Sunday, January 24, 2010

लिखता हूँ मैं कूड़ा करकट फिर भी, टिप्पणियां काश मिलती खूब सारी----(मिथिलेश दुबे)

बहुत दिंनो से देख रहा हूँ कि टिप्पणी को लेकर ब्लोगजगत में काफी उधम मचा हुआ है, कोई ब्लोगिंग ही छोड़ कर जा रहा,, कारण बस टिप्पणी ना मिलना । कभी-कभी लगता है कि टिप्पणी हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या टिप्पणी मात्र से ही कविता या अन्य विधा का मूल्यांकन हो सकता है, ये शायद बड़ा सवाल हो, बात सही कि टिप्पणी मिलने से उत्साह वर्धन जरुर होता है, लेकिन ध्यान ये भी दिया जाना चाहिए कि टिप्पणी है कैसी, यहाँ है कैसी का मतलब यह है कि वह आपको टिप्पणी मिलीं क्यो, आपके रचना के ऊपर या आग्रह के ऊपर । ज्यादातर लोगो का कहना होता है कि रचना अच्छी हो तो टिप्पणी ज्यादा मिलनी चाहिए, बात फिर आकर रुकती है कि क्या टिप्पणी करने वाला हमारी रचना का मूल्यांकन करने लायक है ? बहुत लोगो की शिकायत होती है कि मैं अच्छा लिखता हूँ फिर भी टिप्पणी नहीं मिलती , क्योंकि मेरा नेटवर्क कमजोर है, बात किसी हद तक मानी जा सकती है, लेकिन किसी को पढने या टिप्पणी के लिए बाध्य तो नहीं किया जा सकता, लेकिन नेटवर्किंग को दर किनार भी नहीं किया जा सकता। मैं तो कहता हूँ कि टिप्पणी कि चिंता छोडीये, आपको एक टिप्पणी ही मिले, लेकिन वह पढने वाले कें अन्तर्मन से हो , और वह टिप्पणी आपको आपके रचना के ऊपर मिले तो संमझिए की वह सौ टिप्पणी के बराबर है, बस फोरमेलटी पूरी करने वाली टिप्पणी से कुछ नहीं होने वाला है । बस ज्यादा नहीं बस यही कहना है कि लीखिए अपने संतुष्टि के लिए, बाकी सब पढने वाले के उपर छोड दिजीए । और अन्त में हाजीर है टिप्पणी से ही जुडी एक कविता,शायद और कुछ समझ आ जाये

टिप्पणियां काश मिलती खूब सारी,

कविता चाहे अच्छी न हो हमारी,

करता गुजारिश सभी ब्लागरों से,

टिपियाने की अब है आपकी बारी,




पढ़ता न कोई आग्रह करने पर,

लिखता हूँ मैं कूड़ा करकट,

कहते हैं वो सब,

फिर भी मैंने ना हिम्मत हारी,

कृपया टिपियाइये अब है आपकी बारी,




मूल्य का मूल्याकंन करो,

जो लिखा चाहो तो न पढ़ो,

दिया हुआ लिंक है,

उस पर क्लिक करो,

समय कम है , मालूम है,

फिर भी भाई कुछ ही टिपियाते चलो, ,




आपका भी नाम होगा,

मेरा भी काम होगा,

आपका भी ब्लाग देखूँगा,

हो सकेगा तो कुछ टिपिया दूँगा,





इसलिए करता हूँ मेल,

चर्चा करूँगा तो होगा विवाद,

होगी बेवजह बदनामी,

गुपचुप तरीके से की तैयारी,

चलिये कीजिए टिप्पणी,

मैं भी पडूं सब पर भारी,

आयी है आपकी बारी,

काश टिप्पणी मिले खूब सारी।।

Friday, January 22, 2010

मैंने जो किया वह सही है पर फिर भी अकेला हूँ क्यों ?-- (मिथिलेश दुबे)

