Friday, March 5, 2010

चिट्ठा चर्चा को ये अधिकार किसने दिया------- मिथिलेश दुबे

शायद ये सवाल आज तक किसी ने नहीं पूछा होगा । आखिर किससे पूछ कर मेरे लेख को चिट्ठा चर्चा पर प्रकाशित किया गया , मैं इतनी मेहनत से लिखता हूँ , चाहे जो लिंखू ये मर्जी है , लेकिन मेरे चिट्ठे को बिना मेरे इजाजात से क्यों प्रकाशित किया गया । चिट्ठा चर्चा किसका है ये मुझे नहीं पता , लेकिन ये जिसने भी किया है वह निहायत ही घटिया बेशर्म वाली घटना है । नाम चिट्ठा चर्चा है , जहाँ मैंने सुना है कि चिट्ठो की चर्चा की जाती है , लेकिन भड़ास निकालने के लिए मेरी पोस्ट जिस किसी ने भी किया उन्हे माफी मांगनी पड़ेगी , अन्यथा उनके खिलाफ उचित कार्यवाई की जायेगी , इस तरह किसी की पोस्ट को चुराना और तुच्छी लोकप्रियता के लिए ब्लोग पर डालना किसी भी नजरिए से सही नहीं है । ऐसा नहीं कि इस दिंन और भी पोस्टे नहीं आयी , आयीं बहुत सी पोस्टे आयी , लेकिन मात्र मेरे पोस्ट को क्यों स्थान दिया गया , इन सबका जवाब मुझे ब्लोग के कर्ताधर्ता से चाहिए,, उनकी ये जिम्मेंदारी बनती है कि वे लेखक से एक बार जरुर पूछे , पोस्ट प्रकाशित करने से पहले , खासकर इस तरह की चर्चा करने से पहले , ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा अभी, बस यही कहना है कि इस तरह की छोटी और तुच्छी हरकत बन्द करें चिट्ठा चर्चा वाले,

38 comments:

  1. ’चिट्ठा चर्चा ’में कई बार एक ही चिट्ठे की किसी प्रविष्टी की चर्चा होती है । ’छोटी ’ और ’तुच्छ ’ पोस्टों की चर्चा भी हो जाया करती है। सुजाता द्वारा चिट्ठेकारी पर किए शोध को पढ़ें । उन्हें लोकप्रियता के लिए आपके महान और मौलिक विचारों का उल्लेख करना पड़ा ? चिट्ठा-चर्चा के मंचों पर चर्चित चिट्ठे के लेखक से पूर्वानुमति लेने की इच्छा पहली बार प्रकट हुई है । इच्छाएं अक्सर मूर्खतापूर्ण भी हुआ करती हैं।

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  2. अफलातून से आगे मैं

    जिस तरह ब्‍लॉगस्‍पॉट ने अधिकार दिया है हमें कि हम अपनी इच्‍छानुसार कुछ भी लिखें छापें। उसी के तहत चिट्ठाचर्चा को यह अधिकार खुद ही प्राप्‍त हो जाता है। बदले में मिथिलेश जी उनकी चर्चा कर सकते हैं और बदला ले सकते हैं। वे भी नहीं पूछेंगे कि मिथिलेश जी को चिट्ठाचर्चा पर पोस्‍ट लिखने का अधिकार किसने दिया ?

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  3. किसी ने क्या ? कईयो ने बार-बार पूछा है. शायद आपको पता होगा कि लिंक लगाना भी नोटिस दिये जाने की श्रेणी मे आ जाता है. और भी वैधानिक मोड दिया जा सकता है. पर भाई लोग वकीलो से सेवा लेकर नोटिस क्यू नही भिजवाते?

    हम भी कुछ नोटिस बनाने-भेजने का फीस जुटा लेते, एड सेंसो ने तो साथ छोड दिया है अब ब्लागरो के आपसी नोटिसो से ही कुछ आनलाईन कमाई कर ली जाय. :)

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  4. हम तो इसे कल की चर्चा में शामिल करने के उद्देश्य से आये थे, पर यहां तो बात ही कुछ और है। मिथिलेश जी आप ही बता दें इसे शामिल किया जाये या नहीं?

