भी काफी आ गये हैं । जवान बच्चे रातों को काम कर रहे हैं और दिन में सोते हैं । डाक्टरों का कहना है कि रात को काम करने के कारण उनका शरीर रोगों का घर बनता जा रहा है और उनकी कामशक्ति घट रही है । कैरियर के चक्कर में पड़कर लड़कियां कई साल नौकरी कर के तीस साल से ऊपर की उम्र में शादी कर रही हैं जो सन्तानोपत्ति में प्राकृतिक रुकावट साबित हो रही है । पारसियों की तरह कहीं हमारी कौम और देश तो इस खतरे की ओर नहीं बढ़ रहा ? हमारी संस्कृति में मां को सदा ही ऊंचा स्थान दिया गया है ।

एक अनपढ़ मां को भी उतनी ही इज्जत दो । मातृत्व को सम्मान दो, इसी में हमारी भलाई है - मां तुझे सलाम !
और आप लोगो से विनम्र निवेदन है कि इस लेख को अन्यथा ना ले और मैं जो कहना चाहता हूँ और जिसको लेकर मेरी चिन्ता है उसपे ध्यान दिजिएगा।

Thursday, November 26, 2009

अनजाने रिश्ते का एहसास

अनजाने रिश्ते का एहसास,

बयां करना मुश्किल था ।

दिल की बात को ,

लबों से कहना मुश्किल था ।।


वक्त के साथ चलते रहे हम ,

बदलते हालात के साथ बदलना मुश्किल था ।

खामोशियां फिसलती रही देर तक,

यूँ ही चुपचाप रहना मुश्किल था ।।


सब्र तो होता है कुछ पल का ,

जीवन भर इंतजार करना मुश्किल था ।

वो दूर रहती तो सहते हम ,

पास होते हुए दूर जाना मुश्किल था ।।


अनजाने रिश्ते का एहसास ,
बयां करना मुश्किल था ।।

Monday, November 23, 2009

कविता प्रतियोगिता सूचना

हिन्दी साहित्य मंच "तृतीय कविता प्रतियोगिता " दिसंबर " माह से शुरू हो रही है । इस कविता प्रतियोगिता के लिए किसी विषय का निर्धारण नहीं किया गया है अतः साहित्यप्रेमी स्वइच्छा से किसी भी विषय पर अपनी रचना भेज सकते हैं । रचना आपकी स्वरचित होना अनिवार्य है । आपकी रचना हमें नवम्बर माह के अन्तिम दिन तक मिल जानी चाहिए । इसके बाद आयी हुई रचना स्वीकार नहीं की जायेगी ।आप अपनी रचना हमें " यूनिकोड या क्रूर्तिदेव " फांट में ही भेंजें । आप सभी से यह अनुरोध है कि मात्र एक ही रचना हमें कविता प्रतियोगिता हेतु भेजें । रचना के साथ अपना फोन नम्बर और पता भी जरुर संलग्न करें, जिससे संपर्क किया जा सके। प्रथम द्वितीय एवं तृतीय स्थान पर आने वाली रचना को पुरस्कृत किया जायेगा । दो रचना को सांत्वना पुरस्कार दिया जायेगा । सर्वश्रेष्ठ कविता का चयन हमारे निर्णायक मण्डल द्वारा किया जायेगा । जो सभी को मान्य होगा । आइये इस प्रयास को सफल बनायें । हमारे इस पते पर अपनी रचना भेजें -hindisahityamanch@gmail.com .आप हमारे इस नं पर संपर्क कर सकते हैं- 09818837469, 09891584813, हिन्दी साहित्य मंच एक प्रयास कर रहा है राष्ट्रभाषा " हिन्दी " के लिए । आप सब इस प्रयास में अपनी भागीगारी कर इस प्रयास को सफल बनायें । आइये हमारे साथ हिन्दी साहित्य मंच पर । हिन्दी का एक विरवा लगाये जिससे आने वाले समय में एक हिन्दीभाषी राष्ट्र की कल्पना को साकार रूप दे सकें ।

कट्टरताओं मत बाँटो देश ---- धर्म , जाती और क्षेत्र के नाम पर

नया युग वैज्ञानिक अध्यात्म का है । इसमें किसी तरह की कट्टरता मूढता अथवा पागलपन है। मूढताए अथवा अंधताये धर्म की हो या जाति की अथवा फिर भाषा या क्षेत्र की पूरी तरह से बेईमानी हो चुकी है । आज से पाँच-छह सौ साल पहले यूरोप जिस अंधविश्वास दंभ एंव धार्मिक बर्बरता के युग में जी रहा था, उस युग में आज अपने देश को घसीटने की कोशिश करना किसी भी तरह से उचित ना होगा। जो मूर्खतायें अब तक हमारे निजी जीवन का नाश कर रही थी वही अब देशव्यापी प्रागंण में फैलकर हमारी बची-खुची मानवीय संवेदना का ग्रस कर रही है । जिनकें कारण अभी तक हमारे व्यक्तित्व का पतन होता रहा है , अब उन्ही के कारण हमारा देश तबाह हो रहा है । धर्म के नाम पर , जाति के नाम पर,क्षेत्र के नाम, और भाषा के नाम पर जो झगड़े खड़े किए जा रहे है उनका हश्र सारा देश देख रहा है । कभी मंदिर और कभी मस्जिद तो कभी जातीयता को रिझाने की कशिश ।दुःख तो तब और होता है जब इस तरह के मामलो में शिक्षित वर्ग भी शामिल दिखता है । ये सब किस तरह की कुटिलताएँ है और इनका संचायन वे लोग कर रहे है जो स्वयं को समाज का कर्णधार मानते हैं । इन धर्मो एवं जातियो के झगड़ो को हमारी कमजोरियों दूर करने का सही तरीका केवल यही है कि देश के कुछ साहसी एंव सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन कट्टरताओं की कुटिलता के विरुद्ध एक महासंग्राम छेड़ दें।

जब तक यह मूर्खता नष्ट न होगी, तब तक देश का कल्याण-पथ प्रशस्त ना होगा । समझौता कर लेनें, नौकरियों का बँटवारा कर लेने और अस्थायी सुलह नामों को लिखकर, हाथो में कालीख पोत लेने से कभी राष्ट्रीयता व मानवीयता का उपवन नहीं मंहकेगा । हालत आज इतनी गई-गुजरी हो गई है कि व्यापक महांसंग्राम छेडे बिंना काम चलता नहीं दिखता । धर्म , क्षेत्र एवं जाति का नाम लेकर घृणित व कुत्सित कुचक्र रचनें वालों की संख्या रक्तवीचकी तरह बढ रही है । ऐसे धूर्तो की कमी नहीं रही, पर मानवता कभी भी संपूर्णतया नहीं हुई और न आगे ही होगी, लेकिन बीच-बीच में ऐसा अंधयूग आ ही जाता है , जिसमें धर्म , जाति एवं क्षेत्र के नाम पर झूठे ढकोसले खड़े हो जाते हैं । कतिप्रय उलूक ऐसे में लोगो में भ्रातियाँ पैदा करने की चेष्टा करने लगते है । भारत का जीवन एवं संस्कृति वेमेल एवं विच्छन्न भेदभावों की पिटारी नहीं है । जो बात पहले कभी व्यक्तिगत जीवन में घटित होती थी, वही अब समाज की छाती चिरने लगें । भारत देश के इतिहास में इसकी कई गवाहिँया मेजुद हैं । हिंसा की भावना पहले कभी व्यक्तिगत पूजा-उपक्रमो तक सिमटी थी, बाद में वह समाज व्यापिनी बन गयी । गंगा, यमुना सरस्वती एवं देवनंद का विशाल भू-खण्ड एक हत्याग्रह में बदल गया । जिसे कुछ लोग कल तक अपनी व्यक्तिगत हैसियत से करते थे, अब उसे पूरा समाज करने लगा । उस समय एक व्यापक विचार क्रान्ति की जरुरत महसूस हुई । समाज की आत्मा में भारी विक्षोभ हुआ ।