कुछ भी सही लगता रहा न जाने क्यों गलत होते हुए भी ? हमेशा से एक तलाश अधूरी लिए दिल के कोने में कभी नहीं भटका अचानक ही कुछ ऐसा जिसकी मुझे जरूरत थी पर शायद उम्मीद तो कभी भी न थी । पहली मुलाकात की याद शायद ही कभी जेहन से उतर पाये । इन सब के बीच खुद इतना खुश हो जाना था जिसको किसी के सामने दिखाया और बताया न जा सकता है । हम किसी ट्रेन या बगीचे या फिर राह चलते न मिले थे हमको तो बस मिलना था इसलिए मिले थे । कहीं कोई जान पहचान न होते हुए भी अजनबी न थे । किस्मत ने टक्कर दी और मैं न जाने क्यों वो कर बैठा जिसको मैं कभी न कर सकता था । धीरे धीरे हम इतने पास पास हुए कि दूर होने का गम पल पल घुटन देता । कहते हैं कि ज्यादा प्यार हो तो फिर वहां पर कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर होने वाला है ।

मिलाने से लेकर बिखराब तक का सफर तय कर लेने के बाद भी आज जब सोचता हूँ मैं सब बातों को तो न जाने एक विश्वास अब भी कायम सा लगता है जो कि है ही नहीं । मुझे लगता रहा है कि मैंने जो किया वह सही है पर फिर भी अकेला हूँ क्यों ? शायद इसका जवाब मेरे पास नहीं है और न कभी होगा । इंसान अपनी हार पराजय को बहुत ही मुश्किल से स्वीकार करता है और मैं उनमें से हूँ जो हार कर भी न जाने जीत का एहसास पाता है । दूर रहने से कोई रिश्ता कमजोर नहीं होता बल्कि और मजबूत ही होता लगा मुझे । लड़ाई करके किसी को भूलना हो ही नहीं सकता बल्कि और भी पास आ जाते हैं । गिले शिकवे जरूर होते हैं पर प्यार और भी ज्यादा । ये सब समझाना चाहता था मैं पर कभी सफल नहीं हो पाया हूँ मैं न जाने क्यों या फिर वो समझना ही न चाहते हो । जो भी है आज मेरे पास शुकून और दुख दोनों देता है ।

Thursday, January 14, 2010

ढकोसला नंद महाराज को चाहिए मल्लिका से गर्मी , हिन्दी ब्लोगिंग में ये कब से होने लगा , शर्म नहीं आती इनकों

जी हाँ बिल्कुल सही सुना आपने, शायद ऐसे बाबा और साधू के बारे में आप लोग पहली बार सुन रहें हों कि येमहाराज अपने भक्तो से कह रहें कि बच्चा ठंड बहुत ज्यादा बढ गयी है , कोई मल्लिका जैसी चेली भेजो जो मुझे गर्मी प्रदान कर सके इस ठंड में , सुनकर बडा अजीब लगता है कोई बाबा इस तरह की वाहियात और लज्जाहीन माँगे करता है अपने भक्तो से, वह भी ऐसे जगह जहाँ ये पाप माना जाता हो लेकिन क्या किया जायें इस बाबा के उपर कलियूग पूरी तरह से हाबी है , इसे कुछ आगे पिछे की सूझ ही नहीं रही , नहीं तो ऐसे फालतू की मांगे ही ना करता आपको ज्यादा माथापच्ची करने की जरुरत नहीं है , ये बाबा हमारे ही हिन्दी ब्लोगजगत के हैं , जो कि हिन्दी ब्लोगजगत को दूषित कर रहें है शर्म नहीं आती ऐसे बाबाओ को जो की गर्मी लाने के लिए मल्लिका की माँकर रहा है हैरानी तब और भी आती है जब इनके बारे में टिप्पणीया देखने को मिलती हैं , लोग इनका विरोध करने की बजाय इनका आशिर्वाद ग्रहण करते है , शायद ये बात ऊनकें भक्तो को जरा भी अच्छी ना लगें

