Monday, May 17, 2010

और लिख दी कहानीं अपने खून से---------मिथिलेश दुबे


एक चिड़िया को एक सफ़ेद गुलाब से प्यार हो गया ,गुलाब से अपनी मोहब्बत का इजहार किया ,
गुलाब ने जवाब दिया कि जिस दिन मै लाल हो जाऊंगा उस दिन मै तुमसे प्यार करूँगा ,
जवाब सुनके चिड़िया गुलाब के आस पास काँटों में लोटने लगी और उसके खून से गुलाब लाल हो गया,
ये देखके गुलाब ने भी उससे कहा की वो उससे प्यार करता है पर तब तक चिड़िया मर चुकी थी...................................................................................................


सीलिए कहा गया है कि सच्चे प्यार का कभी भी इम्तहान नहीं लेना चाहिए,
क्यूंकि सच्चा प्यार कभी इम्तहान का मोहताज नहीं होता है ,
ये वो फलसफा; है जो आँखों से बया होता है ,

Thursday, May 13, 2010

समीर लाल जी की तुलना लुच्चो से , अब तो हद हो गयी --------मिथिलेश दुबे

जय हो हिन्दी ब्लोगिंग की , एक बार फिर विवाद चल पड़ा है कि कौन है हिन्दी ब्लोगिंग में सर्वश्रेष्ठ ? कमबख्त ये भी कोई सवाल है पुछने को,खैर तब पर भी कुछ अविचारी लोग इस मसले पर लड़ पड़ते हैं , जबकि ब्लोगिंग के हर बच्चे को मालुम है कि कौन है सर्वश्रेष्ठ । हिन्दी ब्लोगिंग में अगर कोई है जिसे सर्वश्रेष्ठ कहा जा सकता है , जिसे हिन्दी का सिपाही कहा जा सकता है , जिसके लिए कहा जा सकता है कि वह निश्वार्थ रुप से हिन्दी की सेवा कर रहा है वह नाम सामिर लाल जी का , इनके आस पास तो कोई दिखता ही नहीं जिससे इनकी तुलना की जा सके । इनकी तुलना तो किसी से की ही नहीं जा सकती , अगर इनके समकक्ष कोई दिखता भी तो वह समीर लाल जी ही है , कोई और नहीं । अब कोई इनकी किसी लुच्चे लफंगे ब्लोगर से करे भी तो कुछ किया नहीं किया जा सकता । इधर कुछ दिनों से इनकी चर्चा फिर से हो रही है , अक्सर ये अपनी रचनाओं के कारण ही चर्चीत रहते हैं परन्तु अबकी कुछ और ही पक रहा है , अबकी इनकी चर्चा इनकी सर्वश्रेष्ठता को लेकर की जा रही है । कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है कि ये ऐसा नहीं लिखते जिससे इन्हे सर्वश्रेष्ठ कहा जा सके और इनको लुच्चो लफंगो के समकक्ष रख रहे हैं , जबकि सबको मालुम है समीर लाल जी क्या लिखते है । अब इनकी तुलना किसी तुच्छ ब्लोगर से कि जाए तो तुच्छ शब्द की बेईज्जती ही होगी । आपको लोगों को क्या लगता है कि इनके समकक्ष कोई है , देखने का नजरिया हर तरफ से होना चाहिए नाकि बस लिखाई पर ही निर्भर रहें । मुझे उम्मीद है कि जो मुझे लगता है वह आपको भी लगता होगा ।

Saturday, May 8, 2010

मुझे माँ मत बोलो,,, क्या कहें इसे नारी विकास या नारीत्व पतन???-----मिथिलेश दुबे

आज मैं कुछ नहीं कहूँगा आज मैं आपको एक सच्ची कहानी सुनाने जा रहा हूँ जिसे सुनने के बाद आप भी शायद सोचने पर मजबुर हो जायें । हमारा देश विकास के पथ पर अग्रसर है, विकास हर क्षेत्र में हो रहा इससे कदापि इनकार नहीं किया जा सकता । देश आधनिकता की वय इस तरह पिस रहा है कि यह अपने खूद के अस्तित्व को भी मिटाने पर तुला है । अब हमारें देश में आधुनिकता के नाम पर वह सब किया जा रहा है जो कभी अमान्य था । अब लड़के लड़किया शादी से पहले सेक्स कर सकते हैं , बिना शादी के भी साथ रह सकते हैं वह भी मान्यता प्राप्त । इसी तरह बढ़ते आधुनिकता के आड़ में पल रहे बुरी चिन्तन का ही परिणाम है ये सच्ची घटना ।