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  5. एक कबूतर था। वह कभी मुंडेर पर बैठता कभी किसी डाल पर तो कभी कहीं तो कभी कहीं। एक बार वह एक ऐसे घर में घुस गया जिसमें कि एक दर्पण था। कई चीजें उस दर्पण में दिख रही थीं।

    कबूतर जैसे ही दर्पण के सामने पहुंचा, अचानक दर्पण में अपना अक्स देख चौंक गया। उसे बहुत गुस्सा आया कि यह दर्पण उसका अक्स किससे पूछ कर दिखा रहा है। लगा इतराने....कि क्यों...कैसे उसे दिखाया जा रहा है। भूल गया कि दर्पण का तो नेचर ही है कि जो दिखे वह दिखाये.....अब यह तो कबूतर की गलती है कि वह दर्पण के सामने गया।

    आप शायद पिछली किसी पोस्ट में तो ब्लॉगिंग को बाय बाय भी बोल चुके थे, फिर क्या मैं सो काल्ड ब्लॉगर्स की पुकार का असर मानूं या आपकी भीड जुटाउ चाहत जो आप फिर ब्लॉगिंग करने लगे ।

    खैर, इस तरह की पोस्टें लिख क्यूं अपना और लोगों का टाईम वेस्ट कर रहे हैं। अब ये न कहना कि मैंने थोडी बुलाया था यहां आओ औऱ मेरी पोस्ट पढो।

    राखी सावंतमय पोस्टें केवल भीड जुटाने का साधन होती हैं, इससे ज्यादा इनकी अहमियत नहीं होती।

    और हां, मैं जानना चाहता हूँ कि क्या आप की पोस्ट पहली बार चिट्ठाचर्चा में आई है या इसके पहले भी चिट्ठा चर्चा में आ चुकी है। यदि आपकी जानकारी में कई और पोस्टें आपकी चिट्ठाचर्चा में आई हैं तो तब आपने विरोध क्यों नहीं किया ?

    मैं नाहक किसी विवाद आदि में कुछ लिखने से बचता रहता हूँ, लेकिन आज पता नहीं क्या सोच कर यह टिप्पणी कर रहा हूँ। किसी बात से यदि आपको ठेस पहुँचे तो क्षमाप्रार्थी हूँ। वैसे भी आपने लिख रखा है - आपकी राय हमारे लिये महत्तवपूर्ण है । अपनी बात को बेबाकी से कहें :)

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  6. मिथिलेश जी,
    एक प्रश्न है, क्या ये पहली बार हुआ है कि आपके चिट्ठे का जिक्र हुआ है चिट्ठा चर्चा में?
    अगर हाँ तो आपका प्रश्न कम से कम ईमानदार है, अगर पहले भी आपका जिक्र हो चुका है और अब जागे हैं, तो गुड मार्निंग, ;-)

    दूसरा अगर आपको लगा है कि कुछ गलत हुआ है और बहुत खाली टाइम है तो अदालती नोटिस नोटिस खेल लो, जैसा कि कुछ लोग पहले भी खेलने की धमकी दे चुके हैं,
    वरना चिल मारो, बिंदास रहो और मौज से जियो, इस बार लगता है आप टिप्पणियों से थोडा व्यथित नजर आ रहे हैं, तो जवान देरी किस बात की लिख डालो अगला लेख,
    आप लिखो और जैसा मन आये लिखो, ये आपको स्वतंत्रता है, दूसरे सहमत तो अच्छा और असहमत तो और भी अच्छा...

    कभी कभी चिट्ठे पर ऐसा भी हो जाता है,
    मौज मौज में चिट्ठे का चर्चा हो जाता है | वाह हम भी शायर हो गए, :)

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  7. और ये जो गजरौला टाईम्स का प्रिंट लगा रखा है तो जरा उसके बारे में भी बताएं कि क्या गजरौला वालों ने आपसे अनुमति ली थी आपके बारे में अपने कॉलम में छापने से पहले ?