ये बाबा आखिर हैं कौन तो ये भी आप लोगो को बता देता हूं , ये बाबा है लगोंटा नंद इनके नाम मात्र से ही बहुत कुछ प्रतीत हो रहा है । इन बाबा का दिमाग जो है ना वह अभी घास चरने चला गया है हिमालय पर्वत पर । इनके ब्लोग पर कल मैंने एक पोस्ट देखा , जिसमे बाबा अपने भक्तो से क्या कह रहें है कूद ही देख लीजिए

लगोंटा नंद-----said
एक मल्लिका टाइप चेली की व्यवस्था हो !!!

सभी ब्लॉगर भक्तों का कल्याण हो ! हमें पता है, तुम सभी ठण्ड को लेकर परेशान हो कीबोर्ड पर उंगलियाँ नहीं चल रही है,पोस्ट छोड़ने में जान निकल रही है,..पर बच्चा लोग तुम तो फिर भी ठीक हो, यहाँ हिमालय पर मात्र एक लंगोट के सहारे हमारी हालत तुमसे भी ज्यादा खराब हो रही है, लैपटॉप को बार-बार गर्म करता हूँ तो शरीर ठंडा हो जाता है, शरीर गर्म करने की मेरे पास कोई व्यवस्था भी नहीं है, एक चेली थी, वो भी ठण्ड तो झेल रही थी पर हमें झेलने को तैयार न हुई और इस बर्फीली चोटी पर हमें मरने को अकेला छोड़ भाग गई! बच्चा लोग कोई सुन्दर सी चेली हमारे लिए भेजने की व्यवस्था हो जाए तो.......!
जल्द ही व्यवस्था करवाओ वरना तुम सब अपने महान लंगोटानंद बाबा से हाथ धो बैठोगे, ठण्ड में हमारी कुल्फी जम रही है, जल्दी भेजो मल्लिका टाइप चेली !"""

अब अगर आप लोगो ने ठिक तरह से पढ लिया होगा तो आपको समझ भी आ गया होगा इनके बारे में । ये सब पढने के बाद मैने क्या कहा इनके ब्लोग पर जरा देखियेगा

Mithilesh dubey said...

वैसे आप जो भी हो , ये बात तो पता चल गयी है कि आप निहायत ही घटिया प्रकार के साधु हो । अरे ये कोई तवायफ खाना नहीं है कि आप यहाँ अपने गर्मी के लिए चेली ढुढ रहे हैं , जब आप इस प्रकार के साधु हैं तो आपको ऐसे जगहो के बारे में पता ही होगा । शर्म आनी चाहिए आपको अपने आप आपको महाराज कहते हुए , आप तो महाराज और साधु के नाम पर कलंक है । अब समझ आया कि आपको क्यों बस लगोंटा ही मिला है , अब ऐसी सोच वाले को और क्या मिल ही सकता । मै तो चाहुंगा की आप वहीं बर्फ में दब जायें , ताकि आप जैसे महाराजो की से ये पृथ्वी छुटकारा पाये ।

से आप लोगो को बता दूँ कि बाबा के चेले भी बहुत हैं , उन्ही मे से एक इनका चेला मुझे कहते है देखिये

jhottanand said...

और बच्चा मिथिलेश...लंगोटनन्द जी के प्रति अकारण इतना इतना क्रोध करना ठीक नहीं...तुम्हारी तो उम्र है ..एक नहीं दस पटा लोगे...लेकिन लंगोटनन्द जी कहाँ जाएँ?....किसके दर के आगे अपना माथा फोड़ें?
जैसे भरे पेट को भूखे की व्यथा का अंदाज़ा नहीं होता...जैसे तृप्त व्यक्ति को प्यासे के दुख का भान ही नहीं होता ..उसी तरह तुम्हें भी लंगोटनन्द जी की वेदना का ज्ञान नहीं है...
अभी कल ही दिल्ली जैसे शहर के रैन बसेरे में ठंड से सात लोगों के मौत हो गई है... और फिर बाबा लंगोटनन्द जी तो हिमालय की बर्फ़ीली चोटियों पर।

