Sunday, December 26, 2010

नारी उत्थान में निहित भारत विकास-------------मिथिलेश दुबे

नारी के महान बलिदान योगदान के कारण ही भारत प्राचीन में समपन्न और विकसित था . प्राचीन काल में नर-नारी के मध्य कोई भेद नहीं था और नारियां पुरुषों के समकक्ष चला करती थी फिर चाहे वह पारिवारिक क्षेत्र हो या धर्म , ज्ञान विज्ञानं या कोई अन्य , सर्वांगीण विकास और उत्थान में नारी का योगदान बराबर था . नारी न सिर्फ सर्वांगीण विकास में सहायक थी पुरुष को दिशा और बल भी प्रदान करती थी . भारत के विकास में नारी योगदान अविस्मरणीय है. शायद इनके योगदान बिना भारत के विकास का आधार ही न खड़ा हो पता . इतिहास में भी नारी का लम्बा हस्तकक्षेप रहा . प्राचीन भारत को जो सम्मान मिला उसके पीछे नारियों का सहयोग व सहकार कि भावना सन्निहित रही है .वर्तमान समय में भले ही नारी शिक्षा का अवमूल्यन हो रहा हो , अन्धानुकरण के उफान पर भले ही उसकी शालीनता , मातृत्वता को मलीन और धूमिल किया गया हो परन्तु प्राचीन भारत में ऐसा नहीं था . तब चाहे कोई क्षेत्र हो , ज्ञान का हो या समाज का हो, नारी को समान अधिकार प्राप्त थे . नर-नारी को समान मानकर समान ऋषिपद प्राप्त था .

वैदिक ऋचाओं की द्रष्टा के रूप में सरमा , अपाला, शची , लोवामुद्रा , गोधा ,विस्वारा आदि ऋषिकाओं का आदरपूर्वक स्थान था .यही नहीं सर्वोच्य सप्तऋषि तक अरुंधती का नाम आता है. नर और नारी में भेद करना पाप
समझा जाता है . इसी कारण हमारे प्राचीन इतिहास में इसे अभेद मन जाता रहा है.ब्रह्मा को लिंग भेद से परे और पार मन जाता है . ब्रह्मा के अव्यक्त एवं अनभिव्यक्त स्वरुप को सामन्य बुद्धि के लोग समझ सके इसीलिए ब्रह्मा ने स्वयं को व्यक्त्त किया तो वे नर और नारी दोनों के रूप में प्रकट हुए . नर के रूप को जहाँ परमपुरुष कहा गया वाही नारी को आदिशक्ति परम चेतना कहा गया . नर और नारी में कोई भेद नहीं हैं . केवल सतही भिन्नता है और यही भ्रम नारी और पुरुष के बिच भेद कि दीवार खड़ी करती है. शास्त्रों में ब्रह्मा के तीनों रुपों को जहां ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहा गया तो वहीं नारियों को आदिशक्ति, महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली कहा गया । देवासुर संग्राम में जब देवताओं को पराजय का मुँह देखना पड़ा था तब देवीशक्ती के रुप में देवताओं की मदद करना तथा राक्षसों को पराजित करना अध्यात्म-क्षेत्र में नारी को हेय समझने वाली मान्यता को निरस्त करती है ।

नारी शक्ति के बिना भगवान शिव को शव के समान माना जाता है । पार्वती के बिना शंकर अधुरे हैं । इसी तरह विष्णु के साथ लक्ष्मी, राम के साथ सीता को हटा दिया तो वह अधूरा सा लगता है । रामायण से अगर सीता जी को हटा दिया तो वह अधूरा सा लगता है । द्रोपदी, कुंती गांधारी का चरित्र ही महाभारत को कालजयी बनाता है अन्यथा पांडवो का समस्त जीवन बौना सा लगता । नारी कमजोर नहीं है, अबला नहीं है, वह शक्ति पर्याय है । देवासुर संग्राम में शुंभ निशुंभ, चंड-मुंड, रक्तबीज, महिषासुर आदि आसुरी प्रोडक्ट को कुचलने हेतु मातृशक्ति दुर्गा ही समर्थ हुई । इसी तरह अरि ऋषि की पत्नी अनुसूइया ने सूखे-शुष्क विंध्याचल को हरियाली से भर देनें के लिए तपश्चर्या की और चित्रकूट से मंदाकिनी नदी को बहने हेतु विवश किया । यह घटना भागीरथ द्वारा गंगावतरण की प्रक्रिया से कम नहीं मानी जा सकती ।
साहस और पराक्रम के क्षेत्र में भी नारी बढ‌ी-च‌ढी़ । माता सीता उस शिवधनुष को बड़ी सहजता से उठा लेती जिसे बड़े-बड़े योद्धा नहीं उठा पाते थे । इनके अलावा नारियां वर्तमान समय में भी विभिन्न क्षेत्रों, जैसे-- प्रशासनिक क्षत्र में किरण वेदी , खेल में सानिया नेहवाल, सानिया मिर्जा, झूल्लन गोस्वामी, राजनीति में सोनिया गांधी, प्रतिभा देवी सिंह पाटील, मीरा कुमार, विज्ञान के क्षेत्र में कल्पना चावला, सुनिता विलियम्स, आदि सभी अपने क्षेत्रों में अग्रणी रही हैं और भारत स्वाभीमान को बढ़ाया है ।
इस तरह ऐसे बहुत से प्रमाण हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि भारत के विकास के लिए आदर्शवादी नारियों ने अपनी क्षमता योग्यता का योगदान दिया । समाज में नारी के विकास के लिए समुचित व्यवस्थाएं की जाए । नारी के
विकास से ही भारत अपनी प्रतिष्ठा, सम्मान, गौरव को पुनः प्राप्त कर सकता है ।

