Monday, December 6, 2010

"तुम्हारी बातें ही आईना थी "------------मिथिलेश दुबे

तुम्हारी बातें ही आईना थी

जिंसमे देखता था तुमको मैं

टुकड़ो-टुकड़ो में मिलती थी खुशी

दिन में कई बार।।



उन दिनो यूं ही हम तुम


खुश हुआ करते थे

न तुमने मुझे देखा था और

न ही मैने तुमको

बना ली थी एक तस्विर

तुम्हारी उन बातो से

सजा लिए थे सपनें रातों में

तुम्हारी उन बातो से

महसुस करता था तुमको हर पल

कल्पंनाये न छोड़ती थी साथ

जिसपर बैठ कर तय करता था सफर अपना।।



अच्छ लगता यूँ ही सब कुछ

सोचकर बाते तेरी मुस्कुराहट

उतर आती थी होठो पर

कितना हसीन था वो पल

वो साथ

जब बातें ही हमारी आवाज

हमारें जज्बात बयां करती थी।।



मै प्यार की गहराई तुम्हे समझाता

और प्यार की ऊंचाई

तुम चुपचाप ही सुनती रहती थी सब कुछ

यूं ही तब ये सिलसिला चलता रहता था

देर तक और फिर पूछता था

तुमसे न जाने कितने सवाल

तुम मुस्कुराकर ही टाल देती थी जवाब।।


मैं गुस्साता तो तुम समझाती

मैं रुठता तो तुम मनाती

पल आज फिर से याद आ रहा है

सोचकर बातें मैं

आज अकेले ही मुस्कुराता हूँ

तुमको याद करके।।

19 comments:

  1. नर्म अहसासों की बानगी है…………बेहद खूबसूरत्।

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  2. बहुत ही मखमली अभिव्यक्ति दी है आपने!
    --
    सुन्दर शब्दचित्र!

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  3. आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
    बहुत ख़ूबसूरत और लाजवाब रचना लिखा है आपने! बधाई!

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  4. सोचकर बातें मैं

    आज अकेले ही मुस्कुराता हूँ

    तुमको याद करके।।
    अच्छी कविता ...अंतिम पंक्तियाँ तो बहुत ही अच्छी लगीं.

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  5. बहुत रोचक और सुन्दर अंदाज में लिखी गई रचना .....आभार

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  6. तुमसे न जाने कितने सवाल

    तुम मुस्कुराकर ही टाल देती थी जवाब।।
    ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

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  7. बातों का आईना, बहुत सुन्दर परिकल्पना।

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  8. बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
    विचार-प्रायश्चित

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  9. मै प्यार की गहराई तुम्हे समझाता

    और प्यार की ऊंचाई .
    बहुत अच्छा अहसास लम्बी किन्तु सुन्दर कबिता ---बधाई.

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  10. @सोचकर बातें मैं
    आज अकेले ही मुस्कुराता हूँ


    जीवन के सफर में ये भी एक मुकाम आता है......
    जब अकेले बैठ कर मुस्कुराता हूं... और लोग पागल समझते हैं.

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  11. प्रिय मिथिलेश जी ,
    उनकी बातों के आईने में ,उनको देख कर खुश 'आप' हुए ! ...और उस अनदेखे की तस्वीर भी बनाकर रातों के स्वप्न और कल्पनाएँ भी जी डालीं 'आपने' ! फिर प्यार की गहराई और ऊंचाई से वाबस्ता सवालों के सिलसिले भी 'आपके' ! तब रूठना और अबकी यादें भी 'आपकी'!

    पर वो बेचारी तो केवल, बातों , मुस्कराहट , मनाने और यादों में सिमट कर रह गयी :)

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  12. khoobasoorat our laajavaab rachna.

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  13. आरे मेरी टिप्पणी कहाँ गयी कल मैने इस पर टिप्पणी दी थी।पहले बाताओ फिर अगली टिप्पणी दूँगी। आशीर्वाद।

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  14. बहुत सुंदर कविता. बहुत ही भावपूर्ण...

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  15. अंतर्मन के अहसास को बखूबी शब्दों में ढाला है..........मिथिलेश जी इतने दिन कहाँ रहे .बहुत दिनो बाद आपकी रचना पढने को मिली........

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  16. लगता है सब अंतरजाल की कृपा है ...बहुत खूबसूरती से गढ़ी है रचना ...

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  17. waah
    अच्छा लगा भाई

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