ये बाबा मुझे कहते हैं कि तुम तो अभी जवान हो , तुम जितनी चाहो उतनी लड़कियाँ पटा सकते हो , तो कहता हूँ अरे पाखंडी बाबा जब लडंकिया पटाने का इतना ही शौक है तो बाबा और महाराज काहे को बने फिरते हो , । अब लोग ही बताईये कि हिन्दी ब्लोगिंग कोई ऐसी जगह तो है नहीं कि जहाँ से इन्हे लड़किया प्रदान की जा सके, वह भी मात्र गर्मी प्रदान करने के लिए । पता नहीं इनका मकसद क्या है ब्लोगिंग का , भगवान ही जाने ।

अन्त में सभी वरीष्ठ ब्लोगरो से निवेदन है कि इस प्रकार फलतू और गन्दी ब्लोगिंग का विरोध करें , ताकी जो हिन्दी ब्लोगिंग की प्रतिष्ठा बची है वह बची रही , इनको ज्यादा तवज्जो ना दें नही तो ये अपने जैसे हिन्दी ब्लोगिंग को भी बना देंगे ।

Monday, January 11, 2010

हिन्दी साहित्य मंच कविता प्रतियोगिता सूचना

हिन्दी साहित्य मंच "चतुर्थ कविता प्रतियोगिता" मार्च माह में आयोजित कर रहा है। इस कविता प्रतियोगिता के लिए किसी विषय का निर्धारण नहीं किया गया है अतः साहित्यप्रेमी स्वइच्छा से किसी भी विषय पर अपनी रचना भेज सकते हैं । रचना आपकी स्वरचित होना अनिवार्य है । आपकी रचना हमें फरवरी माह के अन्तिम दिन तक मिल जानी चाहिए । इसके बाद आयी हुई रचना स्वीकार नहीं की जायेगी ।आप अपनी रचना हमें " यूनिकोड या क्रूर्तिदेव " फांट में ही भेंजें । आप सभी से यह अनुरोध है कि मात्र एक ही रचना हमें कविता प्रतियोगिता हेतु भेजें रचना के साथ-साथ अपना स्थाई पता और फोन नम्बर अवश्य ही संलग्न करें ।

प्रथम द्वितीय एवं तृतीय स्थान पर आने वाली रचना को पुरस्कृत किया जायेगा । दो रचना को सांत्वना पुरस्कार दिया जायेगा ।

प्रथम पुरस्कार - रूपये एक हजार , द्वितीय पुरस्कार - रूपये पांच सौ , तृतीय पुरस्कार - रूपये तीन सौ । साथ ही दो कविता को हिन्दी साहित्य मंच की तरफ से सांत्वना पुरस्कार दिया जायेगा । हिन्दी साहित्य मंच की तरफ से एक प्रशस्ति - पत्र भी प्रदान किया जायेगा ।

सर्वश्रेष्ठ कविता का चयन हमारे निर्णायक मण्डल द्वारा किया जायेगा । जो सभी को मान्य होगा ।आइये इस प्रयास को सफल बनायें । हमारे इस पते पर अपनी रचना भेजें -
hindisahityamanch@gmail.com .आप हमारे इस नं पर संपर्क कर सकते हैं-09891584813,09818837469,
हिन्दी साहित्य मंच एक प्रयास कर रहा है राष्ट्रभाषा " हिन्दी " के लिए । आप सब इस प्रयास में अपनी भागीगारी कर इस प्रयास को सफल बनायें । आइये हमारे साथ हिन्दी साहित्य मंच पर । हिन्दी का एक विरवा लगाये जिससे आने वाले समय में एक हिन्दीभाषी राष्ट्र की कल्पना को साकार रूप दे सकें ।


