Monday, May 17, 2010

और लिख दी कहानीं अपने खून से---------मिथिलेश दुबे


एक चिड़िया को एक सफ़ेद गुलाब से प्यार हो गया ,गुलाब से अपनी मोहब्बत का इजहार किया ,
गुलाब ने जवाब दिया कि जिस दिन मै लाल हो जाऊंगा उस दिन मै तुमसे प्यार करूँगा ,
जवाब सुनके चिड़िया गुलाब के आस पास काँटों में लोटने लगी और उसके खून से गुलाब लाल हो गया,
ये देखके गुलाब ने भी उससे कहा की वो उससे प्यार करता है पर तब तक चिड़िया मर चुकी थी...................................................................................................


सीलिए कहा गया है कि सच्चे प्यार का कभी भी इम्तहान नहीं लेना चाहिए,
क्यूंकि सच्चा प्यार कभी इम्तहान का मोहताज नहीं होता है ,
ये वो फलसफा; है जो आँखों से बया होता है ,

28 comments:

  1. सादर वन्दे !
    भाई जी क्या बात है कि प्यार कि इतनी बड़ी परिभाषा रच डाली ?
    रत्नेश त्रिपाठी

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  2. कहो! ना, प्यार है।

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  3. सच्‍चे प्‍यार को बहुत शिद्दत से महसूस लिया मिथिलेश जी।

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  4. waah bahut purani mail ko aaj kavita roop me padha...

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  5. बेहतरीन
    क्या गहराई से प्यार को परिभाषित किया है

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  6. अरे आज तो कुछ अलग पढने को मिला , वैसे भी मुहब्बत जिंदा रखनी चाहिए

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  7. वाह....बहुत सुन्दर

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  8. शत प्रतिशत मिथिलेश -वही झेल रहा हूँ -फेस बुक पर वही सफ़ेद गुलाब आज भी मुस्कुरा रहा है !

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  9. भाई बहुत सही कहा

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  10. बेहद दिल को छूने वाली रचना। अद्भुत। मिथिलेश जी, इसको पहले भी पढ़ा था, लेकिन कहते हैं, जब प्यार इबादत सा हो जाए तो उसके बारे में बार बार सुनने और पढ़ने के बाद भी वो अच्छे लगते हैं।

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  11. सच कहा मिथिलेश.. कोई सब्जेक्ट समझने और प्यार का इज़हार करने में देर नहीं करनी चाहिए..

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  12. प्यार में कुर्बान हो जाना इसी को कहते हैं.

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  13. उम्दा सोच की अभिव्यक्ति /

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  14. अकसर ऐसा ही होता है प्रेम शायद बलिदान पर आकर ही पूरा होता है ........

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  15. बहुत नासमझ चिड़िया थी...

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  16. जलजला ने माफी मांगी http://nukkadh.blogspot.com/2010/05/blog-post_601.html और जलजला गुजर गया।

