तन पर लपेटे
फटे व पुराने कपड़े
वह सांवली सी लड़की,
कर रही थी कोशिश
शायद ढक पाये
तन को अपने,
हर बार ही होती शिकार वह
असफलता और हीनता का
समाज की क्रूर व निर्दयी निगाहें
घूर रहीं थी उसके खुलें तन को,
हाथ में लिए खुरपे से
चिलचिलाती धूप के तले
तोड़ रही थी वह पेड़ो से छाल
और कर रही थी जद्दोजहद जिंदगी से अपने
तन पर लपेटे फटे व पुराने कपड़े
वह सावंली सी लड़की ।
मानवीय संवेदनाओं को अभिवयक्त करती कविता...
ReplyDeleteबेहद मार्मिक प्रस्तुति..
ऐसे रचनाएं जब भी पढता हूँ अक्सर शब्दहीन हो जाता हूँ!!!!!!!!
आपने कड़वा सच लिखा है....
behad marmik aur sach ko vyakt karti abhivaykti.
ReplyDeleteमिथिलेश जी आप सदा ही उम्दा लिखते हैं और मैं आपका सम्मान भी दिल से करता हूँ - आज भी आपकी कविता कविता के लिहाज़ से बेहतरीन है लेकिन मैं नहीं समझता की नारी का शरीर देखने को लालायित पुरूष की नज़र हमेशा क्रूर और निर्दयी ही होती है
ReplyDeleteईश्वर ने नारी का शरीर आकर्षक बनाया है और किसी ख़ास कोण से देखने पर पुरूष बेचारा अपनी आंखें सेंक लेता है अब इसका मतलब सदा यही क्यूँ लगाया जाता है कि उसकी नज़र क्रूर और निर्दयी ही है
और सच कहना ............क्या सिर्फ पुरूष ही नारी को देखता है ? क्या नारियां पौरूष की दीवानी नहीं होतीं ?
क्रिकेटर धोनी को उसकी मर्ज़ी के बिना चूमने वाली कौन थी ?
क्या वह एक पुरूष था ?
भाई मेरे, नारी और पुरूष दोनों ही एक दूसरे को देखने और झाँकने में माहिर होते हैं और इसमें कोई बुराई भी नहीं है .
ha wo sawli si ladki
ReplyDeletebahut khub
@आदरणीय अलबेला भईया सर्वप्रथम चरण स्पर्श
ReplyDeleteयहाँ मेरा निर्दयी और क्रुर का मतलब वह नहीं है जो आप समझ रहें हैं , यहाँ मेरा मतलब उस मानवता से है जो कि वहाँ शर्मसार हो रही थी, मानवता वहाँ यह होनी चाहिए थी कि उसके तन को पहले ढका जाता ।
बहुत सुंदर कविता.... भावों को बहुत खूबसूरती से उकेरा है....
ReplyDeleteअच्छा! इस कविता में न... समाज की स्पेलिंग रौंग हो गयी है.... ठीक कर लेना...
एक मजबुर ओर गरीब सांवली सी लडकी, जहां से अपने आप को बचाती फ़िर रही है, बहुत खुब कविता मै दर्द झलकता है उस की गरीबी का
ReplyDeletebahut hi marmik kavita sir...bahut khoob....samaj ki spelling sahi kar lijiyega...
ReplyDeleteएक और निराला .....
ReplyDeleteक्या करें , हम अभी विकासशील हैं । और अनुमान है कि अगले १०० साल तक शायद विकासशील ही रहेंगे ।
ReplyDeleteकौन है इसके लिए जिम्मेदार ?
जिंदगी की सच्चाई को करीबी नज़र से दर्शाती रचना ।
Badhiya Mithilesh.. aisi hi tumne ek aur kavita likhi thi kya pahle? yahain par padh chuka hoon shayad.. Albela ji ki baat kuchh sahi bhi lagi
ReplyDeleteसंवेदना को खूबसूरती दी है आपने
ReplyDeleteबहुत सुन्दर
बहुत मार्मिक रचना है.....्बहुत सुन्दर!
ReplyDeletenice poem ! welcome back brother.
ReplyDeleteबहुत मार्मिक
ReplyDeleteयार गरीबी हैं ही ऐसी चीज़........राजकपूर की फिल्मे गरीबी औरत की खूबसूरती को जिस तरह दिखाती हैं....ये तो सब जानते हैं......इस खूबसूरती के पीछे भी कई मजबूरियां होती हैं.....
ReplyDeleteमानवीय संवेदनाओं को उकेरती...
ReplyDeletemujhe bhi laga ki ye kavita pahle padhi hai...agar aisa hai bhi to kya ...kavita bahut acchi lagi
ReplyDeletetumhein dekh kar bahut accha laga mithilesh..
likhte raho..
...didi
लाचार लड़की का बहुत मार्मिक चित्रण...
ReplyDeleteबहुत ही अच्छी कविता लिखी है
ReplyDeleteउम्मीद है शायद निकट भविष्य में इस त्रासदी से मुक्ति मिले ...
ReplyDeleteबहुत सुंदर कविता.... भावों को बहुत खूबसूरती से उकेरा है....
ReplyDeleteबहुत मार्मिक चित्रण...
सरकार की लाडली, कन्यारत्न जैसी योजनाएं जब तक सिर्फ प्रचार के भोंपू की तरह इस्तेमाल की जाती रहेंगी, सरकारी धन बीच में बैठे मगरमच्छ खा-खाकर मोटे होते रहेंगे, देश की मुन्नियों के चेहरे पर मुस्कान नहीं आ सकती...उनकी इस दुर्दशा से कोई अपनी कुंठाओं को शांत करने की कोशिश करता है तो उसे शैतान ही कहा जा सकता है...
ReplyDeleteजय हिंद...
बहुत सुंदर कविता अच्छे भाव
ReplyDeleteउनकी मतलब देखने वालों की आंखें जो बोलती हैं। उसकी कविता भी लिखी जाए मिथिलेश जी। तलाशती हैं रास्ता, घुसने का, कपड़ों के भीतर, झांकने का, सब कुछ आंकने का ..........
ReplyDeletesundar kavita ...bahut maarmik chitran ...padhkar achha laga
ReplyDeleteachchi bhavpurn kavita hai ..shubhkamnaye
ReplyDeleteबहुत ही सजीव चित्रण .... शुभकामनाएँ !!
ReplyDeletesahi observation kiya doobe je aapne...kisi ne to sahi nazar se dekha.. badi vidmabna hai ..jiske paas saadhan hai wo tan dhankta nahi hai ..aur jise dhakna hai uske paas saadhan nahi hai ..
ReplyDeleteक्या अजीब इतफाक है जो शरीर ढकना चाहते हैं उन्हें कपड़े नहीं मिलते जिन्हें मिलतो हैं वो सब उतार फैंकना चाहते हैं
ReplyDeleteमानवीय संवेदना को उकेरती सुन्दर कविता।
ReplyDelete@अलबेला खत्री,
यहाँ पर सिचुएशन अलग है। सामान्य तौर पर जैसा आपने कहाँ नारी की सुन्दरता को प्रशंसात्मक रुप में देखने में क्रूरता और निर्दयी जैसी बात नहीं है लेकिन कविता की सिचुएशन में लड़की के पास तन ढकने को भी कपड़े नहीं हैं। अब ऐसी स्थिति में भद्र पुरुष निगाहें दूसरी तरफ फेर लेता है जबकि क्रूर एवं निर्दयी निगाहें जमीं रहती हैं।