Friday, February 5, 2010

मैं तो चला भई .............अब आप चाटो ( बाय - बाय ब्लोगिंग )-------मिथिलेश दुबे


मैंने आज ब्लागिंग को अलविदा कहने का मन बना लिया है , मैनें हमेशा वही लिखा और कहा जो मुझे सार्थक लगा । किसी को भी नीचा दिखाना मेरे समझ से परे रहा है और रहेगा । मेरे लेखन से अगर किसी को दुख हुआ है तो इसके लिए खुद को दोषी समझता हूँ । मुझे किसी भी मुद्दे ( हल्का - फुल्का या गंभीर ) पर बहस करना प्रिय लगा है हां यहां यह बात जरूर ध्यान देता हूँ कि सार्थकता बनी रहे अर्थात कुर्तक न हो ।

ब्लागिंग में मुझे आये हुए अभी कुछ ही महीने बीते हैं पर जो उत्साह चिट्ठाकारी को लेकर मैं आया था वह अब जाता रहा है । मैं किसी भी गुटबंदी का विरोध करता हूँ चाहे वो कहीं भी हो या किसी भी रूप में क्यों न हो ? लोग अपने से बड़े की आदतों से ही काफी कुछ सीखते हैं और मैंने बहुत कुछ ऐसा ही करने की कोशिश की पर मैं नाकाम रहा । मुझसे किसी तरह की चाटुकारिता न हो सकेगी । इसलिए मेरा यहां पर स्थान भी नही है । वैसे भी ब्लागिंग मैंनें स्वेच्छा से की और स्वेच्छा से इससे दूर भी हो रहा हूँ । जब तक हमको लक्ष्य का पता ही न हो तो अंधेरे में तीर चलाने से क्या फायदा ? मेरी समझ तो ऐसी ही लिखाई ( ब्लागियाई) हो रही है । कभी कभी कुछ पोस्टों को पढ़कर मन प्रसन्नचित हो जाता है । मगर कुछ लोगों को गांधीगीरी का शौक चर्राया है ( मगर ऐसे गुण नहीं हैं ) ।

मैंनें किसी एक को निशाना नहीं बनाया है मेरा सभी से निवेदन था कि सार्थक लिखा जाय और यह बात सभी के लिए लागू होती है । कोई " रंडी " लिखता है......... क्या अगर यहां पर " वेश्या " लिखा जाय तो गलत होगा ? लेकिन नहीं भई मेरा तो रूतबा है .....मेरी जी हुजूरी करने वाले हैं , जब चाहें अपनी बात के लिए बीसियों टिप्पणी कराकर तुमको धूल चटा सकते हैं । मैं किसी का नाम नहीं लूंगा पर जिस तरह से राजनीति हो रही है ब्लागिंग में मैं इसका समर्थन नहीं कर सकता हूँ । तुम्हारी मां.....तुम्हारी बहन की..... ..........मां बहन तक को नहीं छोड़ते गालियां देने में और यह किसी एक की समस्या नहीं है बल्कि हमारी सबकी है । मैं कभी भी अपने किसी भी पोस्ट पर बहस से पिछे नहीं हटा , जितने भी बहस हुए मैंने जरुर भाग लिया , क्योंकि मुझे लगा कि बहस होगी तो परिणाम जरुर आयेगा , विवाद कभी नहीं चाहा । लेकिन कुछ दिंन बाद समझ आयी कि यहाँ बहस करने से कोई फायदा नहीं होंने वाला । यहाँ आपके ज्यादा लिंक है लोगो से आपकी बात सर्वमान्य होगी , यहाँ बड़े लोगो का भी ग्रुप है जिसे आप गलत नहीं ठहरां सकते , वे चाहे जो लिखे ।


बातें तो न जाने कितनी गूंज रहीं हैं कानों में ......................पर अब बस यही सूझ रहा है । कई लोगों का साथ और स्नेह मुझे मिला चिट्ठाकारी के दौरान जिसका मैं सदा आभारी रहूँगा ।यहाँ मेरे बहुत से रिश्ते बंने , बडे भाई, दीदी माँ बहन दोस्त बहुत से रिश्ते जिन्होंने मुझे बहुत प्यारा दिया जो की मैं शायद कभी भी भूल ना पाऊं । जिन्होंने मुझे पढ़ा और मुझे प्रोत्साहित किया उनको धन्यवाद । मेरा किसी से भी किसी प्रकार का गीला सिकवा नाराजगी नहीं है , आप सब सही है । शायद उम्र कम होंने की वजह से कुछ बाते समझ नहीं पाया, इसके लिए अगर नादानी में मैंने किसी को कुछ भी अपशब्द कहा हो गलत भाषा का प्रयोग किया हो तो उसके लिए दिल से क्षमा मांगता हूँ । मैंने हमेशा कोशिश की , कि अपने से बडो़ को इज्जत दूँ अगर मैं ऐसा नहीं कर पाया किसी कारण वश तो उसके लिए भी क्षमा प्रार्थीं हूँ ।मेरे लिए यह फैसला लेना बहुत मुश्किल था , लेकिन दिल ने इजाजत दे दी । जारी रखिये आप लोग हिन्दी ब्लोगिंग को और आगे बढाईये ऐसे ही मैं तो चला यहां से...........................बाय-बाय ।

मिथिलेश दुबे

54 comments:

  1. अरे ये क्या हुआ? क्यों छोड़ रहे हो ब्लॉग्गिंग ? अरे बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी छोटी बातें तो होती रहती हैं...तो ऐसे छोड़ कर थोड़े न जाया जाता है...लिखो और बिंदास लिखो...बस

