Monday, April 12, 2010

भारत को गुलाम बनाना बहुत आसान है क्योंकि ??? मिथिलेश दुबे

सन् १९४७ में भारत और भारतवासी विदेश दासता से मुक्त हो गये। भारत के संविधान के अनुसार हम भारतवासी 'प्रभुता सम्पन्न गणराज्य' के स्वतन्त्र नागरिक है। परन्तु विचारणीय यह है कि जिन कारणो ने हमें लगभग १ हजार वर्षो तक गुलाम बनाये रखा था , क्या वे कारण निशेःष हो गये है? जिन संकल्पो को लेकर हमने ९० बर्षो तक अनवरत् संघर्ष किया था क्या उन संकल्पो को हमने पूरा किया है? हमारे अन्दर देश शक्ति का अभाव है। देश की जमीन और मिट्टी से प्रेम होना देशभक्ति का प्रथम लक्षण माना गया है। भारत हमारी माता है उसका अंग- प्रत्यंग पर्वतो, वनो नदियो आदि द्वारा सुसज्जित है उसकी मिट्टी के नाम पर हमें प्रत्येक बलिदान के लिए तैयार रहना चाहिए। राणा प्रताप सिंह शिवाजी से लेकर अशफाक उल्लाह महात्मा गांधी आदि तक वीर बलिदानियो तक परम्परा रही , परन्तु अब यह परम्परा हमें प्रेरणा प्रदान नहीं करती। आज हम अपने संविधान मे भारत को इंण्डिया कहकर गर्व का अनुभव करते हैं, और विदेशियों से प्रमाण पत्र लेकर गौरवान्वित होने का दम्य भरते है। हमारे स्वतन्त्रता आन्दोलन की जिस भाषा द्वारा देश मुक्त किया गया, उस भाषा हिन्दी को प्रयोग में लाते हुए लज्जा का अनुभव होता है। अंग्रजी भक्त भारतीयों की दासता को देखकर सारी दुनिया हमपर हँसती है। वह सोचती है कि देश गूँगा है जिसकी कोई अपनी भाषा नहीं है उसको तो परतन्त्र ही बना ही रहना चाहिए बात ठीक है विश्व में केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ के राजकाज में तथा तथाकथित कुलीन वर्ग में एक विदेशी भाषा का प्रयोग किया जाता है। आप विचार करें कि वाणी के क्षेत्र में आत्महत्या करने के उपरान्त हमारी अस्मिता कितने समय तक सुरक्षित रह सकेंगी।

राजनीति के नाम पर नित्य नए विभाजनो की माँग करते रहते है। कभी हंमे धर्म के नाम पर सुरक्षित स्थान चाहिए तो कभी अल्पसंख्यको के वोट लेने के लिए संविधान में विशेष प्रावाधान की माँग करते हैं। एक वह युग था जब सन् १९०५ में बंगाल विभाजन होने पर पूरा देश उसके विरोध में उठ खड़ा हुआ था। परन्तु आज इस प्रकार की दुर्घटनाएं हमारे मर्म का स्पर्श नहीं करती हैं। सन् १९४७ में देश के विभाजन से सम्भवतः विभाजन-प्रक्रिया द्वारा हम राजनीतिक सौदेबाजी करान सीख गए हैं। हमारे कर्णधारों की दशा यह है कि वे किसी भी महापुरुष के नाम पर संघटित हो जाते है तथा उसके प्रतिमा स्थापन की विशेष अधिकारो की माँग करने लग जाते है। यहाँ तक कि राजघाट में राष्ट्रपिता की समाधि के बराबर में समाधि-स्थल की माँग करते हैं।