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  8. मिथिलेश जी, शांत हो जाइये,

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  9. मिथिलेश की चिंता और आक्रोश इस मामले में जायज है की इसके पहले तो चिट्ठाचर्चा ने इनकी किसी पोस्ट का जिक्र नहीं किया -अब क्या केवल चिट्ठाचर्चा मात्र एकल पोस्टों की चर्चा का भंडास निकालने का मंच बन रहा है? जिसे जो भी खुन्नस हो और जिससे भी हो चिट्ठाचर्चा खुला मंच बनता जा रहा है उनके लिए -पहुँचो और भोंपू बजा दो !बढ़िया हैं -लगता है जल्दी ही यहाँ नारियों और नारीवादियों का ही वर्चस्व होगा -मिथिलेश आदि हवा हवाई हो रहेगें!

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  10. दुनिया में मुद्दों की कमी नहीं .. फिर भी यदि आप नारी पर ही अपनी कलम चलाना चाहते हैं .. तो इस बात का ध्‍यान रखें कि आज कुछ प्रतिशत नारी उच्‍छृंखल है .. तो उससे अधिक शोषित भी है .. शोषितों के लिए कुछ काम करना सार्थक होगा .. जबकि उच्‍छृंखलों के लिए कुछ लिखना निरर्थक .. उम्‍मीद करती हूं कि मेरी बात को आप अच्‍छी तरह समझ चुके होंगे !!

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  11. चिट्ठा चर्चा के जिस अंक में आप का लेख छापा गया है उस का लिक इस पोस्ट में नहीं है। चिट्ठा चर्चा में आप का लेख खूब तलाशा लेकिन कहीं नहीं मिला। हाँ उस की चर्चा अवश्य है। चर्चा पर कोई भी कैसे प्रतिबंध लगा सकता है? यदि चर्चा पर प्रतिबंध हो तो किसी भी पुरुष को किसी भी स्त्री मामले पर चर्चा करने का अधिकार कहाँ से मिला? जहाँ से हमें अपने विचार प्रकट करने का अधिकार मिला है वहीं से आप के आलेख पर चर्चा करने का अधिकार भी प्राप्त हुआ है।

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  12. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत इतना मौलिक अधिकार तो संविधान दे ही देता है कि किसी के बारे में बात की जा सके.

    आप तो अपना सार्थक लेखन जारी रखें. शुभकामनाएँ.

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  13. सतीश पंचम जी की बात से सहमत

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  14. और यदि मजाक है तो .....फिर क्या कहने

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  15. मिथिलेश मैने तुम्हे लम्बा चौडा कमेण्ट लिखा था पर शायद उसे नज़र लग गई और वो पब्लिश नही हो पाया।मैं दोबारा वो सब तो नही कहना चाहता बस इतना कहता चाह्ता हूं कि प्यार बांटते चलो उतना ही ज्यादा प्यार मिलता चला जायेगा।वैसे भी ज़रूरी नही जो हमारे लिखे को गलत कहे वो हमारे शुभचिंतक नही होते,वे ना हो तो हमारे लेखन मे सुधार कंहा से आयेगा।निंदक नियरे राखिये सुना है ना।और देखों मिथिलेश जो कुछ यंहा शुरू हो रहा है वो क्या हमारी असली दुनिया मे कम है?वंहा के झूठ=फ़रेब और तनाव से बचने मेरे जैसे लोग इस आभासी दुनिया मे प्यार ढूंढते है और बिना देखे ही एक दूसरे पर सिर्फ़ लेखन के आधार पर विश्वास करते हैं,प्यार करने लगते हैं और अगर यंहा भी वही सब कुछ मिलने लगे तो?तुम अच्छे हो सब मान्ते हैं इसलिये इन सब फ़ाल्तू विवादों से दूर रहोगे ऐसा मुझे विश्वास है।बाकी तो तुम खुद ही समझदार हो।

