Sunday, February 28, 2010

ये कैसा खुशियों का त्योहार है माँ----------------मिथिलेश दुबे

माँ आज तेरी याद बहुत आ रही है...
हाँ पता है कि कोई त्योहार है आज....
लेकिन माँ मुझे कोई नहीं कह रहा........
कि तुम अच्छे और नयें कपड़े पहन........
ही निकलना घर से,
माँ तू तो जानती है ना कि........
ज्यादा भिगने से मेरी तबियत खराब हो जाया करती...........
लेकिन माँ देख ना मुझे कोई मना नहीं कर रहा........
माँ सब कहते है कि त्योहार खुशियां लेकर आता है.........
लेकिन ये कैसा त्योहार........
माँ जहाँ तू ही नहीं,
मेरी तो हर खुशी तुझसे ही है माँ........
अभी फोन पर तुझसे ही बात किया.......
कह रही हो कि गुझियाँ बनाकर खा लेना......
कैसे खाँ लूंगा माँ,
कैसे लाऊंगा वो हाथ.......
जो अब तक हर बार ही खिलाया करते थे.......
कैसे लाऊंगा वो प्यार......
जो मुझसे तू करती थी....
जब भी मैं मेरे तेरे पास होता था,
तुझे याद है माँ जब..........
पिछली बार मै घर से आते हुए रोया था......
तब तो तू भी मेरे साथ रोयी थी........
लेकिन देख ना आज.........
ये कैसा खुशियों का त्योहार है........
जहाँ मैं रो भी रहा हूँ तो इस बन्द कमरे में.........
लेकिन तू नहीं है माँ.........
माँ आज तेरी याद बहुत आ रही है

Friday, February 26, 2010

अगर आप कलाकार हैं तो अपनी माँ बहन की नंगी तस्विर बनाओं और दिखाओं अपने कला का जौहर---------मिथिलेश दुबे

ये तो सबको मालुम ही होगा कि कांग्रेस ऐसे कोई मौका नहीं चूकती जिससे हिन्दूओं को हतोउत्साहित किया जा सके , लेकिन शायद वह यह भूल जाती हैं कि हिन्दू कमजोर नहीं कि वह किसी डरें , उन्हे अपनी रक्षा करनी अच्छी तरह से आती है । भारत की वार्तमान स्थिति पर अगर ध्यान दिया जाये तो पता चलेगा कि यहाँ अभी हाल फिल सारे षड़यन्त्र हिन्दुओं के खिलाफ रचे जा रहे हैं । इसका सबसे ताजा तरीन घटना है मकबूल फिदा हुसैन को कांग्रेस सरकार भारत लाना चाहती है, भारत सरकार कह रही है कि आपको भारत में उचित सुरक्षा दी जायेगी । फिदा हूसैन से कौन वाकिफ नहीं होगा, हाँ ये वहीं है जिन्होने भारत माता , सिता माता , माँ पर्वती को नंगी तस्विरों में प्रदर्शित किया । कुछ लोग इनका समर्थन ये कहकर करते है कि ये कलाकार हैं, बढ़िया है अगर आप कलाकार हैं तो अपनी माँ बहन की नंगी तस्विर बनाओं और दिखाओं अपने कला का जौहर सबको, ये कैसा कला का प्रदर्शन है जिसमे अपना धर्म दिखता है पूजा के लिए और दूसरो का दिखता है कला के लिए । जिस तरह से उन्हे कांग्रेस बूला रही है ये बात फिर साबीत हो गयी है कि कांग्रेस है ही हिन्दू विरोधी ।

लेकिन कांग्रेस में ऐसे देशभक्त हिन्दू कार्यकर्ताओं की बहुत बढ़ी संख्या है, जो असंगठित हैं व एक दूसरेमें विश्वाश की कमी की वजह से, इन देशद्रोहियों की जुंडली के देशविरोधी-हिन्दुविरोधी षड़यन्त्रों का मुंहतोड़ जबाब देने में अपने आप को असहाय महसूस कर रहे हैं इसलिए खामोश हैं। उन्हें अपनी चुपी तोड़ते हुए एक दूसरे पर विश्वास करते हुए संगठित होकर इस देशद्रोहियों की जुंडली को बेनकाब कर अपदस्थ करना होगा और देशभक्त लोगों को कांग्रेस के शीर्ष पदों पर बिठाकर कांग्रेस के देशविरोधी-हिन्दु विरोधी जिहादी आतंकवाद व धर्मांतरण समर्थक कदमों को रोककर देशभक्ति की राह पर चलाना होगा । नहीं तो हिन्दुस्तान की जनता ये मानने पर मजबूर हो जाएगी कि हरेक कांग्रेसी देश विरोधी-हिन्दू विरोधी जिहादी आतंकवाद व धर्मांतरण समर्थक है और देश मे आए दिन बम्ब विस्फोटों में मारे जाने वाले निर्दोष हिन्दुओं, सैनिकों, अर्धसैनिक बलों व पुलिस के जवानों के कत्ल के लिए जिम्मेवारहै।