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  17. लो आ गया जलजला (भाग एक)
    वे ब्लागर जो मुझे टिप्पणी के तौर पर जगह दे रहे हैं उनका आभार. जो यह मानते हैं कि वे मुफ्त में मुझे प्रचार क्यों दें उनका भी आभार. भला एक बेनामी को प्रचार का कितना फायदा मिलेगा यह समझ से परे हैं.
    मैंने अपने कमेंट का शीर्षक –लो आ गया जलजला रखा है। इसका यह मतलब तो बिल्कुल भी नहीं निकाला जाना चाहिए कि मैं किसी एकता को खंडित करने का प्रयास कर रहा हूं। मेरा ऐसा ध्येय न पहले था न भविष्य में कभी रहेगा.
    ब्लाग जगत में पिछले कुछ दिनों से जो कुछ घट रहा है क्या उसके बाद आप सबको नहीं लगता है कि यह सब कुछ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं होने की वजह से हुआ है. आप अपने घर में बच्चों से तो यह जरूर कहेंगे कि बेटा अब की बार इस परीक्षा में यह नबंर लाना है उस परीक्षा को तुम्हे क्लीयर करना ही है लेकिन जब खुद की परीक्षा का सवाल आया तो सारे के सारे लोग फोन के जरिए एकजुट हो गए और पिल पड़े जलजला को पिलपिला बताने के लिए. बावजूद इसके जलजला को दुख नहीं है क्योंकि जलजला जानता है कि उसने अपने जीवन में कभी भी किसी स्त्री का दिल नहीं दुखाया है। जलजला स्त्री विरोधी नहीं है। अब यह मत कहने लग जाइएगा कि पुरस्कार की राशि को रखकर स्त्री जाति का अपमान किया गया है। कोई ज्ञानू बाबू किसी सक्रिय आदमी को नीचा दिखाकर आत्म उन्नति के मार्ग पर निकल जाता है तब आप लोग को बुरा नहीं लगता.आप लोग तब सिर्फ पोस्ट लिखते हैं और उसे यह नहीं बताते कि हम कानून के जानकार ब्लागरों के द्वारा उसे नोटिस भिजवा रहे हैं। क्या इसे आप अच्छा मानते हैं। यदि मैंने यह सोचा कि क्यों न एक प्रतिस्पर्धा से यह बात साबित की जाए कि महिला ब्लागरों में कौन सर्वश्रेष्ठ है तो क्या गलत किया है। क्या किसी को शालश्रीफल और नगद राशि के साथ प्रमाण देकर सम्मानित करना अपराध है।
    यदि सम्मान करना अपराध है तो मैं यह अपराध बार-बार करना चाहूंगा.
    ब्लागजगत को लोग सम्मान लेने के पक्षधर नहीं है तो देश में साहित्य, खेल से जुड़ी अनेक विभूतियां है उन्हें सम्मानित करके मुझे खुशी होगी क्योंकि-
    दुनिया का कोई भी कानून यह नहीं कहता है कि आप लोगों का सम्मान न करें।
    दुनिया का कानून यह भी नहीं कहता है कि आप अपना उपनाम लिखकर अच्छा लिख-पढ़ नहीं सकते हैं. आप लोग विद्धान लोग है मुंशी प्रेमचंद भी कभी नवाबराय के नाम से लिखते थे. देश में अब भी कई लेखक ऐसे हैं जिनका साहित्य़िक नाम कुछ और ही है। भला मैं बेनामी कैसे हो गया।