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  16. मिथिलेश जी,

    एक सुझाव है कि अतिविवाद से बचे विवादित पल एक क्षण के लिये तो सुखानुभूति दे देते है किन्‍तु जीवन भर के लिये कडुवाहट दे जाते है। सार्थकता को अपनाएँ, आप बहुत अच्‍छा लिखते है आपकी लगभग सभी पोस्‍टो पर पहुँचना होता है किन्‍तु आपके विषय विषय चयन के कारण टिप्‍पणी सम्‍भव नही होती है।

    मै नही कहता कि वाद-विवाद गलत है अपितु इसे सार्थकता से जोड़ा जाये तो बेहतर होगा। आपकी राष्‍ट्रभक्ति से ओतप्रोत रचनाएँ मुझे पंसद रही है और मेरा मानना है कि आपकी एक अच्‍छे ब्‍लागर के रूप मे पहिचान उन्‍ही लेखो के द्वारा हुआ है।

    बरसाती बुलबुलो जैसे लेख विषय परिस्थिति के अनुसार ही अच्‍छे लगते है, हमेशा नही।

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  17. मैंने चिट्ठाचर्चा से बहुत बार कहा मेरा चिट्ठा शामिल करो, नहीं करते. आप पहले है जो शामिल किये जाने का विरोध कर रहे हैं. अगर आपका लिखा सार्वजनिक रूप से पढ़ने के लिए है तो चर्चा के लिए अनुमति नहीं लेनी पड़ती.

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  18. ये चिट्ठाचर्चा वाले ।
    कब सुनते हैं दिल के नाले ।
    चाहे कोई जोर लगा ले ।
    पोस्ट अपनी हटवाने को ।
    जीवन को सफ़र में राही ।
    मिलते हैं बिछड़ जाने को ॥

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  19. मिथिलेश जी,

    एक सुझाव है कि अतिविवाद से बचे विवादित पल एक क्षण के लिये तो सुखानुभूति दे देते है किन्‍तु जीवन भर के लिये कडुवाहट दे जाते है।

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  20. मेरी व्यक्तिगत राय यही है कि किसी की भी पोस्ट पर चर्चा हो लेकिन इस रूप में नहीं जैसी चल रही है.
    इससे किसी का भी भला नहीं होने वाला.पोस्ट अपनी स्वयं की होती है -विचार अपने होते है.
    सहमती-असहमति हो सकती है लेकिन इसको नर-नारी विवाद का रूप देना कहीं से भी उचित नहीं है.

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  21. अरे भैय्या सब कोई अब तुम पर पिल पडा है। कोई बात नहीं लगे रहो। तुम ने न तो कोई गलत बात कही है, न लिखी है।

    हां जहां तक चि्ट्ठाचरचा की बात है, चर्चा करना तो हरेक का मौलिक अधिकार है।

    दर असल समस्या चर्चा की नहीं है बल्कि यह है कि अनजाने तुम ने कुछ लोगों की दुखती रगों को छू लिया है। उन लोगों ने अपने "पैदल" तुम्हारे विरुद्ध चला दिये। बस यह है इस गुरिल्ला युद्ध का मर्म।

    लगे रहो, लिखते रहो। तुम्हारी आजादी पर कोई भी लगाम नही लगा सकता।

    सस्नेह -- शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
    हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
    मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
    लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??

    http://www.Sarathi.info

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  22. जरा मेरे आलेख

    http://sarathi.info/archives/2624

    को देख लेना जहां मैं ने तुम्हारे बारे मे लिखा है।

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  23. युवा जब अपनी उर्जा से ओत-प्रोत सोच को समाज के सामने रखता है तब ऐसे ही जलजला आता है. मैंने पहले भी लिखा था कि आपके लेखन और सोच में मुझे स्वामी विवेकानंद के विचारों की झलक मिलती है. ऐसे में समाज चाहेगा कि वह युवासोच के आगे न झुके. आप राष्ट्रसेवा कर रहे हैं. आज समाज सेवा कर रहे हैं. आप के कन्धों पर भारतीय संस्कृति की रक्षा की जिम्मेदारी है. ऐसे में विचलित होना उचित नहीं. आप अपना काम करें. समाज को रास्ता दिखायें.

