Saturday, March 13, 2010

क्या आप हिन्दू हैं ?------------मिथिलेश दुबे

'हिन्दू' शब्द मानवता का मर्म सँजोया है। अनगिनत मानवीय भावनाएँ इसमे पिरोयी है। सदियों तक उदारता एवं सहिष्णुता का पर्याय बने रहे इस शब्द को कतिपय अविचारी लोगों नें विवादित कर रखा है। इस शब्द की अभिव्यक्ति 'आर्य' शब्द से होती है। आर्य यानि कि मानवीय श्रेष्ठता का अटल मानदण्ड। या यूँ कहें विविध संसकृतियाँ भारतीय श्रेष्ठता में समाती चली गयीं और श्रेष्ठ मनुष्यों सुसंस्कृत मानवों का निवास स्थान अपना देश अजनामवर्ष, आर्याव्रत, भारतवर्ष कहलाने लगा और यहाँ के निवासी आर्या, भारतीय और हिन्दू कहलाए। पण्डित जवाहर लाल नेहरु अपनी पुस्तक 'डिस्कवरी आफ इण्डिया' मे जब यह कहते है कि हमारे पुराने साहित्य मे तो हि्दू शब्द तो आता ही नहीं है, तो वे हिन्दूत्व में समायी भावनाओं का विरोध नहीं करते। मानवीय श्रेष्ठता के मानक इस शब्द का भला कौन विरोध कर सकता है और कौन करेगा। उदारता एवं सहिष्णुता तथा समस्त विश्व को अपने प्यार का अनुदान देने वाले हिन्दूत्व के प्रति सभी का मस्तक अनायास ही झुक जाता है। हाँ इस शब्द का अर्थ पहले-पहल प्रयोग जिस ग्रंथ में मिलता है, वह आठवीं शदी का ग्रन्थ है 'मेरुतन्त्र'। इसमें भी हिन्दू शब्द का अर्थ किसी धर्म विशेष से नहीं हैं । इसके तैतीसवें अध्याय में लिखा है "शक एवं हूण आदि का बर्बर आंतक फैलेगा। अतः जो मनुष्य इनकी बर्बरता से मानवता की रक्षा करेगा वह हिन्दू है"। मेरुतन्त्र के अतिरिक्त भविष्य पुराण, मेदिनी कोष, हेमन्त कोसी कोष ब्राहस्पत्य शास्त्र, रामकोष, कालिका पुराण , शब्द कल्पद्रुम अद्भुत रुपकोष आदि संस्कृत ग्रंन्थो में इस शब्द का प्रयोग मिलता है। ये सभी ग्रंन्थ दसवीं शताब्दी के आस पास के माने जाते है।
इतिहासकारों एंव अन्वेषण कर्ताओ का एक बड़ा वर्ग इस विचार से सहमत है कि हिन्दू शब्द का प्रेरक सिन्धु नदी है। डा० वी डी सावरकर की पुस्तक 'स्लेक्ट इन्सक्रिप्सन' में कहा गया है, सिन्धु नदी के पूर्वी एवं पश्चिमी दिशाओ के बीच के क्षेत्र एंव पश्चिमी दिशाओं के बीच के क्षेत्र के निवासियों को फारस अर्थात वर्तमान ईरान के शासक जिरक एंव दारा हिन्दू नाम से पुकारते थे। आचार्य पाणिनी ने अष्टाध्यायी में सिन्धु का अर्थ व्यक्तियों की वह जाती बतायी है, जो सिन्धु देश में रहते हैं। पण्डित जवाहर लाल नेहरु के अनुसार हिन्दू शब्द प्रत्यक्षतः सिन्धु से निकलता है, जो इसका पुराना और नया नाम है। इसी सिन्धु शब्द से हिन्दू, हिन्दुस्थान या हिन्दुस्तान बने है और इण्डस इण्डिया भी। समकालीन इतिहासकार हिन्दू को फारसी भाषा का शब्द मानते है। फारसी भाषा में हिन्दू एंव हिन्दू से बने अनेक शब्द मिलते है। हिन्दुवी, हिन्दनिया, हिन्दुआना, हिन्दुकुश, हिन्द आदि फारसी शब्दो में यह झलक देखी जा सकती है। फारस की पुरब दिशा का देश भारत ही वास्तव मे हिन्द था।

