Tuesday, January 5, 2010

पश्चिम की नारी “बिच्च” कहा जाने पर गर्व महसूस करती है

भारतीय स्त्रियों ने अपने लिये सोचने का ठेका पश्चिमी नारियों को दे दिया लगता है! उन्ही की तर्ज पर आपको नारीवादी होने के लिये पुरुष-विरोधी होने की जरूरत क्यों पडती है? पश्चिमी नारी नें बराबरी का नारा बुलंद किया - वोट देने का अधिकार, न्याय का अधिकार, समान वेतन का अधिकार वो सब भारतीय नारी के पास कानूनी रूप से सुरक्षित ही है । इसके आगे सामाजिक स्थिती के मामले में भारतीय नारी क्या चाहती है खुद उसे नहीं पता! वैसे उसका भविष्य कितना अंधकारमय है इसकी जानकारी भी उसे नहीं है । पश्चिमी शैली की आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का नारा बुलन्द करती वर्किंग वुमन हो चुकने, आर्थिक स्वतंत्रता, समानता के नाम पर कुछ हद तक चारित्रिक स्वछंदता आदी के लिये चिल्ल-पों करती वीरांगनाओं को अपने से तीस-पैंतीस साल या २-३ पीढियों पहले यही सब कर चुकी पश्चिमी महिलाओं का हश्र देखना चाहिए। आज पश्चिमी समाज में ४५% से अधिक विवाहों की परिणिती तलाक है. एकल मां-बाप की संतानें एक सुविधा संपन्न स्वार्थी समाज में अपने स्वास्थ्य और अपनी कमाई के अलावा किसी और चीज़ के बारे में सोचते हैं और ना किसी और पर भरोसा ही कर सकते हैं. अमरीका में हर साल १.९ मिलियन लोगों को डिप्रेशन या अवसाद की शिकायत होती है जिनमें महिलाओं का प्रतिशत अधिक है. ऐसा क्यों है?

मेरा मानना है कि “पश्चिम की औरत, औरत नहीं है - वो मर्द की एक किस्म है चाहे कितनी नारीवादी बने! अपने सहज औरतपन से मर्दों को समझदारी सिखा सकने के बजाए आज भारतीय नारी भी मर्द की एक किस्म बनना चाहती है और हो कर रहेगी! लेकिन ज्वलंत विचारों वाली आपकी सफ़ल कार्पोरेट विरांगनाओं, आपकी सुपुत्रियों के लिये दुल्हे मिलना मुश्किल होंगे क्योंकी भारतीय पुरुष भी पश्चिमी पुरुषों के समान औरत को “बिच्च” कह कर बुलाएंगे और उपभोग की वस्तु समझेंगे और उनसे विवाह करने से बचना चाहेंगे! ये नंगा सच है. यह पश्चिम की त्रासदी है! और हां पश्चिम की स्त्री “बिच्च” कहा जाने पर गर्व महसूस करती है की वो हर मामले में अपनी हांक कर पुरुष को इतना कुढा चुकी है! तो सचमुच बहुत मेहनत से पाया गया ओहदा है!!

I’m tough, I’m ambitious, and I know exactly what I want. If that makes me a bitch, okay. -Madonna का कहना है , जो की स्टार है , अमेरिका की ।

कहते हैं की “मुद्दा ये था की औरत फ़ेमिनिस्म के नाम पर ही सही मर्द की एक किस्म तो होना चाहती रही है लेकिन हम मर्दों की निगाह में वो अच्छे वाले मर्दों की एक किस्म नहीं हो सकीं - कुछ मिस्टिरियस मामला है! वैसे अगर पश्चिम का अंधानुकरण ज़ारी रहा तो आनी वाली पीढी के भारतीय बाप अपनी स्वछंद बालाओं को रईस लडके फ़ंसाने की सलाह देंगे.।

ऐसे में हर आदमी ये सोचेगा की औरत उससे पैसे की खातिर जुडी है और औरत ये सोचेगी की मर्द उससे देह की खातिर जुडा है. फ़िर दोनो संतुलन सिद्ध करने चल पडते हैं. ऐसे असुरक्षित समाज में औरत ये सिद्ध करना चाहती रहेगी की वो आत्मनिर्भर है और मर्द ये सिद्ध करना चाहता रहेगा की वो चिरयूवा है, तो वियाग्रा और डिप्रेशन की गोलियां बिकना लाजमी है - ये है पश्चिमी असुरक्षा - जिसकी जडें तथाकथित स्त्री सशक्तिकरण में छुपी हैं! गोलियां प्रेम और समर्पण का स्थान नहीं ले सकतीं । आज बहुधा पश्चिमी औरतें कहती है की स्त्री सशक्तिकरण का मुद्दा आत्मघाती छलावा सिद्ध हुआ है! ना खुदा ही मिला ना विसाल-ए-सनम! कुछ औरतें मानती हैं की वे अति कर चुकी हैं ।