परिणाम स्वरूप ये सब मिलकर कांग्रेसियों के खून के प्यासे हो सकते हैं क्योंकि अब कांग्रेस के पाप का घड़ा भर चुका है ।भगवान राम-जो करोड़ों हिन्दूस्थानियों के आस्था विश्वाश और श्रद्धा के केन्द्र हैं-के अस्तित्व को नकारना व सनातन में विश्वाश करने वाले शांतिप्रिय हिन्दुओं व सैनिकों को आतंकवादी कहकर जेलों में डालकर बदनाम करना-इस पाप के घड़े में समाने वाले अपराधनहीं हैं।वैसे भी कांग्रेस की स्थापना एक विदेशी अंग्रेज ए ओ हयूम(जो ब्यापार के बहाने भारत आकर धोखा देकर देश को गुलाम बनानेबाली ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकारी था) ने 1885 में विदेशियों के राज को भारत में लम्बे समय तक बनाए रखने के लिएअंग्रेजी शासकों के सहयोग से की थी । तब इसका मूल उदेश्य था क्रांतिकारियों की आवाज को जनसाधारण तक पहुंचने से रोकनाऔर ये भ्रम फैलाना कि जनता का प्रतिनिधत्व कांग्रेस करती है न कि क्रांतिकारी।इसकी स्थापना का कारण बना 1857 का स्वतन्त्रता संग्राम जिससे अंग्रेजों के अन्दर दहशत फैल गई । आओ ! जरा नमन करें, शहीद मंगलपांडे, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ,शहीद तांत्य टोपे, शहीद नाना साहिब जैसे अनगिनत शहीदों को जो राष्ट्र की खातिर बलिदान हुए। कांग्रेस की स्थापना केकुछसमयतकअंग्रेजीशासकों को किसी अंदोलन का सामना नहीं करना पड़ा लेकिन धीरे- धीरे क्रांतिकारियों ने कांग्रेस को अपना मंच बनालिया । शहीद भगत सिंह , शहीद राजगुरू, शहीद सुखदेव, शहीद चन्दरशेखर आजाद, शहीद बाल गंगाधर तिलक , शहीद लाला लाजपतराय, शहीद विपन चन्द्र पाल जैसे असंख्य क्रांतिकारी कांग्रेस से जुड़े और देश के लिए बलिदान हुए । देश का धर्म के आधार पर विभाजन स्वीकार कर लिया । अंग्रेजों को लिख कर दे दिया कि नेताजी सुभाष चन्द्रवोस जैसा घोरराष्ट्रवादी क्राँतिकारीजबभी हिन्दुस्थान आएगा तो उसे उन दुष्ट- डकैत साम्राज्यबादियों के हवाले कर दिया जाएगा, जिन्होंने 300वर्ष तक इस देश का लहू पानीकी तरह बहाया व देश छोड़ते वक्त अपने लिए काम करने वाले को कुर्सी पर बिठाया । इधर लोगोंको यह कहकर बरगलाना शुरू कर दिया कि देश आजाद करवा दिया ।