वर्तमान भारत, पाकिस्तान बंग्लादेश एवं अफगानिस्तान इसी क्षेत्र का भाग है। फारसी शब्दावली के नियमानुसार संस्कृत का अक्षर 'स' फारसी भाषा के अक्षर 'ह' में परिवर्तित हो जाता है। इसी कारण सिन्धु शब्द परिवर्तित होकर हिन्दू हो गया। हिन्दू शब्द जेन्दावेस्ता या धनदावेस्ता जैसी फारसी की प्राचीन धार्मिक पुस्तक में सर्वप्रथम मिलता है। संस्कृत एवं फारसी भाषा के अतिरिक्त भी अनेकों ग्रंन्थो में हिन्द या हिन्दू शब्द का प्रयोग किया गया है।

श्री वासुदेव विष्णुदेवदयाल ने अपनी पुस्तक 'द एसेन्स आफ द वेदाज एण्ड एलाइड स्क्रिपचर्स' में पृष्ठ ३-४ पर आचार्य सत्यदेव वर्मा ने 'इस्लामिक धर्म ग्रंन्थ पवित्र कुरान के संस्कृत अनुवाद की भूमिका में श्रीतनसुख राम ने अपनी पुस्तक 'हिन्दू परिचय' के पृष्ठ ३१ पर लिखा है कि अरबी भाषा के एक अँग्रेज कवि लबी बिन अखतब बिन तुरफा ने अपने काव्य संग्रह में हिन्द एंव वेद शब्द का प्रयोग किया है। ये महान कवि इस्लाम से २३०० वर्ष पूर्व हुए है। अरबी 'सीरतुलकुल' में हिन्दू शब्द का मिलना यह अवश्य सुनिश्चित करता है कि यह शब्द यूनान, फारस एंव अरब देशों में प्रचलित था और यह भी कि विश्व की परीक्रमा में विभाजित अधिकतर समकालीन राष्ट्र इस शब्द को धर्म विशेष अथवा सम्प्रदाय विशेष के अर्थ में नहीं बल्कि सद् गुण सम्पन्न मानव जाति या क्षेत्र विशेष के अर्थ में प्रयोग करते थे।
हिन्दू शब्द से मानवीय आदर्शो का परिचय मिलता है। साथ ही सिन्धु क्षेत्र सम्बन्धित होने के कारण इससे हम अपना राष्ट्रीय परिचय भी पाते है। हिन्दू शब्द को जब हम साम्प्रदायिकता संकीर्णताओं से जोड़ते है तो हम अपनी महानता, विशालता एवं गर्व को संकुचित मानसिकता मे बन्दी बना देना चाहते है। भारत में अपना अस्तित्व रखने वाले सभी धर्मों, सम्प्रदायों की मान्यताएँ एंव उपासना विधि भाषा, वेशभुषा, रीतिरिवाज, धार्मिक विश्वास भले ही आपस मे न मिलते हो, परन्तु सभी अपना सम्मिलित परिचय एक स्वर में गाते हुए यही देते है, सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा । हो भी क्यों न, हिन्दू और हिन्दुस्तान इन सभी जातियों प्रजातियों एवं उपजातियों की मातृभूमी है। जहाँ सभी को रहने का समान अधिकार है।

मानवीय गौरव के प्रतीक इस शब्द से अपना नाता जोड़ने में महाराणा प्रताप एवं शिवाजी सरीखे देशप्रेमियों ने गर्व का अनुभव किया। गुरु गोविन्दसिंह ने भी इस शब्द के निहितार्थ का भावबिभोर होकर गान किया है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार हीन दुष्याति इति हिन्दू अर्थात जो अपनी हीनता एवं बुराई को स्वीकार कर उसे छोड़ने के लिए तैयार होता है वह हिन्दू है। 'द धर्मस्मृति' के अनुसार हिंसा से बचने वाला , सदाचारी ईश्वर की राह पर चलने वाला हिन्दू है। आचार्य माधव के अनुसार ओंकार मूलमन्त्र मे आस्था रखने वाले हिन्दू होते है। आचार्य बिनोबा भावे का कहना था, वर्णाश्रम को मानने वाला, गो सेवक, वेदज्ञान का पुजारी , समस्त धर्मो को सम्मान देने वाला , दैवी शक्तियों का उपासक , मोक्ष प्राप्ति की जिज्ञासा रखने वाला जीवन में आत्मसात करने वाला ही हिन्दू है। आज बदले हुए परिवेश में मान्यताएँ बदली हुई हैं। कतिपय चतुर लोग बड़ी चतुराई से अपने स्वार्थ के लिए, अहं की प्रतिष्ठा के लिए शब्दों का मोहक जाल बिछाते रहते है। बहेलिए की फाँसने वाली वृत्ति, लोमड़ी की चाल की अथवा फिर भेड़ियों की धूर्तता कभी उन आदर्शो को स्थापित नहीं कर सकती जिनकी स्थापना के लिए इस देश के सन्तो, ऋषियों, बलिदानियों ने अपने सर्वस्व की आहुति दे दी।