इस क्रम में सबसे बडा हास्यापद सच तो यह है कि जो लोग अपने हितो के लिए धर्म , क्षेत्र की की दुहाई देते है उन्हे सांप्रदायिक कहा जाता है, परन्तु जो लोग जाति-धर्म क्षेत्र के नाम पर अपने स्वार्थ साधते हैं , वे स्वयं को बडा पुण्यकर्मि समझते हैं । जबकि वास्तविकता तो यह है कि ये दोंनो ही मूढ हैं , दोनो ही राष्ट्रविनाशक है । इनमें से किसी को कभी अच्छा नहीं कहा जा सकता । ध्यान रहे कि इस तरह की मुढतायें हमारे लिए हानिकारक ही साबित होंगी , अंग्रजो ने तो हमारे कम ही टुकडे किय, परन्तु अब हम अगर नहीं चेते तो खूद ही कई टूकडों में बँट जायेंगे, क्या भरोसा है कि जो चन्द स्वार्थि लोग आज अलग राज्य की माँग कर रहे हैं वे कल को अलग देश की माँग ना करे, इस लिए अब हमें राष्ट्रचेतना की जरुरत है, हो सकता है शुरु में हमें लोगो का कोपाभजन बनना पड़े , पर इससे डरने की जरुरत नही है । तो आईये मिलकर राष्ट्र नवसंरचना करने का प्रण लें ।

Sunday, November 22, 2009

भारतीय संस्कृति से लुप्त होती-- सिर से आँचल व पैरों से पायल

बदन से सरकते कपड़े , जी हाँ आजके वर्तमान परिवेश में आपको आसानी से दिख जायेगा । अब ये आपको हर गली नुक्कड़ , बाजार हो या शोपिग माल छोटे कपड़ो मे लड़कियां आपको आसानी से दिख जायेंगी । कल तक छोटे कपड़े रैंप पर कैटवाक करती मॉडल्स अपने डिजाइनर्स के कलेक्शन को पेश करने के लिए पहनती थीं, लेकिन आजकल ऐसे कपड़े आम शहरी लड़कियाँ भी पहन रही हैं। जो दिखता है, वही बिकता है' की तर्ज पर अब लड़कियाँ भी 'बिंदास बाला' की छवि में खुद को ढालती जा रही हैं और बेझिझक अपने मांसल सौंदर्य का प्रदर्शन कर लोगों की वाहवाही बटोर रही हैं। और हर जगह कहती फिरती है कि ये हमारा हक है । ठिक है हक और भी तो है , तो क्या इस हक की जरुरत ज्यादा है इनकों । ऐसे कपड़ो में घुमती फिरती है और कहती है कि "Am I Looking hot and sexy ?" और अगर आप ने हाँ कह दिया तो क्या हौसले और भी बुलंद ।

अभी कुछ दिनों पहले की बात है मै टी वी देख रहा था , की अचानक मेरी नजर इड़िया टीवी पर पड़ी और देखा किसी अदालत नामक सीरियल पर पड़ी , जहाँ एक एपिसोड में एक कटघरे में स्वामी बाबा रामदेव थे औत दूसरे कटघरे में बोलीवुड की आइटम गर्ल समंभावना सेठ और कश्मिरा शाह थी । मुद्दा चल रहा था भारतीय संस्कृति को लेकर , तो बाबा जी कह रहे थे कि ये जो आप कम कपड़ो मर डांस करती है ये अच्छा नहीं होता । इसपर समंभावना सेठ ने कहा कि बाबा अभी शर्त लगाईये , यही नाचूँ और हर मर्द खड़े होकर ताली बजाने पर मजबूर ना हो जायें तो कहिएगा । इस पर बाबा जी चुप हो गये । अब आप ही बताईये अगर वहाँ मर्द होंगे तो ऐसे नित्य पर तालियाँ तो बजेंगी ही । छोटे कपड़े पहनकर अपने बदन की सुंदरता का प्रदर्शन करना युवा लड़कियों के लिए अब एक फैशन बन गया है। जिसका बदन जितना अधिक दिखेगा उसे लोग उतना ही सुंदर व सेक्सी कहेंगे। अब लड़कियों के लिए 'सेक्सी' संबोधन एक अपशब्द नहीं बल्कि सुंदरता का पैमाना बन गया है। एक समय था जब हम और आप या कोई भी सेक्सी शब्द कहने में शर्म महशुस करता था , परन्तु एक समय आज है कि ऐसे शब्दो का प्रयोग करना मतलब इज्जत देना । फैशन शो, फिल्मी अभिनेत्रियों के कपड़े आदि सभी युवा लड़कियों को ग्लैमर के रंग में ढाल रहे हैं। कल तकमल्लिका शेरावत व राखी सावंत के छोटे कपड़े दर्शकों को आँखे मूँदने पर मजबूर करते थे परंतु आज सबसे ज्यादा माँग इन्हीं बिंदास अदाकाराओं की है। शर्म की बात है ना , जो हमारे संस्कृति को धूमिल करने मे लगा है उसकी माँग मार्केट मे सबसे ज्यादा है । कल तक हम बस फिल्मो में इन्हे देख पाते थे परन्तु अब इनकी परछाई हर जगह आसानी से दिख जाती है ।


ऐसे छोटे कपड़ो की माँग भी नित्य ही बढ़ती जा रही है , । अब आप बाजार या कपड़े की दूकानं पर जायेगे तो सबसे पहले स्कर्ट या इस प्रकार के ही छोटे कपड़े दिखेंगे । मुंबई की मायानगरी से निकलकर ग्लैमरस कपड़ों का फैशन बड़े-बड़े महानगरों तक पहुँचता जा रहा है, जहाँ शोरूम में सजने के बाद सर्वाधिक बिक्री उन्हीं कपड़ों की होती है जिनकी लंबाई कम व लुक ट्रेंडी होता है। यही नहीं महानगरों के नामी स्कूलों, कॉलेजों, एयर होस्टेस एकेडमी आदि का ड्रेस कोड ही मिनी स्कर्ट-टॉप व फ्रॉक बन गए हैं। कल तक घर-गृहस्थी संभालने वाली लड़कियाँ भी अब फैशन शो व सौंदर्य प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़कर भाग ले रही हैं और नए फैशनेबल वस्त्रों के अनुरूप अपने बदन को ढाल रही हैं। अब जब माँ अपनी बेटी को सलवार-कमीज पहनने को कहती है तो बेटी शान से कहती है कि 'माँ, अब तुम भी बदल जाओ। आज तो स्कर्ट व कैप्री का दौर है। सलवार-कमीज तो गाँव की लड़कियाँ पहनती हैं।' बुद्धि से बच्चे भले ही बड़े न हों, पर पहनावे से आजकल की किशोरियाँ अपनी उम्र से बहुत अधिक बड़ी हो गई हैं। यह सब बदलते दौर की 'फैशन' का प्रभाव है जिसने भारतीय संस्कृति की छाप को मिटाकर सिर से आँचल व पैरों से पायल को लुप्त कर दिया है ,आजकल का फैशन ही शार्ट स्कर्ट, शार्ट फ्रॉक्स आदि हैं।

जो फैशन बाजार में दिखता है, वही बिकता है। इसी तर्ज पर आज छोटे कपड़े युवतियों की पहली पसंद बन गए हैं। । भला जिस भावी पीढ़ी का नेतृत्व रिया सेन, किम शर्मा व राखी सावंत जैसी अभिनेत्रियाँ करें उस पीढ़ी की युवतियाँ पूरे शरीर को ढँकने वाले लंबे कपड़े कैसे पहन सकती हैं?