आभार ----अलग-अलग किताबों से पढ़ा गया किरदारों के बारे में

Sunday, December 19, 2010

" 19 दिसम्बर की वह सुबह "------------मिथिलेश दुबे

रोज की तरह उस दिन भी सुबह होती है, लेकिन वह ऐसी सुबह थी जो सदियों तक लोगों के जेहन में रहेगी । दिसंबर का वह दिंन तारीख 19 , फांसी दी जानी थी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को । बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फांसी दी जानी थी । रोज की तरह बिस्मिल ने सुबह उठकर नित्यकर्म किया और फांसी की प्रतीक्षा में बैठ गए । निरन्तर परमात्मा के मुख्य नाम ओम् का उच्चारण करते रहे । उनका चेहरा शान्त और तनाव रहित था । ईश्वर स्तुति उपासना मंन्त्र ओम् विश्वानि देवः सवितुर्दुरुतानि परासुव यद्रं भद्रं तन्न आसुव का उच्चारण किया । बिस्मिल बहुत हौसले के इंसान थे । वे एक अच्छे शायर और कवि थे ,जेल में भी दोनों समय संध्या हवन और व्यायाम करते थे । महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती को अपना आदर्श मानते थे । संघर्ष की राह चले तो उन्होंने दयानन्द जी के अमर ग्रन्थों और उनकी जीवनी से प्रेरणा ग्रहण की थी । 18 दिसंबर को उनकी मां से जेल में भेट हुई । वे बहुत हिम्मत वाली महिला थी । मां से मिलते ही बिस्मिल की आखों मे अश्रु बहने लगे थे । तब मां ने कहा कहा था कि " हरीशचन्द्र, दधीचि आदि की तरह वीरता से धर्म और देश के लिए जान दो, चिन्ता करने और पछताने की जरुरत नही है । बिस्मिल हंस पड़े और बोले हम जिंदगी से रुठ के बैठे हैं" मां मुझे क्या चिंतन हो सकती, और कैसा पछतावा, मैंने कोई पाप नहीं किया । मैं मौत से नहीं डरता लेकिन मां ! आग के पास रखा घी पिघल ही जाता है । तेरा मेरा संबंध कुछ ऐसा ही है कि पास आते ही मेरी आंखो में आंसू निकल पड़े नहीं तो मैं बहुत खुश हूँ ।
अब जिंदगी से हमको मनाया न जायेगा।
यारों है अब भी वक्त हमें देखभाल लो, फिर कुछ पता हमारा लगाया न जाएगा । बह्मचारी रामप्रसाद बिस्मिल के पूर्वज ग्वालियर के निवासी थे । इनके पिता श्री मुरली धर कौटुम्बिक कलह से तंग आकर ग्वालियर छोड़ दिया और शाहजहाँपुर आकर बस गये थे । परिवार बचपन से ही आर्थिक संकट से जूझ रहा था । बहुत प्रयास के उपरान्त ही परिवार का भरण पोषण हो पाता था । बड़े कठिनाई से परिवार आधे पेट भोजन कर पाता था । परिवार के सदस्य भूख के कारण पेट में घोटूं देकर सोने को विवश थे । उनकी दादी जी एक आदर्श महिला थी , उनके परिश्रम से परिवार में अच्छे दिंन आने लगे । आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और पिता म्यूनिसपिल्टी में काम पर लग गए जिन्हे १५ रुपए मासिक वेतन मिलता था और शाहजहाँपुर में इस परिवार ने अपना एक छोटा सा मकान भी बना लिया । ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष ११ (निर्जला एकादशी) सम्वत १९५४ विक्रमी तद्ननुसार ११ जून वर्ष १८९७ में रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म हुआ । बाल्यकाल में बीमारी का लंबा दौर भी रहा । पूजारियों के संगत में आने से इन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया । नियमित व्यायाम से देह सुगठित हो गई और चेहरे के रंग में निखार भी आने लगा । वे तख्त पर सोते और प्रायः चार बजे उठकर नियमित संध्या भजन और व्यायाम करते थे । केवल उबालकर साग, दाल, दलिया लेते । मिर्च खटाई को स्पर्श तक नहीं करते । नमक खाना छोड़ दिया था । उनके स्वास्थ्य को लोग आश्चर्य से देखने लगे थे । वे कट्टर आर्य समाजी थे, जबकि उनके पिता इसके विरोधी थे जिसके चलते इन्हे घर छोड़ना पड़ा । वे दृढ़ सत्यवता थे । उनकी माता उनके धार्मिक कार्यों में और शिक्षा मे बहुत मदद करती थी । उस युग के क्रान्तिकारी गैंदालाल दीक्षित के सम्पर्क में आकर भारत में चल रहे असहयोग आन्दोलन के दौरान रामप्रसाद बिस्मिल क्रान्ति का पर्याय बन गये थे । उन्होंने बहुत बड़ा क्रान्तिकारी दल (ऐच आर ए) हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेसन के नाम से तैयार किया और पूरी तरह से क्रान्ति की लपटों के बीच ठ गए । अमरीका को स्वाधीनता कैसे मिली नामक पुस्तक का उन्होनें प्रकाशन किया बाद मे ब्रिटिश सरकार नेजब्त कर लिया । बिस्मिल को दल चलाने लिए धन का अभाव हर समय खटकता था । धन के लिए उन्होंने सरकारी खजाना लूटने का विचार बनाया । बिस्मिल ने सहारनपुर से चलकर लखनऊ जाने वाली रेलगाड़ी नम्बर ८ डाऊन पैसेंन्जर में जा रहे सरकारी खजाने को लूटने की कार्ययोजना तैयार की । इसका नेतृत्व मौके पर स्वयं मौजूद रहकर रामप्रसाद बिस्मिल जी ने किया था । उनके साथ क्रान्तिकारीयों में पण्डित चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खां , राजेन्द्र लाहिड़ी, मन्मनाथ गुप्त , शचीन्द्रनाथ बख्शी, केशव चक्रवर्ती, मुरारी लाल, बनवारी लाल और मुकुन्दीलाल इत्यादि थे । काकोरी ट्रेन डकैती की घटना की सफलता ने जहां अंग्रजों की नींद उड़ा दी वहीं दूसरी ओर क्रान्तिकारियों का इस सफलता से उत्साह बढ़ा । इसके बाद इनकी धर पकड़ की जाने लगी । विस्मिल, ठा़ रोशन सिंह , राजेन्द्र लाहिड़ी, मन्मनाथ गुप्त, गोविन्द चरणकार, राजकुमार सिन्हा आदि गिरफ्तार किए गए । सी. आई. डी की चार्जशीट के बाद स्पेशल जज लखनऊ की अदालत में काकोरी केस चला । भारी जनसमुदाय अभियोग वाले दिन आता था । विवश होकर लखनऊ के बहुत बड़े सिनेमा हाल 'रिंक थिएटर को सुनवाई के लिए चुना गया । विस्मिल अशफाक , ठा़ रोशन सिंह व राजेन्द्र लाहिड़ी को मृयुदंड तथा शेष को कालापानी की सजा दी गई । फाँसी की तारीख १९ दिसंबर १९२७ को तय की गई । फाँसी के फन्दे की ओर चलते हुए बड़े जोर से बिस्मिल जी ने वन्दे मातरम का उदघोष किया । राम प्रसाद बिस्मिल फाँसी पर झूलकर अपना तन मन भारत माता के चरणों में अर्पित कर गए । प्रातः ७ बजे उनकी लाश गोरखपुर जेल अधिकारियों ने परिवार वालो को दे दी । लगभग ११ बजे इस महान देशभक्त का अन्तिम संस्कार पूर्ण वैदिक रीति से किया गया । स्वदेश प्रेम से ओत प्रोत उनकी माता ने कहा " मैं अपने पुत्र की इस मृत्यु से प्रसन्न हूँ दुखी नहीं हूँ ।" उस दिन बिस्मिल की ये पंक्तियां वहाँ मौजूद हजारो युवकों-छात्रों के ह्रदय में गूंज रही थी---------- यदि देशहित मरना पड़े हजारो बार भी , तो भी मैं इस कष्ट को निजध्यान में लाऊं कभी । हे ईश ! भारतवर्ष मे शत बार मेरा जन्म हो कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो
इस महान वीर सपूत को शत्-शत् नमन