भारतीय स्त्री जिस संतुलन को साध सकती है उसे पश्चिमी स्त्री नहीं साध सकी थी - वो एक साथ भारतीय पुरुष को उसकी कुंठाओं से मुक्त कर सकती है और सहचरी भी हो सकती है - इतनी समझदारी और रचनात्मकता है उसमें - लेकिन ये तीस-चालिस साल पुरानी फ़ेमिनिस्ट लेखिकाओं के पद-चिन्हों पर चल कर नहीं होगा!

23 comments:

  1. वाह इतनी छोटी उम्र और इतना गहन चिंतन! -यह विच है या बिच मुझे कुछ शंका सी हो रही है -क्योनी पश्चिम जगत में औरते विच (डायन ) कहने पर उतना बुरा नहीं मानती!यहाँ कह दीजिये तो मुंह नोच लेगीं !

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  2. तुम्हारी बात से सहमत हूँ, लेकिन कुछ चीज समय के साथ बदल जाएंगी, तुम उसको रोक नहीं पाओगे। सच में, पश्चिमी देशों में ये सब कब से होता आ रहा है, लेकिन वहाँ की जनसंख्या बढ़ी के भारत की, भारत नम्बर दो है। चीन नम्बर एक। ये सब कुदरत है, जैसे उसके साथ खिलवाड़ हुआ, अब वो ही कुदरत संतुलन भी तो लाएगी।

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  3. हद हो गई मिथिलेश भाई...अब आपको समझाना बेकार ही है....

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  4. भाई तो मैंने कभी भी इतने गहराई से इतने गंभीर चिंतन नही किया पर आपकी यह प्रस्तुति मुझे बहुत अच्छी लगी...पश्चिमी सभ्यता तो अब हमारे देश पर भी हावी होने लगी...अब तो इधर भी कुछ आसार ठीक नही है....सही प्रसंग है भाई..

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  5. naari tu naaraayani !
    nar ki tuk to khar se milti hai ...

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  6. शबनम जी का कहना सही है दूबे भाई. आपको समझाना बेकार है. हम समझा-समझा के मरे जा रहे हैं कि हर आज़ादी की बात करने वाली औरत पश्चिम की नारी की तरह नहीं होना चाहती, पर आपलोग हैं कि समझते ही नहीं.

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  7. " पश्चिमी शैली की आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का नारा बुलन्द करती वर्किंग वुमन हो चुकने, आर्थिक स्वतंत्रता, समानता के नाम पर कुछ हद तक चारित्रिक स्वछंदता आदी के लिये चिल्ल-पों करती वीरांगनाओं को अपने से तीस-पैंतीस साल या २-३ पीढियों पहले यही सब कर चुकी पश्चिमी महिलाओं का हश्र देखना चाहिए। आज पश्चिमी समाज में ४५% से अधिक विवाहों की परिणिती तलाक है. एकल मां-बाप की संतानें एक सुविधा संपन्न स्वार्थी समाज में अपने स्वास्थ्य और अपनी कमाई के अलावा किसी और चीज़ के बारे में सोचते हैं और ना किसी और पर भरोसा ही कर सकते हैं. अमरीका में हर साल १.९ मिलियन लोगों को डिप्रेशन या अवसाद की शिकायत होती है जिनमें महिलाओं का प्रतिशत अधिक है. ऐसा क्यों है? "

    " bahu hi acchi post vastvikta ka darshan huva aur aapki baat bilkul sahi hai mat karo videshi mailao ka anukaran ..."

    " bahut hi sarahniy post ."

    ----- sacchai { AAWAZ }

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  8. .
    .
    .
    शबनम खान जी की टिप्पणी से पूरी तरह सहमत...

    सलीम खान तो अब विज्ञान लेखक हो गये हैं परन्तु लगता है कि भगवा सलीम खान का उदय हो रहा है...

    यह रही मेरी टिप्पणी, टुकड़ों में...

    भारतीय स्त्रियों ने अपने लिये सोचने का ठेका पश्चिमी नारियों को दे दिया लगता है!

    जबकि टेंडर दुबे जी ने डाला था।


    पश्चिमी नारी नें बराबरी का नारा बुलंद किया - वोट देने का अधिकार, न्याय का अधिकार, समान वेतन का अधिकार वो सब भारतीय नारी के पास कानूनी रूप से सुरक्षित ही है । इसके आगे सामाजिक स्थिती के मामले में भारतीय नारी क्या चाहती है खुद उसे नहीं पता!