संचालक
हिन्दी साहित्य मंच
नई दिल्ली

Saturday, January 9, 2010

सांसे जो कम पड़ जायें तो ले लेना मेरी-----------(मिथिलेश दुबे)


इंम्तहान तेरे प्यार का अब होगा ,
यार तेरा जब तुझसे जुदा होगा,
बस बातें ही रह जायेगी यादों का पुलिन्दा बनकर,
इनके ही सहारे जीवन का सफर अब होगा ।।

जमाने से मिलकर तो चलना ही होगा ,
राहें है मुश्किल मगर मंजिल पर पहुँचना होगा,
सांसे जो कम पड़ जायें तो ले लेना मेरी,
पर जो वादा किया है तुमने उसे पूरा करना ही होगा ।।

अब वक्त का तकाजा ये होगा ,
प्यार मेरा अब तेरा होगा ,
हम पार कर जायेंगे सरहदें सारी,
उस जहां में न कोई प्यार का इंम्तहान होगा।।

Wednesday, January 6, 2010

नारी के प्रति वासनात्मक दृष्टि हटाकर हमें पवित्रता का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए

क्या ? अरे नहीं भाई मैं ही हूँ । जानता हूँ आप लोगो को लग रहा होगा कि मेरा ह्रदय परिवर्तन हो गया है , तो ऐसा कुछ नहीं है , मेरे लेखो से बहुत लोगो को लगता है कि मै नारी विरोधी हूँ , तो सच कह रहा हूँ कि नारी से श्रेष्ट तो कोई हो ही नही सकता , और ये शिगूफा मात्र नहीं , मैंने पिछे भी बहुत से उदाहरण दिये है , और कुछ आज भी देंने का प्रयास करूंगा , और ये भी बताऊंगा कि नारी के प्रति पुरुषो के क्या रवैये होने चाहिए ।हमारा यहाँ आज की महिलाए कहती है कि उन्हे दबाने की कोशिश की जाती है , इसमे सच्चाई भी है , लेकिन ये वे लोग करते हैं जो नारी शक्ति से अनभिज्ञ्य है , सच तो ये है कि नारी ही सर्वश्रेष्ठ है । हमें फिर इसके लिए पिछे की ओर ही जाना पड़ेगा , हो सकता है कि इसे बहुत से लोग कथीत कहें तो उनके लिए ये नहीं है ।

बात करते हैं ब्राह्मी महाशक्ति गायत्री की , गायत्री माता को एक देवी के रुप में चित्रित-अंकित किया गया है । प्रश्न यह उठता है कि गायत्री महाशक्ति को नारी के रुप में क्यों पूजा जाता है, जबकि अन्य सभी देवता नर रुप हैं । इसी प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि गायत्री महामंत्र में सविता देवता की प्रार्थना के लिए पुल्लिंग शब्दो का प्रयोग हुआ है , फिर उसे नारी रुप में क्यों माना गया ? इस प्रकार के प्रश्नो या शंकाओं के मूल आधार में मनुष्य की यह ,मान्यता ही काम करती है , जिसके अनुसार नर को श्रेष्ठ और नारी को निकृष्ट माना गया है , जो की अशिक्षा का अभाव है और कुछ नहीं , हाँ कुछ महिलाओं का कहा होता है कि ये अत्याचार है , तो ऐसा कुछ नहीं ।

स्त्री का वर्चस्व स्वीकार करने में कुछ पुरुषो को अपना अपमान समझ में आता है , जबकी सत्य तो यही है कि नारी ही श्रेष्ठ है । नहीं तो हम नारी शक्ति की पूजा क्यों करते , उसके सामने सर क्यों झुकाते । हमारे यहाँ आज से नहीं अपितु सदियो से ही नारी को सबसे उपर दर्जा दिया जाता रहा है । जो आपको इस प्रार्थना में भी दिखेगा

