Tuesday, February 16, 2010

वो लड़की --------------------------------------------(मिथिलेश दुबे)


फटे पुराने कपड़े तन पर लिए,
झाड़ियों में घूमती वो,
हाथ में कुल्हाड़ी
और
सर पर लकड़ी का बोझ,
नंगे पांव सर्द हवाओं के बीच,
आंखों से टपकते आंसू उसके
कांटों के बीच टहलती वो,
कटकटाते दांतों की आवाज,
थरथराता उसका बदन,
ठंड ने आगोश में ले लिया था
सांवली सूरत को,
हर रोज नजर आती थी
वो लड़की,
कुछ अर्सा गुजरा
सब कुछ वैसा ही है,
पर वो लड़की नहीं है,
याद है -
उसका चेहरा,
उसके बाल -
जिस पर दो फीते लाल रंग के बंधे थे।
मासूमियत से भरा चेहरा,
अब बहुत दूर जा चुका है ,
जहां उसे सर्द हवाएं छू भी नहीं सकती।

32 comments:

  1. बहुत अच्छा ।

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  2. बहेतरीन प्रस्तुति .......

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  3. मिथिलेश, आपकी इस कविता में परिपक्वता झलक रही है और भावों डूबकर तो आप लिखते ही हैं. बहुत सुन्दर.

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  4. Bahut sundar, gahare bhavo se bhari rachana...shubhkamnae!!
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

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  5. बहुत सुंदर बच्चा लाल चलो आज से आपकी ट्यूश्न शुरू

    इन शब्दों को ठीक करो
    उसका बाल ---उसके बाल
    रंग के बधे थे ....बंधे थे
    बांकी सब टनाटन है , और लडकी की फ़ोटो अच्छी चुन कर लगाई है ,

    अजय कुमार झा

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  6. are waah !!
    aaj to alag hi rang hai..
    Mukti ji baat bilkul sahi hai..paripakwata dikhne lagi hai ab rachna mein...
    bahut hi acche bhav...sundar shabd-sanyojan..
    accha laga padhna ..
    didi..

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  7. अच्छी पहल..बहुत सुन्दर..

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  8. बहुत सुंदर पंक्तियों के साथ ....सुंदर रचना....

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  9. इक अनजानी का दर्द समझ कर कवि मन तड़प उठा
    सुन्दर रचना

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  10. बहुत सुन्दर!! भावपूर्ण रचना.....

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  11. क्या बात कही पंडित जी, अहा ! कितनी संजीदगी से। बहुत खू़ब।

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  12. संवेदनशील रचना.....बहुत अच्छी लगी.

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  13. अति सुंदर ओर गहरे भाव लिये है आप की यह रचना
    धन्यवाद

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  14. अरे तुम ऐसा भी लिखते हो.? बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना ...ये कविता शायद तुम्हारे सभी लेखो से अच्छी लगी मुझे..बेहद सुंदर अभिव्यक्ति.

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  15. कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की,
    बहुत ख़ूबसूरत मगर सांवली सी...

    जय हिंद...

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  16. बहुत अच्छा लगा. वाह!
    ...बधाई.

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  17. वाह!! क्या बात कही है और क्या अंदाज है, मिथिलेश!

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  18. ओह बहुत दूर काहली गयी वो -जहाँ से लौट कर कोई वापस नहीं आता
    प्रभावित करती कविता

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  19. अद्भुत कहने से अब कोई नहीं रोक सकता\

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  20. कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की,
    बहुत ख़ूबसूरत मगर सांवली सी... बहुत सुंदर पंक्तियाँ .....मिथलेश जी बहुत बहुत आभार ...आपकी सनेहिल भावना के लिए मेने आपकी बात मान भी ली है (अपनी फोटो बदल कर ) ,,,भला किसी दोस्त की प्यारी सी बात भी ना मानी जाये ऐसा केसे हो सकता है !धन्यवाद !

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  21. bahut hi sundar prastuti.......badhayi.

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  22. वह गई कहाँ ?
    कोई नहीं जानता !!!!!
    बहुत सुन्दर मिथिलेश भाई !

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  23. ...बहुत खूब, प्रसंशनीय !!!!

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  24. ऐसी लडकियाँ तो आस पास बहुत नज़र आती हैं मगर हम ही उन्हें देखने की कोशिश नही करते उस लडकी के लिये संवेदनायें अच्छी लगी। ऐसी लडकियाँ हमेशा गुमनामी के कोहरे मे ही जीवन गुज़ार देती हैं बहुत अच्छी लगी कविता
    बधाई और आशीर्वाद।

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  25. संवेदनशील ... दर्द का एहसास कराती है यह रचना ... ग़रीबी में सर्द हवाएँ अक्सर जीवन भी उड़ा ले जाती हैं ...

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