हमारे युवा वर्ग को विरासत में जो भारत मिलने वाला है उसकी छवि उत्साह वर्धक नहीं है। भारत में व्याप्त स्वार्थपरता तथा संकुचित मानसिकता को लक्ष्य करके एक विदेशी पत्रकार ने एक लिख दिया था कि भारत के बारे में लिखना अपराधियों के बारे में लिखना है। आपातकाल के उपरान्त एक विदेशी राजनयिक ने कहा था कि भारत को गुलाम बनाना बहुत आसान है, क्योंकी यहाँ देशभक्तो की प्रतिशत संख्या बहुत कम है। हमारे युवा वर्ग को चाहिए कि वे संघठित होकर देश-निर्माण एंव भारतीय समाज के विकास की योजनाओं पर गम्भीरतापुर्वक चिन्तन करें उन्हे संमझ लेना चाहिए कि हड़तालो और छुट्टियाँ मनाने से न उत्पादन बढता है और न विदेशी कर्ज कम होगा। नारेबाजी और भाषणबाजी द्वारा न चरित्र निर्माण होता है और न राष्ट्रियता की रक्षा होती है। नित्य नई माँगो के लिए किये जाने वाले आन्दोलन न तो महापुरुषो का निर्माण करते है और न स्वाभिमान को बद्धमूल करते हैं ।
आँखे खोलकर अपने देश की स्थिति परिस्थिति का अध्ययन करें और दिमाग खोलकर भविष्य-निर्माण पर विचार करें। पूर्व पुरुषो को प्रेरणा -स्त्रोत बनाना सर्वथा आवश्यक है। परन्तु उनके नाम की हुण्डी भुनाना सर्वथा अनुचित होने के साथ अपनी अस्मिता के साथ खिलवाडठ करना है। देश की अखण्डता की रक्षा करने में समर्थ होने के लिए हमें स्वार्थ और एकीकरण करके अपने व्यक्तित्व को अखण्ड बनाना होगा। देश की स्वतंत्रता के नाम पर मिटने वाले भारतविरों नें देशभक्ति को व्यवसाय कभी नहीं बनया। हमें उनके चरित्र व आचरण की श्रेष्ठता को जीवन में अपनाना होगा , आज देश की प्रथम आवश्यकता है कि हम कठोर परिश्रम के द्वारा देश के निर्माण मे सहभागी बनें।

48 comments:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. bilkul sahi kaha aassan nahi hai...gulaam banana

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  4. मिथिलेश, अच्छा लगा आपको पढ़ना। विचार क्रांतिकारी हैं आपके। इस शिक्षा व्यवस्था से जो उत्पाद निकलने हैं, उनसे ज्यादा आशा नहीं करनी चाहिये, और इसके जिम्मेदार हम सब भी हैं, जो अपने बच्चों को संस्कारयुक्त शिक्षा नहीं प्रदान करवा रहे हैं।
    आभार।

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  5. बौद्विक गुलामों को जागरूक करने की दिशा में आपका लेख बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।

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  6. आपकी बातों से सहमत हैं.

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  7. "सन् १९४७ में भारत और भारतवासी विदेश दासता से मुक्त हो गये।"
    Dubey ji, you haven't got your facts correct before writing here. We are still under foreign rule :)

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  8. हाँ मिथिलेश, इसकी सख्त जरुरत है आज.

    भारत में युवा शक्ति दुनिया भर में सबसे ज्यादा है. युवाओं को अपनी शक्ति पहचान कर विदेशी साजिशों को कुचलना होगा. बौद्धिक गुलामी जिस तेजी से फैली है, मुट्ठी भर देश द्रोही पर्याप्त होंगे, भारत को तोड़ने में.

    सुलभ

    (राष्ट्र जागरण धर्म हमारा)

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  9. विचारोत्तेजक लेख -सचमुच जिस देश की अपनी एक सर्वग्राह्य भाषा हो और वह अभिव्यक्ति के लिए एक विदेशी भाषा की परमुखापेक्षिता करता हो वह तो पिछलग्गू ही रहेगा -मानसिक गुलाम किस हद तक प्रगति कर सकता है ? समय आ गया है हम हिन्दी को राष्ट्र भाषा घोषित करें और सभी राज्यों में इसके पठन पाठन को अनिवार्य करें !अब समय शेष नहीं है ,समर भले हो!