पुस्तक आभार-- युग के देवता

Friday, December 10, 2010

रिश्ते बंद है आज चंद कागज के टुकड़ो में---------मिथिलेश दुबे


रिश्ते बंद है आज
चंद कागज के टुकड़ो में,
जिसको सहेज रखा है मैंने
अपनी डायरी में,
कभी-कभी खोलकर
देखता हूँ उनपर लिखे हर्फों को
जिस पर बिखरा है
प्यार का रंग,
वे आज भी उतने ही ताजे है
जितना तुमसे बिछड़ने से पहले,
लोग कहते हैं कि बदलता है सबकुछ
समय के साथ,
पर
ये मेरे दोस्त
जब भी देखता हूँ
गुजरे वक्त को,
पढ़ता हूँ उन शब्दो को
जो लिखे थे तुमने,
गूजंती है तुम्हारी
आवाज कानो में वैसे ही,
सुनता हूँ तुम्हारी हंसी को
ऐसे मे दूर होती है कमी तुम्हारी,
मजबूत होती है
रिश्तो की डोर
इन्ही चंद पन्नो से,
जो सहेजे है मैंने
न जाने कब से।।

Monday, December 6, 2010

"तुम्हारी बातें ही आईना थी "------------मिथिलेश दुबे

तुम्हारी बातें ही आईना थी

जिंसमे देखता था तुमको मैं

टुकड़ो-टुकड़ो में मिलती थी खुशी

दिन में कई बार।।



उन दिनो यूं ही हम तुम


खुश हुआ करते थे

न तुमने मुझे देखा था और

न ही मैने तुमको

बना ली थी एक तस्विर

तुम्हारी उन बातो से

सजा लिए थे सपनें रातों में

तुम्हारी उन बातो से

महसुस करता था तुमको हर पल

कल्पंनाये न छोड़ती थी साथ

जिसपर बैठ कर तय करता था सफर अपना।।



अच्छ लगता यूँ ही सब कुछ

सोचकर बाते तेरी मुस्कुराहट

उतर आती थी होठो पर

कितना हसीन था वो पल

वो साथ

जब बातें ही हमारी आवाज

हमारें जज्बात बयां करती थी।।



मै प्यार की गहराई तुम्हे समझाता

और प्यार की ऊंचाई

तुम चुपचाप ही सुनती रहती थी सब कुछ

यूं ही तब ये सिलसिला चलता रहता था

देर तक और फिर पूछता था

तुमसे न जाने कितने सवाल

तुम मुस्कुराकर ही टाल देती थी जवाब।।


मैं गुस्साता तो तुम समझाती

मैं रुठता तो तुम मनाती

पल आज फिर से याद आ रहा है

सोचकर बातें मैं

आज अकेले ही मुस्कुराता हूँ

तुमको याद करके।।

Thursday, December 2, 2010

दैहिक प्यास या बलात्कार---------मिथिलेश दुबे

,आधुनिकता की आंधी अपने पूरे उफान पर है , अब यह वहाँ पहुँच चुकी है जहाँ से पिछे की ओर रुख करना बेमानी होगी, और नामुमकिन भी है । आधुनिकता की आड़ में वह सब समय से पहले किया जा रहा जिसे समय से पू्र्व करना कभी हमारे समाज में अपराध माना जाता था, अब वह सब बीक रहा है जो कभी अमूल्य हुआ करता था । अब बाजारो में कौमार्य की बीक्री भी शुरु हो गयी है, दुःखद लेकिन सत्य । अब शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाना आम बात हो गयी और अब तो इसको कानुनी मान्यता भी मिल गयी , शायद बदलते समाज और समय की यही माँग है , इस फैसले से हमारा प्रभूत्व वर्ग बहुत खुश हुआ । पहले कहा जाता था लड़का , लड़की जब जवान हो जायें तो उनकी शादी कर देनी चाहिए , कारण....... ताकि सामाज के साथ-साथ खुद की उनकी शारीरिक जरुरतों की पूर्ती हो सके , लेकिन ये बातें अब तो पुरातन सी लगती हैं ,अब तो लगता है कि ये आदमखोर के जमाने की बात होगी । वर्तमान समय में ना तो समाज की चिंता है और ना ही वर्जनाओं के बिखरने का , जब सारी जरुरतें कम से कम शारीरिक, बिना शादी के ही पूरी हो रही है तो शादी जैसे बंधन में बंधना लोगो को नागवार सा लगने लगा । जिसकी पवित्रता की बातें होती थी उसे अब खुलेआम बे आबरु किया जा रहा है बिना किसी लज्जा और शर्म के ।