आज तक लोगों को यह नहीं बताया कि अगर पाकिस्तान की ओर से हस्ताक्षर सैकुलर पुराने काँग्रेसी मुहम्मदअली जिन्ना ने किए थे तो भारत की ओर से सैकुलर काँग्रेसी ज्वाहरलाल नेहरू ने किए थे या किसी और ने ? हिन्दुओं का कत्लेआम शुरू था इधर मोहन दास जी व नेहरू जी हिन्दुओं को यह कहकर बरगलाने में लगे हुए थे कि वो हमारेभाई हैं जो हिन्दुओं का कत्लेआम कर रहे हैं , हिन्दुओं की माँ बहनों की इज्जत पर हमला कर रहे हैं इसलिए आप कायर और नपुंसक बनकर हमारी तरह तमाशादेखो, जिस तरह क्रांतिकारी देश के लिए शहीद होते रहे देश छोड़ते रहे और हम अपने अंग्रेज भाईयों से सबन्ध अच्छे बनाए रखने के लिए तमाशबीन बनें देखते रहें। पर मोहन दास जी व नेहरू जी के नेतृत्व में कांग्रेस का एक ग्रुप क्रांतिकारियों को कभी गले न लगा पाया । वरना क्या वजह थी कि नेताजी सुभाषचन्द्र वोस (जिन्होने 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में पट्टाभीसीतारमैइया जी को हराया जिनकासमर्थन मोहन दास जीकर रहे थे)को कांग्रेस छोड कर आजाद हिन्द सेना बनानी पड़ी । शहीद भक्तसिंह जैसे प्रखर राष्ट्रवादी देशभक्त के बचाव में यह ग्रुप खुलकर सामने नहीं आया उल्टा उनको गुमराह क्राँतिकारी कहकर उनके देश की खातिर किए गए बलिदान को अपमानित करने का दुःसाहस किया । काश ! उन्होंने बकिंम चन्द्र चटर्जी जी द्वारा लिखित उपन्यास आनंदमठ पढ़ा होता(सैकुलर गिरोह में सामिल हिन्दुओं को ये उपन्यास जरूर पढ़नाचाहिए) तो शायद वो ये गलती न करते और भारत के सर्बमान्य नेता होते और आज हिन्दू इस तरह न मारे जाते। हम इस बात को यहां स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम निजी तौर पर मोहन दास जी की आर्थिक सोच व उनकीसादगी के कट्टर समर्थक हैं जिसमें उन्होंने स्वदेशी की खुलकर बकालत की । पर क्या नेहरू जी को यह सोच पसन्द थी ?नहीं न । कुर्सी की दौड़ में ईसाईयत की शिक्षा प्राप्त नेहरू जी मांउटबैटन की यारी व कुर्सी की दौड़ में इनसानित और देशभक्ति छोड़कर वो सब कर बैठे जो देशद्रोही गद्दार जिहादियों और सम्राज्यबादी ईसाईयों के हित में व हिन्दुस्थान और हिन्दुओं के विरोधमें था । कई बार मन यह सोचने पर मजबूर होता है कि मोहन दास जी के नाम जितनी भी बदनामियां हैं उन सबके सूत्र धार नेहरू जी थे । जिन हालात में मोहन दास जी के शरीर को खत्म किया गया उसके सूत्रधार भी कहीं न कहीं नेहरू जी ही थेक्योंकि नेहरू जी प्रधानमन्त्री थे, गांधी जी सुरक्षा की जिम्मेदारी उनकी थी और उनके खत्म होने का सबसे ज्यादा फायदा नेहरू परिवार ने ही उठाया। जिसके मोहन दास जीकटर विरोधी थे क्योंकि उन्होंने तो देश विभाजन के बाद ही कांग्रेस को समाप्त करनेका आग्रह किया था जिसके नेहरू जी विरूद्ध थे अब जरा सोचो मोहन दास जी को किसने खत्म करवाया ? वे कितने दूरदर्शी थे इसका पता आज आए दिन देश के विभिन्न हिन्दू बहुल क्षेत्रों में होने वाले बम्बविस्फोटों व मुस्लिम बहुलक्षेत्रों में होने वाले दंगों से पता चलता है। कांग्रेस भरसक प्रयास करती है कि कोई जिहादी आतंकी न मारा जाए । और इसका उदाहरण हमारे सामने है, आखिर गुरु अफजल को अभी तक जिन्दा रखने का क्या मतलब है जबकि सबको मालुम है कि उसे फासी की सजा हुयी है, इसका जवाब कौन देगा । आखिर कसाब को जिन्दा क्यो रखा गया है, जबकी सबको पता है कि मुंबई मे कत्लेआम उसी ने किया था।