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  10. गोदियाल जी ितनी महत्वपूर्म बात हमारे द्यान में क्यों नहीं आई।हम आपसे सहमत हैं।

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  11. सबसे पहले तो तुमको वापस आया देख बहुत ही अच्छा लगा...
    ज़रूर खूब मन लगा होगा....और परीक्षा अच्छी गयी होगी..
    आलेख बहुत ही अच्छा लिखे हो आज...
    बधाई..
    दीदी..

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  12. गोदियाल जी से सहमत,
    लेकिन आपने यह क्यों कहा कि "बनाना आसान है?" बने हुए तो हैं ही हम अभी… कौन से आज़ाद हो गये हैं… देखा नहीं आपने, न्यूक्लियर बिल पास करवाने के लिये मनमोहन साहब कितनी उठापटक कर रहे हैं… :)

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  13. बेहतरीन। लाजवाब।

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  14. देश की अखण्डता की रक्षा करने में समर्थ होने के लिए हमें स्वार्थ और एकीकरण करके अपने व्यक्तित्व को अखण्ड बनाना होगा।

    बहुत सुन्दर विचारोत्तेजक आलेख.

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  15. LORD MACAULAY ne is "FUTURE GULAMI" ka beej pehle hi bo diya tha. ab dekho ped-poudhe kab ugte hai ,

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  16. सादर वन्दे!
    अपनी सनातन शिक्षा से मिली मानसिक मजबूती ही थी की १००० वर्षों की गुलामी से आजादी मिली लेकिन लगता है कि जो गुलामी नहीं कर सकी उसे आज की विदेशी शिक्षा कर रही है.
    रत्नेश त्रिपाठी

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  17. " sahi aur sarthak mudde ko pesh kiya hai aapne padhker accha laga "

    ----- eksacchai{ AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

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  18. नारेबाजी और भाषणबाजी द्वारा न चरित्र निर्माण होता है और न राष्ट्रीयता की रक्षा होती है। नित्य नई माँगो के लिए किये जाने वाले आन्दोलन न तो महापुरुषो का निर्माण करते है और न स्वाभिमान को बद्धमूल करते हैं...

    ठीक कहा, भाषणबाज़ी से नहीं सही ढ़ंग से अपना कर्म करने से देश का भला होता है...

    मिथिलेश, इतने दिनों बाद तुम्हें पढ़ना अच्छा लगा...

    जय हिंद...

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  19. खुशदीप जी और अदा जी ने बिलकुल सही राय दी है!HUM उनका समर्थन करते है!



    कुंवर जी,

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  20. jab bhagat singh jel men the us waqt desh ke bade bade wakeel jinmen gaandhi aur nehru bhi shamil the ne unki rihaaee men koi dilchaspi nahin dikhaee (shayed wah kamyunist the isliye) lekin pata us mahan des bhkt shaheede azam bhagat singh ki waklat kisne ladi

    ?????????????
    ??????????
    ?????/

    nahin pata to jaan lijiye

    MOHAMMAD ALI JINNAH

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  21. गुलाम बनाना आसान है ...बात यही से शुरू कर ले ...क्या हम आजाद हैं ....??
    आजादी है तो सिर्फ बोलने की ...वो भी कुछ देर ही ...
    हिंदी राष्ट्रीय भाषा है ...कागजों में ...संविधान में ...
    व्यवहार में कितनी है ...खुद हिंदी की वकालत करने वाले अपने आप में झांक कर देख ले ...
    अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलवाने के बाद गाल बजाने जैसा काम कम से कम मैं तो नहीं कर सकती ...!!

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  22. मैं इस बात पर वाणी जी से सहमत हूँ.

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  23. Har Party sif apne vote bank ki rajniti ke lie ye kam kar rahi hai.