पर एक बात जो हमेशा से कही जा रही कि जहाँ अति होता है वहाँ विनाश भी जल्द शुरु हो जाता है , जिसका आरंभ धीमा ही सही परन्तु शुरु हो चुका है । वाकया है मुंबई का , जहाँ एक प्राइवेट एयरलाइंस मे काम करने वाली एक युवती ने अपने सहकर्मी युवक पर बलात्कार का आरोप लगाया है , पुलिस के मुताबिक वरुण नामक युवक उस युवती को शादी का झांसा देकर उसका पिछले दो सालों से बलात्कार कर रहा है , अभी तक जितने भी बलात्कार की घटना हुई है उनमे मुझे ये घटना सबसे हास्यास्पद लगी ,और मजे के बात यह है कि दोनों पिछले कई सालो से एक साथ एक ही फ्लैट मे साथ-साथ रहते थे ,आखिर हो भी क्यों ना जहाँ तक मैं बलात्कार के बारे में जान पाया हूँ वह क्षणीक और जबरन किया जाता है , अब लगातार दो साल बलात्कार करना , अजीब लग रहा है सूनने में, मुझे तो लगता है कि बलात्कार करवाने के केस करना चाहिए उस युवक को । अब आप लोग भी जरा सोचिए कि इतना लंबा बलात्कार हो सकता है क्या ??
दो साल लगातार हवस की आंधी मे बहकर हम विस्तर होने के बाद बलात्कार का आरोप लगाना किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता । शादी युवक ने क्यों नहीं की किस कारण जानलेना भी जरुरी बनता है । जब इतनी ही चिंता थी अपनी इज्जत की तो पहले क्यों नहीं सोचा ? गलती लड़के की भी है परन्तु उसने तो किसी पर बलात्कार का आरोप नहीं लगाया । इस पूरे प्रकरण नें इस बात की गवाही दी है कि लिव इन रिलेशनशिप
किसी भी तरह से जायज नहीं है हमारे समाज के लिए । ऐसे रिश्तो का कोई मानक नहीं होता बल्कि ऐसे रिश्ते दो आत्मओं के मिलन जैसे पवित्र रिश्ते को दागदार करते हैं, ऐसे रिश्तो से मात्र दैहिक शोषण में वृद्धी होगी । , जिसका उदाहरण हम ऊपर देख ही चुके हैं । इसे आधुनिकता की अंधता ही कहा जा सकता है कि रजामंदी से बने बने शारीरिक संबन्ध को बलात्कार जैसे घृणीत कार्य की संज्ञा दी जा रही है । परिवर्तन प्रकृति का नियम है परन्तु ये परिवर्तन नैतिकता के उत्थान की ओर हो ना कि पतन ओर हो ।

दो महिने बाद ब्लोगिंग मे फिर से वापसी हो रही , उम्मिद करता हूँ कि सबकुछ ठिक-ठाक चलेगा । इस मेरे अनुपस्थिति में जिन लोगों ने मुझे याद किया उनका शुक्रगुजार हूं । कोशिश करुंगा कि जहाँ से छोड‌ गया ब्लोगिंग उसके वहीं से शुरुआत करूंगा , खैर एक पुराना लेख पढिये जिसे मैं समय पर पोस्ट नहीं कर पाया ।


Sunday, August 22, 2010

क्योंकि वेश्या है वह ??????--- मिथिलेश दुबे


सहती न जानें कितने जुल्म
करती ग्रहण
पुरुष कुंठाओ को
हर रात ही होती है हमबिस्तर
न जानें कितनों के साथ.............
कभी उसे कचरा कहा जाता
कभी समाज की गंदगी
कभी कलंक कहा गया
कभी बाई प्रोडक्ट
तो कभी सभ्य सफेदपोश
समाज का गटर.........
आखिर हो भी क्यों ना
कसूर है उसका कि वह
इन सफेद पोशों के वासना को
काम कल्पनाओं को
कहीं अंधेरे में ले जाकर
लील जाती है
खूद को बेचा करती है
घंटो और मिनटों के हिसाब से...........
जहाँ इसी समाज में
नारी को सृजना कहा जाता है
पूज्य कहा जाता है
माता कहा जाता है
देवी कहा जाता है
उसी समाज की
शोषित, उपेक्षित
उत्पीडित, दमित
कुल्टा है वह
क्योंकि दोष है उसका
वेश्या है वह।

Saturday, August 21, 2010

लेकिन तुम नहीं आये-------------मिथिलेश दुबे


आज फिर देर रात हो गयी
लेकिन आप नहीं आये
कल ही तो आपने कहा था
आज जल्दी आ जाऊंगा
जानती हूं मैं
झूठा था वह आश्वासन .......
पता नहीं क्यों
फिर भी एक आस दिखती हैं
हर बार ही
आपके झूठे आश्वासन में........
हाँ रोज की तरह आज भी
मैं खूद को भूलने की कोशिश कर रही हूँ
आपकी यादों के सहारे
रोज की तरह सुबह हो जाए
और आपको बाय कहते ही देख लूं..........
आज भी वहीं दिवार सामने है मेरे
जिसमे तस्वीर आपकी दिखती है
जो अब धूंधली पड़ रही है
जो आपके वफा का
अंजाम है या शायद
बढ़ती उम्र का एहसास........
वही बिस्तर भी है
जिसपर मैं रोज की तरह
आज भी तन्हा हूँ
अब तो इसे भी लत लग गई है
मेरी तन्हाई की..............
दिवार में लगा पेंट भी
कुरेदने से मिटनें लगा है
मेरे नाखून भी जैसे
खण्डहर से हो गये है
आसुओं की धार से
तकिए का रंग भी हल्का होने लगा है
सजन लेकिन तुम नहीं आये
तुम नहीं आये ।।