इतने हिन्दुओं का खून पी लेने के बाद भी इस कांग्रेस की प्यास न बुझी हो इसलिए इस ने यह सुनिश्चित किया कि भारत के हिन्दुओं वाले हिस्से को हिन्दूराष्ट्र न बनने दिया जाए । इस कांग्रेस द्वरा यह भी सुनिश्चित किया गया कि भविष्य में हिन्दू सुखचैन से न जी सकें और कांग्रेस का वोट बैंक भी चलता रहे । जब 1948 में पाकिस्तानी सेना ने कबाइली जिहादियों के वेशमें भारत पर हमला किया तब भी नेहरू जी की भूमिका भारत विरोधी ही रही। यह वही नेहरू जी हैं जो पटेल जी के लाख समझाने के बावजूद, इस हमले का मुकाबला कर जिहादी आक्रांताओं को मार भगाने के बजाए संयुक्तराष्ट्र में ले गए । यह वही नेहरू जी हैं जिन्होंने संयुक्तराष्ट्र की बैठक में पटेल जी के रोकने के बाबजूद, पाकिस्तान द्वारा कब्जे में लिए गए जम्मू-कश्मीर के हिस्से को बार-बार आजाद कश्मीर कहा जिसका खामियाजा भारत आज तक भुक्त रहा है। अब आप ही बताइए कि आज जम्मू-कश्मीरमें जा रहे निर्दोष हिन्दुओं व शहीद हो रहे सैनिकों के कत्ल के लिए कांग्रेस व नेहरू जी को जिम्मेवार क्यों न ठहराया जाए ? यह वही नेहरू जी हैं जिन्होंने हिन्दुविरोधीयों को खुश करने के लिए कहा था ‘ मैं दुर्घटनावश हिन्दू हूँ ’।

आपको यह जान कर हैरानी होगी कि पचास के दशक में आयुद्ध कारखानों में नेहरू जी का जोर हथियारों की जगह सौंदर्य-प्रसाधन बनवाने पर ज्यादा था । जिसके विरूद्ध तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी ने नेहरू जी को पत्र लिखकर चेताया भी था । पर नेहरू जी तो कबूतर की तरह आँखें बन्द किए हुए कहते फिर रहेथे,हमारे ऊपर कोई हमला नहीं कर सकता । वे कितने दूरदर्शी थे इसका पता 1962में ही लग गया,जब हथियारों की कमी के कारण हमारे बहादुर सैनिकों को शहीद होना पड़ा और भारत युद्ध हार गया। हमारी मातृभूमिके एक बड़े हिस्से पर चीन ने कब्जा कर लिया।आओ उन शहीदों को हर पल प्रणाम करने का प्रण करें । काश नेहरू जी को पता होता कि शान्ति बनाए रखने का एकमात्र उपाय है युद्ध के लिए तैयार रहना। मन्दिरों पर किए जा रहे हमलों, हिन्दुबहुल क्षेत्रों में बम्ब विस्फोट करके चलाए जा रहे हिन्दू मिटाओ अभियान के लिए कांग्रेस को जिम्मेवार क्यों न माना जाए ? पाकिस्तान व बांगलादेश में जो हिन्दू रह गए थे वो आज गिने-चुने रह गए हैं बाकी यातो इस्लाम अपनाने पर बाध्य कर दिय गए,भगा दिए गये या जिहादियों द्वारा जन्नत पाने के लिए हलाल कर दिए गये व किएजा रहे हैं लेकिन भारत में जिहादी आतंकवादियों को शरण, सहायता वसहयोग देकर हिन्दुओं का कत्ल करवा रहे हैं। क्यों कि पाकिस्तान व बांगलादेश की तरह भारत में भी शासन हिन्दुविरोधी जिहाद समर्थकोंने किया और हिन्दुविरोधी कानून बनाकर हिन्दुओं को अपूर्णीय क्षति पहुँचाई ।आज भारत में ही जिहादी आतंकवाद जारी है देश के विभिन्न हिस्सों में जिहादियों द्वारा हिन्दुबहुल क्षेत्रों,मन्दिरों ,सेना ब पुलिस की गाड़ियों व कैंपों में बम्बविस्फोट कर हजारों हिन्दू मारे जा चुके हैं। इन जिहादियों द्वारा इतने निर्दोश हिन्दुओं का कत्ल कर देने के बावजूद जिहाद समर्थक सैकुलर हिन्दुविरोधी देशद्रोही गिरोह का जिहादियों को समर्थन आज भी जारी है ।