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  24. मिथिलेश भाई,
    महाशक्ति एवं सारथी जी की टिप्पणी से पूर्ण सहमत हूं… कन्फ़्यूज़ न हों… दोनों अपनी जगह सही हैं… और मैं भी इस कटु विवाद (जिसे मैं भचान कहता हूं) को देख रहा था… इसलिये सुझाव हैं कि -

    सारथी जी ने अपने लेख में सभ्य शब्दों में कहा, लेकिन मैं उतना सभ्य नहीं हूं इसलिये खुलकर कहता हूं कि हिन्दी ब्लॉगिंग में "शातिर" लोग भरे पड़े हैं, जो अपना उल्लू सीधा करने के लिये कुछ भी कर सकते हैं, किसी भी गुट को हवा दे सकते है, पानी दे सकते हैं, खाद डाल सकते हैं…। इसलिये मेरी तरह मोटी चमड़ी वाले बनो और अपने मन की लिखो, किसी की परवाह मत करो… तुम्हारे उग्र विचारों वाले उर्जा से भरपूर लेख कई लोगों को बेचैन कर देते हैं, और जैसा कि शास्त्री जी ने कहा कि इसीलिये वे अपने "पैदल" मैदान में लड़ने के लिये छोड़ देते हैं।

    आपने अपने विचार रखे, किसी को पसन्द आयें न आयें कोई जरूरी नहीं, नेट पर माल पड़ा है कोई न कोई तो पढ़ेगा ही, कोई प्रभावित भी होगा… इसलिये हिन्दी ब्लॉगिंग की "सड़ान्ध" से दूर रहकर लिखना सीखो…। इधर एक नहीं कई "मठ" हैं, किस-किस की सदस्यता लोगे? किस-किस को खुश करने की कोशिश करोगे?

    बेंगाणी जी से भी सहमत हूं, जिस कथित चर्चा को आप इतना भाव दे रहे हैं, वहाँ कुछ "खास" चिठ्ठे, "खास" मौके पर, "खास" लोगों को खुश (या नाखुश) करने के लिये होते हैं। उसे इतनी तवज्जो देने की जरूरत नहीं है, और "टाइम-पास बहस" में पड़ने की तो बिलकुल भी आवश्यकता नहीं है…। लिखो और भूल जाओ, फ़िर अगला लिखो और उसे भूल जाओ… लोगों को भचभचाने दो।

    हो सकता है कि मेरी इस टिप्पणी को पढ़कर त्योरियां चढ़ें, सिलवटें पड़ें, ठुनका-ठुनकी हो… लेकिन परवाह कौन करता है, जिस तरह से आप को टारगेट बनाकर अकेले छोड़ दिया गया और घेरकर मारने की कोशिश हुई… यह बर्दाश्त नहीं हुआ। आशा है कि मेरे सुझावों पर अमल करेंगे और खुश रहेंगे (मेरी तरह) :)

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  25. मिथिलेश भाई,मस्त रहो, ओर इन लोगो से दुर रहो, यहां सभी तरह के लोग है, अच्छॆ बुरे, टांग खींचू भी, ओर सहारा देने वाले भी, इस लिये मस्त रहो ,ऎसे लोगो को ठोकर मारो

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  26. मिथिलेश जी ... आप अच्छा लिखते हैं .. मौलिक लिखते हैं .. खुल कर लिखते हैं .. अपना काम करते चलें ... कोई क्या करता है क्या फरक पढ़ता है ... उन्होने चर्चा करी तो करने दें ... आपका लिखा अपने नाम से लिखा तो ग़लत है ... बाकी गज की चाल चलें .. मक्खियाँ तो भिनाएँगी ही ..

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  27. सभी लोगों ने अपना राय दिया है और मैं सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूंगी मेरे भाई कि आप बढ़िया लिखते हैं और इसी तरह आगे भी लिखते रहिये और हम सब पढ़ने का लुत्फ़ उठाएंगे!