    केवल मिथिलेश बाबू को पता है।



    अमरीका में हर साल १.९ मिलियन लोगों को डिप्रेशन या अवसाद की शिकायत होती है जिनमें महिलाओं का प्रतिशत अधिक है. ऐसा क्यों है?

    पर अवसाद तो हिन्दुस्तान में भी महिलाओं को ही ज्यादा होता है गूगल बाबा को सर्च कर देख लो।



    लेकिन ज्वलंत विचारों वाली आपकी सफ़ल कार्पोरेट विरांगनाओं, आपकी सुपुत्रियों के लिये दुल्हे मिलना मुश्किल होंगे क्योंकी भारतीय पुरुष भी पश्चिमी पुरुषों के समान औरत को “बिच्च” कह कर बुलाएंगे और उपभोग की वस्तु समझेंगे और उनसे विवाह करने से बचना चाहेंगे!

    अब आया समझ कि कमाऊ और काबिल होने के बावजूद मिथिलेश बाबू अभी तक क्यों घोड़ी नहीं चढ़े।



    वैसे अगर पश्चिम का अंधानुकरण ज़ारी रहा तो आनी वाली पीढी के भारतीय बाप अपनी स्वछंद बालाओं को रईस लडके फ़ंसाने की सलाह देंगे.।

    गरीब लड़के फंसाने की सलाह से तो निश्चित ही बेहतर सलाह है यह।




    ऐसे असुरक्षित समाज में औरत ये सिद्ध करना चाहती रहेगी की वो आत्मनिर्भर है और मर्द ये सिद्ध करना चाहता रहेगा की वो चिरयूवा है, तो वियाग्रा और डिप्रेशन की गोलियां बिकना लाजमी है - ये है पश्चिमी असुरक्षा - जिसकी जडें तथाकथित स्त्री सशक्तिकरण में छुपी हैं! गोलियां प्रेम और समर्पण का स्थान नहीं ले सकतीं ।

    पर प्रेम और समर्पण भी कभी वियाग्रा की गोली का स्थान नहीं ले सकता, Sidenafil की हिन्दुस्तान में बिक्री के आंकड़े सर्च करो कभी।



    भारतीय स्त्री जिस संतुलन को साध सकती है उसे पश्चिमी स्त्री नहीं साध सकी थी - वो एक साथ भारतीय पुरुष को उसकी कुंठाओं से मुक्त कर सकती है।

    भाई यह कुन्ठा केवल तुम में है सभी भारतीय पुरूषों को बेबात अपने साथ न घसीटो।

    आभार!

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  9. फिर वही रेटोरिक

    मिथिलेश भाई तुम बात का मतलब समझे बिना बोल देते हो, यही सबसे बड़ी दिक्कत है. वैसे तो तुम्हें समझाना बेकार है (जैसा यहां कहां है), लेकिन यह तुम्हारे नहीं, दूसरों के लिये है.

    1. पश्चिमी नारी कि जो 'स्थिति' कि तुम बात करते हो बंधुश्री उसमें नारी का नहीं उन पुरुषों का दोष है जो नारी कि स्वतंत्रता को गले नहीं उतार पा रहे. सच तो यह है कि पश्चिम में भी पुरुषों का आइडियल नारी का स्वरूप तुम्हारे स्वरूप से कुछ अलग नहीं है.

    2. मैडोना ने जो कहा है उसका मतलब भी तुमने गलत कहा मित्रवर. उसका मतलब है: मैं अपनी आजादी, अपनी मह्त्वाकांक्षा अपनी अरमानों का गला नहीं घोटूंगी, मैं उन्हें पाउंगी, अगर इसके कारण कोई मुझे 'बिच' कहे तो वही सही. भाई अगर तुम्हारी मह्त्वाकांक्षा और आजादी कोई चारदीवारी में बंद कर दे तो तुम्हारे जैसा पुरुष भी उसे वापस पाने की कीमत डॉग कहला कर चुका देगा.

    3. और तुमसे कहा किसने डियर कि पश्चिमी नारी को बिच कहलवाना पसंद है? ये बिलकुल बकवास बात है. एक काम करना जरा किसी पश्चिमी नारी को उसके मुंह पर बिच कहना, इतने जूते खाओगे की चांद गंजा जायेगी. पिक्चर देख-देख समझ बनाते हो क्या?

