Sunday, August 22, 2010

क्योंकि वेश्या है वह ??????--- मिथिलेश दुबे


सहती न जानें कितने जुल्म
करती ग्रहण
पुरुष कुंठाओ को
हर रात ही होती है हमबिस्तर
न जानें कितनों के साथ.............
कभी उसे कचरा कहा जाता
कभी समाज की गंदगी
कभी कलंक कहा गया
कभी बाई प्रोडक्ट
तो कभी सभ्य सफेदपोश
समाज का गटर.........
आखिर हो भी क्यों ना
कसूर है उसका कि वह
इन सफेद पोशों के वासना को
काम कल्पनाओं को
कहीं अंधेरे में ले जाकर
लील जाती है
खूद को बेचा करती है
घंटो और मिनटों के हिसाब से...........
जहाँ इसी समाज में
नारी को सृजना कहा जाता है
पूज्य कहा जाता है
माता कहा जाता है
देवी कहा जाता है
उसी समाज की
शोषित, उपेक्षित
उत्पीडित, दमित
कुल्टा है वह
क्योंकि दोष है उसका
वेश्या है वह।

49 comments:

  1. उफ़ …………एक गहरी वेदना का गहन चित्रण्………………इस पर तो कुछ कहने की भी हिम्मत नही हो रही सिर्फ़ महसूस कर पा रही हूँ……………बेहद मार्मिक और कटु सच्चाई।

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  2. काश कोई समझ पाता उनके दर्द को .........उनके तन नहीं उनके मन में झांक पाता कि .कभी वो भी किसी की बेटी थी..........बहन थी..............

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  3. इस अभिशप्तता का जिम्मेदार कौन है ?

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  4. अपना अपना भाग्‍य .. क्‍या खूब लिखा आपने !!

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  5. प्रिय मिथिलेश जी ,
    संभवतः यह अंतिम विकल्प है , स्वयं या परिजनों के अस्तित्व को बनाये रखने का , अन्यथा कोई भी स्त्री इस पंक में स्वेच्छा से नहीं आती ! आज आपनें एक उद्देश्यपरक / सार्थक कविता रची है ! विसंगति पर गहरा आघात किया है !

    साधुवाद ! साधुवाद !

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  6. एक गहरी वेदना का गहन चित्रण्

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  7. नहीं वैश्य नहीं थी वो........... गंगा ही तो थी. जो धो रही थी लोगो के पाप. और अब मैली हो गयी

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  8. कटु सत्य।
    साधना फ़िल्म क गाना याद आ गया
    औरत ने जनम दिया मर्दों को
    मर्दों ने उसे बाज़ार दिया। ...

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  9. मिथिलेस जी, सायद चुप से बेहतर कुच्छो नहीं होगा इस कविता पर..अब इसको चाहे त समाज के मरे हुए मूल्य के सोक में दो मिनट का मौन कह लीजिए!!

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  10. कटु सत्य को उजागर करती प्रभावशाली रचना...

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  11. कुछ नया नहीं कहा आपने।

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  12. सामाजिक यथाथे और नारी वेदना को सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति दी है भाई आपने, धन्‍यवाद.

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  13. रक्षाबंधन पर हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!
    बहुत खूब लिखा है आपने! गहरी वेदना का बिल्कुल सही चित्रण किया है आपने जो सराहनीय है!

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  14. बहुत मार्मिक प्रस्तुति ....

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  15. रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाये!

    संवेदनाओं से भरी हुई एक ज़बरदस्त रचना है..... बहुत खूब!

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  16. बहुत बड़ा सच. जो उसे इस बाज़ार में लाने के ज़िम्मेदार हैं, वे ही हिकारत से देखते हैं, बहुत कड़वा सच. रक्षाबन्धन की शुभकामनाएं.

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  17. बबली जी से सहमत.

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  18. क्योंकि दोष है उसका
    वेश्या है वह।
    .....gahare bhaav....achhi kavita.

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  19. समाज का वो पक्ष,जिस पर कोई कुछ भी कहने से गुरेज करता है..सार्थक रचना,

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  20. मार्मिक ... काश उनको भी कोई समझ सकता ... उठा पाता इस गंदगी से ....

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  21. ...kitani majboor ho kar we yeh pesha apnaati hogi!...ek naye vishay par aapne kavya rachana ki hai, dhanyawaad!

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  22. मार्मिक और कष्टकारक अध्याय है मानव समाज का ...