Thursday, August 12, 2010

छिनाल कह दिया तो हंगामा क्यो है बरपा-----------मिथिलेश दुबे

आजकल जहां देखिए एक ही शब्द गूंज रहा है छिनाल और छिनाल । हां इससे ये फायदा जरुर रहा कि कम से कम बहुत लोगों को इसका मंतव्य स्पष्ट हो गया । मात्र एक शब्द को लेकर इतना हो हल्ला हुआ कि इसी मुद्दे के तले कामनवेल्थ का मुद्दा कहीं पाताल में जा समाया । लेकिन हाँ एक बात जो समझ नहीं आती मुझे कि अक्सर जब कोई बड़ा मुद्दा तुल लेने वाला होता है, तभी अचानक ऊपर से कोई ऐसा मुद्दा आ गिरता है कि दूसरा मुद्दा तो लापता ही हो जाता है । छिनाल शब्द जैसे क्या बोल दिया विभूति नारायण राय जी ने, नारी वादियों के मुहं में संजीवनी की बुंद डाल दी । इससे पहले नारी वादियों को कुछ सूझ तो रहा नहीं था कि अचानक से देखके मौका मार दो चौका वाली घटना हो गई । महिला संगठन ऊठ - जाग गई अरे ये नारी अपमान । हाँ तो फिर पिपीयाना शुरु क्या हुआ कि बंद होने का नाम ही नही ले रहा । हो भी कैसे जब तक मुद्दा जीवित तब तक दूकान में लोगो की आवाजाही तेज रहेगी साथ दूकान में खरीद परोख्त की घटना भी बढ़ जाएगी । यहाँ तक कि कुछ संगठनें तो मन्नतें मांग रही होंगी कि काश महिनें में एकाक ऐसी घटना होती रहती तो दूकान भी चलती रहती , और हम भी मजे मजें और ओ भी मजे, भगवान भला करे उसका । अब जरा देखिए अगर इस शब्द में नारी विरोधाभास होता तो जाहिर सी बात है सभी महिलाओं को होता, । लेकिन नहीं ऐसा नहीं हुआ इस मुद्दे को लेकर महिलाओं के मत भिन्न-भिन्न हैं, कारण इसके पिछे जो हो । राय जी के साथ काम करने वाली एक महिला लेखक ने उनको सही करार दिया और कहा कि ये उनका नीजि मत है । इतना सबकुछ जानने के बाद भी इतना हंगामा क्यों बरपा । राय जी ने माफी भी मांग ली लेकिन इसका ये मतलब निकालना कि वे गलत थे ठिक ना होगा । किसी के विरोधीयों की संख्या ज्यादा होगी तो जाहिर सी बात है कोई भी झूक सकता है जिसका जीता जागता सबूत राय जी हैं । नारी अपमान को लेकर उस मुद्दे को बेवजह इतना उछाला जा रहा जिसका नारी सम्मान और अपमान से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं । हां हर बार की तरह मीडिया का योगदान इस मुद्दे पर भी हावी दिख रहा ।
एक ऐसे शब्द के लिए तू-तू मैं-मैं हो रहा जिसका हमारे यहाँ खासकर गावों में प्रयोग सामान्य तौर पर न सिर्फ महिलाओं के लिए वरन पुरुष के लिए भी किया जाता रहा है और हो भी रहा है । गांव में अक्सर इस शब्द का प्रयोग भौजाई और मामीं करती हैं, साधारण मजाक के लिए तब इस बात को लेकर कोई अन्यथा नहीं लेता । ,हाँ यहाँ ये जरुर हो सकता है कि जो नारी हाई प्रोफईल नहीं है अथवा जो कम पढी लिखी है उसे अपमान ना समझ आता हो । राय जी के व्यकतव्य को लेकर महिला लेखकों ने भी अपनी आपत्ति दर्ज कराई और खूब हो हल्ला कर रही है , आखिर क्यों नहीं पता कैसे चलेगा मैं नारी के भले लिए सोचती हूँ , हां चाहे फिर वे महिलाएं खूद को नारी वादी और नारी संरक्षक कहने वाली अपने बहु को जिंदा जला दें तो कोई बात नहीं , लेकिन अगर ऐसा कुकर्म पुरुष कर दे तो उसपर दहेज के लिए मारने का आरोप तो लगेगा ही साथ महिला उत्पीड़न का भी आरोप भी लगाया जायेगा , और अगले दिन महिलावादी संगठन रोड पर दिखाई देंगी पोस्टरों और बैनरों के साथ । राय जी की टिप्पणी पर महिला लेखक मैत्रेयी पुष्पा ने कहा, "हम महिलाओं के सम्मान के लिए बड़ी लंबी लड़ाई लड़कर यहां पहुंचे हैं, लेकिन इस तरह के पुरुष हमें गालियां देते हैं, एक पत्थर मारते हैं और सब पर कीचड़ फैला देते हैं।" । जरा इनकी बातों पर ध्यान दीजिए ये कैसा विकास ये कैसा आत्मविश्वास,और ये कैसी जीत जो मात्र एक पत्थर मारने से टूट जाए, मतलब सब झूठ । भारतीय ज्ञानपीठ की साहित्यिक पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' ने 'बेवफाई' विषय के शीर्षक के साथ अपने ख़ास अंक में विभूति राय का साक्षात्कार किया था। इसी के कुछ अंश अखबारों ने छापे।विभूति राय ने कहा, "पिछले कुछ वर्षों में कुछ महिला लेखिकाएं ये मान के चल रही हैं कि स्त्री मुक्ति का मतलब स्त्री के देह की मुक्ति है। हाल में कुछ आत्मकथाएं भी आई हैं जिनमें होड़ लगी है कि कौन सबसे बड़ा इन्फेडेल है। मैं अपने साक्षात्कार में इसे गलत बताना चाहता था।"
अब इसमे ऐसा क्या कहर बरपा दिया राय जी ने जिससे नारी अपमान हो गया । अगर पुरुष ऐसा कहता है तब गलत है और जबकि महिला लेखिकाएं एक बिस्तर पर कितनी बार जैसे शिर्षक के साथ आत्मकथाएं लिखती है तो वो ठिक है, ये कैसा सौतेला व्यवहार किया जा रहा है समझ के परे है। हाँ उन्हे ज्यादा मिर्ची लगी जिन्होने अपना एजेण्डा नारी विकास के लिए स्त्री देह को बना रखा है । ये एसे लोग है जो स्त्री देह मुक्ति को नारी मुक्ति मानते है, जिनकी नजरों मे अगर नारी को मनमाफिक कपडे पहनने की आजादी दे दी जाए तो नारी पूणतः मुक्त कही जा सकती है स्त्री , बस जी इसी का विरोध किया राय जी ने । क्या हाल हुआ उनका ये सब को पता है । लेकिन हाँ इससे बहुत से लोगों को फायदा भी हुआ जैसे नारी वादी संगठनों का तो हुआ ही साथ ही बहुत से लोग खूद को नारी का शुभचिंतक बनाने में भी लगे हुए हैं । मतलब अंतिम मै जय हो बाबा राय जी की, बीच-बीच में आते राहियेगा, और आमदनी बढवाते रहियेगा ।