Saturday, November 21, 2009

गाली के बदले चुप रहना कितना जायज है ।।

जी हाँ आपने बिल्कुल सही सूना मुझे । गाली के बदले चुप रहना कितना सही होगा । ये एक ऐसा सवाल है जिस पर बहुत से लोगो के बहुत से मत हो सकते है । यहाँ कोई महात्मा गाधीं तो बन नहीं सकता, और न ही उनके जैसा किसी में सहनशीलता ही है । मेरा ऐसा प्रश्न पुछने का बस एक ही मकसद् है, और वह है एकदूसरे के धर्म पर प्रत्यारोपण करना । जैसा की बहुत से लोगो को मालुम है कि आजकल ब्लोग जगत में धर्म के उपर बहुत से लेख आ रहे है और काफी कुछ भड़काऊं भी लिखा जा रहा है इस लेख के अन्दर । मैं इन सबमें शामिल हूँ , इससे इनंकार नहीं किया जा सकता । मुझे ब्लोग जगत में आये हुये मुश्किल से पाँच या छ महिनें ही हुए । जब मैंने ब्लोगिगं शुरु किया था तब मैं बस सामाजिक मुद्दो पर ही लिखता था , लिखता क्या था कोशिश करता था । तब मैंने ये कभी नहीं सोचा था कि मैं धर्म से जुड़े मुद्दे पर कुछ भी लिखूँगा । समय बदल गया , मैंने भी धर्म को मुद्दा बनया और लिखना शुरु किया , बहुत से लोगो नें मेरा विरोध किया और से लोगो नें शाबासी भी दी । धर्म का मुद्दे पर लिखना मतलब विरोध का सामना करने जैसा है ।

मैंने हिन्दुत्व को लेकर कुछ लेख लिखे , जिसपर मुझे तिखी टिप्पणीयों का सामना करना पड़ा और वह जायज भी था । मैं खूद इन सबके पक्ष में कभी नहीं रहा । लेकिन आखिर कोई कब तक चुप रह सकता है । हर चीज की कोई हद सिमा होती है । लगातार हिन्दुओं के खिलाफ, हिन्दू धर्म के खिलाफ लेख लिखे जा रहे हैं, क्या ये सब देख कर कोई चुप रह सकता है ? बहुत से लोगो का कहना होता है कि आप चुप रहिए और ऐसे लेखो को नजरअन्दाज करिए । ठिक है मैं नहीं बोलता या मेरे जैसे बहुत से लोगो नें उस लेख को नहीं पढ़ा और न ही टिप्पणी दी । नतिजा क्या मिलता है सबको मालुम है । लेख ब्लोगवाणी पर सबसे उपर रहेगा , पसन्द में, सबसे ज्यादा पढे जाने में , ज्यादा टिप्पणी में । तो अब बताईये कौन पढ़ता है उन्हे कौन पसन्द और टिप्पणी देता है । और अगर आप वहाँ टिप्पणी देखते है तो शायद आप और भी निराश हो जायें। ठिक है मैं ये नहीं कहता कि ऐसे लेखो को लिखा जाना चाहिए या मै खूद इस चिज के खिलाफ हूँ । लेकिन आप जिस धर्म से है अगर उसके खिलाफ लिखा जाता है तो आप अपना बचाव तो जरुर करना चाहेंगे । मै हिन्दू हूँ , मैंने भी पहले ऐसे लेखो को नजरअन्दाज किया लेकिन कोई कब तक सह सकता है ।

कल अमृत पाल सिंह जी ने अपने ब्लोग पर एक लिखा था " अब समय आ गया है धर्मनिरपेक्षता विरोधी और साम्प्रदायिक भावना का प्रचार करने वाले ब्लागर्स एवं ब्लाग के प्रचार को खत्म करने का" पहल तो काफी अच्छी है और सराहने लायक भी है । उन्हे किसी ने मेल किया था मेरे ब्लोग को लेकर कि मैं भड़काऊं लेख लिख रहा हूँ , या मेरे जैसे बहुत से लोग हैं जो इस तरह से लिखते है । वहाँ अमृत पाल जी ने मेरा लिंक भी दिया और कहा कि ये जरुरी है ,। अच्छी बात है आपने मेरा लिंक दिया , उससे लोगो को ये तो मालुम हो जायेगा कि मैंने क्या गलत लिखा है । अमृत पाल जी भी नये है ब्लोगिंग में , लेकिन जब उन्हे ये पता है कि ऐसे बहुत से लोग है लिखने वाले तो उन्होनें बस मेरा ही लिंक क्यों दिया । भाई इन सबमें सलीम , आसिफ कारीफ , और कैरानवीं भी आते हैं , तो आप उनका भी लिंख देते तो और भी अच्छा होता ।

जनाब की चिन्ता बिल्कुल जायज है और होनी भी चाहिए । जिस तरह से हिन्दू समाज को घसिटा जा रहा है क्या वो सही या इस्लाम को घसिटा जा रहा है वो सही है । किसी भी धर्म को लेकर लिखना उसकी बुराई करना बिल्कुल सही नहीं कहा जा सकता । लेकिन बात फिर बात वहीं आकर रुक जाती है "कब तक" । इस चिज की गारंटी कौन देगा कि अगर मैं लिखना बन्द कर देता हूँ इस तरह के लेखो को तो हिन्दूओं के खिलाफ कोई नहीं लिखेगा , बताना जरा मुश्किल है। बस आपसी एकता की बात करने से कुछ नहीं हो सकता , । पता तो उन्हे चलता जो इसको महशुश करते है । और अन्त में अमृत भाई से यही कहना चाहूगा कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती ।

Thursday, November 19, 2009

फिर होगी अगले बरस मुलाकात


उनकी एक झलक पाने की ख़ातिर


हम नैन बिछाए रहते हैं,


न जाने कब वो आ जाएं


इस कारण एक आँख राह में


और दूजा काम में टिकाए रखते हैं,


इंतज़ार ख़त्म हुआ


उनका दीदार हुआ,


सोचा था जब वो मिलेंगे हमसे


दिल की बात बयाँ करेंगे,


अपने सारे जज़बात उनको बता देंगे,


हाय ये क्या गजब हुआ


जो सोचा था उसका विपरीत हुआ,


वो आए..थोड़ा सा मुस्कुराए


और कह दी उन्होने ऐसी बात


जिससे दिल को हुआ आघात,


कहा उस ज़ालिम ने


मेरा हमदम है कोई और,


मेरी मंज़िल है कोई और


बस कहने आयी थी दिल की बात


फिर होगी अगले बरस मुलाकात ।।

Tuesday, November 17, 2009

अब समय आ गया है हिन्दुविरोधी-देशद्रोही जिहाद व धर्मांतरण समर्थक सैकुलर गिरोह के भ्रामक दुष्प्रचार को खत्म करनें का

यहाँ पर यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि संसार में हिन्दू धर्म ही एकमात्र ऐसी जीवन पद्धति है जिसे किसी संप्रदाय विशेष के साथ नहीं जोड़ा जा सकता,जिसमें कभी किसी संप्रदाय विशेष को अपना शत्रु घोषित नहीं किया गया,इन्सान तो इन्सान पेड़ पौधों जीव-जन्तुओं, पशु-पक्षियों सब में भगवान के रूप को देखा गया, उनकी पूजा की गई । आज तक एक भी लड़ाई किसी पूजा पद्धति के विरोध या समर्थन में नहीं लड़ी गई । हिन्दू धर्म में किसी क्षेत्र विशेष या संप्रदाय विशेष की बात न कर सारे संसार को परिवार मानकर उसकी भलाई की बात की गई । हिन्दूधर्म के प्रचार प्रसार के लिए आज तक किसी देश या संप्रदाय विशेष पर हमला नहीं किया गया। हिन्दू जीवन पद्धति ही दुनिया में सर्वश्रेष्ठ जीवन पद्धति है। लेकिन जिसने भी मानवता के प्रतीक इस हिन्दू संस्कृति व उसे मानने वाले हिन्दुओं पर हमला किया है । इतिहास इस बात का गवाह है कि ऐसे राक्षस को पाप का घड़ा भर जाने पर अपने किए की सजा भुगतनी पड़ी है। हमारे विचार में राक्षसों के इस सैकुलर गिरोह के पापों का घड़ा भी लगभग भर चुका है। साधु-सन्तों का अपमान व भगवान राम के अस्तित्व को नकारना इस बात के पक्के प्रमाण हैं। हमने सुना था कि जब किसी राक्षस का अन्त नजदीक होता है तो उसके द्वारा किए जाने वाले पाप व अत्याचार बढ़ जाते हैं जो हमने पिछले कुछ वर्षों में देख भी लिया ।
अब सिर्फ इस धर्मनिर्पेक्षता रूपी राक्षस का अन्त देखना बाकी है इस राक्षस के खात्में के लिए कर्नल श्रीकांत पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर,सुधाकर चतुर्वेदी जी, राम जी जैसे करोड़ों प्रशिक्षित गण हमले का जबाब देकर इन आतंकवादियों व इनके समर्थक सैकुलरिस्टों का संहार करने के लिए तैयार बैठे हैं बस इंतजार है तो सेनापति के इशारे का जिस दिन ये इशारा मिल गया उसी दिन ये सब राक्षस अपनी सही जगह पर पहुँच जाँयेगे ! हम यहां पर यह सपष्ट कर देना चाहते हैं कि धर्म विहीन प्राणी मानव नहीं दानव होता है। अतः धरमनिर्पेक्षता मानव के लिए अभिशाप है क्योंकि यह मानव को दानव वना देती है। जिसका सीधा सा उदाहरण इस सेकुलर गिरोह द्वारा किए गए क्रियाकलाप हैं। इसी धर्मनिर्पेक्षता की वजह से सेकुलर गिरोह मानव जीवन के शत्रु आतंकवादियों का तो समर्थन करता है पर मर्यादापुर्षोत्तम भगवान श्री राम का विरोध ।