बात अभी हाल के दिंनो की है , मुझे घर से आये हुए एक दो दिंन हुए थे , शाम का वक्त था कि अचानक से लाईट चली गयी , कुछ देर तक इन्तजार करता रहता जब लाईट नहीं आई तो घर से बाहर निकला और सोचा की थोड़ा पार्क में ही विचरण करा जाये जाके पार्क में बैठा रहा ,कुछ देर बाद टहलने लगा कुछ देर विचरण के लेने के बाद फिर से कहीं बैठने का मन हुआ , नजर पड़ी तो देखा मैं जहाँ बैठा था वहाँ कोई और बैठ चुका था । नजर घुमाने के बाद एक जगह खाली स्थान दिखा वहाँ जाकर बैठ गया । अभी कुछ देर ही बिते थे कि वहाँ एक सुन्दर महिला का आगमन हुआ , वह मेरे सामने वाली ब्रेचं पर आकर बैठ गयीं जो कि मुझसे कुछ ही दूरी पर स्थित था । मैंने देखा की उन मैडम के बैठने के कुछ देर बाद ही वहाँ उनके पास दो बच्चे आये , एक लड़का था और एक लड़की थी , एक के हाथ में बल्ला था दूसरे के हाथ में बोल थी , तभी मैडम का फोन बजा और वह फोन पर व्यस्त हो गयीं । मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैडम को गर्मी लग रही थी या नहीं , क्योंकि उनका पहनावा ही कुछ ऐसा था , उन्होनें आधा बाहीं नुमा कुर्ती जो कि किसी झिल्ली के समान लग रहा था उसे ऊपर पहन रखा था , और निचे जिंस ।


मैडम फोन पर व्यस्त थी , उनकीं बातें खत्म हुई , मैं भी पता नहीं क्यों बैठा था , मुझे जरा भी इसका अंदेशा नहीं था कि आज यहाँ वह होगा जिससे मैं दहल ही जाऊंगा । दोंनो बच्चे आपस में खेल रहे थे , मुझे बस इस बात की आशंका ही थी कि वे दोंनो बच्चे इनके ही है । दोंनो बच्चे खेल ही रहे थे कि अचानक उनमें झगड़ा शुरु हो गया , लड़की बड़ी थी , उसने लड़के को एक थप्पण मार दिया , लड़का भागते हुए आया और बोला मम्मी काजल ने मुझे मारा , मम्मी कुछ देर तक खामोश रहीं , मैं ये नजारा देख रहा था ,मम्मी और मेरी भी खामोशी तब भंग हुई जब मम्मी नें उस बच्चे को एक तेज तमाचा जड़ा और कहा कि " तुम्हे कितनी बार मना किया है कि घर के बाहर मुझे मम्मी मत बुलाया करो समझ नहीं आती तुम्हे अब चलो घर " मेरी आंखे खुली की खुली ही रह गयी और बिल्कुल हैरान हो गया । फिर मैंने सोचा कि शायद इसे ही विकास की संज्ञा दी जा रही बड़े शहरो में ।

अब आप क्या सोचते हैं जरुर बतायें ।

Thursday, May 6, 2010

भद्र समाज इन्हें बुरी औरत एवं कुल्टा के रूप में देखता है----------(मिथिलेश दुबे)

समाज में वेश्या की मौजूदगी एक ऐसा चिरन्तन सवाल है जिससे हर समाज, हर युग में अपने-अपने ढंग से जूझता रहा है। वेश्या को कभी लोगों ने सभ्यता की जरूरत बताया, कभी कलंक बताया, कभी परिवार की किलेबंदी का बाई-प्रोडक्ट कहा और सभी सभ्य-सफेदपोश दुनिया का गटर जो ‘उनकी’ काम-कल्पनाओं और कुंठाओं के कीचड़ को दूर अँधेरे में ले जाकर डंप कर देता है। और, इधर वेश्याओं को एक सामान्य कर्मचारी का दर्जा दिलाए जाने की कवायद भी शुरू है। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ है कि समाज अपनी पूरी इच्छाशक्ति के साथ उन्मूलन के लिए कटिबद्ध हो खड़ा हो जाए; तमाम तरह के उत्पीड़न-दमन और शोषण का शिकार वेश्याएँ उन्मूलन के नाम पर जरूर होती रही हैं।