Thursday, August 5, 2010

तेरा धर्म महान की मेरा धर्म---------मिथिलेश दुबे





तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म
मची है लोगों मे देखो कैसी घमासान
बन पड़ा है देखो कैसा माहौल
लग रहे हैं एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप
क्या हो जायेगा अगर मेरा धर्म नीचा
तेरा धर्म महान
आखिर पिसता तो है इन सबके बीच इंसान
जहाँ खाने के लिए रोटी नहीं
पहनने के लिए वस्त्र नहीं
रहने के लिए घर नहीं
वहां का मुद्दा बन पड़ा है
तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म महान,,,,,,,,,,,
जहाँ फैला है भ्रष्टाचार चहूं ओर
जहाँ नेता बन बैठा है भाग्य बिधाता
जहाँ अशिक्षा हावी है शिक्षा पर
जहाँ देखने वालों की भी गिनती है अंधो में
वहाँ मुद्दा बन पड़ा है
तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म .......
जहां मां तोड‍ देती है दम प्रसव के दौरान
जहाँ बच्चे शिकार होते हैं कुपोषण का
जहाँ लड‍‌कियो को अब भी समझा जाता है बोझ
वहाँ मुद्दा बन पड़ा है
तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म .......

Tuesday, August 3, 2010

पुरुष वेश्या, आधुनिकता की नयी खोज -----------मिथिलेश दुबे


हाँ आपको सुनने में अटपटा जरूर लगा होगा . हाँ होगा भी कैसे नहीं है भी अटपटा .अगर इसे आधुनिकता की नयी खोज कहा जाये तो तनिक भी झूठ न होगा . पहले वेश्यावृत्ति का शब्द मात्र महिलाओं के लिए प्रयोग किया जाता था , लेकिन अब जब देश विकाशसील है तो बदलाव आना तो लाजिमी हैं ना. अगर देखा जाये तो वेश्या मतलब वो जिन्हें पुरुष अपने वासना पूर्ति के लिए प्रयोग करते थें , इन्हे एक खिलौना के माफिक प्रयोग किया जाता था, वाशना शांत होने के बाद इन्हे पैसे देकर यथा स्थिति पर छोड़ दिया जाता था . पुरुष वर्ग महिलाओं प्रति आकर्षित होते थे और ये अपनी वासना पूर्ति के लिए जिन्हें वेश्या कहते हैं, इनके माध्यम से अपनी शारीरिक भूख शांत करते थे . लेकिन अब समय बदल गया है पश्चिम की आधी ऐसी आई वहां की प्रगतिवादी महिलाओं ने कहा कि कि ये क्या बात हुयी , पुरुष जब चाहें अपनी वासना मिटा लें परन्तु महिलाएं कहाँ जाये ???? तत्पश्चात उदय हुआ है जिगोलो या पुरुष वेश्याओं का .
आज ये हमारें यहाँ खासकर बड़े शहरों में इनकी संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही . साथ ही इनकी मांग भी दिन व दिन बढती ही जा रही है . जिगोलो का उपयोग महिलाएं अपनी वासना पूर्ति के लिए करती हैं. जब महिलाएं अपने देह का व्यापार करके पैसे कमा सकती हैं तो पुरुष क्यूँ नहीं, परिणाम वेश्याओं के समाज में नयी किस्म . आखिर हो भी क्यूँ न , इसमे पुरुष वर्ग फायदे में भी तो रहता है , एक तीर से दो निशाना जो हो जाता है, इन्हे आनंद तो मिलता ही है साथ ही पैसे भी वह भी अच्छे खाशे .
पुरुष वेश्याओं का प्रयोग ज्यादातर अकेली रहने वाली ,उम्रदराज महिलाएं या अपने पति से संतुष्ट न रहने वाली महिलाएं करती हैं . इनका चलन मेट्रो शहरों में ज्यादा है कारण इनका वहां आसानी से उपलब्धता .
ये नयी किस्म की गंदगी पश्चिम सभ्यता की देन है, यह वहां के नग्नता का परिचायक है . बङे शहरों में इनकी मांग ज्यदा इसलिए क्योंकि यहाँ की महिलाएं ज्यादा आधुनिक हैं .उन्मुक्त हो चुकी महिलाओं को अपनी वासना की पूर्ति के लिए जिगोलो के रुप में साधन मिला. भारत पश्चिम सभ्यता का हमेशा से ही नक़ल करता आया है, तो यहाँ पिछे रहने के कोई कारण ही नहीं है . हमारे देश के युवा उनके ही पदचिन्हों पर चल रहे हैं और इसका परिणाम किसी को बताने की जरूरत नहीं हैं , इतनी स्त्रियों से संबंध बनाने के बाद अक्सर उनमें से ज्यादातर एड्स या अन्य घातक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं फिर चाहे पैसे कमाने के लिए अपनी मर्यादा ही क्यों न दाव पर लगा देनी पड़े .आज युवा अच्छे पैसे के लिए वह सबकुछ कर रहा है जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. शायद आधुनिकता की अन्धता यही है.समलैंगिक पुरुषों और देह व्यापार से जुड़े पुरुषों के लिए काम कर रहे हमसफ़र ट्रस्ट के अध्यक्ष अशोक राव कवि का मानना है कि "ये जिगोलो भी बाज़ार की वस्तु है जो समाज से आ रही माँग को पूरा कर रहे हैं. ये समाज के उच्चवर्ग की वस्तु बन गई है. समाज में माँग थी, जिसकी भरपाई करने के लिए सप्लाई आ गई है. इसने एक नया बाज़ार तैयार किया जो दोनों ही पक्षों की ज़रूरत को पूरा कर रहा है.
इन सबके आगे इस परीदृश्य को देखा जाये तो ये विकास की ये आधुनिकताहमारे सभ्य समाज को न सिर्फखोखला बल्कि विक्षिप्त भी कर रहा है . युवा पीढ़ी को कहा जाता है कि वह भारत का भविष्य सवारेगा वह अब ऐसे दलदल में फंशा जा रहा है जहाँ से इसकी कल्पना करना इनके साथ बेईमानी होगी . रोजगार की कमी को भी इसका कर्णधार कहा जा सकता है, लेकिन ये क्या जिस पीढ़ी को हमसे इतनी उम्मीद है उसके हौशले इतनी जल्द पस्त हो जाएंगे ऐसा कभी सोचा न था. भारत में समलैंगिकता और वेश्यावृत्ति तथा लिव इन रिलेशनशिप के प्रति दृष्टिकोण बदलने की बात की जा रही है। पहले ही इन मुद्दों पर बहुत विवाद हो चुका है। ऐसे में इस तरह के दूषित मानसिकता को रोकना अतिआवश्यक है । अगर देखा जाए तो मीडिया इनमे महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है और पाश्चात की चमचागिरी मे लगा है,ऐसे में फैसला आपके हाथ में है।