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  2. मिथलेश.... मेरे प्यारे छोटे भाई... ऐसा नहीं कहते... भाई... किसी को भी तुम्हारी कोई बात खराब नहीं लगी... यह सिर्फ तुम्हारा सोचना है... तुम्हारे लेखन को हम सब सराहते हैं... सब तुम्हे बहुत प्यार करते हैं.... अगर तुमने कोई गलती की भी है...तो सबने तुम्हे ... प्यार से ही समझाया है... सबसे तुम्हारे कोई ना कोई रिश्ते हैं... सब तुम्हारा भला चाहते हैं.... कम उम्र का जोश कभी गलत नहीं होता .... यही जोश क्रांति लाता है.... बहुत से ऐसे लोग हैं... जो सिर्फ कमियां निकलते हैं.... ऐसे लोगों का कोई लेवल नहीं होता... ऐसे लोग कम्पीटीशन नहीं करते... तो ऐसे लोगों की बातों में आ कर कोई गलत निर्णय नहीं लिया जाता... हम सब तुम्हे बहुत प्यार करते हैं... अगर तुमने कुछ गलत भी किया है... तो सबने तुम्हे माफ़ भी कर दिया है... ऐसा क्यूँ सोचते हो? तुम्हारे जाने से बहुतों को ख़ुशी भी होगी.... तो ऐसे लोगों को खुश होने का मौका क्यूँ देना?

    चलो अब एक प्यारी सी स्माइल दो.... और खुश रहो....

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  3. मिथिलेश, यार ये गलत है,
    अगर तुम समय के अभाव में ब्लोगिग को अलविदा कहते हो तो समझ आता है
    परन्तु ऐसा तो प्रतित नहीं हो रहा, माना ब्लोगिंग में खिचांतानी चल रही है,
    पर इससे आहत होकर ब्लोगिंग नहीं करना गलत है
    तुम बिना किसी भय के अपनी बात कहते हो, हमें यही भाता है
    जनप्रचलित अपशब्दो का प्रयोग तो उपन्यासों में भी होता है
    वो परिस्थितियों के अनुसार होता है, बात समझो
    ब्लोगिंग मत छोड़ो, तुम सिर्फ़ अपनी लेखनी पर ध्यान दो
    अगर कहीं गलत देखो तो बोलो, आहत कहाँ तक करोगे अपने दिल को यार
    जमाने में गम और भी है, ब्लोगिंग जारी रखो

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  4. देखते हैं प्रियवर!
    आप सोनिया गाँधी की भाँति
    अपनी बात पर अटल रहते हो या नही!

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  5. मिथलेश यह बात हमे रास नही आई।
    एकाएक ब्लाग जगत से जाने का फ़ैसला लेना तुम्हारा हमे अच्छा नही लगा।


    हमे कभी कोई गाने याद नही रहते पर आज कहते हैं।
    युं ना जाओ छोडकर, दिल अभी भरा नही।

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  6. मिथिलेश...अब तुम भी??...ओह्ह्ह...क्या है ये,बाबा ??कुछ व्यस्तताओं की वजह से मैं बहुत सारे पोस्ट्स नहीं पढ़ पायी...तुम्हारी लास्ट पोस्ट भी नहीं पढ़ा,अभी...इसलिए वजह मालूम नहीं...पर कोई भी वजह हो...
    इसमें ब्लॉग्गिंग छोड़ने की बात कहाँ से आ गयी?.तुम्हारी पोस्ट का हमेशा इंतज़ार रहता है...कुछ ना कुछ सबको कहने को मिलता है,उस पोस्ट पर...पक्ष में या फिर विरोध में....तुम एक सजग ब्लॉगर हो...और तुम्हारी बहुत जरूरत है,ब्लॉगजगत को..जैसी गंभीरता अपनी पोस्ट्स में दिखाते हो,वैसी ही अभी दिखाओ...और बस इस इरादे को राम राम कर के...वापस आ जाओ.

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  7. दुबे जी, आप चले जाएंगे ब्लागीरी छोड़ कर तो मुझे व्यक्तिगत रूप से दुख होगा। आशा है आप ऐसा नहीं चाहेंगे।

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  8. महफ़ूज अली और दिनेश जी की बात को ही मेरी बात समझे

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  9. मिथलेश हम पुन: आ गए,
    यह बात हमे रास नही आई।
    इस पर पुन: विचार करो।

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  10. ब्लागिंग करना एक व्यक्तिगत शौक है। दूसरे क्या कर रहे हैं क्या सोच रहे हैं उनपे इतना ध्यान देने की क्या जरूरत? करोड़ों हिंदी भाषियों के इस देश में कुछ हजार ब्लॉगर क्या सोच रखते हैं ये इतना भी महत्त्वपूर्ण नहीं। अगर आप को लिखने पढ़ने का शौक है ओ (जो कि स्पष्टतः है) तो उन लोगों तक पहुँचिए जो ब्लागिंग कम्युनिटी से बाहर जरूर हैं पर साहित्य व हिंदी अनुरागी हैं।

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  11. मुझे पहले ही पता था कि संगत का असर तो होता ही है , देखा हो गया न , जब मैं छोडने को तैयार हुआ तो तुमने जाने नहीं दिया , तो सीधी सी बात है कि मैं भी ....संडे को पहुंचो भाई फ़िर बात करते हैं , और हां ब्लोग्गिंग अपने लिए करते हैं पकडना छोडना होगा तो अपने लिए करेंगे या फ़िर अपनों के लिए .....है न ठीक बात ..कहीं नहीं जाना है
    अजय कुमार झा