त्वमेव माता पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव
त्वमेव विद्दा द्रविणं त्वमेव , त्वमेव सर्वं मम देव देव ।।

प्रार्थना में जिंन संबंधो को गिनाया गया है उनमें माता का संबंध सर्वप्रथम है , सर्वोपरि भी है , क्योंकि माता से बढकर परम निःस्वार्थ , अतिशय कोमल , करुणा एंव वात्सल्य से पूर्ण और कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता । जब हम भगवान को माता मानकर चलते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया किसी सह्रदय माता के वात्सल्य के रुप में ही उपलब्ध होती है । ये सच बात है कि नारी के प्रति मनुष्यों में वासनात्मक दुष्टता की प्रवृत्ति जड जमायें रखती है , लेकिन हर व्यक्ति के साथ नहीं होता , ऐसा वही करते है जो नारी शक्ति से अपरचित रहते हैं । यदि इसे हटाया जा सके , नर और नारी के बीच काम-कौतुक की कल्पना मिटाई जा सके तो वीष को अमृत में बदलने जैसी भावानात्मक रसायन बन सकती है ,। नर और नारी के बीच जि 'रयि' और प्राण विद्दुत धारा-सी बहती है, उसका संपर्क वैसा ही प्रभाव उत्पन्न करता है, जैसा बिजली की 'निगेटिव' और पाजिटीव धाराओं के मिलन से बिद्दुत-संचार का माध्यम बनाया जाता है । माता और पुत्र का मिलन एक अंत्यन्त उत्कृष्ट स्तर की आध्यात्मिक विद्दुत धारा का सृजन करता है । मातृ स्नेह से विहीन बालकों में एक बड़ा मानसीक अभाव रह जाता है । भले ही उन्हें सांसारिक अन्य सुविधायें कितनी ही अधिक क्यों न हो ।

पत्नि , बहन , पु्त्री आदि के रुप में नारी भावनात्मक पोषण प्रदान करती है । नारी के रुप में हमें माता का ध्यान करना चाहिए और वासनात्तमक दृष्टि को मिटाने का प्रयास करना चाहिए । नारी के रुप में हम गायत्री की उपासना करते हैं और हमें शान्ति मिलती है । इसलिए हम पुरुषो का ये कर्तव्य बनता है कि नारी को समान अधिकार दें और उनको श्रष्टता का दर्जा दें , जिसमे हमारे साथ-साथ संसार का कल्याण है ।

नर की जननी होने के कारण वस्तुतः नारी उससे कहीं अधिक श्रेष्ठ है एंव पवित्र है । उसका स्थान संभवतः ऊंचा है । माता का पूज्य स्थान पिता एंव उससे भी ऊँचा है । पुरुष की अपूरर्ताएं नारी के स्नेह सिंचन से ही दूर होती हैं । इसलिए यदि नारी के रुप में हमारा ऊपास्य इष्ट हो तो वह औचित्य ही है । अनादिकाल से भारतीय धर्म ऐसी ही मान्यता चली आ रही , जसके अनुसार माता को ही नहीं पत्नी को भी पति से अधिक एंम प्रथम सम्मान मिला है । पति-पत्नि के सम्मिलित युग्म में पत्नि को प्राथमिकता है, । लक्ष्मी-नारायण , सीता-राम , राधे-श्याम , उमा महेश , शची-पुरंदर ,माता-पिता, गंगा -सागर आदि नामो में नारी को ही प्राथमिकता मिली है । कारण उसकी वरिष्ठता ही है । इस दृष्टि से भी यदि देवता का पुल्लिंग स्वरुप अधिक उत्तम है या स्त्रीलिंग स्वरुप तो उसका सहज उत्तर नारी के रुप में ही आयेगा । ऐसी दशा में यह शंका संदेह उचित नहीं है कि नारी को पूज्य स्थान या श्रेष्ठ क्यों माना जाता है । ऐसे प्रश्न नर की अंकारिता से उत्तपन्न होते हैं , तो आईये प्रण लें कि नारी सम्मान करेंगे और उन्हे हमेशा श्रेष्ठता की नजर से देखेंगे ।