Saturday, July 31, 2010

नारी उत्थान का नंगा सच नारीवाद का ढकोसला --------मिथिलेश दुबे

जहाँ देखिये नारीवाद का राग अलापते आपको बहुत सी महिलाएं , बहुत से संस्थाए मिल जाएँगी । लेकिन इनका वास्तविक चेहरा क्या है ये कम लोगों को ही ज्ञात होगा । होगा भी कैसे प्रगतिवाद का अँधा चस्मा जो लगा है । फिर भी ये खुद को फेमिनिस्ट कहने वाली महिलाएं वैसे बील में ही रहती हैं लेकिन समय-समय पर अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए किसी मुद्दे पर भूकप की तरह अचानक से सामने भी आ जाती हैं तब जाके पता चलता की फला-फला लोग हैं जो की फलाने नामक नारी विकास के लिए तथा उनके उठान के लिए कार्य कर रहीं हैं । जहाँ तक नारीवाद को समझ पाया वह यह की नारीवाद राजनैतिक आंदोलन का एक सामाजिक है जो स्त्रियों के अनुभवों से जनित है। हलाकि मूल रूप से यह सामाजिक संबंधो से अनुप्रेरित है लेकिन कई स्त्रीवादी विद्वान का मुख्य जोर लैंगिक असमानता, और औरतों के अधिकार इत्यादि पर ज्यादा बल देते हैं। नारीवादी सिद्धांतो का उद्देश्य लैंगिक असमानता की प्रकृति एवं कारणों को समझना तथा इसके फलस्वरूप पैदा होने वाले लैंगिक भेदभाव की राजनीति और शक्ति संतुलन के सिद्धांतो पर इसके असर की व्याख्या करना है। स्त्री विमर्श संबंधी राजनैतिक प्रचारों का जोर प्रजनन संबंधी अधिकार घरेलू हिंसा , मातृत्व अवकाश, समान वेतन संबंधी अधिकार , स्त्रीवादी विमर्श संबंधी आदर्श का मूल कथ्य यही रहता है कि कानूनी अधिकारों का आधार लिंग" न बने '''''''''''''''''''''''''''''''''''' '
बात तो सही है और मई इनका पक्ष धर हूँ लेकिन जब मूल रवैया इन सिंधान्तो पर ही हो तो । आज हमारे यहाँ जब भी नारीवाद के बात होती है नारी के अधिकार की बात होती है तो इनके नाम पर इन्हें वह आजादी जो हमारे संस्कृति का मानक ही बदल दे। मै नारी अधिकार के पक्ष में हूँ , उन्हें वह सब कुछ मिलना चाहिए जो की पुरुषो को मिलता है लेकिन वह भारतीय संस्कृति के अनुरूप हों तो ज्यादा कारगर होगा सब के लिए , उस आजादी , उस अधिकार की बात हम क्यूँ करें जो हमारे खुद के वजूद को ही दाव पर लगा दें । नारीवाद (फेमिनिस्ट) का भूत पश्चिम से चलकर भारत आया , अब यहाँ भी इसका प्रचार प्रसार जोरों से हो रहा है, हो भी क्यूँ नहीं भारत विकासशील देश जो है । इस नारीवाद ने वहां क्या किया इसके कुछ उदहारण और कुछ आकडे दे रहा हूँ ..............ये आकडे अमेरिका और इंग्लैंड के है जहाँ नारी को सबसे ज्यादा विकासशील मन जाता है .....
--हर में से अमेरिकन स्त्री अपनी जिन्दगी में बलात्कार की शिकार होती है.
--१७. मिलियन अमेरिकन औरते पूर्ण या आंशिक बलात्कार की शिकार है .
-१५ % बलात्कार की शिकार १२ साल से कम उम्र की लड़किया है .
--लगभग % अमेरिकन पुरुषों ने हर ३३ में ने अपनी जिन्दगी में कभी कभी पूर्ण या आंशिक बलात्कार किया है ...एक चाइल्ड प्रोटेक्शन संस्था की १९९५ की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में १२६००० बच्चे बलात्कार के शिकार है जिनमे से 75 % लड़किया है और लगभग ३० % शिकार बच्चे से की उम्र के बीच के है
ये आकडे कम नहीं है अगर हम इन की अन्य विपत्तियों से तुलना करते है तो स्तिथि की भयानकता स्पष्ट हो जाती है जरा देखे.......
हत्या -दिसम्बर २००५ की रिपोर्ट के आधार पर अकेले अमेरिका में ११८१ एकल औरतो की हत्या हुई जिसका औसत लगभग तीन औरते प्रति दिन का पड़ता है यहाँ गौर करने वाली बात ये है की ये हत्याए पति या रिश्ते दार के द्बारा नहीं की गयी बल्कि ये हत्याए महिलाओं के अन्तरंग साथियो (भारतीय प्रगतिवादी महिलाओं के अनुसार अन्तरंग सम्बन्ध बनाना महिलायों की आत्म निर्भरता और स्वंत्रता से जुड़ा सवाल है और इसके लिए उन्हें स्वेच्छा होनी चाहिए) के द्बारा की गयी अब अंत रंग साथियो ने क्यूँ किया???????
घरेलू हिंसा-----National Center for Injury Prevention and Control, के
अनुसार अमेरिका में . मिलियन औरते प्रति वर्ष घेरलू हिंसा और अनेच्छिक सम्भोग का शिकार होती है, और इनमे से कम से कम २० % को अस्पताल जाना पड़ता है ...
कारण - जो भी हो लेकिन है तो भयावह ही , इसका मतलब साफ है की उनका पुरुष विरोधी रवैया उनको एस हालत में पहुंचाता है, ये हमारे न हो इसके लिए हमे उनके क़दमों के निशा पर खुद को चलने से रोकना होगा वरना स्थिति क्या होगी आपक देख ही सकते हैं .....
सम्भोगिक हिंसा -----National Crime Victimization Survey,
के अनुसार 232,960 औरते अकेले अमेरिका में २००६ के अन्दर बलात्कार या सम्भोगिक हिसा का शिकार हुई , अगर दैनिक स्तर देखा जाए तो ६०० औरते प्रति दिन आता है,इसमें छेड़छाड़ और गाली देने जैसे कृत्य को सम्मिलित नहीं किया गया है वे आकडे इसमें सम्मिलित नहीं है जो प्रताडित औरतो की निजी सोच ( क्यूँ की कुछ औरते सोचती है की मामला इतना गंभीर नहीं है या अपराधी का कुछ नहीं हो सकता)और पुलिस नकारापन और सबूतों अनुपलब्धता के के कारण दर्ज नहीं हो सके पश्चमी प्रगतिवादी आन्दोलन से क्या हासिल हुआ केवल विच्च का नाम जिस पर पश्चिमी औरते गर्व करती है ,,
m tough, I’m ambitious, and I know exactly what I want. If that makes me a bitch, okay. - Madonna Ciccone