    Hame jagruk hona padega.

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  24. आपसे सहमत !
    इस देश में बसे तालिबानी फ़िरदौस और महफूज़ जैसे मुसलमानों का जीना हराम करने पर तुले हुए हैं. इनकी हरकतों के कारण ही इंसानियत पसंद लोग इनकी ' हमारी अंजुमन' छोड़कर जा चुके हैं.

    फ़िरदौस जी ने भारतीय सभ्यता की बात की, देश की बात की और इंसानियत की बात की तो इन लोगों ने उन्हें 'मुसलमान मानने तक से ही इनकार कर दिया.

    फ़िरदौस जी के एक लेख का अंश, जिसने तमाम तालिबानियों की नींद हराम कर दी-
    "मज़हब के ठेकेदारों के खौफ़ से हम हिन्दू धर्म अपना लें, ऐसा कभी हो नहीं सकता...क्योंकि
    पलायन हमारी फ़ितरत में शामिल नहीं है... यानि 'न दैन्यम न पलायनम'
    हमने कट्टरपंथियों के विरोध से घबराकर हिन्दू धर्म अपना लिया तो...हमारी कौम की बहनों का क्या होगा...???

    हम बेशक मज़हब के लिहाज़ से मुसलमान हैं, लेकिन सबसे पहले हम इंसान हैं... और मज़हब से ज़्यादा इंसानियत और रूहानियत में यक़ीन करते हैं... हम नमाज़ भी पढ़ते हैं, रोज़े रखते हैं और 'क़ुरआन' की तिलावत भी करते हैं... हम गीता भी पढ़ते हैं और बाइबल भी... क़ुरआन में हमारी आस्था है, तो गीता और बाइबल के लिए भी हमारे मन में श्रद्धा है... हमने कई बार अपनी हिन्दू सखियों के लिए 'माता की कथा' पढ़ी है... और यज्ञ में आहुतियां भी डाली हैं...

    अगर इंसान अल्लाह या ईश्वर से इश्क़ करे तो... फिर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उसने किसी मस्जिद में नमाज़ पढ़कर उसकी (अल्लाह) इबादत की है... या फिर किसी मन्दिर में पूजा करके उसे (ईश्वर) याद किया है..."

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  25. महत्त्वपूर्ण लेख।
    अभी हम उपभोगता की चकाचौंध में अंधे हो गए हैं । इसलिए समझने की स्थिति में नहीं हैं। यह गुलामी अभी और रहेगी।

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  26. विचारोत्तेजक पोस्ट !!!!

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  27. tumhara lekh hai bhai achchha hi hoga jaisa ki sabhi comment kah rahe hain.. chatka laga diya hai.. baki sham ko :)

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  28. सहमत हैं आपसे मिथिलेश.

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  29. विचार करें कि वाणी के क्षेत्र में आत्महत्या करने के उपरान्त हमारी अस्मिता कितने समय तक सुरक्षित रह सकेंगी

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  30. आपके विचार पढ़कर अच्छा लगा ,सुंदर आलेख ,और अच्छे विचारो के लिए बधाई .दुःख यही हैं की हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओ पर अच्छी पकड़ रखने वाले को भी सिर्फ अंग्रेजी नहीं आने से काम शिक्षित मना जाने लगा हैं .उम्मीद दुनिया कायम हैं ,शायद इस सोच में कभी बदलाव आये

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  31. काफी समय बाद आ पाया हूँ आपको पढने मिथिलेश , आशा है बुरा नहीं मानोंगे ! बहुत बढ़िया लगा तुम्हे पढ़कर शुभकामनायें !