हम बात कर रहे थे हिन्दू धर्म की, बीच में धर्म और अधर्म के बीच होने वाले निर्णायक युद्ध के लिए बन रही भूमिका का स्वतः ही स्मरण हो आया । जो लोग हिन्दुओं को लड़वाने के लिए यह मिथ्या प्रचार करते हैं कि हिन्दू धर्म में प्राचीन समय से छुआछूत है । उनकी जानकारी के लिए हम ये प्रमाण सहित स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि बेशक हिन्दू धर्म में वर्ण व्यवस्था शुरू से रही है जो कि किसी भी समाज को व्यवस्थित ढ़ंग से चलाने के लिए जरूरी होती है पर छुआछूत 1000 वर्ष के गुलामी के काल की देन है। खासकर मुसलिम के गुलामी काल की। वर्णव्यवस्था की उत्पति के लिए दो विचार स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आते हैं------------ एक विचार यह है कि सभी वर्ण शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण भगवान के अंगो से बने । पैर से शूद्र, जंघा से वैश्य, भुजाओं से क्षत्रिय व सिर से ब्राह्मण।

अब आप सोचो कि भगवान का कौन सा अंग अछूत हो सकता है सिर ,पैर, जंघा या भुजांयें । कोई नहीं क्योंकि जिसे हम भगवान मानते हैं उसका हर अंग हमारे लिए भगवान ही है । वैसे भी हम बड़ों व साधु संतों के पैर ही पूजते हैं। अतः किसी भी हिन्दू, वर्ण, जाति को अछूत कहना भगवान को अछूत कहने के समान है और जो यह सब जानते हुए भगवान का अपमान करता है वह नरक का भागीदार बनता है। अतः यह हम सब हिन्दुओं का कर्तव्य बनता है कि हम सब हिन्दुओं तक ये सन्देश पहुँचांए और उसे नरक का भागीदार बनने से रोकें। दूसरा विचार यह है कि मनु जी के चार सन्तानें हुईं । जब बच्चे बड़े होने लगे तो मनु जी के मन में यह विचार आया कि सब कामों पर एक ही ताकतवर बच्चा कब्जा न कर ले इसलिए उन्होंने अपने चारों बच्चों को काम बांट दिए ।सबसे बड़े को सबको शिक्षा का जिसे ब्राह्मण कहा गया। उससे छोटे को सबकी रक्षा का जिसे क्षत्रिय कहा गया। तीसरे को खेतीबाड़ी कर सबके लिए भोजन पैदा करने का जिसे वैश्य कहा गया। चौथे को सबकी सेवा करने का जिसे शूद्र कहा गया ।
अब आप ही फैसला करो कि जब चारों भाईयों का पिता एक, चारों का खून एक, फिर कौन शुद्ध और कौन अशुद्ध ,कौन छूत कौन अछूत ? यह एक परम सत्य है कि संसार में कोई भी काम छोटा या बडा , शुद्ध या अशुद्ध नहीं होता । फिर भी हम सेवा के काम पर चर्चा करते हैं और सेवा में भी उस काम की जिसे साफ-सफाई कहा जाता है जिसमें शौच उठाना भी जोड़ा जा सकता है ।(हालांकि भारत मे शौच घर से दूर खुली जगह पर किया जाता था इसलिए उठाने की प्रथा नहीं थी ये भी गुलामी काल की देन है ) आगे जो बात हम लिखने जा रहे हैं हो सकता है माडर्न लोगों को यह समझ न आए । अब जरा एक हिन्दू घर की ओर ध्यान दो और सोचो कि घर में सेवा का काम कौन करता है आपको ध्यान आया की नहीं ? हाँ बिल्कुल ठीक समझे आप हर घर में साफ-सफाई का काम माँ ही करती है और बच्चे का मल कौन उठाता है ? हाँ बिल्कुल ठीक समझे आप हर घर में माँ ही मल उठाती है । मल ही क्यों गोबर भी उठाती है और रोटी कौन बनाता है वो भी माँ ही बनाती है । उस मल उठाने वाली माँ के हाथों बनाई रोटी को खाता कौन है। हम सभी खाते हैं क्यों खाते हैं वो तो गंदी है-अछूत है ? क्या हुआ बुरा लगा न कि जो हमें जन्म देती है पाल पोस कर बढ़ा करती है भला वो शौच उठाने से गन्दी कैसे हो सकती है ? जिस तरह माँ साफ-सफाई करने से या शौच उठाने से गंदी या अछूत नहीं हो जाती पवित्र ही रहती है। ठीक इसी तरह मैला ढोने से या साफ-सफाई करने से कोई हिन्दू अपवित्र नहीं हो जाता । अगर ये सब कर मां अछूत हो जाती है तो उसके बच्चे भी अछूत ही पैदा होंगे फिर तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र सभी अछूत हैं और जब सभी अछूत हैं तो भी तो सभी भाई हैं भाईयों के बीच छुआछूत कैसी ? कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि कोई हिन्दू न छोटा है न बढ़ा सब हिन्दू एक समान हैं कोई अछूत नहीं इसीलिए कहा गया है कि-

न हिन्दू पतितो भवेत

कोई हिन्दू पतित नहीं होता और जो हिन्दू दूसरे हिन्दू को पतित प्रचारित करता है वो हिन्दुओं का हितैषी नहीं विरोधी है और जो हिन्दुओं का विरोधी है वो हिन्दू कैसा ? हमें उन बेसमझों पर बढ़ा तरस आता है जो गाय हत्या व हिन्दुओं के कत्ल के दोषियों (जो न हमारे देश के न खून के न हमारी सभ्यता और संस्कृति के) को अपना भाई बताते हैं और उन को जिनका देश अपना, संस्कृति अपनी और तो और जिनका खून भी अपना, को अछूत मानकर पाप के भागीदार बनते हैं ।

उनकी जानकारी के लिए हम बता दें कि हिन्दुओं के कातिलों आक्रमणकारी मुसलमानों व ईसाईयों को भाई कहना व अपने खून के भाईयों को अछूत अपने आप में ही इस बात का सबसे बढ़ा प्रमाण है कि ये छुआछूत इन मुसलमानों व ईसाईयों की गुलामी का ही परिणाम है क्योंकि अगर हिन्दूसमाज इस तरह के भेदभाव का समर्थक होता तो सबसे ज्यादा छुआछूत इन कातिलों से होती न कि अपने ही खून के भाईयों से । इस गुलामी के काल में जिस तरह हर वर्ण के कुछ जयचन्द, जैसे सैकुलर स्वार्थी हिन्दुओं ने इन साम्राज्यवादी ,अग्निबेश जैसे हिन्दुओं ने मातृभूमि व हिन्दुओं के विरूद्ध काम करते हुए समाज के अन्दर इन दुष्टों के दबाव या लालच में आकर अनेक भ्राँतियां फैलाई छुआछूत भी उन्हीं में से एक है। पर इस हिन्दुविरोधी देशद्रोही जिहाद व धर्मांतरण समर्थक गिरोह ने हिन्दुओं को आपस में लड़वाने के लिए इतना जहर फैलाया है कि एक पोस्टर पर बाबा भीमराव अम्बेडकर जी का नाम न छापने पर आज एक हिन्दू दूसरे हिन्दू पर इतना तगड़ा प्रहार करता है कि एक दूसरे के खून के प्यासे सगे भाईयों को देखकर रूह काँप उठती है । ये लोग यह भूल जाते हैं कि बाबा जी सब हिन्दुओं के हैं किसी एक वर्ग के नहीं । ये वही बाबा भीमराव अम्बेडकर जी हैं जिन्होंने अंग्रेज ईसाईयों के हिन्दुओं को दोफाड़ करने के सब षड्यन्त्रों को असफल कर दिया था।