हिन्दुत्व की खोज आज हमें आदर्शवादी मान्यताओं में करनी होगी। इसमें निहित सत्य को मानवीय जीवन की श्रेष्ठता मे, सद् गुण-सम्वर्धन में खोजना होगा। धार्मिक कट्टरता एंव साम्प्रसायिक द्वेश नहीं 'वसुधैव कुटुम्ब कम्' का मूलमंत्र है। यह विवाद नहीं विचार का विषय है। स्वार्थपरता एंव सहिष्णुता अपनाकर ही हम सच्चे और अच्छे इन्सान बन सकते है। मानवीय श्रेष्ठता का चरम बिन्दु ही हमारे आर्यत्व एवं हिन्दुत्व की पहचान बनेगा,।

47 comments:

  1. बहुत श्रम किया गया है इस आलेख पर। वस्तुतः हिन्दू एक जीवन पद्धति है। जिस का किसी धर्म से संबंध नहीं है। वह सभी उदार धर्मों को अपने यहाँ स्थान देती है।

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  2. बहुत ही सुन्दर लेख दुबे जी। हिन्दू शब्द संकीर्णता का नहीं विशालता का भाव लिये है। हिन्दू हमारी संस्कृति, हमारे राष्ट्रवाद, हमारे गौरव का प्रतीक है।

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  3. lagta hai mithilesh kafi vishleshan kiya hai .........bahut sundar aur prerak aalekh.

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  4. व्‍यापक विचार के साथ के साथ लिखा गया लेख, हिन्‍दुत्‍व एक धर्म न होकर एक जीवन शैली है।

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  5. मिथिलेश, यही है वो ट्रैक जिस पर मैं तुम्हे हमेशा चलते देखना चाहता हूं...

    हीन दुष्याति इति हिन्दू अर्थात जो अपनी हीनता एवं बुराई को स्वीकार कर उसे छोड़ने के लिए तैयार होता है वह हिन्दू है...

    'द धर्मस्मृति' के अनुसार हिंसा से बचने वाला , सदाचारी ईश्वर की राह पर चलने वाला हिन्दू है...

    आचार्य बिनोबा भावे का कहना था, समस्त धर्मो को सम्मान देने वाला ही हिन्दू है...

    ये सब अनमोल वचन हैं...बस गांधी जी का एक दर्शन इसमें जोड़ना चाहता हूं...अगर कोई धर्म बार-बार मुंह से जताता रहता है कि वही सबसे सहिष्णु है, तो ये भी कहीं न कहीं खुद को श्रेष्ठतर देखने की ग्रंथि से ग्रस्त होता है...

    एक बार फिर गहन शोध और अच्छी पोस्ट के लिए बधाई...

    जब भी तुम्हारी ये झलक मुझे दिखाई देगी, कमेंट करने ज़रूर आऊंगा...

    जय हिंद...

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  6. प्रिय मिथिलेश , बहुत ही मेहनत से लिखा गया आलेख है .पढ कर मन प्रसन्न हो गया , अब लग रहा है कि ..ब्लोग्गर में धार है रे ..............
    अजय कुमार झा

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  7. बहुत मेहनत से लिखा गया होगा यह लेख ...शुभकामनायें मिथिलेश !
    १९ वर्ष में जो ओज और धार तुम्हारी कलम में है , निकट भविष्य में तुमसे नए आयाम कायम करने की उम्मीद करता हूँ !
    आशा है अपनी मौलिकता कायम रखोगे !

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  8. ब्लॉग का नया कलेवर अच्छा लगा और लेख भी. साधुवाद !!!

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  9. शब्दशः दिनेश राय जी

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  10. हिन्दुत्व की परिभाषा शायद अब स्वच्छ और प्रचारकों की समझ में आ जाये.

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  11. लगे रहो मुन्ना भाई...........,
    धर्म है या पद्धति, गर्व करने के लायक है। सह अस्तित्व,समन्वय एवम सकल विश्व के कल्याण की भावना इतने उदार रूप में शायद यहीं मिलेंगी। बधाई, मिथिलेश, एक अच्छे लेख के लिये।

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  12. अपनी हीनता एवं बुराई को स्वीकार कर उसे छोड़ने के लिए तैयार होता है वह हिन्दू है।.....अद्भुत

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  13. बहुत बढ़िया मिथिलेश....."
    प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com

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  14. उतम उतम उतम भाई...