    4. एक बात समझ लो मिथिलेश मेरे दोस्त. तुम्हारे जैसे 400 और भी रोने लगे तो भी तुम समाज को पीछे नहीं लेकर जा सकते. तुम्हें औरतें डेकोरेशन और युटिलिटी कि वस्तु लगती हैं क्या? उपर से तुर्रा यह कि तुमने समझ लिया है कि उनका काम पुरुषों की कुंठायें मिटाना है.

    5. मैं यह देखकर हैरान हूं प्यारे कि यहां पर औरतें अपनी ही बात करने में इतनी डिफेन्सिव हुई जा रहीं हैं चाहे बकवास कैसी ही उल्टी-पुल्टी हो. शायद इसलिये इतने दिनों तक तुम्हारे जैसे लोगों कि दुकान चल रही थी.

    6. मिथिलेश भाई तुम्हारी पश्चिमी लिबेरेटड नारी को भी पहली बार मताधिकार जैसा आधारभूत मानवीय हक भी 1857 के आसपास मिला, मतलब सिर्फ 150 साल पहले. उससे पहले तो शायद वह मानव कैटेगेरी में भी शामिल नहीं थी़ं.

    यार तुम्हें तो नहीं लेकिन हमें तुम पर शर्म आती है.

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  10. समझाइस लाल जी

    आपका बहुत-बहुत आभार कि आप मेरे ब्लोग पर आयें । हाँ एक बात जरुर कहना चाहूँगा कि जो भी स्थिति हो रही है महिलाओं को लेकर उसमे आप जैसे चमचो का महत्वपूर्ण स्थान है । और हाँ ये कोई फिल्मी कहानी , जरा आखें खोलिए और ये लिकं देखिए , बिच्च वाली बात आपको समझ आ जायेगी

    http://www.foulmouthshirts.com/womens-t-shirts/You-Call-Me-Bitch-Like-Its-A-Bad-Thing-T-shirt.htm

    अरे नहीं समझाइस जी दुकानदारो से ज्यादा कमाई तो चमचो की होती है ।

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  11. मिथिलेश मेरे जिगरी, ये टी-शर्ट कोई इम्पीरिकल एविडेन्स है क्या जिसको दिखा कर तुम निर्विवाद रूप से साबित कर देते हो कि पश्चिमी लड़कियां गाली-पसंद करती हैं?

    यार तुम अरविन्द मिश्रा जी जैसे साइन्सदानों की सोहबत में रहते हो कुछ तो उनसे सीखो कि किसी भी थ्योरी को सत्य साबित करने के लिये किन-किन कसौटियों पर उतारना पड़ता है.

    ये एकदम फालतू, कबाड़ बात है जो तुम कहते हो, यह वेस्टर्न लड़कियों का चरित्र-हनन है. मेरे प्यारे दोस्त वहां भी परिवार होते हैं, मम्मी-पापा होते हैं, बहन भी होती है और भाई-बहन-मां-बाप का प्यार होता है.

    भाई मेरे यार, वहां भी इन्सान ही बसते हैं. हाड़-मांस वाले. उनके सीने में भी दिल होता है. तुम अपनी मां से प्यार करते हो? वहां भी लोग करते हैं.

    कभी तो समझोगे न?

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  12. सोच रहा हूँ कि शबनम के ही कमेन्ट को खुद का कोमेंट मानूं.... या फिर? ? ? ? ? ? ? ? ? ?

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  13. aap sab mithilesh k piche pad gye ha dosto...
    dekhiye mithilesh ko ab jaan gyi hu....aur yahi kahungi ki vo ek shaitan bacche ki tarha ha..sabko tang karte ha mithilesh bhai.... ab apki ye ada bhi acchi lagti ha...sach gussa hi nhi ata...chalo bhai ab smile karo...varna pta chala gusse me kal ek aur post isi tarha ki...are bhai CHILL.........

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  14. Bitch - In a feminist context, it can indicate a strong or assertive woman, one who might make men feel threatened (Wikipedia)
    मिथिलेश,
    इस शब्द का अर्थ मैंने ऊपर दिया है...
    मडोना ने यह बात इसलिए कहा क्यूंकि वो बताना चाहती है....यह उसकी ज़िन्दगी है...इसे कैसे जिया जाए इसका फैसला वो खुद करेगी और कोई नहीं...अपनी ज़िन्दगी को अपने कंट्रोल में लेना कोई दोष नहीं है...और अगर आज की नारी यह करती है तो बुराई क्या है....???
    अगर आज की नारी अपने जीवन के निर्णय खुद करती है तो इसमें इतना परेशान क्यूँ होना...बुद्धि-विवेक उसके पास है....उसके फैसले हमेशा जायज़ होंगे...ज़रुरत है भरोसे की...
    मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी है, शायद तुमने पढ़ी भी हो....पञ्च-परमेश्वर......जब कोई भी इंसान निर्णायक की कुर्सी पर बैठता है.....तो वह कभी स्वार्थी नहीं होता.....ज़रुरत है उसे वह आसन देने की....
    एक बार विश्वास करके देखो...तुम्हारा सारा भ्रम टूट जाएगा.......और प्रगति किसी के चीखने-चिल्लाने से रुकी है भला....नारी बदल रही है और साथ ही बदल रहे हैं नर.....आँखें खोल कर देखो अपने आस-पास....और तलाशो उनमें अच्छाई.....तुम्हें ज़रूर नज़र आएगी.....

