Friday, July 9, 2010

धर्म विरोधी बताकर उसका गान करने से मना करना कितनी शर्म की बात है,, डुब मरो-----मिथिलेश दुबे

जी हाँ बिल्कुल सही सुना आपने। अगर ऐसा वाकया आपको देखने को मिले जहाँ कोई अपनी माँ को माँ कहने में शर्म महसुस करता हो और पुछने पर कहता हो ये बताने के लिए कि ये माँ है,माँ कहना जरुरी नहीं है। जरा सोचिए कितनी शर्मसार करने वाली घटना है। मेरा ये कहना उनके लिए है जो की अपने आपको भारतीय कहते है और "वन्दे मातरम्" जैसे पवित्र शब्द जो की हमारा राष्ट्रिय गीत है, को गाने से इनकार करते है और कहते है कि ये इस्लाम विरोधी है। जिसकी खाते है, जहाँ रहते है, उसको समर्पित दो शब्द कहने की बारी आती है तो उसे धर्म विरोधी बताकर उसका गान करने से मना करना कितनी शर्म की बात है एक कहावत है "जिस थाली में खाना उसी में छेद करना" यहा फिट बैठती है। धरती माँ जिससे हमें जीवन मिलता है, जिससे पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी मिलती है, जिसकी लाज बचाने के लिए न पता कितनो नें अपने प्राण की आहूती दे दी उसको सम्मान देनें में जिसे शर्म आती है उसे सच कह रहा हूँ कहीं डुब मरना चाहिए। जमीयत उलेमा हिंद ने देश के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को गैर-इस्लामिक करार देते हुए इसके खिलाफ फतवा सुना दिया । जमीयत के राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसरे दिन पारित एक प्रस्ताव में कहा गया है कि मुसलमान को वंदे मातरम् नहीं गाना चाहिए। क्यो भाई क्यों, न पता इस गीत को लेकर इतना विवाद क्यों है। मुझे लगता है पूरी दुनियाँ में ये पहली घटना होगी जहाँ राष्ट्रगान को लेकर विवाद हो रहा है।
हमारे यहाँ या कहिए विश्व भर में हर देश के अन्दर बहुत से जन जाती और धर्म के लोग रहते है। उनका हर क्रिया कलाप एक दुसरे धर्म के पुरक होता है। यहीं इन सबको एक राष्ट्र और एक देश मे बाँधने का काम करता है राष्ट्र गीत या राष्ट्र गान। लेकिन बड़े दुख की बात है हमारे देश में कुछ गलत अवधारणा के लोगो नें राष्ट्र गीत को विवादित कर दिया है। मान लेता हूँ कि राष्ट्रियता जताने के लिए राष्ट्रगान करना आवश्यक नहीं है, लेकिन भला ऐसा हो सकता है क्या ? आप भारत में रहकर पाकिस्तान जिन्दाबाद कहें और फीर कहें कि मैंने भारत मुर्दाबाद नहीं कहा तो कोई विश्वास करेगा क्या ?।

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय सरकारी सेवा में थे और १८७० में जब अंग्रेजी हूकमत ने 'God save the King/Queen' गाना अनिवार्य कर दिया तो इसके विरोध में वन्दे मातरम् गीत के पहले दो पद्य १८७६ में संस्कृत में लिखे। इन दोनो पद्य में केवल मातृ-भूमि की वन्दना है। उन्होंने ने १८८२ में आनन्द मठ नाम का उपन्यास बांग्ला में लिखा और इस गीत को उसमें सम्मिलित किया। उस समय इस उपन्यास की जरूरत समझते हुये इसके बाद के पद्य बंगला भाषा में जोड़े गये। इन बाद के पद्य में दुर्गा की स्तुति है। कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (१८९६) में, रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे लय और संगीत के साथ गाया। श्री अरविन्द ने इस गीत का अंग्रेजी में और आरिफ मौहम्मद खान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया है। आरिफ मोहम्मद खान भी एक मुसलमान थे और सच्चे मुसलमान थे। जब उन्होने इसका उर्दू अनुवाद किया तो क्या बिना पढे किया था, ऐसा तो नहीं होगा। उन्होने इसका मर्म समझा था तब अनुवाद किया, अब आज के मुसलमान कह सकते है कि शायद वे सच्चे मुसलमान नहीं होगें।