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  15. bahut hi badhiya laga aaj padh kar...
    khush raho..!!

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  16. मिथिलेश के मानवता की ओर बढ़ते कदम। इन्‍हीं दमदार कदमों को अपने नेक विचारों के माध्‍यम से आगे बढ़ाते रहें। नए नए सोपान लहराते रहें। मानव और मानवता का गुणगान हो। जिससे नहीं कोई परेशान हो। सदा अपना ही सारा जहान हो।

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  17. बहुत बहेतरीन लेख ......पढकर काफी जानकारी हुई .......बहुत बहुत धनवाद.

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  18. वाह इस उम्र मै इतना अच्छा लिखते हो तो जरुर एक दिन नाम कमायोगे, बहुत सुंदर लिखा, मै भी दिनेश जी की टिपण्णी से सहमत हुं. धन्यवाद

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  19. मुझे खुद नही पता कि मैं कौन हूँ??
    लोग ऐसा कहते हैं!

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  20. मेहनत से लिखा गया लेख
    मौलिकता बनाए रखिए
    शुभकामनाएँ

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  21. सादर वन्दे!
    किसी बिंदु को अगर सूर्य के नजरिये से देखा जाये तो उसके प्रकाश की किरणे सर्वत्र दिखाई देती है, और यही आपके इस लेख में भी दिखाई देती है.
    रत्नेश त्रिपाठी

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  22. पहले के पोस्ट से हटके...अच्छा लगा....

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  23. आज तो तुमने बहुत ही अच्छा आलेख लिखा है . बहुत सुन्दर और परिश्रम के साथ लिखा गया है . बहुत बहुत आशीर्वाद !!

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  24. मिथिलेश भाई आज मन खुश हो गया तुम्हारा सुन्दर लेख पढ़कर

    बहुत मेहनत करी हैं लेख में, साधुवाद, खुशदीप भाई की बात पर ध्यान देना

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  25. प्रिय बंधू
    मिथिलेश जी सादर प्रणाम |
    आपका लेख पढ़कर ह्रदय प्रफुलित हो गया| इस लेख को लिखने में आपने जो कठिनतम प्रयास किये है मै इसके लिए आपको कोटि -कोटि शुभकामना देता हूँ | भविष्य में भी आपके द्वारा लिखा हुआ ऐसा लेख पढ़ने को मिले | आपका प्रश्न है कि क्या आप हिन्दू है ?....
    हाँ..... क्योकि वह सभी लोग हिन्दू है जो लोग गाय गंगा और मिट्टी से प्यार करते है |वेद के अनुसार सामाजिक पद्धति का संचालन करना ही हिन्दू है |
    शेष कुशल है
    आपका कुशलाकांक्षी
    अश्वनी मिश्र

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  26. आपने बहुत बढ़िया लिखा है! एक नए अंदाज़ के साथ बेहतरीन पोस्ट! बधाई! लिखते रहिए!

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  27. बहुत बढ़िया!
    दिनेश जी की बात से सहमत मैं भी यही मानती हूँ.

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  28. "मिथिलेश, यही है वो ट्रैक जिस पर मैं तुम्हे हमेशा चलते देखना चाहता हूं".खुशदीप जी से सहमत...
    मिथलेश ! यह हुई न बात ...बहुत मेहनत की है आपने और बहुत ही सार्थक लिखा है..कृपया यही दिशा बनाये रखना. .

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  29. My friend I have decided not to comment on your posts and also posts written in Hindi world.The Hindi world seems to be comprised of "hi-fi" intellectauls and a super dumb idiot soul like me seems to be a total misfit here in such elightened and refined souls of Hindi world.

    Well,only a rare occurence(like this one)of mine be seen in Hindi world.Why waste precious time of Hindi bloggers in making them read "shit" written by me ? So no more comments from me in the Hindi world reserved for qualified intellectuals.

    This is one such moment when I am once again sandwiched between rants of heart and mind.And like always ,I give way to the call of heart:-)) ..Ya dil ki suno dilwalo :-))

    Coming back to the topic I wish to state what Vivekananda had said about it :"The word 'Hindu' by which it is the fashion nowadays to style ourselves,has lost all its meaning,for this word merely meant,those who lived on the other side of the river Indus(in Sanskrit the Sindhu)...What word we should use then ?The other words which alone we can use are either Vaidikas-the follower of Vedas or better still Vedantists-the follower of Vedanta."