Tuesday, January 5, 2010

पश्चिम की नारी “बिच्च” कहा जाने पर गर्व महसूस करती है

भारतीय स्त्रियों ने अपने लिये सोचने का ठेका पश्चिमी नारियों को दे दिया लगता है! उन्ही की तर्ज पर आपको नारीवादी होने के लिये पुरुष-विरोधी होने की जरूरत क्यों पडती है? पश्चिमी नारी नें बराबरी का नारा बुलंद किया - वोट देने का अधिकार, न्याय का अधिकार, समान वेतन का अधिकार वो सब भारतीय नारी के पास कानूनी रूप से सुरक्षित ही है । इसके आगे सामाजिक स्थिती के मामले में भारतीय नारी क्या चाहती है खुद उसे नहीं पता! वैसे उसका भविष्य कितना अंधकारमय है इसकी जानकारी भी उसे नहीं है । पश्चिमी शैली की आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का नारा बुलन्द करती वर्किंग वुमन हो चुकने, आर्थिक स्वतंत्रता, समानता के नाम पर कुछ हद तक चारित्रिक स्वछंदता आदी के लिये चिल्ल-पों करती वीरांगनाओं को अपने से तीस-पैंतीस साल या २-३ पीढियों पहले यही सब कर चुकी पश्चिमी महिलाओं का हश्र देखना चाहिए। आज पश्चिमी समाज में ४५% से अधिक विवाहों की परिणिती तलाक है. एकल मां-बाप की संतानें एक सुविधा संपन्न स्वार्थी समाज में अपने स्वास्थ्य और अपनी कमाई के अलावा किसी और चीज़ के बारे में सोचते हैं और ना किसी और पर भरोसा ही कर सकते हैं. अमरीका में हर साल १.९ मिलियन लोगों को डिप्रेशन या अवसाद की शिकायत होती है जिनमें महिलाओं का प्रतिशत अधिक है. ऐसा क्यों है?

मेरा मानना है कि “पश्चिम की औरत, औरत नहीं है - वो मर्द की एक किस्म है चाहे कितनी नारीवादी बने! अपने सहज औरतपन से मर्दों को समझदारी सिखा सकने के बजाए आज भारतीय नारी भी मर्द की एक किस्म बनना चाहती है और हो कर रहेगी! लेकिन ज्वलंत विचारों वाली आपकी सफ़ल कार्पोरेट विरांगनाओं, आपकी सुपुत्रियों के लिये दुल्हे मिलना मुश्किल होंगे क्योंकी भारतीय पुरुष भी पश्चिमी पुरुषों के समान औरत को “बिच्च” कह कर बुलाएंगे और उपभोग की वस्तु समझेंगे और उनसे विवाह करने से बचना चाहेंगे! ये नंगा सच है. यह पश्चिम की त्रासदी है! और हां पश्चिम की स्त्री “बिच्च” कहा जाने पर गर्व महसूस करती है की वो हर मामले में अपनी हांक कर पुरुष को इतना कुढा चुकी है! तो सचमुच बहुत मेहनत से पाया गया ओहदा है!!

I’m tough, I’m ambitious, and I know exactly what I want. If that makes me a bitch, okay. -Madonna का कहना है , जो की स्टार है , अमेरिका की ।

कहते हैं की “मुद्दा ये था की औरत फ़ेमिनिस्म के नाम पर ही सही मर्द की एक किस्म तो होना चाहती रही है लेकिन हम मर्दों की निगाह में वो अच्छे वाले मर्दों की एक किस्म नहीं हो सकीं - कुछ मिस्टिरियस मामला है! वैसे अगर पश्चिम का अंधानुकरण ज़ारी रहा तो आनी वाली पीढी के भारतीय बाप अपनी स्वछंद बालाओं को रईस लडके फ़ंसाने की सलाह देंगे.।