    जहाँ तक तलाक की समस्या है पश्चिम के देशों में....निःसंदेह ज्यादा है...और इसका कारण है विचारों में टकराहट.....लेकिन यहाँ के लोग इसे एक भूल की तरह समझते हैं.........और एक-दुसरे से मैत्री भाव से अलग हो जाते हैं......अब अगर सिर्फ नारी के चुप रहने से शादी बची रहती है तो क्या यह उचित है की वह सारी उम्र चुप रहे ....सिर्फ इसलिए कि शादी बची रहे.....फिर जब विचार ही नहीं मिलते तो उस विवाह को क्यूँ ढोना.....जीवन एक मिला है...उसे अच्छी तरह जीने का हर किसी का अधिकार है....और इस अधिकार का इस्तेमाल करने में कोई बुराई नहीं अगर जीना सच-मुच दूभर हो गया है तो......

    पश्चिम में डिप्रेशन के कई कारण हैं......मौसम, काम का बोझ, आज कल आर्थिक स्थिति......
    मौसम बहुत बड़ा रोल अदा करता है....साल के ८-९ महीने बर्फ.....और ठण्ड...लोगों से बहुत कम मिलना जुलना, काम का बोझ बहुत होता है.....यहाँ हर इंसान भारत में जितना काम करता है उसका ३ गुना काम करता है... और आज कल आर्थिक स्थिति कि वजह से नौकरी जाने का खतरा तलवार कि तरह गर्दन पर लटकती रहती है.....इसलिए और ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है...

    महिलाओं कि शारीरिक संरचना भी इसमें बहुत बड़ा योगदान करती है.....जब कम उम्र हो तो एक किसिम कि परेशानी और जब उम्र ज्यादा हो तो दुसरे किसिम कि परेशानी....
    इस में प्रगतिशीलता उलटे अच्छा योगदान करेगी.....खुद पर जब भरोसा होता है तो फिर कोई भी dipressed क्यूँ होगा भला...

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  15. एक बात और .जो शायद बहुत असंगत नहीं है -.पश्चिम में विच (बिच नहीं )/डायन को वह अभिशप्त दर्जा नहीं मिला है जो यहाँ है -विकीपीडिया का यह उद्धरण देखिये -“At this day it is indifferent to say in the English tongue, ‘she is a witch’ or ‘she is a wise woman’”.[12]
    मागर भारत में अन्धविश्वास और नारी विरोध की पारंपरिक वृत्ति के चलते दीन हीन अबलायें किस तराह डायन कह कर मारी जा रही हैं यह शोचनीय है !

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  16. bahut khob..bahut satya kaha aapne...pashchim ki naari khud ko bitch kehena pasand karti hai...
    totally agree with u.

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  17. भाई मैंने जो ब्लॉग की दुनिया में स्त्रियों को और मुसलमानों को अपनी दुर्दशा प्रोजेक्ट करते देखा है वैसा वास्तविक जीवन में दूर दूर तक नहीं देखा न ही देश में स्त्री का ये हाल है न ही मुसलमानों का हां अपवाद कुछ हो सकते है वो तो कही भी होते है ,मेरे एक दोस्त को उसकी बीवी हफ्ते महीने में दो चार हाथ रसीद देती है पर वो बेचारा गांधीवादी है अब इसे क्या कहे ?? नारी समाज अत्याचारी है ???

    बिच का तो पता नहीं पर सुना है अम्रीका में पिम्प भी कहलाना सम्मानजनक हो चला है !

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  18. बहुत शानदार विश्लेषण. बधाई.

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  19. लिखने और कहने की स्वतंत्रता सबको है ........ और खुले मन से चर्चा करने में कोई परहेज़ नही होना चाहिए ............ कुछ हद तक सहमत हूँ

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  20. dubey ji.. aap ye batayen ki ishant aur nehra me se aap kise team me dekhna chahenge. aur parveen ke baare me aapne kuchh nhi kaha.

    pls reply..

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