Wednesday, January 6, 2010

नारी के प्रति वासनात्मक दृष्टि हटाकर हमें पवित्रता का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए

क्या ? अरे नहीं भाई मैं ही हूँ । जानता हूँ आप लोगो को लग रहा होगा कि मेरा ह्रदय परिवर्तन हो गया है , तो ऐसा कुछ नहीं है , मेरे लेखो से बहुत लोगो को लगता है कि मै नारी विरोधी हूँ , तो सच कह रहा हूँ कि नारी से श्रेष्ट तो कोई हो ही नही सकता , और ये शिगूफा मात्र नहीं , मैंने पिछे भी बहुत से उदाहरण दिये है , और कुछ आज भी देंने का प्रयास करूंगा , और ये भी बताऊंगा कि नारी के प्रति पुरुषो के क्या रवैये होने चाहिए ।हमारा यहाँ आज की महिलाए कहती है कि उन्हे दबाने की कोशिश की जाती है , इसमे सच्चाई भी है , लेकिन ये वे लोग करते हैं जो नारी शक्ति से अनभिज्ञ्य है , सच तो ये है कि नारी ही सर्वश्रेष्ठ है । हमें फिर इसके लिए पिछे की ओर ही जाना पड़ेगा , हो सकता है कि इसे बहुत से लोग कथीत कहें तो उनके लिए ये नहीं है ।

बात करते हैं ब्राह्मी महाशक्ति गायत्री की , गायत्री माता को एक देवी के रुप में चित्रित-अंकित किया गया है । प्रश्न यह उठता है कि गायत्री महाशक्ति को नारी के रुप में क्यों पूजा जाता है, जबकि अन्य सभी देवता नर रुप हैं । इसी प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि गायत्री महामंत्र में सविता देवता की प्रार्थना के लिए पुल्लिंग शब्दो का प्रयोग हुआ है , फिर उसे नारी रुप में क्यों माना गया ? इस प्रकार के प्रश्नो या शंकाओं के मूल आधार में मनुष्य की यह ,मान्यता ही काम करती है , जिसके अनुसार नर को श्रेष्ठ और नारी को निकृष्ट माना गया है , जो की अशिक्षा का अभाव है और कुछ नहीं , हाँ कुछ महिलाओं का कहा होता है कि ये अत्याचार है , तो ऐसा कुछ नहीं ।

स्त्री का वर्चस्व स्वीकार करने में कुछ पुरुषो को अपना अपमान समझ में आता है , जबकी सत्य तो यही है कि नारी ही श्रेष्ठ है । नहीं तो हम नारी शक्ति की पूजा क्यों करते , उसके सामने सर क्यों झुकाते । हमारे यहाँ आज से नहीं अपितु सदियो से ही नारी को सबसे उपर दर्जा दिया जाता रहा है । जो आपको इस प्रार्थना में भी दिखेगा

त्वमेव माता पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव
त्वमेव विद्दा द्रविणं त्वमेव , त्वमेव सर्वं मम देव देव ।।

प्रार्थना में जिंन संबंधो को गिनाया गया है उनमें माता का संबंध सर्वप्रथम है , सर्वोपरि भी है , क्योंकि माता से बढकर परम निःस्वार्थ , अतिशय कोमल , करुणा एंव वात्सल्य से पूर्ण और कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता । जब हम भगवान को माता मानकर चलते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया किसी सह्रदय माता के वात्सल्य के रुप में ही उपलब्ध होती है । ये सच बात है कि नारी के प्रति मनुष्यों में वासनात्मक दुष्टता की प्रवृत्ति जड जमायें रखती है , लेकिन हर व्यक्ति के साथ नहीं होता , ऐसा वही करते है जो नारी शक्ति से अपरचित रहते हैं । यदि इसे हटाया जा सके , नर और नारी के बीच काम-कौतुक की कल्पना मिटाई जा सके तो वीष को अमृत में बदलने जैसी भावानात्मक रसायन बन सकती है ,। नर और नारी के बीच जि 'रयि' और प्राण विद्दुत धारा-सी बहती है, उसका संपर्क वैसा ही प्रभाव उत्पन्न करता है, जैसा बिजली की 'निगेटिव' और पाजिटीव धाराओं के मिलन से बिद्दुत-संचार का माध्यम बनाया जाता है । माता और पुत्र का मिलन एक अंत्यन्त उत्कृष्ट स्तर की आध्यात्मिक विद्दुत धारा का सृजन करता है । मातृ स्नेह से विहीन बालकों में एक बड़ा मानसीक अभाव रह जाता है । भले ही उन्हें सांसारिक अन्य सुविधायें कितनी ही अधिक क्यों न हो ।