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  32. काश हर भारतीय इस तरह की सोच रखे तो कुछ सुधार हो
    बहुत अच्छा लिखा है ।

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  33. दिक्कत यही है कि भारत में लोग महापुरुषों में अपनी-अपनी कौम बिरादरी के छाँट कर उन्हें अपनी जागीर घोषित कर लेते हैं। उनकी शिक्षाओं, उनके आदर्शो पर कोई चलता नहीं।

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  34. bahut acchha lekh hai ,apna karya karte rahna ek din samaj khada hoga hi .
    dhanyabad

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  35. Tera baibhaw amar rahe ma ham din char rhe na rahe.aise logo par rashtra chal raha hai.

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  36. ऐसे लेखोँ की समाज को आवश्यकता है ।

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  37. ऐसे लेखोँ की समाज को आवश्यकता है ।

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  38. ऐसे लेखोँ की समाज को आवश्यकता है ।

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  39. ऐसे लेखोँ की समाज को आवश्यकता है ।

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  40. ऐसे लेखोँ की समाज को आवश्यकता है ।

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  41. ऐसे लेखोँ की समाज को आवश्यकता है ।

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  42. ऐसे लेखोँ की समाज को आवश्यकता है ।

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  43. बहुत ही सुन्दर सारगर्भित तथा विचारोत्तेजक लेख है ... हमें सामाजिक तथा वैचारिक आज़ादी की तरफ कदम उठाने पड़ेंगे ...

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  44. देश की अखण्डता की रक्षा करने में समर्थ होने के लिए हमें स्वार्थ और एकीकरण करके अपने व्यक्तित्व को अखण्ड बनाना होगा। देश की स्वतंत्रता के नाम पर मिटने वाले भारतविरों नें देशभक्ति को व्यवसाय कभी नहीं बनया। हमें उनके चरित्र व आचरण की श्रेष्ठता को जीवन में अपनाना होगा ....

    देश भक्ति का ज़ज्बा है ......बहुत खूब .....!!
    ...कहाँ गायब थे इतने दिन ....??

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  45. आँखे खोलकर अपने देश की स्थिति परिस्थिति का अध्ययन करें और दिमाग खोलकर भविष्य-निर्माण पर विचार करें। पूर्व पुरुषो को प्रेरणा -स्त्रोत बनाना सर्वथा आवश्यक है। परन्तु उनके नाम की हुण्डी भुनाना सर्वथा अनुचित होने के साथ अपनी अस्मिता के साथ खिलवाडठ करना है। देश की अखण्डता की रक्षा करने में समर्थ होने के लिए हमें स्वार्थ और एकीकरण करके अपने व्यक्तित्व को अखण्ड बनाना होगा। देश की स्वतंत्रता के नाम पर मिटने वाले भारतविरों नें देशभक्ति को व्यवसाय कभी नहीं बनया। हमें उनके चरित्र व आचरण की श्रेष्ठता को जीवन में अपनाना होगा , आज देश की प्रथम आवश्यकता है कि हम कठोर परिश्रम के द्वारा देश के निर्माण मे सहभागी बनें।
    bahut hi vicharotejak avam prabhavshali rachna.
    poonam

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  46. चिंतनीय आलेख ....शुभकामनायें मिथिलेश !

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  47. एक अतिरिक्त +३०६ सौ डॉलर के एक माह कमा इस लिंक के साथ http://www.clix-cents.com/?ref=chuffy विज्ञापन आपको एक इंटरनेट से करते हैं या उससे भी ज्यादा कर सकते हैं अगर आप घर पर एक कंप्यूटर है देखने के लिए बस का भुगतान इन सभी +३०६ hundred गारंटी अगर इसे कॉपी नहीं है और पेस्ट करता ब्राउज़र में लिंक है कि भाषा एक घर से काम करने बाधा अगर आप अपने गूगल टूलबार के पृष्ठ पर आप भाषा अनुवादक डाउनलोड शानदार सकते हैं चाहता हूँ नहीं है डॉलर करने के लिए जा रहा द्वारा इंटरनेट कनेक्शन के साथ क्योंकि वह है कि मैं आशीर्वाद और उसके दोस्त की बधाई निमंत्रण कर रहा हूँ chuffy हिट

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