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  12. अनर्थक पोस्‍ट,

    जिस दिन छोड़ना हो हमारी तरह छोड़ देना ताकि आवाज न हो, चिल्‍ला चिल्‍ला कर छोड़ना ठीक नही।

    आपने जो भी किया है, उचित किया है, उसमे कोई दो राय नही, और मै चाहूँगा कि आप मान मनौव्‍वल को भी महत्‍व मत दीजियेगा, ये ब्‍लागर लोग आपको मोह माया मे फांस कर जाने नही देगे, अपेक्षा है कि पहली बार कोई बंदा घोषणा करके ब्‍लागिंग छोड़ेगा और फिर वापस नही आयेगा।

    ऐसा करने पर आपको नाम चिट्ठाकारी की दुनिया मे ऐसा करने वाले पहले ब्‍लागर कह जायेगे।

    जय हिन्‍द :D

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  13. बहुत खतरनाक वायरस होता है भाई ब्लॉगिंग का .. ऐसे कह देने से नहीं जाता ।
    महफूज़... देख लेना भाई... अपनाइच भाई है क्या ..

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  14. मनन करो. कुछ दिन विराम और विश्राम ले लो. शायद मन बदले. अगर मेरी बात का बुरा लगा हो, तो क्षमाप्रार्थी.

    इन्तजार रहेगा फिर भी, शुभकामनाएँ.

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  15. अभी टंकी पर चढे हो, हमारी आकांक्षा है कि जल्दी ही उतरो और लिखना जारी रखो...

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  16. भई जो भी निर्णय लो, खूब अच्छे से सोच विचार के लेना...
    खूब लिखो,अच्छा लिखो ओर बाकी की चिन्ता छोडो..दुनिया ऎसे ही चलते रहने वाली है।

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  17. कुछ विश्राम के बाद आना , यही ठीक होगा ! वैसे गुंडों के डर कर भागने वाले कायर भी कहलाते हैं , तुम्हारे एक जाने से यहाँ किसी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला , उम्मीद है फिर सोचोगे !

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  18. मिथिलेश प्यारे,
    ब्रह्मचर्य से इंसान गृहस्थ में जाता है, फिर वानप्रस्थ और फिर संन्यास...ये ब्रह्मचर्य से सीधे संन्यास में छलांग...बात कुछ जमी नहीं...
    अनिल पुसदकर भाई की एक सीख एक बार फिर याद दिलाता हूं...अच्छा लिख, ब्लॉग पे डाल...बाक़ी सब चिंता छोड़ो, रामजी भली करेंगे...

    जय हिंद...

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  19. देखो भई, रूठना है तो रूठ जाओ, लेकिन टूटना नहीं।

    उस बच्चे की याद आ रही, जिसकी आंखों में जलेबी सुनते ही चमक आ जाती थी

    कहो तो आ जाऊँ, जलेबी ले कर :-)

    वापस आईए ज़ल्दी। आपका इंतज़ार हम भी करेंगे।

    बी एस पाबला

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  20. इस ब्‍लॉग जगत में आने के बाद आपपर सिर्फ अपना ही वश नहीं रहा .. जो आपकी मनमौजी चलेगी .. हमारा भी कोई हक है आपपर .. इतने अच्‍छे अच्‍छे आलेखों को पढाने की आदत जो बना दी है .. आपको आगे भी पोस्‍ट करनी ही होगी .. और जहां तक विरोध का सवाल है .. वो भी दर्ज करना पाठकों का ही अधिकार है .. आपलोग हिम्‍मत हारेंगे तो भला मैं कैसे यहां टिकूंगी ??

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  21. bandhu mithlesh jee, aisi batein to aapke reallife me bhi aaspaas milti hongi na ki gutbazi ya samuh aadi, to kya aap vaha se bhi aise palayan kar lete hain?

    agar nahi to yaha se kyn?

    dekhiye blog jagat me bhi to aakhir aadmi hi aayenge na to yaha ham kyn sab kuchh acchaa acchaa hi hone ki ummeed rakhte hain bhai...

    aasha hai aap meri baat samajh gaye hoge....

    baaki jaisa aap chahen

    shubhkamnayein....

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  22. प्यारे भाई मिथिलेश जी !
    सबसे पहले तो आपको उस श्रेष्ठतम कविता के लिए बधाई और मेरा हार्दिक अभिनन्दन जो आपने कल लिखी थी.........मैंने उस कविता को आधार बना कर आपकी तथा ओम आर्य, रूपचंद्र शास्त्री, पी सी गोदियाल, निर्मला कपिला, प्रिया, हरकीरत हीर, लावण्यम अन्तर्मन, देवमणि पाण्डे तथा अन्य ( कई नाम अभी याद नहीं आ रहे ) की कविताओं पर बड़ी सौम्य और सकारात्मक चर्चा लिखी थी, लेकिन जब टाइप करने के बाद मैं उसमे रंग भर रहा था तो अचानक मेरी भूल से पूरी चर्चा डिलीट हो गई तो दुबारा वैसी सुन्दर रचना लिखने में मैं आलस्य कर गया ...लेकिन आपकी कविता की सुखद अनुभूति अब भी अनुभव कर रहा हूँ .

    अब रही बात आपका ब्लोगिंग से मोहभंग होने की, तो भाई ! ये तो एक सिलसिला है दरिया की तरह, जो चलता रहेगा . न तो आपके लिखने से कोई बाढ़ आने वाली है और न ही न लिखने से कोई अकाल पड़ने वाला है लेकिन एक बात मेरी ध्यान से पढना ...