पत्नि , बहन , पु्त्री आदि के रुप में नारी भावनात्मक पोषण प्रदान करती है । नारी के रुप में हमें माता का ध्यान करना चाहिए और वासनात्तमक दृष्टि को मिटाने का प्रयास करना चाहिए । नारी के रुप में हम गायत्री की उपासना करते हैं और हमें शान्ति मिलती है । इसलिए हम पुरुषो का ये कर्तव्य बनता है कि नारी को समान अधिकार दें और उनको श्रष्टता का दर्जा दें , जिसमे हमारे साथ-साथ संसार का कल्याण है ।

नर की जननी होने के कारण वस्तुतः नारी उससे कहीं अधिक श्रेष्ठ है एंव पवित्र है । उसका स्थान संभवतः ऊंचा है । माता का पूज्य स्थान पिता एंव उससे भी ऊँचा है । पुरुष की अपूरर्ताएं नारी के स्नेह सिंचन से ही दूर होती हैं । इसलिए यदि नारी के रुप में हमारा ऊपास्य इष्ट हो तो वह औचित्य ही है । अनादिकाल से भारतीय धर्म ऐसी ही मान्यता चली आ रही , जसके अनुसार माता को ही नहीं पत्नी को भी पति से अधिक एंम प्रथम सम्मान मिला है । पति-पत्नि के सम्मिलित युग्म में पत्नि को प्राथमिकता है, । लक्ष्मी-नारायण , सीता-राम , राधे-श्याम , उमा महेश , शची-पुरंदर ,माता-पिता, गंगा -सागर आदि नामो में नारी को ही प्राथमिकता मिली है । कारण उसकी वरिष्ठता ही है । इस दृष्टि से भी यदि देवता का पुल्लिंग स्वरुप अधिक उत्तम है या स्त्रीलिंग स्वरुप तो उसका सहज उत्तर नारी के रुप में ही आयेगा । ऐसी दशा में यह शंका संदेह उचित नहीं है कि नारी को पूज्य स्थान या श्रेष्ठ क्यों माना जाता है । ऐसे प्रश्न नर की अंकारिता से उत्तपन्न होते हैं , तो आईये प्रण लें कि नारी सम्मान करेंगे और उन्हे हमेशा श्रेष्ठता की नजर से देखेंगे ।

30 comments:

  1. हमने पवित्र दृष्टिकोण ही अपनाया हुआ है....

    इस लेख से हम धन्य हुए... प्रभु....

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  2. ha ha ha ha ha ...insaan mat samjhna bas ....ya to dewi samjhna ya dasi...haha h aha h...
    good one

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  3. बहुत सार्थक चिंतन प्रस्तुत किया है भाई आपने.

    अंतर की गंगा में सारे कडुए कलुष चलो हम धो लें
    बँधी हुई दुस्‍तर गांठों को, सुलझे चिंतन से हम खोलें

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  4. अब क्या कहूँ, पहली कुछ पंक्तियों में आपने कमाल की बात कर दी। अब मैं क्या हूँ। शायद मैं भी आज वाली पोस्ट में यहीं कह रहा था, लेकिन कहने का अपना अपना ढंग है।

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  5. सार्थक आलेख....

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  6. दिल से निकली हुई बात है भाई,
    और यही है वास्तविक सच्चाई,
    वेद,पुराणों हर जगह व्याप्त है,
    जो यह दर्शानें को पर्याप्त है,
    परमेश्वरी,विश्वेश्वरी,जगदेश्वरी,
    नारी है समस्त लोकों में सर्वोपरि,

    सुंदर बात .अपने इस भाई का धन्यवाद स्वीकारें इस सुंदर आलेख के लिए..

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  7. हा जी मेरे छोटे शैतान भाई...तो वादा निभा ही दिया तुमने..आज एक ऐसा लेख लिख ही दिया जिसे पढ़कर सब एक बार चौंके ज़रूर होंगे... पर अभी भी काफी संकुचित दृष्टि में लिखा है।ऐसा मुझे लगा...
    आगे के लिए शुभकामनाएँ....

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  8. नारी ने कभी नहीं कहा कि उसे देवी माना जाय. इन्सान समझ लिया जाय यही बहुत बड़ी बात है. मेरा आपसे यही अनुरोध है दूबे भाई कि आप सभी नारियों को एक ही दृष्टि से देखें. फिर चाहे वह बहन, माता या सहचरी हो या कोई स्वतन्त्र नारी जो इन बन्धनों में बँधना नहीं चाहती. यदि आप स्त्री का सम्मान करते हैं तो आपको सभी स्त्रियों का सम्मान करना चाहिये सिर्फ़ अपनी बहन या बेटी का नहीं. शुभकामनाएँ!!