    Anyway,he is of the opinion that "there is no race on this earth to which the world owes so much as to the patient Hindu,the mild Hindu."

    http://books.google.co.in/books?id=ZLmFDRortS0C&pg=PA24&lpg=PA24&dq=Vivekananda+on+Word+Hindu&source=bl&ots=yN37AAD0YF&sig=2tP494LxFHqydXYDezH1UrEiHqg&hl=en&ei=i_ubS_m5D463rAexrrXSAg&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=2&ved=0CAoQ6AEwAQ#v=onepage&q=Vivekananda%20on%20Word%20Hindu&f=false

    And Mithilesh,though you write well,I feel you will soon give way to looking at issues from wide angles.You need to apply all the dimensions to have a picture perfect.You have given reference of Discovery Of India.Like to devote few words to it .

    "The word “Hindu” was thus not only robbed of all the pride and prestige it had acquired over the past several centuries, but also made synonymous with foreign invaders who had committed no end to crimes against the native people. The word no more designated the vast majority of this country’s population; on the contrary, it became the hallmark of a small minority which had conspired to masquerade as the majority. The Buddhists, the Jains, the Sikhs, and the Animists (new name for those subscribing to tribal religions) were taken out of the fold of Hinduism at one fell sweep. Finally, the “Dravidian South” was given a call to revolt against everything associated with the word “Hindu” - religion, culture, language, etc.


    This was the lore which was taught in school and college textbooks of an educational system which had been designed and was being controlled by the British establishment and the Christian missions. This was the lore which was given the pride of place in Communist pamphlets and periodicals which started to proliferate from the ‘twenties of this century onwards.And this was the lore by mouthing which a section in the Indian National Congress started strutting around as “progressive”, “radical”, “revolutionary”, "socialist", and the rest. Pandit Jawaharlal Nehru became the leader of this section after a brief visit to the Soviet Union in 1927. And he started fancying himself as a great historian when his Glimpses of World History and Discovery of India, which revelled in this lore, were hailed as classics by the prestigious press in this country and abroad.

    http://www.bharatvani.org/books/htemples2/app3.htm

    Yours sincerely,
    Arvind K.Pandey

    http://indowaves.instablogs.com/

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  30. "Ya dil ki suno duniyawaalo ya mujhko abhi chup rahne do,mai gham ko khushi kaise kah du jo kahte hai unko kahne do"

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  31. सुगठित सुसंस्कृत शब्दों में हिन्धू धर्म की व्याख्या ..
    बहुत बढ़िया मिथिलेश ....

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  32. Sari se to nahin lekin adhikansh baton se sahmat hoon Mithilesh.. ho sakta hai alag-alag itihason ki wajah se kuchh binduon par hamari samajh bant jati ho isliye..
    lekin koi shaq nahin ki ek behatreen lekh hai ye..

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  33. हम क्या कहे, सब कुछ तो सभी ने कह दिया...इस सार्थक आलेख को पढ़ कर बहुत अच्छा लगा.. बस शुभकामनाएँ देना चाहूँगा...

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  34. काफ़ी मेहनत से शोध करके लिखा गया लेख है । लोगों ने पसंद भी किया, मिल रही टिप्पडियों मे ज़ाहिर भी हो रहा है । अरविंद जी हिंदी ब्लॉगिंग से नाराज़ हैं लेकिन उन्होने भी जानकारी बढ़ाने वाली बातें लिख कर आप के लेख मे एक और पहलू दिया और इससे लेख और पूर्णता को प्राप्त हुआ । उन्हे आते रहना चाहिए और हम सब को उनके ज्ञान का लाभ मिले इस लिए मैं उनसे हठ पूर्वक आग्रह करूंगा कि वे नाराज़गी छोड़ कर आते रहें ।

    मैं सिर्फ़ यह जोड़ना चाहता हूं कि यह सारी परिभाषायें एक ऐसे समाज की आत्मा को खोजने की तड़प है जो लगभग आठ सौ वर्षों तक ग़ुलाम रहा । वह यह बताना चाहता है कि हमे कम मत आंको हम भी महान हैं । इसलिए पहली बात यह कि लगभग हर बात मे हम यह साबित करने लगते हैं कि दुनिया मे जो कुछ श्रेष्ठ है उसे हमारे पुरखों ने हज़ारों साल पहले ही खोज लिया था । जो थोड़ा सच हो सकता है पर थोड़ा झूठ भी होता है ।