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  23. न सफेद पोशों के वासना को
    काम कल्पनाओं को
    कहीं अंधेरे में ले जाकर
    लील जाती है
    खूद को बेचा करती है
    घंटो और मिनटों के हिसाब से...........

    मिथिलेश जी एक पुरुष होकर स्त्री के लिए इतनी बारीकी से लिखना बहुत बड़ी बात है .....
    बहुत ही गहरी रचना .....बधाई ....!!

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  24. उसी समाज की
    शोषित, उपेक्षित
    उत्पीडित, दमित
    कुल्टा है वह
    क्योंकि दोष है उसका
    वेश्या है वह।
    vanadna dubey ji aur harkirat ji dono ne meri man ki baate kah di .jo koste hai wahi izzatdaar hi wahan jaate hai aur unki durdasha karte hai .vicharniye hai aur achchha likha hai

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  25. वेश्या शब्द को हिकारत से महसूस करना, देखना ,बोलना, सुनना हम छोड़ देंगे तो ये शायद हमारा धर्म होगा ?
    दुसरो के दिए दर्द को दूसरोके लिए अपना मानकर उसपर मर्मस्पर्शी रचना के लिए साधुवाद |
    ये हमारे समाज की विडम्बना ही है की जो भी हमारी किसी भी तरह की गंदगी को साफ करते है ,अपना जीवन यापन करते है वो ही हमारे द्वारा उपेक्षित होते है |

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  26. सार्थक कविता.
    वैसे तो बहुत कम लोग ही हैं जो सर्वथा नया कह पाते हैं. एक ही विषय पर बहुतों की कलम चलती है मगर कहने का अंदाज जुदा होता है. इस विषय पर लिखना, इस दर्द को महसूस करना और प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान इस ओर खींचना बड़ी बात है.
    ..बधाई.

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  27. सार्थक कविता । .....अच्छा लगा पढ़कर !

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  28. ek dam kaduva sach liye huue sarthak post.apni gaharai chhodne me shat pratishat safal.main shobhana ji ki baat se sahamat hun.
    poonam

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  29. किसी वेश्या की यह उक्ती कि हम हैं इसीसे पुरुषों के घर में माँ बहनें और बीवियाँ सुरक्षित है विचारणीय है । पुरुष को तो कोई दोष नही देता पर स्त्री को हमेशा कटघरे में खडा किया जाता है । कितनी मजबूर होंगी वे जो यह काम करने को बाध्य हैं ।

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  30. समाज का नंगा सच। प्रभावी प्रस्तुति।

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  31. काफी दिन से कुछ लिखा क्यों नहीं ??

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  32. dubey ji sahi keha ..'hir' ji ne sahi keha..vakai aap badhai ke haqdaar hai..mujhe to aise jeevan ki kaplna bhar se dar lagta hai!

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  33. bahut achchi rachna dubey ji badhayee ...........

    iss vishay pr maine kuch kosish ki thi

    http://neerajkavi.blogspot.com/2009/12/blog-post.html

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  34. umda kavita

    karuna ki kavita

    _______uttam post !

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  35. आपको एवं आपके परिवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !

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  36. ज़बरदस्त... बहुत ही विचारोत्तेजक रचना...

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  37. भगवान श्री गणेश आपको एवं आपके परिवार को सुख-स्मृद्धि प्रदान करें! गणेश चतुर्थी की शुभकामनायें!

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  38. बहुत ही मार्मिक एवं संवेदना युक्त रचना। समाज के इस उपेक्षित तबके का दर्द उकेरती हुयी।

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  39. इस बात पर सदिया रुसवा हुई हैं और शायद होती रहेंगी..क्योंकि अब तो यह अंडरवलर््ड का मुनाफेदार पेशा बन गया है।

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  40. इस बात पर सदिया रुसवा हुई हैं और शायद होती रहेंगी..क्योंकि अब तो यह अंडरवलर््ड का मुनाफेदार पेशा बन गया है।

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  41. कुछ तो लिखो भाई..तबियत तो ठीक है!

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  42. Very thoughtful n soulful poem... behad maarmik, kahin gahre utar jane wali... loved ur blog

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  43. बहुत मर्निक और भावमयी प्रस्तुति ....

    आज मिश्रा जी की पोस्ट से आपको जानने का अवसर प्रदान हुआ .. पहली बार आपके ब्लॉग पर आई हूँ बहुत अच्छा लगा

    आपके जल्दी स्वस्थ होने की कामना करती हूँ ...

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  44. bahut badhiya yaar

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