इस देश में असंख्य अल्पसंख्यक वन्दे मातरम्‌ के प्रति श्रद्धा रखते हैं। मुफ्ती अब्दुल कुदूस रूमी ने फतवा जारी करते हुए कहा था कि राष्ट्रगान का गायन उन्हें मुस्लिमों को नरक पहुँचाएगा। बहिष्त लोगों में लोहा मण्डी और शहीद नगर मस्जिदों के मुतवल्ली भी थे। इनमें से 13 ने माफी मांग ली। आश्चर्य की बात है कि अपराधिक गतिविधियों में शामिल होना, आतंकवादी कार्रवाईयों में भाग लेना, झूठ, धोखा, हिंसा, हत्या, असहिष्णुता, शराब, जुआ, राष्ट्र द्रोह और तस्करी जैसे कृत्य से कोई नरक में नहीं जाता मगर देश भक्ति का ज़ज़बा पैदा करने वाले राष्ट्र गान को गाने मात्र से एक इंसान नरक का अधिकारी हो जाता है। ब्रिटेन के राष्ट गान में रानी को हर तरह से बचाने की प्रार्थना भगवान से की गई है अब ब्रिटेन के नागरिकों को यह सवाल उठाना चाहिए कि कि भगवान रानी को ही क्यो बचाए, किसी कैंसर के मरीज को क्यों नहीं? बांग्लादेश से पूछा जा सकता है कि उसके राष्ट्रगीत में यह आम जैसे फल का विशेषोल्लेख क्यों है? सउदी अरब का राष्ट्रगीत ‘‘सारे मुस्लिमों के उत्कर्ष की ही क्यों बात करता है और राष्ट्रगीत में राजा की चाटुकारिता की क्या जरूरत है? सीरिया के राष्ट्रगीत में सिर्फ ‘अरबवाद की चर्चा क्या इसे रेसिस्ट नह बनाती? ईरान के राष्ट्रगीत में यह इमाम का संदेश क्या कर रहा है? लीबिया का राष्ट्रगीत अल्लाहो अकबर की पुकारें लगाता है तो क्या वो धार्मिक हुआ या राष्ट्रीय? अल्जीरिया का राष्ट्रगीत क्यों गन पाउडर की आवाज को ‘हमारी लय और मशीनगन की ध्वनि को ‘हमारी रागिनी कहता है? अमेरिका के राष्ट्रगीत में भी ‘हवा में फूटते हुए बम क्यों हैं? चीन के राष्ट्रगीत में खतरे की यह भय ग्रन्थि क्या है? किसी भी देश के राष्ट्रगीत पर ऐसी कोई भी कैसे भी टिप्पणी की जा सकती है लेकिन ये गीत सदियों से इन देशों के करोडों लोगों के प्रेररणा स्रोत हैं और बने रहेंगे। उनका उपहास हमारी असभ्यता है। शम्सु इस्लाम हमें यह भी जताने की कोशिश करते हैं कि वन्दे मातरम्‌ गीत कोई बड़ा सिद्ध नहीं था और यह भी कोई राष्ट्रगीत न होकर मात्र बंगाल गीत था। वह यह नहीं बताते कि कनाडा का राष्ट्रगीत 1880 में पहली बार बजने के सौ साल बाद राष्ट्रगीत बना। 1906 तक उसका कहीं उल्लेख भी नहीं हुआ था। आस्ट्रेलिया का राष्ट्रगीत 1878 में सिडनी में पहली बार बजा और 19 अप्रैल 1984 को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त हुआ।