मीडिया से ताल्लुक रखने वाली संध्या जैन कहती हैआज जो कानून बन रहे हैं वो विदेशी कानूनों की अंधी नकल भर हैं। उनमें विवेक का नितांत अभाव है। उन्होंने कहा कि अगर हमारे बेटे-बेटियां लिव इन रिलेशनशिप के तहत रहेंगे तो क्या हम खुश रहेंगे। क्या उनके इस फैसले से हमारी आत्मा को दुख नहीं होगा। अगर दुख होगा तो हमें ऐसे कानून का विरोध करना चाहिए और नहीं तो फिर तो कोई बात ही नहीं।"

गांधी विद्या संस्थान की निदेशक कुसुमलता केडिया जी के अनुसार भारतीय स्त्री किसी ने बिगाड़ी तो वो थे दो तामसिक प्रवाह- इस्लाम और ईसाइयत का भारत में आगमन। केवल भारत में ही नहीं ये दोनों शक्तियां जहां भी रोकने वहां की संस्कृति की इन्होंने जमकर तोड़-फोड़ की। ईसाई विचारधारा के अनुसार स्त्री ईंख के समान है का चाहें तो चबाएं या रस निकाल धकोश्ला पीकर धकोश्ला दें। दूसरी ध्ह्कोश्ला द्ध्कोस्लाहा स्त्री को पूर्णत ढंक देने की वकालत करता है लेकिन वह यह नहीं सोचता कि इससे स्त्री का सांस लेना दूभर जाएगा।ईसाई धर्म ने स्त्रियों पर जमकर अत्याचार किया।

जो स्त्री अधिक बोलती थी उसे मर्द रस्सी में बांधकर नदी में बार-बार डूबोते थे। यही उसकी सजा थी। लेकिन हमारे देश में इन दोनों के आगमन से पूर्व स्त्रियों की हमेशा सम्मानजनक स्थिति रही। विघटन तो इनके संसर्ग से हुआ। भारत के संदर्भ में नारी मुक्ति यही है कि भारतीय स्त्री फिर उसी पुरातन स्त्री का स्मरण कर अपने उस रूप को प्राप्त करे। कि पश्चिम की स्त्रियों का नकल करे।

समाज सेविका निर्मला शर्मा के अनुसार " भारत के गांवों में रहने वाली स्त्री तो मुक्त होने की इच्छा व्यक्त नहीं करती। एक मजदूरन भी ऐसी सोच नहीं रखती। मुक्ति वो स्त्रियां चाहती हैं जो कम कपड़ों में टेलीविजन के विज्ञापनों में नजर आती हैं ताकि वो कपड़ों का बोझ और हल्का कर सकें। नारी मुक्ति के बारे में वो औरतें सोचती हैं जिनकी जुबान पर हमेशा रहता हैये दिल मांगे मोर



तथ्य और आकडे साभार.....9University of North Carolina, 7National Institute of Justice (pages 6-7), 8Family Violence Prevention Fund,10National Coalition of Anti-Violence Programs (NCAVP), 11http://www.bhartiyapaksha.com/?p=1634

१-Bureau of Justice Statistics,

2Deptartment of Justice,

3Centers for Disease Control and Prevention (CDC),

4National Coalition Against Domestic Violence (NCADV),

5Bureau of Justice Statistics (table 2, page 15),

6US Census Bureau (page 12),