हम जानते हैं कि धर्मांतरण के दलालों द्वारा लगाई गई आग को सिर्फ एक दो प्रमाणों से नहीं बुझाया जा सकता क्योंकि इस हिन्दुविरोधी गिरोह का मकसद सारे हिन्दू समाज को इस आग में झुलसाकर राख कर देना है । यही तो इस देशद्रोही गिरोह की योजना है कि हिन्दुओं के मतभेदों को इतना उछालो कि उनमें एक दूसरे के प्रति वैमनस्य का भाव इतना तीव्र हो कि वो राष्ट्रहित हिन्दूहित में भी एक साथ न आ सकें । यह हम सब हिन्दुओं शूद्र, क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य का आज पहला कर्तव्य होना चाहिए कि गुलामी काल से पहले के हिन्दू एकता के प्रमाणों को संजोकर व वर्तमान में हिन्दूएकता के प्रमाणों को उजागर कर इस हिन्दुविरोधी षड़यन्त्र को असफल करें। जिहादियों व धर्मांतरण के दलालों द्वारा हिन्दुओं पर थोपे गये इस युद्ध को निर्णायक युद्ध की तरह लड़कर अपनी ऋषियों-मुनियों मानव सभ्यता की भूमि भारत को इन पापियों से मुक्त करवाकर राम राज्य की स्थापना करें । अपने हिन्दूराष्ट्र भारत को विकास के पथ पर आगे बढ़ाकर गरीब से गरीब हिन्दू तक विकास का लाभ पहुँचायें व उसे शांति व निर्भीकता से जीने का अवसर प्रदान करें जो इन असुरों के रहते सम्भव नहीं। वैसे भी किसी ने क्या खूब कहा है- मरना भला है उनका जो अपने लिए जिए। जीते हैं मर कर भी वो जो शहीद हो गए कौंम के लिए।। जिस छुआछूत की बात आज कुछ बेसमझ करते हैं उसके अनुसार ब्राह्मण सबसे शुद्ध , क्षत्रिय थोड़ा कम, वैश्य उससे कम, शूद्र सबसे कम।चलो थोड़ी देर के लिए यह मान लेते हैं कि यह व्यवस्था आदि काल से प्रचलित है। तो क्योंकि क्षत्रिय ब्राह्मण से अशुद्ध है तो फिर ब्राह्मण क्षत्रिय की पूजा नहीं कर सकते हैं पर सच्चाई इसके विपरीत है मर्यादा पुर्षोतम भगवान श्री राम क्षत्रिय हैं पर सारे ब्राह्मण अन्य वर्णों की तरह ही उन्हें भगवान मानते हैं उनकी पूजा करते हैं। भगवान श्री कृष्ण ब्राह्मण थे क्या ? जो सारे हिन्दू उनकी पूजा करते हैं। सब हिन्दू उनको भगवान मानते हैं उनकी पूजा करते हैं। ये सत्य है पर वो ब्राह्मण नहीं वैश्य वर्ण से सबन्ध रखते हैं फिर तो ब्राह्मण और क्षत्रिय उनसे शुद्ध हैं उनकी पूजा कैसे कर करते हैं ? ब्राह्मण और क्षत्रिय उनकी पूजा करते हैं ये सत्य है इसे देखा जा सकता है। अतः इस सारी चर्चा से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि वर्ण व्यवस्था एक सच्चाई है पर ये शुद्ध अशुद्ध वाली अवधारणा गलत है और आदिकाल से प्रचलित नहीं है ये गुलामी काल की देन है।अगर ये आदिकाल से प्रचलित होती तो मर्यादा पुर्षोतम भगवान श्री राम भीलनी को माँ कहकर न पुकारते न ही उनके जूठे बेर खाते । अतः जो भी हिन्दू इस शुद्ध-अशुद्ध की अवधारणा में विश्वास करता है वो अज्ञानी है बेसमझ है उसे सही ज्ञान देकर हिन्दू-एकता के इस सिद्धान्त को मानने के लिए प्रेरित करना हम सब जागरूक हिन्दुओं का ध्येय होना चाहिए और जो इस ध्येय से सहमत नहीं उसे राष्ट्रवादी होने का दावा नहीं करना चाहिए।

अब जरा वर्तमान में अपने समाज में प्रचलित कार्यक्रमों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं । इस हिन्दुविरोधी देशद्रोही जिहाद व धर्मांतरण समर्थक गिरोह के इतने तीव्र दुष्प्रचार व विभाजनकारी षड्यन्त्रों के बावजूद आज भी जब किसी हिन्दू के घर में शादी होती है तो सब वर्ण उसे मिलजुलकर पूरा करते हैं। आज भी ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य, शूद्र में से किसी के भी घर में शादी यज्ञ या अन्य कार्यक्रमों के दौरान भोजन जिस बर्तन में रखा जाता है या जिस बर्तन में भोजन किया जाता है उसे उस हिन्दू भाई द्वारा बनाया जाता है जिसे इस शुद्ध-अशुद्ध की अवधारणा के अनुसार कुछ शूद्र भी अशुद्ध मानते हैं। यहां तक कि अधिकतर घरों में आज भी रोटियां उसी के बनाए बर्तन में रखी जाती हैं दूल्हे की सबसे बड़ी पहचान मुकुट(सेहरा) तक शूद्र हिन्दू भाई द्वारा ही बान्धा जाता है और तो और बारात में सबसे आगे भी शूद्र ही चलते हैं यहां तक कि किसी बच्चे के दांत उल्टे आने पर शूद्र को ही विधिवत भाई बनाया जाता है । अगर शूद्र को आदिकाल से ही अछूत माना जाता होता वो भी इतना अछूत कि उसकी परछांयी तक पड़ना अशुभ माना जाता होता तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, सब शूद्र के बनाए बर्तन में न खाना खाते ,न शूद्र द्वारा मुकुट बांधा जाता,न बारात में शूद्र को सबसे आगे चलाया जाता और न ही शादियों में हिन्दू समाज का ये मिलाजुला स्बरूप दिखता जो इस शुद्ध-अशुद्ध की अवधारणा को पूरी तरह गलत सिद्ध करता है ,हां वर्तमान में जो हिन्दूएकता के सिद्धांत के विपरीत एक ही वर्ण में या विभिन्न वर्णों के बीच कुछ कुरीतियां दिखती हैं । उन्हें हिन्दूसमाज को यथाशीघ्र बिना कोई वक्त गवाए दूर करना है और हिन्दूएकता के इस सिद्धांत को हर घर हर जन तक पहुँचाना है। दिखाबे के लिए नहीं दिल से- मन से क्योंकि किसी भी हिन्दू को अशुद्ध कहना न केवल हिन्दुत्व की आत्मा के विरूद्ध है बल्कि भगवान का भी अपमान है ।

काम बहुत आसान है अगर दिल से समझा जाए तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को सुपिरियोरिटी कम्पलैक्स(बड़प्पन) व शूद्र को इनफिरियोरिटी कम्पलैक्स(हीन भावना) का भाव दूर कर अपनी उत्पति को ध्यान में रख कर अपनी असलिएत को पहचाहना होगा याद रखना होगा कि हमारा खून एक है । जिस तरह हमारी मां सेवा का काम कर अछूत नहीं हो सकती ठीक इसी तरह कोई शूद्र भाई भी अछूत नहीं हो सकता। हम सब हिन्दू एक हैं भाई-भाई हैं। एक-दूसरे का अपमान भगवान का अपमान है। अब वक्त आ गया है कि सब हिन्दू इस हिन्दुविरोधी-देशद्रोही जिहाद व धर्मांतरण समर्थक सैकुलर गिरोह के भ्रामक दुष्प्रचार का शिकार होकर इन हिन्दूविरोधियों के हाथों तिल-तिल कर मरने के बजाए एकजुट होकर जंगे मैदान में कूदकर अपने आपको हिन्दूराष्ट्र भारत की रक्षा के लिए समर्पित कर दें । वरना वो दिन दूर नहीं जब हिन्दू अफगानिस्तान, बांगलादेश, पाकिस्तान की तरह वर्तमान हिन्दूराष्ट्र भारत से भी बेदखल कर दिए जांए जैसे कश्मीर घाटी से कर दिए गये और मरने व दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर होंगे।