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  18. लो आ गया जलजला (भाग-दो)
    आप सब लोगों से मैंने पहले ही निवेदन किया था कि यदि प्रतियोगिता को अच्छा प्रतिसाद मिला तो ठीक वरना प्रतियोगिता का विचार स्थगित किया जाएगा. यहां तो आज की तमाम एक जैसी संचालित पोस्टें देखकर तो लग रहा है कि शायद भाव को ठीक ढंग से समझा ही नहीं गया है. भला बताइए मेरी अपील में मैंने किस जगह पर अभद्र शब्दों का इस्तेमाल किया है.
    बल्कि आप सबमें से कुछ की पोस्ट देखकर और उसमे आई टिप्पणी को देखकर तो मुझे लग रहा है कि आपने मेरे सम्मान के भाव को चकनाचूर बनाने का काम कर डाला है। किसी ने मेरा नाम जलजला देखकर यह सोच लिया कि मैं किस कौन का हूं। क्या दूसरी कौन का आदमी-आदमी नहीं होता है। बड़ी गंगा-जमुना तहजीब की बात करते हैं, एक आदमी यदि दाढ़ी रख लेता है तो आपकी नजर में काफिर हो जाता है क्या। जलजला नाम रखने से कोई ........ हो जाता है क्या। और हो भी जाता है तो क्या बुरा हो जाता है क्या। क्या जलजला एक देशद्रोही का नाम है क्या। क्या जलजला एक नक्सली है। एक महोदय तो लिखते हैं कि जलजला को जला डालो। एक लिखते हैं मैं पहले राहुल-वाहुल के नाम से लिखता था.. मैं फिरकापरस्त हूं। क्या जलजला जैसा नाम एक कौम विशेष का आदमी ही रख सकता है। यदि ऊर्दू हिन्दी की बहन है तो क्या एक बहन किसी हिन्दू आदमी को राखी नहीं बांध सकती.
    फिर भी शैल मंजूषा अदा ने ललकारते हुए कहा है कि मैं जो कोई भी हूं सामने आ जाऊं। मैं कब कहा था कि मै सामने नहीं आना चाहता। (वैसे मैंने यहां देखा है कि जब मैं अपने असली नाम से लिखता हूं तो एक से बढ़कर एक सलाह देने वाले सामने आ जाते हैं, सब यही कहते हैं भाईजान आपसे यह उम्मीद नहीं थी, आप सबसे अलग है आप पचड़े में न पढ़े. अब अदाजी को ही लीजिए न पचड़े में न पड़ने की सलाह देते हुए ही उन्होंने ज्ञानू बाबू से लेकर अब तक कम से कम चार पोस्ट लिख डाली है)
    जरा मेरी पूर्व में दिए गए कथन को याद करिए मैंने उसमे साफ कहा है कि 30 मई को स्पर्धा समाप्त होगी उस दिन जलजला का ब्लाग भी प्रकट होगा। ब्लाग का शुभारंभ भी मैं सम्मान की पोस्ट वाली खबर से ही करना चाहता था, लेकिन अब लगता है कि शायद ऐसा नहीं होगा. एक ब्लागर की मौत हो चुकी है समझ लीजिएगा.
    अदाजी के लिए सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैं इंसान हूं.. बुरा इंसान नहीं हूं। (अदाजी मैंने तो पहले सिर्फ पांच नाम ही जोड़े थे लेकिन आपने ही आग्रह किया कि कुछ और नामों को शामिल कर लूं.. भला बताइए आपके आग्रह को मानकर मैंने कोई अपराध किया है क्या)
    आप सभी बुद्धिमान है, विवेक रखते हैं जरा सोचिए देश की सबसे बड़ी साहित्यिक पत्रिका हंस और कथा देश कहानी प्रतियोगिताओं का आयोजन क्यों करती है। क्या इन प्रतियोगिताओं से कहानीकार छोटे-बड़े हो जाते हैं। क्या इंडियन आइडल की प्रतिस्पर्धा के चलते आशा भोंसले और उदित नारायण हनुमान जी के मंदिर के सामने ..काम देदे बाबा.. चिल्लाने लगे हैं।
    दुनिया में किसी भी प्रतिस्पर्धा से प्रतिभाशाली लोग छोटे-बड़े नहीं होते वरन् वे अपने आपको आजमाते हैं और जब तक जिन्दगी है आजमाइश तो चलती रहनी है. कभी खुद से कभी दूसरों से. जो आजमाइश को अच्छा मानते है वह अपने आपको दूसरों से अच्छा खाना पकाकर भी आजमाते है और जिसे लगता है कि जैसा है वैसा ही ठीक है तो फिर क्या कहा जा सकता है.
    कमेंट को सफाई न समझे. आपको मेरे प्रयास से दुख पहुंचा हो तो क्षमा चाहता हूं (ख्वाबों-ख्यालों वाली क्षमा नहीं)
    आपकी एकता को मेरा सलाम
    आपके जज्बे को मेरा नमन
    मगर आपकी लेखनी को मेरा आहावान
    एक पोस्ट इस शीर्षक पर भी जरूर लिखइगा
    हम सबने जलजला को मिलकर मार डाला है.. महिला मोर्चा जिन्दाबाद
    कानून के जानकारों द्वारा भेजे गई नोटिस की प्रतीक्षा करूंगा
    आपका हमदर्द
    कुमार जलजला

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  19. सच्चे प्यार का कभी भी इम्तहान नहीं लेना चाहिए,
    आपका लेख सुंदर बन पड़ा है ......

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  20. बिल्कुल सही कहा..इसमें इम्तिहान कैसा!!

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  21. आप मानें या न मानें
    पर यह सच है कि
    जलजला जलाने नहीं
    जगाने आया है
    आग लगाने नहीं
    लगी हुई आग को
    बुझाने आया है
    http://jhhakajhhaktimes.blogspot.com/2010/05/blog-post_18.html

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  22. प्यार तो आखिर प्यार होता है, प्यार को प्यार कहोऔर काई नाम न दो।

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  23. आज तो गज़ब कर दिया…………।सच सच्चे चाहने वालों का पता ही नही कब क्या कर बैठें………………सीधा दिल तक उतर गयी।

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  24. क्या मिथिलेश जी , दिल तोड़ दिया ऐसा अंत दिखा के !

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