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  9. आदरणीय mukti दीदी जी

    कृपया ये बताने की कृपा करें कि मैंने कब किसी नारी को अपमानित किया , और कहाँ ?

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  10. @ मुक्ति जी !
    सब देख रहा हूँ यहाँ का हाल ..
    'फैज़' साहब का एक शेर याद आ रहा है ..
    '' वो बात सारे फसाने में जिसका ज़िक्र न था |
    वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है || ''
    ....... समझाना तो पड़ेगा ही ,,,

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  11. हालाँकि एक लेख में मैंने एक वेद मंत्र लिखा भी है ..." यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते , रमन्ते तत्र देवता " ...मगर अब लगता है कि नारी को बस एक सामान्य इंसान भर मान लिया जाए ...पुरुष की तरह की खूबियों और गलतियों के साथ स्वीकार किया जाए ....वही काफी होगा ...

    इतनी कम उम्र में नारी विषयक गहन शोध और चिंता पर मुझे चिंता हो रही है ....यदि इस युवा शक्ति का संकल्प और चिंता समाज और देशहित में होती तो क्या बात थी ...!!

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  12. सतत चलता विवादास्पद विषय

    बी एस पाबला

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  13. बढिया चिंतन किया आपने !!

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  14. agree to many of earlier comments especially by mukti and vani . !

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  15. बडिया आलेख मगर कितने लोग असर करेंगे वो पूजें बेशक न मगर इन्सान जरूर समझें । और चिन्तन करो बस ऐसे ही लिखते रहो आशीर्वाद्

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  16. जहाँ भी सांस्कृतिक जड़ें मजबूत है वहां नारी का सम्मान है श्रेष्ठ स्थान है. अत्याचार या अपमान केवल वही पुरुष करते हैं, जो अपने पुरुषार्थ से अनभिज्ञ हैं.

    मिथिलेश चूँकि आप उपदेश दे रहे हैं तो मैं भी यहाँ उपदेश दे ही दूँ.

    पुरुष धनात्मक चिंतन जारी रखें और विकास कार्यों में तल्लीन रहें. नारियाँ न स्वयं भटके और ना ही पुरुषों को भटकने दे. सबको सन्मार्ग दिखाते रहे.

    लेख अच्छा लिखा है आपने.

    नए भारत निर्माण की और कदम बढाए.

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  17. अच्छा आलेख...काफी गहन शोध और समय लेकर लिखा है....अच्छी कोशिश की है,अपना मंतव्य स्पष्ट करने की...किसी भी पुरुष या स्त्री की इस लेख से असहमति नहीं होगी...पर बात फिर वहीँ पर अटक जाती है कि अगर किसी नारी में ये सारे श्रेष्ट गुण ना हुए तो?..उसमे भी कुछ कमियां,कुछ गलतियां हुईं तो??..क्या उन्हें अपमानित करना चाहिए..नहीं...बस ये समझना चाहिए कि वे भी मनुष्य हैं और कुछ गलतियां कर के सीखने का,अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से जीने का .या अपने विचार बनाने का उन्हें भी हक है...बस इतनी सी बात सब समझ लेँ..फिर तो किसी विवाद की कोई गुंजाईश ही नहीं.

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  18. अपुन को तो नारी शब्द का ज़िक्र आते ही टेंशन हो रही है ,कही कुछ पढ़ कर आ रहा हूँ (डरते डरते )!

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  19. मुझे तो लगता है कि विज्ञ जन यदि अपनी प्रतिभा का प्रयोग नर और नारी में अन्तर और समानताएं ढूँढने, कौन छोटा-कौन बड़ा, कौन आगे-कौन पीछे, कौन ऊँचा-कौन नीचे, आदि की तुलना करने तथा किसी एक को सर्वोच्च घोषित करने हेतु तर्क इकट्ठा करने के बजाय दोनो को समान रूप से प्रकृति के दो अनुपम वरदान मान लें और इसी समदृष्टि से आचरण करें तो यह दुनिया बहुत बेहतर हो जाएगी।

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  20. सार्थक चिंतन है ........ ये चिंतन शायद हमारे समाज में ही है ......... आज शायद इस चिंतन को पुनः स्तापित करने की आवश्यकता है .........

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  21. आपको और आपके परिवार को नए साल की हार्दिक शुभकामनायें!
    बहुत बढ़िया लिखा है आपने!

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  22. न र ... लघु; ना री... दीर्घ... अब नारी बडी कि नर :)

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  23. लेख अच्छा लिखा है आपने.

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  24. लेख अच्छा लिखा है आपने.

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  25. जिस दिन पुरुष स्त्री को अपने बराबर का स्मझने लगेंगे उस दिन यह विमर्श ही बन्द हो जायेगा ।

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