ऐसे में हर आदमी ये सोचेगा की औरत उससे पैसे की खातिर जुडी है और औरत ये सोचेगी की मर्द उससे देह की खातिर जुडा है. फ़िर दोनो संतुलन सिद्ध करने चल पडते हैं. ऐसे असुरक्षित समाज में औरत ये सिद्ध करना चाहती रहेगी की वो आत्मनिर्भर है और मर्द ये सिद्ध करना चाहता रहेगा की वो चिरयूवा है, तो वियाग्रा और डिप्रेशन की गोलियां बिकना लाजमी है - ये है पश्चिमी असुरक्षा - जिसकी जडें तथाकथित स्त्री सशक्तिकरण में छुपी हैं! गोलियां प्रेम और समर्पण का स्थान नहीं ले सकतीं । आज बहुधा पश्चिमी औरतें कहती है की स्त्री सशक्तिकरण का मुद्दा आत्मघाती छलावा सिद्ध हुआ है! ना खुदा ही मिला ना विसाल-ए-सनम! कुछ औरतें मानती हैं की वे अति कर चुकी हैं ।

भारतीय स्त्री जिस संतुलन को साध सकती है उसे पश्चिमी स्त्री नहीं साध सकी थी - वो एक साथ भारतीय पुरुष को उसकी कुंठाओं से मुक्त कर सकती है और सहचरी भी हो सकती है - इतनी समझदारी और रचनात्मकता है उसमें - लेकिन ये तीस-चालिस साल पुरानी फ़ेमिनिस्ट लेखिकाओं के पद-चिन्हों पर चल कर नहीं होगा!

Friday, January 1, 2010

अलविदा कहता हूँ मैं

आज लहर है , तूफान है , बादल है , बारिश है , धूप है , छांव है पर तुम नहीं हो मैं क्यों कहूँ कुछ तुमसे बताओ ना ? जबकि चाहती हो अपना बनाना पर कह नहीं सकती जुबां से अपने ऐसा नहीं कि जानता नहीं हूँ फिर सुनना चाहता हूँ तुमसे और तुम हो कि क्यों कहोगी और मैं हूँ कि बिन सुने अनसुना हूँ तुम्हारी एक परिधि है , एक सीमा है , दीवार है यही कहती हो जानता हूँ ये बेबसी पर मुझे तरस क्यों आये भला ? मैं झुकूंगा और ही तुम से कहूँगा अपनी बातें महसूस करती हो तो खुद भी समझो , कितना कुछ बाकी है अभी जानने को शायद कुछ भी नहीं..... खुली किताब में से उड़ते पन्नों की तरह ही तो मैं हूँ तुम्हारे लिए प्यार को सीमाएं दी है तुमने मुझे दूर रखने के लिए ये पता है तुमको भी , मुझको भी आखिर खुश नहीं रहती हो पर करती चली आयी हो वही ..... जो हमेशा दर्द देता है तुमने ये किस्मत समझा है पर मैं क्या समझू बताना कभी , .....शायद कभी जान पाऊगा क्योंकि अब तो मिलना होगा कभी ........................वैसे अच्छा है किसी बहाने से ही याद आती रहोगी दर्द देती रहोगी

प्यार को परिभाषित न कर सकता हूँ और न ही जता पाया शायद न कभी बता पाऊगा , तुम आज भी जुदा हो कल भी जुदा रहोगी ही , झूठी कसमें खाने को भले ही कह दो पर मैं तो न कहूगा कुछ करने को , अलविदा कहता हूँ मैं तुमसे खुश हूँ ........ पूरा करो तुम रास्ता । जिंदगी का यह रूख मेरे लिये उजाड़ता है शायद तुमको संवारता है , और क्या कहना है कुछ भी नहीं ....... याद थी , याद हो और याद रहोगी ये वादा है , यही कोशिश है , यही चाहत है , यही प्यार है