Saturday, August 21, 2010

लेकिन तुम नहीं आये-------------मिथिलेश दुबे


आज फिर देर रात हो गयी
लेकिन आप नहीं आये
कल ही तो आपने कहा था
आज जल्दी आ जाऊंगा
जानती हूं मैं
झूठा था वह आश्वासन .......
पता नहीं क्यों
फिर भी एक आस दिखती हैं
हर बार ही
आपके झूठे आश्वासन में........
हाँ रोज की तरह आज भी
मैं खूद को भूलने की कोशिश कर रही हूँ
आपकी यादों के सहारे
रोज की तरह सुबह हो जाए
और आपको बाय कहते ही देख लूं..........
आज भी वहीं दिवार सामने है मेरे
जिसमे तस्वीर आपकी दिखती है
जो अब धूंधली पड़ रही है
जो आपके वफा का
अंजाम है या शायद
बढ़ती उम्र का एहसास........
वही बिस्तर भी है
जिसपर मैं रोज की तरह
आज भी तन्हा हूँ
अब तो इसे भी लत लग गई है
मेरी तन्हाई की..............
दिवार में लगा पेंट भी
कुरेदने से मिटनें लगा है
मेरे नाखून भी जैसे
खण्डहर से हो गये है
आसुओं की धार से
तकिए का रंग भी हल्का होने लगा है
सजन लेकिन तुम नहीं आये
तुम नहीं आये ।।

30 comments:

  1. वाह बहु्त अच्छी कविता है।
    शुभकामनाएं

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  2. प्रिय मिथिलेश जी ,
    आज आपकी कविता नें पुरुषों की बैंड बजा दी , कविता तो सुन्दर है पर मर्द बेवफाओं में शुमार हुए ! आज ज़रा ठिठोली का मन है सो आप ज़रा गौर करिये कि आपने टाइटिल में क्या लिखा है :)

    "लेकिन तुम नहीं आये.....मिथिलेश दुबे"

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  3. अली भईया क्या बताऊं, पता नहीं क्यो बस ऐसे ही ये विचार आया कि कुछ नारी पीड़ा को भी दर्शाया जाए सो लिख दिया । और वज पकड़ा आपने, आप भी ना ।

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  4. मनोरम प्रस्तुती!

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  5. सुन्दर,,,अति सुन्दर...आपका ये रूप तो मैंने आज पहली बार देखा...
    बहुत बढ़िया

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  6. आपकी ये अभिव्यक्ति सुन्दर लगी........आपके लेखन से हटकर.....

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  7. दिवार में लगा पेंट भी
    कुरेदने से मिटनें लगा है
    मेरे नाखून भी जैसे
    खण्डहर सी हो गई है
    आसुओं की धार से
    तकिए का रंग भी हल्का होने लगा है
    सजन लेकिन तुम नहीं आये
    तुम नहीं आये ।।
    बहुत खूब !!

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  8. आप क्यों नहीं समय पर कहीं आ जा रहे हैं ?

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  9. पुरुस मन से स्त्री हृदय का अभिव्यक्ति देखकर सुखद आस्चर्य हुआ... मिथिलेस बाबू एक सहृदय व्यक्ति का ई खूबी होता है कि वह भावनाओं को महसूस करता है अऊर हमरे बिचार में भावना का कोनो जेंडर नहीं होता है… इसलिए अपना पहिलका बात को काटते हुए आपको सुंदर रचना के लिए बधाई देते हैं..थोड़ा बहुत टाइपिंग का त्रुटि है, दोहरा लेंगे त सुधर जाएगा और निखर जाएगा...

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  10. अच्छा लगा यह पढकर।

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  11. आपकी ये अभिव्यक्ति सुन्दर लगी.....

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  12. बहुत दिनों बाद इतनी बढ़िया कविता पड़ने को मिली.... गजब का लिखा है

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  13. सुंदर प्रस्तुति।

    *** राष्ट्र की एकता को यदि बनाकर रखा जा सकता है तो उसका माध्यम हिन्दी ही हो सकती है।

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  14. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति... खूबसूरत कविता......

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  15. एक स्त्री के विरह को बेहद खूबसूरत शब्दों से सँवारा है………………सुन्दर प्रस्तुति।

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  16. अच्छी कविता ....शुभकामनाएँ !!

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  17. विरह पीड़ा का सुंदर चित्रण

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  18. अच्छी कविता ....शुभकामनाएँ !!

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  19. अपनी पोस्ट के प्रति मेरे भावों का समन्वय
    कल (23/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
    और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।

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  20. बढ़िया रचना. बधाई.

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  21. अपनी पोस्ट के प्रति मेरे भावों का समन्वय
    कल (23/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
    और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  22. बहुत सुन्दरता के साथ आपने औरत के दर्द को बयान किया है! आख़िर ये कैसा प्यार है जो निभा नहीं पाए तो इससे बेहतर की प्यार न करें ताकि उम्मीदों पर कोई औरत इंतज़ार करते करते अपनी ज़िन्दगी न बिता दें! अगर वफ़ा नहीं तो बेवफा न हो ! उस औरत ने तो अपनी जान से भी ज़्यादा चाहा पर उसे गम के अलावा कुछ भी न मिला! मिथिलेश जी बहुत दिनों के बाद दिल से लिखे हुए भावपूर्ण रचना पढने को मिला! इस उम्दा प्रस्तुती के लिये ढेर सारी बधाइयाँ!

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  23. अच्छी रचना बधाई !

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  24. महिलायें तो पहले से ही खूब अभिव्यक्त कर रही हैं अपने विचार, अब मिथिलेश भी नारी मन की व्यथा अभिव्यक्त करने लगे:)

    अच्छी कविता लिखी है, बधाई।

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  25. दूबे जी बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति

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  26. Mithilesh Bhai...

    Wah kya kavita likhi hai...

    Deepak...

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  27. बहुत सुन्दर कबिता
    धन्यवाद.

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  28. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना

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