आज स्थिति विपरीत है। वेश्यावृत्ति एवं फ्लाईंग वेश्याएँ बढ़ रही हैं। आज वेश्याएँ बहुत ज्यादा हैं, ग्राहक कम हैं, इस कारण वेश्याएँ स्वयं को 20-20 रुपयों में मिनटों के हिसाब से नीलाम कर रही हैं। क्या कहा जाए इसे ? सभ्यता का अन्त या मनुष्यता का चरम पतन, कि आज देह की सजी दुकानों में देह एक डिपार्टमेंटल स्टोर बन गई है जहाँ नारी अपने अलग-अलग अंगों का घंटों और मिनटों के हिसाब से अलग-अलग सौदा कर रही है ! इस देह बाजार का इतना यंत्रीकरण हो चुका है कि सभी मानवीय अनुभूतियाँ और मर्यादाएँ स्वाहा हो चुकी हैं। मानव को ईश्वर की सर्वोत्तम भेंट प्रेम वहाँ सामूहिक व्यभिचार में बदल चुका है। एक कमरे में तीन-तीन पुरुषों के साथ कोई एक भाड़े पर....बारी-बारी से। खुलेआम। इन्हीं लालबत्ती इलाकों में कहीं जगह की कमीं के चलते एक ही कमरे में कपड़ा टाँगकर.....

कहीं पॉकेट में बीस का नोट लिए कोई स्कूली बालक इन बाजारों में। कहीं गाड़ी में बैठाकर कोई रईसजादा गाड़ी में ही..।वेश्याएँ अपने-अपने बारे में बताना नहीं चाहतीं, अपना सर्वस्व गँवाकर भी, अपनी इज्जत का ड़र अपने पेशे के खुलासा हो जाने का डर इनकी आत्मा से चिपका रहता है, विशेषकर जो आस-पास के गाँवों से आई हुई हैं, या जो पार्टटाइम या फ्लाईंग वेश्याएँ हैं।

नारी का अर्थ यदि सृजन, प्रकृति और सम्पूर्णता है तो आज इस बाजार में तीनों नीलाम हो रहे हैं। और, यह नीलामी जीवन की नसतोड़ यंत्रणाओं और भुखमरी की कोख से उपजती है, जाने कैसे एक आम धारणा लोगों में है कि वेश्याएँ बहुत ठाट-बाट से रहने के लिए यह रास्ता अपनी इच्छा से पकड़ती हैं। यह सत्य उतना ही है जितना पहाड़ के सामने राई। 85 प्रतिशत वेश्यावृत्ति जीवन की चरम त्रासदी में भूख के मोर्चे के विरुद्ध अपनाई जाती है। 10 प्रतिशत वेश्यावृत्ति धोखाधड़ी से उपजती है, यह धोखाधड़ी प्रेम के झूठे वादे, नौकरी प्रलोभन, शहरी चकाचौंध से लेकर एक उच्च और सम्मानित जीवन के सब्ज़बाग दिखाने तक होती है। असन्तुलित विकास, बेकारी, उजड़ते गाँव पारम्परिक शिल्प और घरेलू उद्योगों के विलुप्त हो जाने से शहरों की तरफ बढ़ता पलायन....आदि संभावनापूर्णइनपुटहैं इन लालबत्ती इलाकों के।

इन लालबत्ती इलाकों की संख्या खतरनाक गति से बढ़ रही है। पहले गिने
इलाके थे और वेश्याएँ भी शाम ढले निकलना शुरू होती थीं। आज इलाके बहुत बढ़ गए हैं, और सुबह से लेकर गहराती रात तक की गलियों के मुहाने पर ग्राहकों के इन्तजार में प्रतीक्षा करतीं और कमर दु:खाती जीवन से थकी-ऊबी, लिपी-पुती किशोरियाँ मिल जाएँगी। राष्ट्रीय महिला आयोग, 95-96 के अनुसार भारत के महानगरों में दस लाख से भी अधिक वेश्याएँ हैं पिछले साल से इसमें 20 प्रतिशत इजाफा हुआ है। इस समाचार पर गंभीर विचार करना तो दूर सम्भ्रान्त वर्ग यह मान बैठा है कि वेश्यावृत्ति बन्द नहीं हो सकती। एक बौद्धिक से पूछा गया, ‘क्या वेश्या उन्मूलन संभव है ? उसने जवाब दिया, ‘हाँ संभव है, पर वह उसी प्रकार का होगा जिस प्रकार की ‘‘सोसाइटी विदाउट ए गटर।’’ इस भावशून्यता एवं भावनात्मक क्षरण के जवाब में यही कहा जा सकता है कि जनाब कभी यही तर्क दास प्रथा के लिए दिये जाते थे।

