Thursday, August 5, 2010

तेरा धर्म महान की मेरा धर्म---------मिथिलेश दुबे





तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म
मची है लोगों मे देखो कैसी घमासान
बन पड़ा है देखो कैसा माहौल
लग रहे हैं एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप
क्या हो जायेगा अगर मेरा धर्म नीचा
तेरा धर्म महान
आखिर पिसता तो है इन सबके बीच इंसान
जहाँ खाने के लिए रोटी नहीं
पहनने के लिए वस्त्र नहीं
रहने के लिए घर नहीं
वहां का मुद्दा बन पड़ा है
तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म महान,,,,,,,,,,,
जहाँ फैला है भ्रष्टाचार चहूं ओर
जहाँ नेता बन बैठा है भाग्य बिधाता
जहाँ अशिक्षा हावी है शिक्षा पर
जहाँ देखने वालों की भी गिनती है अंधो में
वहाँ मुद्दा बन पड़ा है
तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म .......
जहां मां तोड‍ देती है दम प्रसव के दौरान
जहाँ बच्चे शिकार होते हैं कुपोषण का
जहाँ लड‍‌कियो को अब भी समझा जाता है बोझ
वहाँ मुद्दा बन पड़ा है
तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म .......

31 comments:

  1. मत-मजहब को लोग अब, समझ रहे हैं धर्म!
    धर्म नाम कर्तव्य का, करो सदा सत्-कर्म!!

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  2. आखिर इस पीड़ा ने आपसे भी कविता तक लिखवा ली -बहुत सुन्दर और सार्थक कविता !

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  3. मिथिलेश भाई अन्‍यथा न लें। मेरा मानना है ऐसे विषयों पर ऐसी सतही कविता लिखकर अपना समय बरबाद न करें।

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  4. कविता काफी अर्थपूर्ण है, और ज्‍यादा समकालीन। धर्मनिरपेक्षता को सांसों की तरह आवश्‍यक बनाने के बदले कुछ लोग उसे ढाल की तरह इस्‍तेमाल कर रहे हैं। उदारीकरण की बयार ने बहुत सी आंतो को सुखा दिया है। पानी का स्‍वाद बदल दिया है। लेकिन उम्मीद का दामन भी पूरा-पूरा नहीं छूटा है।

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  5. सन्देश देती हुई रचना..............काश लोग धर्म का अर्थ जान पाते कि कोई भी धर्म बैर भाव नहीं सिखाता वो तो बस प्रेम सिखाता है सिर्फ प्रेम लेकिन कैसी विडंबना है कि इंसान धर्म की आड़ में इंसानियत तक भूल गया है............

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  6. कटु सत्य को उजागर करती प्रभावी रचना

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  7. सही अभिव्यक्ति।
    और
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने सही बात प्रस्तूत कर दी।

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  8. मिथिलेश, बात तो यही है कि यहाँ लोग दाने-दाने को मोहताज हैं और लोगों को अपने-अपने धर्म की पड़ी है.
    आज की तुम्हारी कविता से ये पता चल रहा है कि समाज में फैली इस अव्यवस्था के प्रति कितना आक्रोश है तुम्हारे मन में. मैं यही चाहूँगी कि इस आक्रोश को तुम सही दिशा में लगाओ. यही दिशा सही है...
    समाज में बहुत सी समस्याएँ हैं. कोई समाज कभी समस्या से विहीन हो ही नहीं सकता, पर ये देखना है कि हमें फोकस किस समस्या पर करना है. आज गरीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, दहेज, भ्रूण-हत्या,नारी-उत्पीडन (जिसमें छेड़छाड़ और बलात्कार जैसे मुद्दे आते हैं) आदि ऐसी समस्याएँ हैं, जिनसे समाज की बहुत बड़ी आबादी प्रभावित होती है.
    अब तो तुम मीडिया में हो तो ऐसे ही मुद्दों पर फोकस करो.
    good one, keep it up.

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  9. बहुत अच्छी कविता, पिसता तो आम इंसान ही है चाहे युसुफ़ नाम हो या राधेलाल...