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  28. प्रिय मिथिलेश ,
    तुम्हारे बागी तवरों और शब्दों की तीक्ष्णता के अलावा विषय की सीमितता के कारण देर सवेर ये होना है ये तो मैं जानता ही था इसलिए जो कुछ भी हुआ उससे मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ ...चलो आखिर इसके प्रतिक्रिया स्वरूप ही सही महिला ब्लोग्गर्स को एक साथ ही सहमत होने का गौरव तो हासिल ही हुआ .....हालांकि मुझे खुशी तब और अधिक होती जब किरन बेदी को जबरन सेवा मुक्त करने के खिलाफ़ ऐसा कुछ होता या फ़िर आरूषि या रुचिका ...या छोडो ये सूची लंबी हो जाएगी ...चलो महिला दिवस पर ऐसा होना भी कुछ परिणाम तो लाएगा ही

    अब बात चर्चा की तो ..इसमें कोई संदेह नहीं कि चिट्ठाचर्चा मंच इसी उद्देशय के लिए है ..हां उसका उपयोग कौन से चर्चाकार अपने किस उद्देश्य के लिए करते हैं या कर रहे हैं ये देखने वाली बात रहती है ...और अब तो हमेशा ही .....तुम अपनी लेखनी जारी रखो ...बिना हतोत्साहित हुए ...हां विषयों में विविधता देखना अच्छा लगेगा ...

    अजय कुमार झा

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  29. मिथिलेश के आक्षेप को क्या कहूँ,
    सतीश पँचम जी की टिप्पणी को सवा-सौ प्रतिशत नम्बर !
    आदरणीय अफ़लातून जी तक तो पहुँचा भी नहीं जा सकता,
    किन्तु सतीश ने खरा पोस्ट-मॉर्टम किया है, मेरे लिखने को बचा ही क्या.. उल्टे ब्लॉगिंग मँच से ही एक अनिच्छा हो गयी ।

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  30. वैसे गलती तो मिथिलेश दुबे कर ही रहे हैं।
    जिसे चिट्ठा चर्चा कह रहे हैं वह तो अब चिट्ठा परखच्चा है!

    इन ब्लॉग-परिपक्वों को इतना तो समझना चाहिए कि सार्वजनिक मंच की अपनी गरिमा होती है। जिस बात को अपने ब्लॉग पर कहा जा सकता है उस बात को एक मंच की बैसाखी बनाकर रखना क्या कहलाएगा? मालूम नहीं।

    बेचारे टिप्पू चाचा भी कहीं माथा पकड़ कर बैठे होंगे कि यहाँ तो अब टिप्पणी चर्चा हो गई :-)

    बी एस पाबला

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  31. अरे भई, पाबला जी ने तो बहुत अच्छा याद दिलाया। मैंने तो केवल दर्पण आदि कह एक उदाहरण देने की कोशिश की थी। मीना बाजार आदि में तो ऐसे ऐसे दर्पण मिलते हैं जिसमें किसी पतले को मोटा, मोटे को पतला और नाटे को लंबा भी दिखाया जाता है। मेले आदि में तो इस तरह के दर्पण खूब देखने को मिलते हैं।

    वही बात यहां किस्म किस्म के ब्लॉग चर्चाओं में भी देखने को मिलती है। कभी ये चिट्ठाचर्चा तो कभी वो चिट्ठा चर्चा। और उसी में से किसी ब्लॉग की अच्छी पोस्ट पर कोई चर्चा तक नहीं होती और किसी बेतुकी पोस्ट पर हत्त तेरे की धत्त तेरे की चलती रहती है। तरह तरह के दर्पण हैं। अब हर किसी पर तो टोटल अक्स नहीं दिख पाता ये तय है, कोई कॉन्वेक्स है तो कोई कॉन्केव है। मुद्दा यही है कि लोग खुद को दिखना जैसा चाहते हैं, उसी अनुसार दर्पण भी चुन लेते हैं:)


    बाकी तो मेरा मिथिलेश जी से केवल वैचारिक मतभेद है कोई निजी खुन्नस नहीं...... और वैचारिक मतभेद भी कैसा.... मिथिलेश जी की जिस पोस्ट के बारे में कहा जाता है कि फलां ये फलां वो तो मैं यह कहूंगा कि मिथिलेश भाई ने मुद्दा तो सही उठाया है लेकिन उसमें एक तरह का अतिवाद दिख रहा है। घूम फिर कर मुद्दा नारी ये नारी वो पर केन्द्रित होता जा रहा है और उसमें घी डालने का काम एकाध चिलचिलाती टिप्पणीयां करती हैं। सो मामला बढता जाता है।