    दूसरी कोशिश यह है कि एक ऐसी पहचान बनायी जाय जो पूरे भारत , कश्मीर से कन्या कुमारी और गौहाटी से गुजरात तक सबको एक सूत्र मे बांधे, जिससे सब इमोसनली जुड़ें । यह काम हिंदी कर सकती थी लेकिन प्रांतीय भाषाओं के समर्थक और भारतीय संविधान दोनों हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के समकक्ष ही रखते हैं ।

    इस हालात मे यह कोशिश जारी रहनी चाहिए कि कोई ऐसा सूत्र मिले जिससे सारा भारत एक इमोशनल सूत्र मे बंध सके , चाहे वह हिंदू शब्द को पुन: परिभाषित कर के या किसी और तरीके से ।

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  35. बहुत बढ़िया!

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  36. ारे इतनी गूढ और सुन्दर व्याख्या? शाबास । मै दिवेदी क्जी की बात को बिलकुल सही मानती हूँ। और दो पँक्तियाँ अपने जावाब मे कहना चाहती हूँ
    न हिन्दू हूँ नमुस्लमान हू<ँ
    मैं बस एक इन्सान हूँ
    शायद हिन्दू ध्र्म की यही मूल भावना है। बधाई इस आलेख के लिये। आशीर्वाद्

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  37. अद्भुत ,बहुत रोचक लेख ...बधाई स्वीकार करे

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  38. फैयाज बुलंदशहरीMarch 14, 2010 at 2:01 PM

    क्या 'हिन्दू शब्द भारत के लिए समस्या नहीं बन गया है?
    http://navyadrishti.blogspot.com/2009/12/blog-post_31.html

    आज हम 'हिन्दू शब्द की कितनी ही उदात्त व्याख्या क्यों न कर लें, लेकिन व्यवहार में यह एक संकीर्ण धार्मिक समुदाय का प्रतीक बन गया है। राजनीति में हिन्दू राष्ट्रवाद पूरी तरह पराजित हो चुका है। सामाजिक स्तर पर भी यह भारत के अनेक धार्मिक समुदायों में से केवल एक रह गया है। कहने को इसे दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय माना जाताहै, लेकिन वास्तव में कहीं इसकी ठोस पहचान नहीं रह गयी है। सर्वोच्च न्यायालय तक की राय में हिन्दू, हिन्दुत्व या हिन्दू धर्म की कोई परिभाषा नहीं हो सकती, लेकिन हमारे संविधान में यह एक रिलीजन के रूप में दर्ज है। रिलीजन के रूप में परिभाषित होने के कारण भारत जैसा परम्परा से ही सेकुलर राष्ट्र उसके साथ अपनी पहचान नहीं जोडऩा चाहता। सवाल है तो फिर हम विदेशियों द्वारा दिये गये इस शब्द को क्यों अपने गले में लटकाए हुए हैं ? हम क्यों नहीं इसे तोड़कर फेंक देते और भारत व भारती की अपनी पुरानी पहचान वापस ले आते।

    more:
    http://navyadrishti.blogspot.com/2009/12/blog-post_31.html

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  39. bahut mehnat se likha saargarbhit lekh...jo gyan dhara aapne pravahit ki....aage bhi umeed hai..u hi pravahit hoti rahegi.badhayi.aur shubhaasheesh.

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  40. मिथिलेश भाई, मेरी ये सोच आज और पुख्ता हो गई कि आपके लेखन और विचारों में मुझे स्वामी विवेकानंद की झलक मिलती है. हिन्दू से सम्बंधित ऐसा लेख पहले कभी नहीं पढ़ा. इतना खोजपूर्ण, इतना व्यापक लेखन करने वाले कितने हैं? बहुत कम.

    आपको साधुवाद. एक अद्भुत लेख के लिए.

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  41. अच्छा शोध है । ऐसे ही अच्छे विषयों पर लिखो। द्विवेदी जी का कथन सही है ।

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  42. अद्भुत ,बहुत रोचक लेख ...बधाई स्वीकार करे

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  43. मुझे भी लगता है की हिंदू एक जीवन दर्शन है .... जीवन की कला है ..... इसको मात्र धर्म की परिभाषा में बाँधना उचित नही है .... आपका लेख बहुत गहरे अध्यन से निकला है ...... बधाई इस अच्छे और सार्थक लेख के लिए .....

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  44. बहुत ही सुन्दर जानकारी परक व उपयोगी पोस्ट...वाह !!!

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