Friday, February 19, 2010

लिखे कविता जीतें ईनाम--------------------------(मिथिलेश दुबे)

हिन्दी साहित्य मंच "चतुर्थ कविता प्रतियोगिता" मार्च माह में आयोजित कर रहा है। इस कविता प्रतियोगिता के लिए किसी विषय का निर्धारण नहीं किया गया है अतः साहित्य प्रेमी स्वइच्छा से किसी भी विषय पर अपनी रचना भेज सकते हैं । रचना आपकी स्वरचित होना अनिवार्य है । आपकी रचना हमें फरवरी माह के अन्तिम दिन तक मिल जानी चाहिए । इसके बाद आयी हुई रचना स्वीकार नहीं की जायेगी ।आप अपनी रचना हमें " यूनिकोड या क्रूर्तिदेव " फांट में ही भेंजें । आप सभी से यह अनुरोध है कि मात्र एक ही रचना हमें कविता प्रतियोगिता हेतु भेजें रचना के साथ-साथ अपना स्थाई पता और फोन नम्बर अवश्य ही संलग्न करें ।

प्रथम द्वितीय एवं तृतीय स्थान पर आने वाली रचना को पुरस्कृत किया जायेगा । दो रचना को सांत्वना पुरस्कार दिया जायेगा ।

प्रथम पुरस्कार - रूपये एक हजार , द्वितीय पुरस्कार - रूपये पांच सौ , तृतीय पुरस्कार - रूपये तीन सौ । साथ ही दो कविता को हिन्दी साहित्य मंच की तरफ से सांत्वना पुरस्कार दिया जायेगा । हिन्दी साहित्य मंच की तरफ से एक प्रशस्ति - पत्र भी प्रदान किया जायेगा ।

सर्वश्रेष्ठ कविता का चयन हमारे निर्णायक मण्डल द्वारा किया जायेगा । जो सभी को मान्य होगा ।आइये इस प्रयास को सफल बनायें । हमारे इस पते पर अपनी रचना भेजें -
hindisahityamanch@gmail.com .आप हमारे इस नं पर संपर्क कर सकते हैं-09891584813,09818837469,
आप हिन्दी साहित्य मंच पर अपनी रचना प्रकाशन हेतु भी भेज सकते है । हिन्दी साहित्य मंच एक प्रयास कर रहा है राष्ट्रभाषा " हिन्दी " के लिए । आप सब इस प्रयास में अपनी भागीगारी कर इस प्रयास को सफल बनायें । आइये हमारे साथ हिन्दी साहित्य मंच पर । हिन्दी का एक विरवा लगाये जिससे आने वाले समय में एक हिन्दीभाषी राष्ट्र की कल्पना को साकार रूप दे सकें ।

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संचालक
हिन्दी साहित्य मंच
नई दिल्ली

Tuesday, February 16, 2010

वो लड़की --------------------------------------------(मिथिलेश दुबे)


फटे पुराने कपड़े तन पर लिए,
झाड़ियों में घूमती वो,
हाथ में कुल्हाड़ी
और
सर पर लकड़ी का बोझ,
नंगे पांव सर्द हवाओं के बीच,
आंखों से टपकते आंसू उसके
कांटों के बीच टहलती वो,
कटकटाते दांतों की आवाज,
थरथराता उसका बदन,
ठंड ने आगोश में ले लिया था
सांवली सूरत को,
हर रोज नजर आती थी
वो लड़की,
कुछ अर्सा गुजरा
सब कुछ वैसा ही है,
पर वो लड़की नहीं है,
याद है -
उसका चेहरा,
उसके बाल -
जिस पर दो फीते लाल रंग के बंधे थे।
मासूमियत से भरा चेहरा,
अब बहुत दूर जा चुका है ,
जहां उसे सर्द हवाएं छू भी नहीं सकती।

Thursday, February 11, 2010

अब मैं ना हिम्मत हारूँगा---------------(मिथिलेश दुबे)