    जहां तक चिट्ठाचर्चा पर पोस्टों के बारे में है तो मेरी भी पोस्टें उस पर स्थान यदा कदा ही बना पाती हैं और मैं ऐसी उम्मीद भी नहीं करता कि मेरी पोस्टें वहां हो ही। चर्चा हो तो भी ठीक, न हो तो भी ठीक। जब समय मिला, मूड बना तो लिखता हूँ, जो छपा छपा न छपा तो कौन सा आसमान टूट पडा :)


    वैसे, मैने यहां पहले वाली टिप्पणी कर तो दी लेकिन मन में कहीं न कहीं कचोट रहा था कि यार नाहक इस विवाद में उलझ पडा :(

    मिथिलेश जी, कोई बात दिल पर न लें। मस्त हो लिखें, कोई गिला शिकवा नहीं है। मुंबईया भाषा में कहूं तो - टेंशन काए को लेने का :)

    अमर जी, आपकी तरह मेरे मन में भी कई बार ब्लॉगिंग मंच से अनिच्छा की स्थिति आई है लेकिन बात वही है, कहीं अच्छा है तो कहीं खराब। बस हमें चुनने की देर है, लेकिन बात वही है कि चुनें किसे, हर और से एक से एक लहर सी आती है कभी नारीवाद, कभी पुरूषवाद, कभी ये चर्चा कभी वो चर्चा।

    ऐसे में उन लहरों से बचकर या तो सागर किनारे खडे हो लहरों से उत्पन्न उर्मियों का आनंद लिया जाय या फिर खुद ही लहरों पर सर्फिंग की जाय :)

    वैसे आनंद तो सागर तट पर टहलते हुए भी लिया जा सकता है और यही सोच है कि ब्लॉगिंग में हूँ भी और नहीं भी.....Total virtuality :)

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  32. जिसे चिट्ठा चर्चा कह रहे हैं वह तो अब चिट्ठा परखच्चा है!

    इन ब्लॉग-परिपक्वों को इतना तो समझना चाहिए कि सार्वजनिक मंच की अपनी गरिमा होती है। जिस बात को अपने ब्लॉग पर कहा जा सकता है उस बात को एक मंच की बैसाखी बनाकर रखना क्या कहलाएगा? मालूम नहीं।

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  33. चिट्ठाचर्चा पर नारी टीम को बक अप करते हुए अनूप शुक्ल कहते हैं -
    "मुझे चक दे इंडिया का वह सीन याद आ रहा है जिसमें महिला हॉकी टीम की लड़कियां उनको छेड़ने वाले लफ़ंगों की वो तुड़ैया करती हैं कि देखकर मजा आ जाता है। "
    अब यहाँ लफंगे हैं मिथिलेश और अरविन्द मिश्र -
    ऐसी भाषा का प्रयोग किया जायेगा और हमसे अपेक्षा की जायेगी की हम विद्वानों की स्टीरियोटाईप सौजन्यता का उदाहरण प्रस्तुत करेगें ?
    अरे ऐसे प्रोवोकेशन पर तो हॉकी खींच कर भडुओं के मुंह पर धर दी जाती है आगे की दंतुलिमाल टूटे जाय तो बला से !
    हमसे तो कोई भी नपुंसक सौजन्यता की तनिक भी अपेक्षा न करे -हम परशुराम के जींस धारण करते हैं -एक हाथ में शाश्त्र एक हाथ में शास्त्र !

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  34. हमसे तो कोई भी नपुंसक सौजन्यता की तनिक भी अपेक्षा न करे -हम परशुराम के जींस धारण करते हैं -एक हाथ में शाश्त्र एक हाथ में Kuran शास्त्र !

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आपकी राय हमारे लिये महत्तवपूर्ण है । अपनी बात को बेबाकी से कहें ।