    किन लोगों से प्रभावित होकर महफ़िल छोड़ रहे हो ? उन लोगों से जिन्हें इतना भी सलीका नहीं है कि किस पोस्ट को कैसा रिस्पोंस देना चाहिए...मैं देख रहा हूँ कि अब तक 24 टिप्पणियां आपको मिली हैं और 7 पसन्द....यानी 7 लोग आपकी रुखसती से खुश हैं और उन्हें आपका जाना पसन्द है...जबकि एक भी व्यक्ति ने आपके पलायन को नापसंद का चटका नहीं दिया जबकि होना ये चाहिए था कि आपको अब तक 24 चटके नापसन्द के मिलते ताकि ये जाहिर होता कि लोगों को आपका जाना पसन्द नहीं है

    और भाई एक बात ख़ास........ये सौ पचास लोगों की परवाह मत करो, आपकी लेखनी का मूल्यांकन ये नहीं करेंगे, आने वाला समय करेगा और समय तब कर पायेगा, जब आप इस जाल पर कुछ अंकित कर जाओगे.. लोगों से घबरा कर अगर गुसांई तुलसीदास पलायन कर लेते, तो आज राम चरित्र मानस भी नहीं होती ........

    अपनी मर्ज़ी के मालिक बनो यार ! मुझे देखो, पिछले दस वर्षों से अकेला संघर्ष कर रहा हूँ ...पूरे देश के कवि एकजुट हो कर भी और लाख चाह कर भी मुझे ख़त्म नहीं कर पाए ..क्योंकि मैं सबको ठेंगे पे रखता हूँ और सच की राह पर चलता हूँ ..........मेरी जुबां, मेरी भाषा आम तौर पर कड़वी होती है लेकिन भावना सदैव विनम्र और मृदु होती है . ब्लोगिंग का लाभ ये न समझो कि चार लोग खुश या नाराज़ हो जायेंगे, बल्कि ये समझो कि आपकी कृति हमेशा के लिए अमर हो जायेगी . गूगल सर्च में फैलते जाओगे और लोग बरसों बाद भी आपको पढ़ते रहेंगे......

    कुल मिला कर ब्लोगिंग छोड़ने में कोई समझदारी नहीं है ऐसा मेरा सोचना है ..आप अपनी मर्ज़ी का निर्णय करने के लिए स्वतंत्र हैं . आपके लिए मेरी हार्दिक शुभ कामनाएं...........और हाँ, मैं आपका नियमित पाठक हूँ इसलिए ये इत्ती लम्बी टिप्पणी की है, मेरी टिप्पणी को अलबेला खत्री कवि की टिप्पणी मत समझना, एक पाठक की समझना

    जय हिन्द !

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  23. प्यारे मिथिलेश,
    ये क्या बुद्धूपना है...
    ऐसा थोड़े ही न होता है...ज़रा सी बात पर कोई घर छोड़ करा जाता है क्या नहीं ना?
    अरे तुम से सब बहुत प्यार करते हैं...कोई नाराज़ नहीं है बस तुम नाराज़ हो....खैर...कहीं नहीं जाना है...ये सब दिन बीत जायेंगे....
    हम आज तुमको फ़ोन करने वाले थे नहीं कर पाए ...लेकिन कल बात होगी तुमसे...और सब ठीक हो जाएगा...
    झा जी से मिलने जा ही रहे हो...उनसे बात करना और वो जो भी कहें सुनना...
    अब यहाँ क्या लिखें..कल तुमसे बात करेंगे...ओके
    दीदी..

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  24. isaka arth ham kya lagayen mithalesh bhai
    are rozzinnaa ham ye bhog rahe hain
    DIL PE MAT LE YAR'

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  25. जिगर मॉ बड़ी आग है..
    मिथिलेश भाई, मैं आपका मुरीद रहा ।
    हमें आप जैसे निडर लोगों की ही ज़रूरत है,
    आप मुझे अपना चेला बना लीजिये, या आप मेरे गुरु बन जाइये ।
    क्योंकि जिग़र कमज़ोर हुआ तो क्या, इधर भी वही आग है । रही आपके जाने की बात.. तो यह अमर सिंह सरीखा व्यक्तव्य है,
    क्योंकि आपने अभी हाल ही में अपने एक पोस्ट में लिखा है कि
    " आपने भाई यहा शुरु अपने मन से होता और खत्म सब के मन से , यही तो खासियत है हमारे हिन्दी ब्लोगिंग की । यहाँ आप अपनी मर्जी से जा ही नहीं सकते, । आप यहाँ आ गयें तो बस आ गयें, यहाँ आते ही आपके अच्छे सम्बन्ध बन जाते है, अच्छे रिश्ते भी मिल जाते है , लेकिन सबसे बडी बात होती है कि आपको उन रिश्तो को निभाना भी पडेगा , ईतने अच्छे सम्बन्ध बन जाने के बाद अब आप ये कहें कि मैं अब जा रहा हुँ आप लोगो को छोडकर, तो ऐसा थोडी ना होता है । "

    अब भला आप ही बताइये, जनता किसको सही समझे , और किस स्टैन्ड पर अमल करे ?

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  26. कही पे निगाह है कही पे निशाना ....बहुत खूब ....
    बड़े अगर गलत लिखते हैं और फिर उसमे सुधार भी कर लेते हैं तो क्या ये छोटो के लिए अच्छा उदहारण नही है ..??
    अब जब लगातार अच्छा लिख रहे हो तो ब्लोगिंग छोड़ जाने की जिद अच्छी नहीं ...लिखते रहो ...