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  10. उद्देश्य सही हो तो कविता अपने आप निखर जाती है ! आपने बेबाकी से अपनी बात कह डाली यही महत्वपूर्ण है ! कई बार सतह की कवितायें गहरी मार करती हैं ! लोग बिलबिला उठते हैं !

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  11. बहुत सुन्दर सार्थक सन्देश देती रचना के लिये बधाई\ कैसे हो? आशीर्वाद।

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  12. बहुत सुन्दर कविता !

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  13. आज अपने पाप छुपाने और गलत कामों को अंजाम देने का जरिया बन गया है धर्म तो ! बढ़िया प्रस्तुती !

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  14. मिथलेश भाई आपकी कविता बिलकुल सही समय आई.लेकिन चकित हूँ कि इस पोस्ट से पहले मैंने एक पोस्ट लिखी .कोई नहीं आया.और यहाँ ऐसे कई लोग हैं जो खुद धर्म की दूकान चला रहे हैं.

    समय हो तो आप भी पढ़ें गर फुरसत हो.
    शमा-ए-हरम हो या दिया सोमनाथ का http://saajha-sarokaar.blogspot.com/2010/08/blog-post.html
    और
    शाहिद अख्तर
    ख़ामोशी के ख़िलाफ़ http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_08.html

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  15. क्या हो जायेगा अगर मेरा धर्म नीचा
    तेरा धर्म महान
    आखिर पिसता तो है इन सबके बीच इंसान
    ....aaj dharm kaa jo swarup hai uspar satik our teekha kataksh...bahut badhiyaa.

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  16. बहुत सुन्दर संदेश देती बेहद ही सार्थक कविता है आज जो मुद्दे हैं उस ओर कोइ ध्यान नही देता और सिर्फ़ धर्म के नाम पर सब अपनी अपनी रोटियाँ सेंकते हैं।

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  17. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  18. सही है अब धर्म का विकल्प ज़रूरी है ...।

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  19. ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.

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  20. जहाँ फैला है भ्रष्टाचार चहूं ओर
    जहाँ नेता बन बैठा है भाग्य बिधाता
    जहाँ अशिक्षा हावी है शिक्षा पर
    जहाँ देखने वालों की भी गिनती है अंधो में
    वहाँ मुद्दा बन पड़ा है
    तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म .......
    ये पंक्तियाँ और हर एक शब्द सच्चाई का ज़िक्र करती है! आपने बहुत ही सुन्दरता से सत्य को शब्दों में बखूबी पिरोया है! बेहद सुन्दर और सार्थक रचना! बहुत बहुत बधाई!

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  21. shastri ji ne sahi keha..karam se bada koi dhram nahi..insaaniyat se bhi bada koi dharam nahi..ek behad hi bebak aur prabhavi abhi vykti..g8 job :)

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  22. इंसानियत का!
    प्रहार करती हुई रचना!

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  23. dharam kabhi alag alag ho hi nahi sakte, har kisi ka ek hi dharam hota hai.... haan insaan ne uske kitne tukde kiye hai ye to sab jaante hi hai...

    achi rachna k liye badhaai..

    Meri Nayi Kavita par aapke Comments ka intzar rahega.....

    A Silent Silence : Zindgi Se Mat Jhagad..

    Banned Area News : Ashley Greene's coffee date with Joe Jonas

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  24. वन्दे मातरम दोस्तों,
    मजहब नही सिखाता आपस मैं बैर रखना,
    हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तान हमारा,

    मिथलेश जी बहुत दिन बाद आपका लिखा पड़ने को मिला बहुत ही अच्छा विषय उठाया है आपने, कोई भी धर्म बड़ा या छोटा नही है, किसी भी धर्म ने बुरे को अपनाने की नशिहत कभी नही दी, धर्म ने हमे प्रेम सिखया आपस मैं जोड़ना सिखाया, और हम बेबकूफों की तरह धर्म के नाम पर लदे जा रहे हैं.
    सादर

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    स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ !

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  26. bahut sundar!
    visit also www.gaurtalab.blogspot.com

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  27. धर्म की अधिकता से कभी किसी को कुछ हाँसिल नही हुवा ... ये एक कड़ुवा सच है ....

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  28. shaandar aur sandesh parak kavita

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