एक बार फिर हाजीर हूँ मैं, साधारण भाषा में इसे पूर्नजन्म भी कह सकते हैं । मेरा ब्लोगिंग को छोड़ने का फैसला गलत था इसका एहसास मुझे प्रतिक्रिया मिलने के बाद हुआ । ब्लोगिंग छोड़ने का फैसला लेना मेरे लिए बहुत मुश्किल था , लेकिन कभी-कभी भावुकता वश कुछ गैर जरुरी फैसले हो जाते हैं जो कि मैंने किया । इन दिंनो लिखना तो पूर्णतया बन्द था , लेकिन पढ़ना यथावत चलता रहा, शायद इसे आप ब्लोगिंग का नशा ही कह सकते है कि दूर रहकर भी पास था । इस दर्मीयान मुझे अपनो का बहुत प्यार मिला जिनका सदा-सदा आभारी रहूंगा , ये अपने को प्यार ही है कि मै दोबारा से वापस आ पाया हूँ । ब्लोगिंग छोड़ने पर मुझसे प्यार करने वालो ने कहा कि ये फैसला तुम्हारा किसी भी विधा से सही नहीं है , साथ डांट भी पड़ी । वहीं कुछ लोग खुश भी हुए होंगे कि चलो एक दुश्मन गया , लेकिन उन्हे पता नहीं कि जहाँ अपनो का प्यार होता है वहाँ बड़े-बड़े घूटनें टेक देंते है । उन सभी का शुक्रगुजार हूँ जिन्होनें मेरा लगातार मेरा साथ दिया और मुझे अपना फैसला बदलना पड़ा ।

अब आता हूँ वहाँ जहाँ मैं रुका था , बात वहाँ हो रही थी हिन्दी ब्लोगिंग में बढ रहे बेवजह पोस्टो की, इसको लेकर मैंने एक पोस्ट लिखी , पोस्ट क्या लिखा जैसे बवाल हो गया , क्यों हुआ ये तो सबको ही मालुम है । मेरे मात्र मोहतरमा शब्द के प्रयोग को लेकर जो कुछ भी हुआ उससे मन बहुत आहत हुआ , आखीर हो भी क्यों ना , जब कोई अपनी हि पोस्ट में गालियां लिखता है , पोस्ट शिर्षक को ही ऐसे शब्द देता है जो कि गालियां समान ही होती है तो कोई नहीं बोलता , क्यों क्यों की चटुकारीता वालो की संख्या ज्यादा होती है । यहाँ अगर आप बड़े ब्लोगर हैं बहुत दिंनो से लिख रहें है तो कोई आपका कुछ नहीं कर पायेगा आप जाहे जो कुछ भी लिखते रहिए ब्लोगिंग के नाम पर । चाहे वह गालियों भरी शिर्षक हो या ऐसे ही अनुचित शब्दो का प्रयोग हो रचना में , कई बार तो ये होता है भड़काऊं और बेहद घटिया प्रकार का शिर्षक दिया जाता है , और बाद में जब पढने वाले उसका विरोध करते हैं तो उन्हे हटा दिया जाता है , और ये भी कहा जाता है कि ये शिर्षक तो रचना का ही भाग है । लेकिन उसमे परिवर्तन भी कर दिया जाता है , क्यों मैं पुछता हूँ क्यो परिवर्तन , अगर आपको लगता है कि आप सही हो और सही किया तो परिवर्तन क्यों ? और अगर आप अपनी गलती स्वीकांर करते हो तो मतलब भी साफ है ये सबकुछ आपनें जानबुझकर किया । अगर मैं कुछ भी ऐसा करता हूँ तो मैं गलत करता हूँ क्योंकि ये सब करने के लिए शायद बड़ा ब्लोगर बनना पड़ेगा , जिसके लिए शायद समय लगे ।

मेरे एक शब्द मोहतरमा के लिए जो कुछ भी हुआ मैं खूद हैरान था कि मैंने ऐसा क्या कह दिया , सभी ब्लोगरो का कहना था कि तुम्हे ऐसे किसी को कहना नहीं चाहिए , जबकी मैंने किसे कहा ये मुझे खुद ही नहीं पता , कुछ लोगो नें कहा कि तुम्हे बड़े ब्लोगरो के लिए ऐसे शब्दो का प्रयोगा नहीं करना चाहिए , तो सबसे पहले मैं बता दूं कि मैं जिसे भी जानता हूँ उसे उसके लेखन शैली और क्या कैसा लिखात है उससे जानता हूँ , नाकि कौन कितने दिंन से लिख रहा , या किसका बहुत बड़ा ग्रुप है , मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला , मैं तो वहीं लिखूंगा जो सच्चाई होगी फिर चाहे वह किसी के लिए भी हो । जिनका नाम मुझे बताया गया और कहा गया कि तुमने इनके लिए मोहतरमा शब्द का प्रयोग किया हैं , जबकि सच्चाई कुछ और ही है , मैं तो उनको जानता ही नहीं, मुझे क्या कोई कैसा क्या लिखता है , लेकिन विश्वास किजीए अगर मैं जानता होता उनके बारे में तो शायद लिख ही नहीं पाता , उनके बारे में पता होता तो ये भी पता होता कि कौन कितना बड़ा ब्लोगर है , लेकिन मेरी नादांनी ही कहिए कि मैं बडे ब्लोगर को जान नहीं पाया ।