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  27. किसी की बातों से खफा नहीं होते
    दोस्त दोस्तों से जुदा नहीं होते
    कुछ बातें कह देते हैं नादान इंसान
    क्योंकि इंसान-इंसान होते हैं खुदा नहीं होते

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  28. बस इतने से ही हार मान गये? अरे जीवन में तो कितनी ही आलोचनाएँ मिलेंगी, उन्हें कैसे झेलोगे?

    मिथिलेश! हमने जो कुछ कहा था वह तो तुम अपना हक समझ कर कहा था और हमारी नीयत तो भली ही थी। क्या बड़ों की बातों का इतना अधिक बुरा मानोगे? भाई पहले यदि कड़े शब्दों में कुछ कह दिया तो अब प्यार से कह रहे हैं कि मत जाओ कहीं, बने रहो हमारे साथ। कभी प्यार तो कभी तकरार तो होते ही रहता है परिवार में।

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  29. बाय बाय ब्लागिंग -ये शीर्षक मैंने कल रात ही सोचा था -आप ले उड़े ,बड़ी जलन हो रही है

    ज़रा ये बताईये आप ब्लॉग्गिंग से चले जाईयेगा तो किसका नुकसान या फायदा होगा .
    आज की दुनिया में नो बॉडी केयर्स एनी बॉडी एनी मोरे.
    अभी बड़ों से बहुत कुछ सीखिए और विनम्र बनिए
    लाठ साहब जैसा व्यवहार मत करिए
    यह हिन्दी ब्लागिंग ही जो आपकी तुनक मिजाजी को झेल रही है
    कटु वचनों के लिए मुझे दुःख है मगर जमीन पर रहिये
    हम आप के केवल और केवल शुभाकांक्षी हैं .

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  30. अरे भैया टंकी से उतर आओ, मौसी ने हाँ कर दी।

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  31. ये मेरा दीवानापन है या ब्लॉगिंग का सुरूर,
    तुम न टिपियाओ ना सही,
    हम टिपियायेंगे जरूर ,
    वरना इस वीराने में इक दिन
    घुट के मर जायेंगे हम.....

    मिथिलेश भाई, काफी गुस्से में हो ,
    ये आपका नहीं ये जवानी का है कसूर ....

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  32. प्रिय, मिथिलेश

    तुम जिस मनःस्थिति से गुजर रहे हो. तुम्हारा यह कदम उचित है. और मैं इसकी सराहना करता हूँ. सबसे पहले तो मैं यह बता दूँ, की मैं तुम्हे क्यों पढता हूँ.
    ... तुम युवावस्था से ही अपने हिन्दुस्तान की गौरवशाली सांस्कृतिक मूल्यों को समझते हो. निरंतर चिंतन मनन कर प्रभावशाली लेखन करते हो.
    ... सामयिक, राष्ट्रिय और ऐतिहासिक मुद्दों पर सार्थक और जिम्मेदार बहस करते हो.
    इतना पर्याप्त है, मुझे किसी के साथ चलने या हंसने बोलने के लिए.

    सिर्फ एक दोस्त/सहयात्री के नाते सलाह दे रहा हूँ.
    >> ब्लॉगजगत के किसी भी साथियों के अनुरोध या आलोचना पर तनिक भी ध्यान न दो. कारण तुम समझते हो, सभी लोगो/लेखको की अपनी एक मौलिक सोच होती है. वे उसी पर चलना पसंद करते हैं.
    मैंने भी आजकल सिर्फ अपने रूचि के अनुसार ही जरुरी ब्लॉग पर भ्रमण करता हूँ. वो भी समयाभाव में पूरा नहीं कर पाता हूँ. सो सबसे पहले अपना प्लात्फोर्म निश्चित कर लो. की मिथिलेश कलम चलता है तो उसका एक उद्देश्य है, ७० से ज्यादा प्रतिशत ब्लोगरी टाइम पास, मनोरंजन, या आपसी हालचाल, निरंतर दैनिक अधूरे बहस तक ही सिमित है. ऐसा मेरा मानना है. इसलिए फिर कहता हूँ, अपना एक उद्देश्य निश्चित कर लो, फिर चाहे सूरज निकले या न निकले, हवा चले या न चले, अपने उद्देश्य से मत भटकना. हमेशा अपने निर्णय और विचारों की कद्र करना.

    >> अब जो कह रहा हूँ, ऐसा करके देखो. अपने ब्लॉग का सिर्फ फोर्मेट डिजाईन और टाइटल बदलो. विचारधारा नहीं. टिप्पणी ओपशंस बंद कर दो. पोस्ट फीड्स सक्रीय कर लो. इमेल सबस्क्राइब बॉक्स लगा लो. ब्लोगरों से चर्चा सिमित रखो. ऐसा करने का मतलब इतना है की चंद ब्लोगर पाठकों से बाहर निकलकर नए नए पाठकों तक पहुंचना है. अपने आलेख में सारगर्भित तथ्य पर ध्यान दो. अधिक तार्किक पैराग्राफ और उदाहरणों के आधार पर टिप्पणियों में सवाल जवाब की गुंजाईश न छोडो. महीने में ३ ही पोस्ट लिखो मगर विवेकपूर्ण और शोधपूर्ण. जरुरी नहीं की अपना कीमती समय मांगे गए टिप्पणियों में नष्ट करो. मैंने कुछ महीने पहले ही, निषकर्ष में कुछ अपील करा था. यहाँ http://myblogistan.wordpress.com/ इस ब्लॉग में सिर्फ तीन पोस्ट हैं, जरुर पढना. और मैंने इसे वर्डप्रेस पर इसलिए बनाया था की मुझे टिप्पणी नहीं चाहिए था बल्कि अधिकाधिक लोगो/पाठको तक मेरा सन्देश पहुंचे.

