
आज फिर देर रात हो गयी
लेकिन आप नहीं आये
कल ही तो आपने कहा था
आज जल्दी आ जाऊंगा
जानती हूं मैं
झूठा था वह आश्वासन .......
पता नहीं क्यों
फिर भी एक आस दिखती हैं
हर बार ही
आपके झूठे आश्वासन में........
हाँ रोज की तरह आज भी
मैं खूद को भूलने की कोशिश कर रही हूँ
आपकी यादों के सहारे
रोज की तरह सुबह हो जाए
और आपको बाय कहते ही देख लूं..........
आज भी वहीं दिवार सामने है मेरे
जिसमे तस्वीर आपकी दिखती है
जो अब धूंधली पड़ रही है
जो आपके वफा का
अंजाम है या शायद
बढ़ती उम्र का एहसास........
वही बिस्तर भी है
जिसपर मैं रोज की तरह
आज भी तन्हा हूँ
अब तो इसे भी लत लग गई है
मेरी तन्हाई की..............
दिवार में लगा पेंट भी
कुरेदने से मिटनें लगा है
मेरे नाखून भी जैसे
खण्डहर से हो गये है
आसुओं की धार से
तकिए का रंग भी हल्का होने लगा है
सजन लेकिन तुम नहीं आये
तुम नहीं आये ।।
वाह बहु्त अच्छी कविता है।
ReplyDeleteशुभकामनाएं
Achchhi Kavita , Mithilesh ji
ReplyDeleteप्रिय मिथिलेश जी ,
ReplyDeleteआज आपकी कविता नें पुरुषों की बैंड बजा दी , कविता तो सुन्दर है पर मर्द बेवफाओं में शुमार हुए ! आज ज़रा ठिठोली का मन है सो आप ज़रा गौर करिये कि आपने टाइटिल में क्या लिखा है :)
"लेकिन तुम नहीं आये.....मिथिलेश दुबे"
अली भईया क्या बताऊं, पता नहीं क्यो बस ऐसे ही ये विचार आया कि कुछ नारी पीड़ा को भी दर्शाया जाए सो लिख दिया । और वज पकड़ा आपने, आप भी ना ।
ReplyDeleteमनोरम प्रस्तुती!
ReplyDeleteसुन्दर,,,अति सुन्दर...आपका ये रूप तो मैंने आज पहली बार देखा...
ReplyDeleteबहुत बढ़िया
आपकी ये अभिव्यक्ति सुन्दर लगी........आपके लेखन से हटकर.....
ReplyDeleteदिवार में लगा पेंट भी
ReplyDeleteकुरेदने से मिटनें लगा है
मेरे नाखून भी जैसे
खण्डहर सी हो गई है
आसुओं की धार से
तकिए का रंग भी हल्का होने लगा है
सजन लेकिन तुम नहीं आये
तुम नहीं आये ।।
बहुत खूब !!
आप क्यों नहीं समय पर कहीं आ जा रहे हैं ?
ReplyDeleteपुरुस मन से स्त्री हृदय का अभिव्यक्ति देखकर सुखद आस्चर्य हुआ... मिथिलेस बाबू एक सहृदय व्यक्ति का ई खूबी होता है कि वह भावनाओं को महसूस करता है अऊर हमरे बिचार में भावना का कोनो जेंडर नहीं होता है… इसलिए अपना पहिलका बात को काटते हुए आपको सुंदर रचना के लिए बधाई देते हैं..थोड़ा बहुत टाइपिंग का त्रुटि है, दोहरा लेंगे त सुधर जाएगा और निखर जाएगा...
ReplyDeleteअच्छी प्रस्तुति
ReplyDeleteअच्छा लगा यह पढकर।
ReplyDeleteआपकी ये अभिव्यक्ति सुन्दर लगी.....
ReplyDeleteबहुत दिनों बाद इतनी बढ़िया कविता पड़ने को मिली.... गजब का लिखा है
ReplyDeleteसुंदर प्रस्तुति।
ReplyDelete*** राष्ट्र की एकता को यदि बनाकर रखा जा सकता है तो उसका माध्यम हिन्दी ही हो सकती है।
बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति... खूबसूरत कविता......
ReplyDeleteएक स्त्री के विरह को बेहद खूबसूरत शब्दों से सँवारा है………………सुन्दर प्रस्तुति।
ReplyDeleteअच्छी कविता ....शुभकामनाएँ !!
ReplyDeleteविरह पीड़ा का सुंदर चित्रण
ReplyDeleteअच्छी कविता ....शुभकामनाएँ !!
ReplyDeleteअपनी पोस्ट के प्रति मेरे भावों का समन्वय
ReplyDeleteकल (23/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
बढ़िया रचना. बधाई.
ReplyDeleteअपनी पोस्ट के प्रति मेरे भावों का समन्वय
ReplyDeleteकल (23/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com
बहुत सुन्दरता के साथ आपने औरत के दर्द को बयान किया है! आख़िर ये कैसा प्यार है जो निभा नहीं पाए तो इससे बेहतर की प्यार न करें ताकि उम्मीदों पर कोई औरत इंतज़ार करते करते अपनी ज़िन्दगी न बिता दें! अगर वफ़ा नहीं तो बेवफा न हो ! उस औरत ने तो अपनी जान से भी ज़्यादा चाहा पर उसे गम के अलावा कुछ भी न मिला! मिथिलेश जी बहुत दिनों के बाद दिल से लिखे हुए भावपूर्ण रचना पढने को मिला! इस उम्दा प्रस्तुती के लिये ढेर सारी बधाइयाँ!
ReplyDeleteअच्छी रचना बधाई !
ReplyDeleteमहिलायें तो पहले से ही खूब अभिव्यक्त कर रही हैं अपने विचार, अब मिथिलेश भी नारी मन की व्यथा अभिव्यक्त करने लगे:)
ReplyDeleteअच्छी कविता लिखी है, बधाई।
दूबे जी बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति
ReplyDeleteMithilesh Bhai...
ReplyDeleteWah kya kavita likhi hai...
Deepak...
बहुत सुन्दर कबिता
ReplyDeleteधन्यवाद.
बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना
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