आभार http://samrastamunch.spaces.live.com

Saturday, November 14, 2009

सावधान! " आपके शरीर में "काकटेल" जहर है "

क्या आपको पता है हम और आप नित्य ही जहर का सेवन करते हे, । आप लोग सोच रहें होंगे कि ये कैसे हो सकता है। अगर हम नित्य जहर खाते तो मर नहीं जाते क्या ? बात तो सही है, जिस जहर का सेवन हम नित्य कर रहे है वह हमें इतने आसानी से थोड़ीं न मरने देगा। श्रृष्टि के आंरभ से ही भोजन की एक अनिवार्य आवश्यकता रही है। मानव के लिए ही नहीं, पशु-पक्षियों एंव वनस्पतियों के लिए। प्राचिनकाल में मनुष्य शिलाग्रहों (गुफाओं) में निवास करते थे, । पशु पक्षियों का माश भी उनके उदरपोषण का साधन था। वैदिक युग में कृषि की शुरुआत हुई। वैदिक सूक्तों में कृषि तथा अन्न से संबधित इंद्र, वरुण अग्नि आदि देवो की प्रार्थना विशद् रुप से वर्णित है। आज प्रत्येक खाद्दपदार्थो में कीटनाशक एंव दूसरे हानिकारक पदार्थ पाये जा रहे हैं। डिब्बाबंद भोजन, बोतलबंद पेय यहाँ तक कि रोटी, दाल, चावल एंव सब्कियाँ भी हानिकारक जहर से नहीं बच पा रही है। हमारा पूरा खान-पान इतना जहरीला हो गया है कि हमारे अपने शरिर में भी कीटनाशकों की खासी मात्रा जमा होती जा रही है।
अधिक पैदावार के लिए कीटनाशक दवाओं के अंधाधुंध प्रयोग के कारण हमारे शरीर में एक अनोखी विष "काकटेल" इकट्ठी होती जा रही है। सामान्यतः कीटनाशक दवाओं का छिड़काव उचित रीति से नहीं किया जाता, परिणामस्वरुप अस्सी से नब्बे पतिशत कीटनाशक कीटों को मारने की बजाय फसंलो पर चिपक जाते है या फिर आस-पास की मिट्टी पर इक्टठे हो जाते है। जिस पर से इनकों हटाने का कोई प्रयास नहीं किया जाता हैं। मांसपेशियों एवं चरबी में जहर इकत्रित होता रहता है या फिर खून में मिलकर धीमें-धीमें जहर के रुप में कार्य करता है और अनेकं बीमारियों को जन्म देता है।
कीटनाशक दवाँ कैसंर और ट्यूमर को बढ़ावा देती है, जबकि कुछ सीधे दिमाग और इससे जुड़ी तंत्रिकाओंपर प्रहार करती है। दौरे पड़ना, दिमाग चकराना और याददाश्त की कमंजोरी जैसे लक्षण कीटनाशक दवाओं के कारण हो सकते हे। कुछ किटनाशक दवाईयाँ शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को भी समाप्त कर देती है। कुछ हारमोन बनाने वाले ग्रंथियों पर चोट करके शरीर की सारी गतिविधियों में उलट-फेर कर देती है।

कीटनाशको के इतने खतरनाक परिणामो के बाद भी इसका उपयोग बिना किसी अवरोध के व्यापक मात्रा में किया जा रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् द्वारा करवाए गये एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार गाय-भैंस के दूध के लगभग वाईस सौ नमूनो में से 82% मे तथा शिशुओ के डिब्बाबंद आहार के बीस व्यावसायिक ब्राड़ों के १८० नमूनें मेम 70% में डी.डी.टी. अवशेष रुप में मौजूद था। बोतलबंद पानी में किटनाशको की मात्रा स्वीकार्य सीमा से 15% अधिक थी। रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ गेहूँ और चावल के द्वारा हम प्रतिदिन कोई आधा मिली ग्राम (.5mg) डी.डी.टी. और बी.एच.सी खा जाते है। सबसे ज्यादा कीटनाशक हम सब्जियों के द्वारा अपने शरीर में पहुचाते हैं। बैगन को चमकदार बनाने के लिए कार्बोफ्यूरान में डुबाया जाता है। गोभी को चमकदार सफेदी देने के लिए मेथिलपैराथियान डाला जाता है। इसी तरह भिंडी तथा परवल को चमकीला हरा बनाने के लिए कापर सल्फेट और मैलाथियान का इस्तेमाल किया जाता है, जो की हमारे शरीर के लिए जहर का काम करती है। कीटनाशको के बाद हमारे शरीर को सबसे ज्यादा नुकसान आर्सेनिक, कैडियम, सीसा, ताँबा, जिंक और पारा जैसी धातुओं से है। फलों, सब्जियों, मसालों आदि से लेकर शिशु आहार तक ये पर्याप्त मात्रा में पाये जाते है।

दिल्ली विश्वविद्दालय और वाराणसी हिंदू विश्वविद्दालया द्वारा किए गये सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार सब्जियों में सीसे की मात्रा स्वीकार्य सीमा मात्रा से 73% ज्यादा पाई गयी । रिपोर्ट के अनुसार, सब्जियों को बहुत अच्छी तरह पर भी इनके जहरीलेपन को सिर्फ 55% तक ही कम किया जा सकता है। सीसा की अधिकता गुरदा खराब करनेण के अलावा उच्च रक्तचाप भी पैदा करती है। इसका सबसे खतरनाक असर बच्चो के मस्तिष्क पर पड़ता है। सिसायुक्त आहार का सेवन करनेसे बच्चो की बुद्धि का विकास अवरुद्ध हो जाता है, । साथ ही उनकीं बुद्धि मंद पड़ने लगती है। बच्चो की मनपसंद चाकलेट भी खतरे से खाली नहीं है। इसमें मौजूद निकिल त्वचा का कैंसर पैदा करता है। यदि डिब्बा प्लासटिक का है तो यह खतरा और बढ़ जाता है , क्योकिं प्लास्टिक धीरे-धीरे जहरीले रसायन छोड़ता है। प्लास्टिक में मौजूद थेलेन वर्ग के रसायन शरीर के हारमोन संतुलन को तहस नहस कर देते है।

मांसाहार तो शाकाहार से और भी खतरनाक स्थिति में पहुँच चुका है। मांस पर ब्लीचिंग पाउडर लपेट दिया जाता है, ताकि पानि सूखने से मांस का वजन कम न हो जाए। इसी तरह से खून के बहाव पर रोक लगाने के लिए कापर सल्फेट का इस्तेमाल किया जाता है। मछलियों में चमकदार ताजगी लंबे समय तक बनाये रखने के लिए अमोनियम सल्फेट में डुबाया जाता है। इस प्रकार मांसाहार यो तो खतरनाक है ही। अब वह विषयुक्त हो गया है। साथ ही खाद्दपदार्थो मे मिलाये गये कृत्रिम रंग भी शरीर के लिए खतरनाक होते है, तथा बहुत से रोगो का कारण भी बनते है। हमारे शरीर में घुलते-मिलते इस जहर से बचाव का एक ही उपाय है कि हम अपनी प्राचिन पद्धति को पुनः अपनाएँ। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम अनियमित अनुचित खान पान से बचकर ही अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं।