    >> ब्लॉगजगत में विचरण कम करो. अभी बहुत कीमती समय चल रहा है तुम्हारा. अपने पेशे में अपना लोहा मनवाओ. अधिकाधिक संपर्क बनाओ.

    >> ध्येय ऐसा रखो जैसा की हमारे स्वामी विवेकानंद ने रखा था. राष्ट्र के पुनर्निर्माण के दिशा में अलख जगाये रखो.

    शुभकानाए....
    - सुलभ

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  33. सुलभ ने जो कुछ कहा है मैं उसका अनुमोदन करता हूँ.

    "ध्येय ऐसा रखो जैसा की हमारे स्वामी विवेकानंद ने रखा था. राष्ट्र के पुनर्निर्माण के दिशा में अलख जगाये रखो."

    सडक पर मैला पडा हो, कभी कभी उसमें पैर पड जाता हो, तो भी हम सडक चलना बंद नहीं करते. चिट्ठाकारी बंद न करो. सभी प्रेमीजनों के आग्रह का आदर करो. चिट्ठाकारी न छोडो!

    सस्नेह -- शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.IndianCoins.Org

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  34. मिथिलेश भाई… हिन्दी ब्लॉगिंग में टिकना हो तो बेशर्म बनना पड़ता है, जो बात सभी जगह लागू होती है वही इधर भी है, यानी यहाँ सबको खुश नहीं किया जा सकता… अपने मन की लिखो… जिसे पढ़ना हो पढ़ेगा, नहीं पढ़ना होगा नहीं पढ़ेगा। यहाँ चारों तरफ़ गुटबाजी है (हिन्दी ब्लॉगिंग है ना!!) बिना किसी गुट में शामिल हुए, मन की ठोके जाओ…। ऐसे भागने लगे, तो हो चुकी ब्लॉगिंग…। ब्लॉगिंग में ऐसा होता है शुरु-शुरु में, मेरे साथ भी हुआ था, लेकिन मन में एक वाक्य याद रखो… "भाड़ में जाओ, मैं तो ऐसा ही लिखूंगा, जिसे जो उखाड़ना हो उखाड़ ले…", बस फ़िर रास्ता आसान हो जायेगा…।

    अच्छे-अच्छे विषयों पर लिखो, अपने ब्लॉग पर फ़ीडबर्नर से सब्स्क्राइबर फ़ॉर्म लगाओ, अगर लोग तुम्हारा लिखा पसन्द करेंगे तो सब्स्क्राइब करके पढ़ेंगे, उन पर नज़र रखो, उनकी पसन्द का लिखो… एक बार सब्स्क्राइबर संख्या बढ़ेगी तब तुम पसन्द-नापसन्द के चटके, टिप्पणी संख्या आदि की बकवास से भी ऊपर उठ जाओगे…। इसमें थोड़ा समय लगेगा, लेकिन तब तक हौसला बनाये रखना पड़ेगा…। ऐसे भागने से काम नहीं चलेगा… :)

    यदि मेरा कहा बुरा लगा हो तो अग्रिम माफ़ी मांगने को भी तैयार हूं… लेकिन अपन तो ऐसे ही हैं भैया…।

    अब थोड़ा "लाइटली" एक बात और… बड़ी मुश्किल से घेर-घार कर हाँक-हाँक कर तो लोगों को हिन्दी ब्लॉगिंग के लिये तैयार कर रहे हैं, और इधर पिछले दरवाजे से बंधे-बंधाये लोग ही भागने लगें तो कैसे काम चलेगा? :) :)

    टिप्पणी कुछ ज्यादा लम्बी हो गई ना… क्या करें यह मेरी गंदी आदतों में शुमार है… :)

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  35. भाई मिथिलेश,
    ब्लागजगत किसी की बपौती नहीं है कि कोई किसी को यहाँ से निकाल सके. आपको लगातार पढता रह हूँ. समय मिलने पर टिप्पणियां भी दी हैं और पसंद के चटके भी. "रज्जु को रज्जु" ही कहने के आपके आग्रह का कायल भी हूँ वरना बहुत से लोग पोलिटिकली करेक्ट बनने के चक्कर में सच को सार्वजानिक रूप से स्वीकारने में कतराते ही हैं. यूँ "रणछोड़" की भूमिका में आ जाने और मैदान साफ़ कर देने से बात नहीं बनती. आशा है आप डटे रहेंगे.

    यार, यह यह जो सज्जन nice की मुहर लिए ब्लागजगत में विचरते हैं इन्हें कोई समझाओ. कहीं ऐसा न हो कि कोई इनकी लंगोटी लेकर भाग जाये और यह महाशय कह उठें "nice"...........