वन्दे मातरम्‌ गीत आनन्दमठ में 1882 में आया लेकिन उसको एक एकीकृत करने वाले गीत के रूप में देखने से सबसे पहले इंकार 1923 में काकीनाड कांग्रेस अधिवेशन में तत्कालीन कांग्रेसाध्यक्ष मौलाना अहमद अली ने किया जब उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के हिमालय पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को वन्दे मातरम्‌ गाने के बीच में टोका। लेकिन पं. पलुस्कर ने बीच में रुकर कर इस महान गीत का अपमान नहीं होने दिया, पं- पलुस्कर पूरा गाना गाकर ही रुके। सवाल यह है कि इतने वषो तक क्यों वन्दे मातरम्‌ गैर इस्लामी नह था? क्यों खिलाफत आंदोलन के अधिवेशनों की शुरुआत वन्दे मातरम्‌ से होती थी और ये अहमद अली, शौकत अली, जफर अली जैसे वरिष्ठ मुस्लिम नेता इसके सम्मान में उठकर खड़े होते थे। बेरिस्टर जिन्ना पहले तो इसके सम्मान में खडे न होने वालों को फटकार लगाते थे। रफीक जकारिया ने हाल में लिखे अपने निबन्ध में इस बात की ओर इशारा किया है। उनके अनुसार मुस्लिमों द्वारा वन्दे मातरम्‌ के गायन पर विवाद निरर्थक है। यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के दौरान काँग्रेस के सभी मुस्लिम नेताओं द्वारा गाया जाता था। जो मुस्लिम इसे गाना नहीं चाहते, न गाए लेकिन गीत के सम्मान में उठकर तो खड़े हो जाए क्योंकि इसका एक संघर्ष का इतिहास रहा है और यह संविधान में राष्ट्रगान घोषित किया गया है।

बंगाल के विभाजन के समय हिन्दू और मुसलमान दोनों ही इसके पूरा गाते थे, न कि प्रथम दो छंदों को। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिवेशन में इसका पूर्ण- असंक्षिप्त वर्शन गया गया था। इसके प्रथम स्टेज परफॉर्मर और कम्पोजर स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर थे।
13 मार्च 2003 को कर्नाटक के प्राथमिक एवं सेकेण्डरी शिक्षा के तत्कालीन राज्य मंत्री बी-के-चंद्रशेखर ने ‘प्रकृति‘ शब्द के साथ ‘देवी लगाने को ‘‘हिन्दू एवं साम्दायिक मानकर एक सदस्य के भाषण पर आपत्ति की थी। तब उस आहत सदस्य ने पूछा था कि क्या ‘भारत माता, ‘कन्नड़ भुवनेश्वरी और ‘कन्नड़ अम्बे जैसे शब्द भी साम्दायिक और हिन्दू हैं? 1905 में गाँधीजी ने लिखा- आज लाखों लोग एक बात के लिए एकत्र होकर वन्दे मातरम्‌ गाते हैं। मेरे विचार से इसने हमारे राष्ट्रीय गीत का दर्जा हासिल कर लिया है। मुझे यह पवित्र, भक्तिपरक और भावनात्मक गीत लगता है। कई अन्य राष्ट्रगीतों के विपरीत यह किसी अन्य राष्ट्र-राज्य की नकारात्मकताओं के बारे में शोर-शराबा नह करता। 1936 में गाँधीजी ने लिखा - ‘‘ कवि ने हमारी मातृभूमि के लिए जो अनके सार्थक विशेषण प्रयुक्त किए हैं, वे एकदम अनुकूल हैं, इनका कोई सानी नहीं है। 26 अक्टूबर 1937 को पं- जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कलकत्ता में कांग्रेस की कार्यसमिति ने इस विषय पर एक प्रस्ताव स्वीकृत किया। इसके अनुसार ‘‘ यह गीत और इसके शब्द विशेषत: बंगाल में और सामान्यत: सारे देश में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीयय तिरोध के प्रतीक बन गए। ‘वन्दे मातरम्‌ ये शब्द शक्ति का ऐसा पस्त्रोत बन गए जिसने हमारी जनता को प्रेरित किया और ऐसे अभिवादन हो गए जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की हमें हमेशा याद दिलाता रहेगा। गीत के प्रथम दो छंद सुकोमल भाषा में मातृभूमि और उसके उपहारों की प्रचुरता के बारे में देश में बताते हैं। उनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर धार्मिक या किसी अन्य दृष्टि से आपत्ति उठाई जाए।

ऐसा भी नहीं है कि सभी मुसलमानो ने इसका विरोध किया हो, ये आप देख ही चुके है। आजादी की लड़ाई के समय हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर चले थे और उत्साह वर्धन के लिए सभी भारत माता के सैनिक 'वन्दे मातरम' कहकर आगे बढ़ रहे थे , तब किसी ने इसका विरोध नहीं किया। आज कट्टरावादी इसपर सांप्रदायिकता की चादर डालने में लगे है जो की हमारे हिन्द के लिए तनिक भी ठीक नहीं होगा। चिन्ता की बात तो ये यह है कि ये लोग ये बात समझने को तैयार नहीं है और भेड़ के समान एकदूसरे के पिछे चलते जा रहे है। मेरा तो कहना साफ है जो अपने देश का राष्ट्र गान करने में शर्म महसुस करता हो उसे कहीं डुब मरना चाहिए जहाँ सूखा पड़ा हो, और ऐसे गद्दारो को देश मे भी स्थान नहीं देना चाहिए।

6 comments:

  1. शानदार पोस्ट

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  2. इस विषय की सम्प्पोर्ण और प्रशंसनीय पोस्ट -भला वन्दे मातरम् गाने में क्या दिक्कत है ?