Tuesday, November 10, 2009

गाय काटने वालो का क्यों ना सर कलम कर दिया जाये


" गाय " जिसे हमारे धर्म (हिन्दू) में माता का दर्जा प्राप्त है। अब माता क्यों कहा जाता है ये सबको पता है। भारत कि गौरवशाली परंपरा में गाय का स्थान सबसे ऊँचा और अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा है। गाय माता की महिमा पर महाभारत में एक कथा आती है। यह कथा रघुकुल के राजा नहुष और महर्षि च्यवन की है, जिसे भीष्म पितामह मे महाराजा युधिष्ठिर को सुनाया था।

महर्षि च्यवन जलकल्प करनें के लिए जल में समाधि लगाये बैठे थे। एक दिंन मछुआरों ने उसी स्थान पर मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल फेंका। जाल में मछलियों के साथ महर्षि च्यवन भी समाधि लगाये खिंचे चले आयें, उनको देखकर मछुआरों ने उनसे माफी मांगी। और उन्होने कहा की ये सब गलती से हो गया। तब महर्षि च्यवन ने कहा " यदि ये मछलियाँ जिएँगी तो मै भी जीवन धारण करुँगा अन्यथा नहीं। तब ये बात वहाँ के राजा नहुष के पास पहुची, राजा नहुष वहा अपने मंत्रीमण्डल के साथ तत्काल पहुचे और कहा

" अर्धं राज्यं च मूल्यं नाहार्मि पार्थिव।
सदृशं दीयतां मूल्यमृषिभिः सह चिंत्यताम।।

अनर्घेया महाराजा द्विजा वर्णेषु चित्तमाः ।
गावश्चय पुरुषव्याघ्र गौर्मूल्यं परिकल्प्यतम्।।

हे पार्थिव आपका आधा या संपूर्ण राज्य भी मेरा मूल्य नहीं दे सकता। अतः आप ऋषियो से विचार कर मेरा उचित मूल्य दीजिए। तब राजा नहुष ने ऋषियो से पुछा तब ऋषियों ने राजा बताया कि गौ माता का कोई मूल्य नहीं है अतः आप गौदान करके महर्षि को खुश कर दीजिए। राजा ने ऐसा ही किया और तब महर्षि च्यवन ने कहा

" उत्तिष्ठाम्येष राजेंद्र सम्यक् क्रीतोSस्मि तेSनघ।
गोभिस्तुल्यं न पश्यामि धनं किंचिदिहाच्युत।।

हे राजन अब मैं उठता हूँ। आपने ने मेरा उचित मूल्य देकर मुझे खरीद लिया है। क्योंकि इस संसार मे गाय से बढ़कर कोई और धन नहीं है। भारत में वैदिक काल से ही गाय को माता के समान समझा जाता रहा। गाय कि रक्षा करना, पोषण करना एवं पुजा करना भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा । वेदो मे कहा गया है कि पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों का आधार भी गाय को माना जाता है।
इतना कुछ होने के बावजुद गाय के मांसो का बड़ा व्यापार भारत व उससे बाहर हो रहा है। और हम मजबुर वस अपनी माँ को कटते देख रहे है और कुछ भी नहीं कर पा रहे है। जिस तरह से इनको सरेआम काटा जा रहा ठीक वैसे ही इनको काटने वालो का सर कलम कर दिया जाना चाहिये। ताकी कोई ऐसी घिनौनी हरकत ना कर सके।

भारत मे गायों की सख्या व उनकी खत्म होती नस्ले इस बात का सबुत है कि किस तरह से उनको देश के बाहर भोजन स्वरुप भेजा रहा है। खाद्यान्न उत्पादन आज भी गो वंश पर आधारित है। आजादी तक देश में गो वंश की 80 नस्ल थी जो घटकर 32 रह गई है। यदि गाय को नही बचाया तो संकट आ जाएगा क्योंकि गाय से ग्राम और ग्राम से ही भारत है। १९४७ में एक हजार भारतीयों पर ४३० गोवंश उपलब्ध थे। २००१ में यह आँकड़ा घटकर ११० हो गयी और २०११ में यह आँकड़ा घटकर २० गोवंश प्रति एक हजार व्यक्ति हो जाने का अनुमान है। इससे ये अन्दाजा लगाया जा सकता है कि जिसे हम माँ कहते है उनका क्या हाल है।
गाय पुराने समाज के लिये पशु नहीं था... वह हमारी धरती पर खड़ी जीवित देवशक्ति थी... बल्कि समस्त देवताओं की आभा लिये उन्हीं अव्यक्त सत्ताओं की प्रतिनिधि थी। उस गाय को काटने-मारने के कारण ही यह भारत राष्ट्र इतनी मेधा-प्रतिभा और संसाधनों, श्री-समृद्धि के स्रोतों के बावजूद यदि गरिब तो यह उसी गो-माता का शाप है.हमारा सहस्त्रों वर्षो का चिन्तन, हमारे योगी, तापस, विद्यायें सब लुप्त हो गये... और जो कबाड़ शेष बचा है वही समाज के सब मंचों पर खड़ा होकर राश्ट्र का प्रतिनिधि बन बैठा है। प्रतिभा अपमानित है, जुगाड़ और जातियों के बैल राष्ट्र को विचार के सभी स्तरों पर हांक रहे हैं, गाय को काटने वालों ने भारतीय समाज की आत्मा को ही बीच से काट डाला है गाय के कटने पर हमारा ‘शीश’ कट कर गिर पड़ा है. हम जीवित हिन्दू उस गाय के बिना कबन्ध हैं, इस कबन्ध के लिये ही मारा-मारी में जुटे हैं अपराध, भ्रष्टाचार और राजनीति का दलिद्दर चेहरा ऐसे ही कबन्ध रूपी समाज में चल सकता था... वरना आज यदि उस गो-माता के सींग का भय होता... तो आपकी गृहलक्ष्मी आपको बताती कि भ्रष्टाचार और दलिद्दर विचारों के साथ आप आंगन में कैसे प्रवेश कर सकते हैं ।