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  36. मिथिलेश,पता नही क्यों मुझे तुम्हारा इस तरह ब्लागिंग छोड़ने का फ़ैसला लेना अच्छा नही लगा।सच पूछा जाय तो ये मेरी भी आदत है और यंहा के अख़बारों मे नौकरी छोड़ने के लिये कुख्यात भी।ज़रा सा मतभेद हुआ दे दिया इस्तीफ़ा और चल पड़े अपने रास्ते।दोस्तों ने बहुत समझाया लेकिन अकड़ कुछ ज्यादा ही थी आज अब जाकर समझ मे आया है कि ऐसा करके मैं बुरे लोगों के लिये मैदान खुला छोड़ देता हूं।अब जबकि उम्र ढल रही है तो ये समझ मे आया है उसके बावज़ूद नौकरी छोड़ने का सिलसिला जारी है।ये सब मै अपनी तारीफ़ नही अक्र रहा हुं बल्कि इसलिये बता रहा हुं कि ऐसी बुरी आदत वाला होने के बावज़ूद संजीत के धकेल कर ब्लागर बनाये जाने के बाद से लगभग दो साल हो गये है यंहा जमा हुआ हूं।तुमसे क्या छिपाना,मुझ पर तो ब्लागर मीट कराने पर गुप्त उद्देश्य साधने का आरोप भी लग गया लेकिन मैं इसे छोड़ नही रहा हूं।ऐसा अगर नौकरी मे होता तो जो तुम्ने ऊपर लिखा है वो मैं बकता भी और हो सकता है कि दो चार हाथ जमा भी देता,मगर यंहा कुछ खराब लोगों को छोड़ दें तो ज्यादातर लोग अच्छे हैं और सच पूछो तो असली दुनिया के फ़रेब और मककरी से तंग आकर मैने इस आभासी दुनिया मे प्यार तलाशने की कोशिश की और बहुत ज्यादा अच्छे लोगों से रिश्ते भी बने।यंहा मै तुम्हे ज्यादा उपदेश नही देना चाहता बस इतना कहना चाहता हूं कि तुम अगर छोड़ कर चले गये तो वे लोग बिना लड़े ही जीत जायेंगे जो चाहते है तुम्हारे जैसा बेबाक और बहादुर ब्लागर न रहे।अब बहादुर लिख दिया है तो बहादुरी दिखाओ,रण छोड़ना नही है ऐसे लोग को मुंह तोड़ जवाब देना है।मुझे उम्मीद है एकाध बुरे लोगों की बुरी बातों से उपजी नाराज़गी और गुस्से को मुझे जैसे और मुझसे पहले अपना प्यार तुम पर बरसा चुके लोगों कि सदईच्छा गुस्से को शांत कर फ़ैसला बदलने पर विचार करने पर मज़बुर करेगी।वैसे अंतिम फ़ैसला तो तुम्हे ही करना है लेकिन मेरा आग्रह कि उस पर फ़िर से विचार कर लेना।

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  37. आप के प्रोफाइल पर आप कि आयु मात्र १९ वर्ष हैं । इस उम्र मे समाज के लिये नहीं अपने लिये सोचना चाहिये । अपनी पढ़ाई , अपनी रोजी रोटी , और अपने माता पिता के प्रति अपने कर्तव्यो का निर्वाह , ये जरुरत होनी चाहिये आप कि उम्र के व्यक्तियों कि । ब्लोगिंग या कोई भी ऐसा काम जिसमे आय कि सम्भावना न हो या जो हम को अपनी आयु के हिसाब से अपने कर्तव्यो से विमुख करे वो ना ही करे तो बेहतर होगाया । आप तो भारतीये संस्कृति के ज्ञाता हैं आप को वो चार अवस्थाए अवश्य याद होगी जिसमे हमारी जिनगी को ४ आश्रमों मे बांटा गया हैं । जिंदगी मे आप कि व्यक्तिगत उपलब्धिया जब पूरी हो जाए निसंकोच ब्लोगिंग मे आये । व्यक्तिगत कमेन्ट दे रही हूँ आशा हैं स्वीकार होगा मेरी शुभकामनाएँ!

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  38. @ rachna ji
    .
    aap bhee ghaat lagye baithee theen , jaise laga loha garam hai , waar kar dala - nirmam prahaar ...
    .

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  39. समय की कमी से जो न लिख पाया, वह बाद में महानुभावों ने लिख ही दिया है।

    टिप्पणियों में छिपे मर्म को पहचानें, विघ्नसंतोषियों की बातों पर ध्यान न दें।

    बी एस पाबला

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  40. यहाँ एक से बढकर एक विचार देखने को मिल रहे हैं। अब ब्लॉग जगत में तो ये सब चलता ही रहेगा।
    इस पर कोई रोक नहीं लगा सकता मेरे भाई। लेकिन इस तरह से मैदान छोड कर भागना भी उचित नहीं है, मैं तो इतना ही जानता हूं।
    --------
    ये इन्द्रधनुष होगा नाम तुम्हारे...
    धरती पर ऐलियन का आक्रमण हो गया है।

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  41. चिंता छोडो मजे से ब्लॉगियाओ. हैप्पी ब्लॉगिंग मिथिलेश दुबे जी

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  42. "जाते हो तो जाओ पर जाओगे कहाँ...बाबूजी तुम ऐसे लोग पाओगे कहाँ...."

    मिथिलेश जीवन में हमेशा वो नहीं मिलता जो हम चाहते हैं फूलों के साथ काटों की बात सबको मालूम है...एक आध कांता चुभ जाने से फूलों से प्रेम करना मत छोडो भाई...अभी तो जीवन की शुरुआत है...ख़म ठोक कर खड़े रहना सीखो...फिर देखो दुनिया कैसे झुकती है...लौट आओ भाई लौट आओ...

    नीरज

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  43. आपकी यह बात सिद्ध करती है कि आप सचमुच के बुतरू(बच्चे) और पलायनवादी हैं...इतने तुच्छ बातों से यदि आप इतने विचलित हैं तो जीवन की बड़ी चुनौतियों के सामने आप क्या करेंगे...किस किस से भागेंगे और कहाँ भागेंगे ????