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  3. राष्ट्रगान का अपमान या न गाना निस्सन्देह शर्म और देश द्रोह की भावना का प्रतीक है । इसका अपमान राष्ट्र का अपमान है। बहुत अच्छा आलेख है। शुभकामनायें। इतने दिन से कहाँ हो?

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  4. कृपया सुधार कर लें. वन्दे मातरम राष्ट्रगान नहीं अपितु राष्ट्रगीत है. "जन गन मन अधिनायक..." भारत का राष्ट्रगान है.

    जहाँ तक एक धर्म विशेष के लोगों द्वारा इसे न गाने की बात है तो वह राजनीति से उपजी हुई परिस्थिति है. कुरआन के बाद दुनियाँ बहुत आगे जा चुकी है. कोई नहीं कहता की लोग उसमें अपना कुछ जोडें लेकिन उसके बाहर जाकर आज की दुनियाँ के हिसाब से व्यवहार तो कर सकते हैं. वैश्वीकरण के युग में हम जहाँ रहना चाहते हैं अगर वहां की संस्कृति में घुलना नहीं चाहते तो हमें वहाँ रहने का अधिकार भी नहीं है.

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  5. मिसाल के तौर पे

    मैं मांसाहारी भी हूँ और मैं मांस मछली आदि खाता हूँ..... दुसरी तरफ मेरा दोस्त मिथिलेश दुबे है जो शाकाहारी है.... हम बाज़ार जाते हैं, कुछ खाने वास्ते ... मैं मिथिलेश को ले जाता हूँ एक नॉन-वेज रेस्तरां में.... मैं वहां आर्डर करता हूँ फ्राई चिकन का....... अब मिथिलेश कहते हैं अरे यार मैं तो शाकाहरी हूँ, मैं ये नहीं खा सकता .... प्लीज़ इसे वापस करके कुछ ऐसा मंग्वावो जो हम तुम दोनों ही खा सकें...........

    अब मुझे क्या करना चाहिए आप बताओ !!!!!!!!!!!!

    १. मैं कहता हूँ कि नहीं ये नहीं चलेगा तुम हमारे साथ आये हो, और तुम्हें हमारी भावना और हमारे द्वारा परोसे गए खाने का सम्मान करना होगा ! तुम कैसे दोस्त हो... लेकिन मैं ज़िद करता हूँ और कहता हूँ नहीं तुम दोस्त नहीं हो दोस्त के नाम पर कलंक हो........ तुम आये हो मेरे साथ और बातें कर रहे हो गैरों सी!!!! वगैरह वगैरह !! और इस तरह बात इतनी बढ़ जाती है और खाना वाना तो दूर हम दोस्त भी नहीं रहते !!!!!!!!!!!!

    २. मैं मिथिलेश की भावना का सम्मान करते हुए कुछ ऐसा खाना मंगवाऊं जो हम दोनों ही खा सके और दोस्ती बरक़रार रख सकें ...

    आप बताईये मुझे दोनों में से कौन सा तरीका अपनाना चाहिए !!

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  6. main nahi samajhtaa ki kisi bhi dharm ke bande ko araashtr geet yaa raashtr gaan ko gaane me kyaa aaptti hai, yaa to jo log ise dharm se jodte hain yaa gaane me sakuchaate hain shaayad unko in laainon kaa matlab hi pataa nahi hai yaa fir wo desh drohi hain ,yaa fir puraane vicharon se sahmat nahi hain,kyaa apni maataa ki vandnaa karnaa yaa apne desh ki stuti karnaa kaise galat ho saktaa hai jab ki ye dono hi hamho aasraa or bhojy padaarth uplabdh karaate hain ,hame jeewan prdaan karte hain ,kyaa isse ye saabit nahin hotaa ki khaao kisi kaa or gaao kisi kaa ,

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