जब कोई हमारी माँ को इस बर्बरता से काट से सकते है तो हम उनका सर क्यो कलम नहीं कर सकते जो हमारी जनंनी को हमसे छिनने की कोशिश कर रहा है। आखिर कब तक हम यूँ ही देखते रहेंगे , कब तक ? कहीं ऐसा ना हो कि बहुत देर हो चुकी हो, अब समय आ गया है उठ खड़े होने का। और इस लड़ाई में सबसे आगे हिन्दुओं को होना चाहिए, क्योंकी ये खिलवाड़ हमारे अस्मत के साथ हो रही है। हमे किसी और का इन्तजार नहीं करना चाहिए। यूरोप में मांस की अत्यधिक मांग होने के कारण, अंग्रेज विचारक चील-कौवों की तरह गाय के चारों ओर मंडराने लगे। गो-धन को समाप्त करने के लिये उन्होंने अंग्रेजी स्कूलों से शिक्षा प्राप्त नीति निर्धारकों, इन फाइल-माफियाओं को फैक्ट्री दर्शन के पाठ पढ़ाये... अनाज की कमी का भय दिखाकर रासायनिक-खाद की फैक्ट्रियां लगीं, दूध की कमी का रोना रोकर दूध के डिब्बे फैक्ट्रियों में तैयार होने लगे, घी, मक्खन सभी कुछ डिब्बा बन्द... ताकि गो-मांस को निर्बाध निर्यात किया जा सके शहरों में रहने वाले मध्यमवर्ग ने इन उत्पादों की चमक के कारण गाय के शरीर से आंखें फेरलीं । वह गोबर, गोमूत्र को भूलता चला गया और देश में गाय सहित हजारों पशुओं को काटने वाले कत्लगाह खुलने पर ऋषियों के पुत्र एक शब्द नहीं बोले. वे इन दूध के डिब्बों से एक चम्मच पाउडर निकाल कर चाय की चुस्कियां भर कर अंग्रेजी अखबार पढ़ते रहे ।
यूरोप से आयातित मांसल सभ्यता के अचार पर चटकारें मारते रहे , और गो-माता हमारे जीवन से अदश्य हो गयी क्योंकि गोबर की जगह यूरिया की बोरियों ने ले ली, बैल की घन्टियों की जगह कृशि जीवन को आक्रान्त करने वाले ट्रैक्टर आ गये तर्क है कि अनाज की कमी पूरी हो गयी ।. यदि हम यूरिया के कारण आत्म निर्भर हैं तो हमारा किसान आत्महत्या क्यों कर रहा है? गेहूँ आयात क्यों किया जा रहा है...? आप के बन्दर मुखी बुद्धिजीवी जब मंहगें होटलों में बैठकर ये जो ‘जैविक-जैविक’ का जप करते रहे हैं, क्या उनके गालों पर झापड़ रसीद की जाय...? यूरोप-अमेरिका कब तक हमें मूर्ख बनायेगा...? हमारी ही गायों को उबाल कर खाने वाले ये दैत्य, हमें ही प्रकृति से जुड़ने की शिक्षायें देते हैं, खेती-जंगल-जल से पवित्र सम्बन्ध रखने वाले भारतीय समाज की ऐसी-तैसी करके भाई लोग पर्यावरण पर उस समाज को शिक्षायें देते हैं। जिनके जीवन में ‘गाय’ की पूछ पकड़े बिना मुक्ति की कामना नहीं, पेड़ जिनके धार्मिक-चिह्न है, नदियाँ जिनकी मां हैं, जहाँ घाटों, नदियों, गायों के व्यक्तियों की तरह नाम हैं, ताकि उनके न रहने पर, समाज में उनकी स्मृति बनी रहे, उस वृद्ध और घाघ समाज को सेमिनारों में पाठ पढाये जा रहे हैं... वो भी हमारे ही खर्चे पर... हद है। गो-माता जब से पशु बनी तभी से हम भारतीयों का समाज भी कबन्ध हो गया है गाय, इस भौतिक जगत और अव्यक्त सत्ता के बीच खड़ा जीवित माध्यम है, उस विराट के समझने का प्रवेषद्वार है जो लोग, जो सभ्यतायें, जो धर्म, गाय को मार-काट कर खा-पका रहे हैं, वे प्रभु और अपने बीच के माध्यम को जड़ बना रहे हैं। वे जीवित धर्म का ध्वंश कर रहे हैं, अब चाहे वे धर्म के नाम पर जितनी बड़ी अट्टालिकायें गुंबद बना लें, वे परमात्मा की कृपा से तब तक वंचित रहेंगें, जब तक वे गाय को अध्यात्मिक दृश्टि से नहीं देखेगें वैसे विटामिन, प्रोटीन और पौश्टिकता से भरे तो कई डिब्बे, और कैप्सूल बाजार में उपलब्ध हैं। यदि ऋषियों ने भौतिक-रासायनिक गुणों के कारण गाय को पूजनीय माना होता, तो हिन्दू आज इन दूध के डिब्बों, कैप्सूलों की भी पूजा कर रहा होता विज्ञान वही नहीं है जो अमेरिका में है, विज्ञान का नब्बे प्रतिशत तो अभी अव्यक्त है, अविश्कृत होना है, हमने अन्तर्यात्रायें कर के उसकी झलक सभ्य संसार को दिखाई थी, असभ्यों ने वो समस्त पोथी-पुस्तक ही जला दिये... गाय बची है... उस माता की पूंछ ही वह आखिरी आशा है जिसे पकड़ कर हम पुनः महाविराट सत्ता का अनावरण कर सकते हैं ।

विदेशो में तो गायो के मांस का व्यापार तो हो ही रहा है, लेकिन बड़े दुःख की बात ये है कि हमारे देश मे भी ये धड़ल्ले से हो रहे है, पीलीभीत जो की उत्तर प्रदेश के अन्तर्गत आता है जो मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र माना जाता है। । वहा इस साल केवल दो महिनें मे (मार्च और अप्रैल) में पाँच सौ से ज्यादा गायो की बली दी गयी इस बात की जानकारीं सरकार को भी दी गयी लेकिन सरकार हाथ पे हाथ रखकर हम हिन्दुओं के साथ खिलवाड़ कर रही है। ब्रिटिश एयरवेज का भारत में बहुत बड़ा व्यापार है ये सबको को मालुम है। इसमें खाने मेन्यू में गाय के मांस को चाव से परोसा जा रहा है, और जब इसका विरोध किया गया तो ब्रटिश एयरवेज वालो ने गाय मांस को इकोनामिक क्लास से हटा दिया, परन्तु फर्स्ट और क्लब वर्ल्ड में गोमांस अब भी परोसे जा रहे है, जो की बड़े दुःख की बात है। ये तो बात रही देश की, अब जरा हम अपने आस पास देखते है जहाँ हमारे माँ को कैसे बेचा जा रहा है। बाजार मे मिलने वाले सौन्दर्य प्रसाधनों में ज्यादातर गाय मांस का प्रयोग किया जाता है। ग्लिसरिन और पेपसिन आप और हम सभी जानते हैं, और इसका प्रयोग सौन्दर्य प्रसाधनो में सबसे ज्यादा किया जाता है। ग्लिसरिन और पेपसिन का ही रुप है जेलेटिन । गाय के मांस और खाल को उबाला जाता है और जो चिकना पदार्थ निकलता है उसे जिलेटिन कहते है, और जिलेटिन के निचले सतह को ग्लिसरिन कहा जाता है। ग्लिसरिन का कारोबार हमारे देश में जोरो से चल रहा है। तो जाहिर सी बात है मांसो के लिए गायो को काटा जाता है। मुसलमानो के यहाँ बकरीद के अवसर पर अब भी गायो की बली दी जाती है। सबसे ज्यादा गायों को पाकिस्तान , अफगानिस्तान और अरब देशो में काटा जाता है। जबकि अरब जहाँ इस्लाम का जन्म हुआ है वहाँ गायों को काटना अनिवार्य है । भारत में भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष से रुप से बकरीद के दिनं गायो को काटा जाता है, और प्रशासन कुछ नहीं करती । जबकि पहले मुगल शासक बाबर ने गो ह्त्या पर पाबंदी लगा दी थी और अपने बेटे हुमायूं को भी गाय न काटने की सलाह दी थी।
गावो विश्ववस्य मातरः।

भारतीय चिंतनपद्धति में, चाहे वह किसी भी पंथ या मान्यता से अनुप्राणित हो, गाय को आदिकाल से ही पुज्यनीय माना गया हैं, और उसके बध को को महापाप समझा जाता रहा है। वेदो, शास्त्रों, एव पुराणो के अलावा कुरान, बाइबिल, गुरुग्रन्थं साहिब तथा जैन एंव बौद्ध धर्मग्रन्थों में भी गाय को मारना मनुष्य को मारने जैसा समझा जाता है। कुरान में आया है कि गाय की कुर्बानी इस्लाम धर्म कर खिलाफ है। इस प्रकार देखा जाये तो सभी धर्मों नें गाय की महत्ता को समान रुप से सर्वोपरि माना है। लेकिन इन सबके बावजुद कुछ निकम्मे व कूठिंत सोच वाले लोग है जो की कहते है बिना गाय की बली दिये हुए त्योहार अधुरा रह जाता है। ये वे समय है जब हमे जैसा को तैसा वाला नियम अपनाना पड़ेगा, अन्यथा इसका परिणाम क्या होगा ये हम सब अनुमानित कर सकते है। कहीं ऐसा ना हो कि जिसे हम माता कहके बुलाते है वह बस तस्विर बनकर ही रह जाये आने वाले समयं में। गौ माता की रक्षा भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म के गौरव व आत्म सम्मान की रक्षा का अभिन्न अंग है। यह अजीब विडंबना है कि कि जब तक हमारे परंपरागत ज्ञान को को पश्चिमी दुनिया व अन्य धर्म वाले मान्यता नहीं दते, हम सकुचाये- से रहते हैं और अन्य धर्म के विचारकों द्वारा उसे स्वीकार करते ही मान लेते है। हम जो सो रहे, हमारे आखों मे पट्टी नुमा बेड़िया पड़ी है, उसे अब निकाल फेकना होगा और निर्णय लेना पड़ेगा। गौ माता की रक्षा लिए हमें संकल्प लेना पड़ेगा। हिन्दू धर्म, बल्कि समूची मानव जाति के विकास के लिए गौ माता की रक्षा को परम कर्तव्य बनाना पड़ेगा।