    सच कहूँ तो मुझे,आपकी इस बात पर बहुत ही क्रोध आ रहा है...

    यदि आपकी निष्ठां सचमुच कुछ अच्छा सच्चा सार्थक और सकारात्मक करने में है,तो ऐसे ख़याल भी आपके मन में नहीं आने चाहिए...
    बाकी आप सोच लें..ऐसे कमजोर सोच रखने वालों को यहाँ से चले ही जाना चाहिए...

    सो बेस्ट ऑफ़ लक...

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  44. शुभ कामनाएं. भाई फिर आना.

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  45. मुझे अभी तक की टिप्पणियों /सुझावों में सबसे सुविचारित और व्यावहारिक टिप्पणी रचना की लगी है -ब्लागिंग जैसे अनुत्पादक काम में यौवन को झोंकना कतई उचित नहीं है मगर यह बात सामान्य साधारण लोगों पर लागू होती है मिथिलेश जैसे असाधारण व्यक्तित्व वाले युवा पर नहीं -सो, उत्तिष्ठ जागृत .....

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  46. अरे इतनी उथल पुथल हो गयी और मुझे पता भी नही चला???????? सब से पहले तो मैं ये नही चाहूँगी कि तुम कायरों की भाँति मैदान छोड कर जाओ तुम मे लिखने की प्रतिभा है उसे आगे बढाना है । ये जिस बात का जिक्र तुम ने किया है---- " रंडी " लिखता है......... इसे मैने भी पढा था पढ कर दुख नही बल्कि उस आदमी की कुंठित और घिनौनी मानसिकता पर रहम आया था शायद उसे माँ बहन के रिश्तों का एहसास ही नही है जो लोग अच्छा काम कर रहे हैं उन्हे ऐसे लोगों की परवाह नही करनी चाहिये हमे जिस ने पढना है पढना ही है। किसी गण्दे तालाब को बाहर किनारे पर खडे हो कर साफ नही किया जा सकता उसे साफ करने के लिये पानी मे उतरना ही पडेगा। बस एक ही बात है ऐसे लोगों से दूरी बना कर अपना काम करते रहो
    वैसे भी ब्लाग वुड एक् परिवार है जहाँ दो बरतन होंगे खडकेंगे भी। ये सब चलता रहता है अगर आपकी भावना सच्चे है तो किसी का डर नही । मेरा ये हुक्म समझ लो कि तुम ब्लागिन्ग नही छोडोगे। मेरे बेटे ही तो मेरा भी साहस हैं मुझे बिलकुल अच्छा नही लगा अपना निर्ण्य वापिस लो। बहुत बहुत आशीर्वाद्

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  47. अरे यार, तुम मैदान छोड़कर क्यों जा रहे हो
    खेल की तरह से ही जीवन को लो...............
    तुम्हारा ब्लॉग बहुत अच्छा है
    आप प्रवाह को बने रखो
    अपनी मौज से लेखन कर्म करो ,
    दूसरों से अप्रभवित रहकर

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  48. मेरे भाई ये सुनकर बड़ा ताज्जुब लगा की आप ब्लॉग छोड़कर जा रहे हैं! भला ये भी कोई बात हुई! आप खामखा दूसरों की बातों को दिल से ले रहे हैं! आपका ब्लॉग बहुत बढ़िया है और आपका हर एक पोस्ट मुझे बेहद पसंद है! ब्लॉग छोड़कर जाने का ख्याल दिल से निकल दीजिये! आपके अगले पोस्ट का इंतज़ार रहेगा!

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  49. मैंने आप का कोई लेख नहीं पढ़ा लेकिन मैं एक ही बात कहना चाहूँगा कि असली दुनिया हो या चिट्ठाजगत बुरे लोग हैं तो अच्छे लोगों की भी कमी नहीं। बस आप बुरे लोगों को छोड़कर अच्छों को देखें।

    मित्र हम पुराने पापी (ब्लॉगर) हैं, कइयों को टंकी चढ़ते देखा है। सबसे पहले टंकी चढ़ने वाले महानुभावाओं में ईस्वामी तथा सागर चन्द नाहर जी का नाम सम्मान सहित लिया जाता है। टंकी परम्परा के ये दोनों प्रवर्तक बाद में टंकी से उतर आये थे। उसी परम्परा के अनुसार कुछ अपवाद छोड़कर सभी टंकी से उतर आते हैं, आप भी उतर आयें।

    पुराने समय में हिन्दी चिट्ठाकारी का सतयुग बीतने के बाद जब चिट्ठाजगत में कलहप्रिय, ट्रॉल्स किस्म के लोग अन्य चिट्ठाकारों को परेशान करने लगे थे तो शुरु में हमें बहुत खराब लगता था पर धीरे-धीरे नजरअन्दाज करने की आदत पड़ गयी।

    बाकी ऊपर सुरेश चिपलूनकर जी की टिप्पणी से सहमत हूँ। मैंने भी अपने अनुभव से यही पाया है कि आप अपने मन की लिखते रहें किसी की परवाह न करें।

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  50. और हाँ मन की शान्ति के लिये ईस्वामी रचित टंकी चालीसा पढ़ें, आराम मिलेगा। :-)

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  51. दूसरे क्या कहते हैं उसकी चिन्ता छोड़िये जो आप को ठीक लगे वह कहिये।

    चिट्ठकारी आपके विचारों को मूर्तिरूप देती है - लिखते चलिये।

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