इस बीच मैं सबसे ज्यादा परेशान था दोहरे मापदंड से , सच में ये बहुत दुःख देता है । ब्लोगिंग छोड़ने के फैसले के बीच मुझे बहुत से लोगो के दो चेहरे देखने को मिलें, कुछ लोगों के तो मेरे उस पोस्ट पर ही दिख गयी थी , कि कैसे लोग क्या-क्या लिखते हैं और मुझे कहते हैं कि मोहतरमा शब्द मत लिखों । ठिक है जो कुछ भी हुआ इस प्रकरण से बहुत कुछ सिखने को भी मिला अपने बडो़ से , शायद जो होता है वह अच्छे के लिए होता है । शायद आप लोगों को लग रहा हो कि मिथिलेश के तेवर अब बदल गयें होंगे तो ऐसा कुछ नहीं बल्कि मेरे तेवर में अब और भी धार आ गयीं है । जो कुछ भी हुआ मेरे लिए बहुत कष्टदायक रहा , लेकिन अपनो के लगातार प्यारा और न चाहने वालो के मिल रहें लगातार बददुंओं से जल्दी ही सबकुछ ठीक हो गया , और वापसी करनें में सफल हो पाया , एक बार फिर से उनका शुक्रगुंजार हूँ जिन्होनें मेरा साथ लगातार बनाये रखा ।


अब मैं ना हिम्मत हारूँगा
अपनी राह चलता जाऊंगा
घटिया तुच्छी बातो से
अब मैं ना डर जाऊंगा


आत्मविश्वास और साहस बढ़ गया
ब्लोगर जन का साथ मिल गया
कोई अब मुझे रोक नहीं सकता
मिल गया है जब प्यार अपनों का
घूंटनो पर कोई अब टिका नहीं सकता।

Friday, February 5, 2010

मैं तो चला भई .............अब आप चाटो ( बाय - बाय ब्लोगिंग )-------मिथिलेश दुबे


मैंने आज ब्लागिंग को अलविदा कहने का मन बना लिया है , मैनें हमेशा वही लिखा और कहा जो मुझे सार्थक लगा । किसी को भी नीचा दिखाना मेरे समझ से परे रहा है और रहेगा । मेरे लेखन से अगर किसी को दुख हुआ है तो इसके लिए खुद को दोषी समझता हूँ । मुझे किसी भी मुद्दे ( हल्का - फुल्का या गंभीर ) पर बहस करना प्रिय लगा है हां यहां यह बात जरूर ध्यान देता हूँ कि सार्थकता बनी रहे अर्थात कुर्तक न हो ।

ब्लागिंग में मुझे आये हुए अभी कुछ ही महीने बीते हैं पर जो उत्साह चिट्ठाकारी को लेकर मैं आया था वह अब जाता रहा है । मैं किसी भी गुटबंदी का विरोध करता हूँ चाहे वो कहीं भी हो या किसी भी रूप में क्यों न हो ? लोग अपने से बड़े की आदतों से ही काफी कुछ सीखते हैं और मैंने बहुत कुछ ऐसा ही करने की कोशिश की पर मैं नाकाम रहा । मुझसे किसी तरह की चाटुकारिता न हो सकेगी । इसलिए मेरा यहां पर स्थान भी नही है । वैसे भी ब्लागिंग मैंनें स्वेच्छा से की और स्वेच्छा से इससे दूर भी हो रहा हूँ । जब तक हमको लक्ष्य का पता ही न हो तो अंधेरे में तीर चलाने से क्या फायदा ? मेरी समझ तो ऐसी ही लिखाई ( ब्लागियाई) हो रही है । कभी कभी कुछ पोस्टों को पढ़कर मन प्रसन्नचित हो जाता है । मगर कुछ लोगों को गांधीगीरी का शौक चर्राया है ( मगर ऐसे गुण नहीं हैं ) ।

मैंनें किसी एक को निशाना नहीं बनाया है मेरा सभी से निवेदन था कि सार्थक लिखा जाय और यह बात सभी के लिए लागू होती है । कोई " रंडी " लिखता है......... क्या अगर यहां पर " वेश्या " लिखा जाय तो गलत होगा ? लेकिन नहीं भई मेरा तो रूतबा है .....मेरी जी हुजूरी करने वाले हैं , जब चाहें अपनी बात के लिए बीसियों टिप्पणी कराकर तुमको धूल चटा सकते हैं । मैं किसी का नाम नहीं लूंगा पर जिस तरह से राजनीति हो रही है ब्लागिंग में मैं इसका समर्थन नहीं कर सकता हूँ । तुम्हारी मां.....तुम्हारी बहन की..... ..........मां बहन तक को नहीं छोड़ते गालियां देने में और यह किसी एक की समस्या नहीं है बल्कि हमारी सबकी है । मैं कभी भी अपने किसी भी पोस्ट पर बहस से पिछे नहीं हटा , जितने भी बहस हुए मैंने जरुर भाग लिया , क्योंकि मुझे लगा कि बहस होगी तो परिणाम जरुर आयेगा , विवाद कभी नहीं चाहा । लेकिन कुछ दिंन बाद समझ आयी कि यहाँ बहस करने से कोई फायदा नहीं होंने वाला । यहाँ आपके ज्यादा लिंक है लोगो से आपकी बात सर्वमान्य होगी , यहाँ बड़े लोगो का भी ग्रुप है जिसे आप गलत नहीं ठहरां सकते , वे चाहे जो लिखे ।


बातें तो न जाने कितनी गूंज रहीं हैं कानों में ......................पर अब बस यही सूझ रहा है । कई लोगों का साथ और स्नेह मुझे मिला चिट्ठाकारी के दौरान जिसका मैं सदा आभारी रहूँगा ।यहाँ मेरे बहुत से रिश्ते बंने , बडे भाई, दीदी माँ बहन दोस्त बहुत से रिश्ते जिन्होंने मुझे बहुत प्यारा दिया जो की मैं शायद कभी भी भूल ना पाऊं । जिन्होंने मुझे पढ़ा और मुझे प्रोत्साहित किया उनको धन्यवाद । मेरा किसी से भी किसी प्रकार का गीला सिकवा नाराजगी नहीं है , आप सब सही है । शायद उम्र कम होंने की वजह से कुछ बाते समझ नहीं पाया, इसके लिए अगर नादानी में मैंने किसी को कुछ भी अपशब्द कहा हो गलत भाषा का प्रयोग किया हो तो उसके लिए दिल से क्षमा मांगता हूँ । मैंने हमेशा कोशिश की , कि अपने से बडो़ को इज्जत दूँ अगर मैं ऐसा नहीं कर पाया किसी कारण वश तो उसके लिए भी क्षमा प्रार्थीं हूँ ।मेरे लिए यह फैसला लेना बहुत मुश्किल था , लेकिन दिल ने इजाजत दे दी । जारी रखिये आप लोग हिन्दी ब्लोगिंग को और आगे बढाईये ऐसे ही मैं तो चला यहां से...........................बाय-बाय ।

मिथिलेश दुबे

Wednesday, February 3, 2010

मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम--------(मिथिलेश दुबे)

मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम,

कविता में पिरे

शब्दों की व्यजंना हो तुम,

मर्म-स्पर्शी नव साहित्य की

सृजना हो तुम,

नव प्रभा की पथ प्रदर्शक

लालिमा हो तुम,

मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम,

स्वप्न दर्शी सुप्त आखों में

बसी तलाश हो तुम,

सावन की कजरी में घुली

मिठास हो तुम,

चन्द्र नगरी के चन्द्र रथ पर

सवार एक सुन्दरी हो तुम,

रस भरे अधरों के अलिंगन की

कल्पित एक स्वप्न परी हो तुम,

मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम ...............