भगवान बचाए इस देश को, आज वेश्या-उन्मूलन,कम से कम सेकेंड़ जेनरेशन वेश्यावृत्ति,
जीवन
के दूसरे विकल्प, नयी शुरूआत की बातें तो दूर, कई नारी संगठन पुरजोर
स्वरों में यह माँग उठा रहे हैं कि वेश्याओं को यौनकर्मी एवं श्रमिक का दर्जा दिया जाए और वेश्यावृत्ति को उद्योग का।कलकत्ते के साल्ट लेक स्टेडियम में फरवरी 2001 में वेश्याओं के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन मेन यह देखकर मैं भौचक्क रह गया था संगठनों से मंत्र
पाकारसभी वेश्याएँ अपने सीने परवी आर वर्कर्सका बैज लगाए स्वयं को
गौरवान्वित
कर रहीं थीं यही मतिभ्रम स्वयं को ही उत्पाद बनाने की माँग,
बाजार में कॉमोडिटी’बनने की आकांक्षा उन्हें किन अँधी सुरंगों में भटकाएगी ?
इस पर गम्भीर विचार किया जाना चाहिए कि किस प्रकार के संगठन नारी की
अन्तर्निहित गरिमा एवं प्रेरणा के अन्त:स्रोत्रों को ही दाँव पर लगा रहे हैं!

पिछली सदी ने कई क्रान्तियाँ देखीं। आम आदमी को इंसान की गरिमा देने के
लिए रूस, चीन, क्यूबा और वियतनाम में क्रान्तियाँ हुई, पर इन लालबत्ती इलाकों
का अँधेरा घना ही होता जा रहा है क्योंकि इनमें आम आदमी समझा नहीं जाता है।
महिला संगठन इन्हें उत्पाद बनाने पर तुले हैं। सरकारी खातों में ये भिखारियों के
समक्ष हैं, इनकी आय पर कोई आयकर नहीं लगाया जाता क्योंकि यह अनैतिक
ढंग से कमाया जाता है। वोट देने का अधिकार होने पर भी ये वोट नहीं दे पातीं
क्योंकि सरकारी कर्मचारी इन गंदी एवं बदनाम गलियों में जाकर इनके नामों को
सूची में डालने की जहमत नहीं उठाते और सबसे बढकर भद्र समाज इन्हें बुरी
औरत एवं कुल्टा के रूप में देखता है पर यह सोचने की बात है कि अधिकांश
वेश्याएँ बारह-तेरह वर्ष की उम्र में ही इन गलियों में धकेल दी जाती हैं, कुछ यहीं
आँख खोलती हैं। प्यार और संरक्षण से वंचित, अपने स्व और गहराइयों से दूर,
ऐसी अर्द्धविकसित और अशिक्षित महिलाएँ, हर रात जिनकी देह का ही नहीं, आत्मा का भी चीरहरण होता हो, ऐसी महिलाएँ जीवन आस्था के आलोक-बिन्दु कहाँ से पाएँ जो स्त्री को स्त्री बनाते हैं ?

यह वेश्याओं की एक रहस्यमय दुनिया है। शताब्दियों का बोझ ढोती हुई। देह के मन्दिरों और देह के पुजारियों की यह वह दुनिया है जो वितृष्णा में लिप्टी एक अजीब सा सम्मोहन जगाती है। यहाँ जिन्दगी का शोर-शराबा है, हर गली के हर कमरे का अलग-अलग इतिहास.....जहाँ हर रात देह की नहीं उघड़ती है वरन् आत्माओं का भी चीर-हरण होता रहता है।
यहाँ जीवन के कुरुप से कुरुप एवं भयंकर से भयंकर नग्न रूप मिल जाएँगे क्योंकि यहाँ संस्कृति, मर्यादा एवं परम्पराओं का कोई डर नहीं है। बन्धन नहीं है। इस रूप के बाजार का रूप विहीन जीवन अपने चरम रूप में आपके समक्ष खुलते थान की तरह बेशर्मी से खुला हुआ है।

आभार----------- पुस्तक - सलाम आखिरी-----मधु कांकरिया

Wednesday, May 5, 2010

तन पर लपेटे फटे व पुराने कपड़े---------------------(मिथिलेश दुबे)

तन पर लपेटे

फटे व पुराने कपड़े

वह सांवली सी लड़की,

कर रही थी कोशिश

शायद ढक पाये

तन को अपने,

हर बार ही होती शिकार वह

असफलता और हीनता का

समाज की क्रूर व निर्दयी निगाहें

घूर रहीं थी उसके खुलें तन को,

हाथ में लिए खुरपे से

चिलचिलाती धूप के तले

तोड़ रही थी वह पेड़ो से छाल

और कर रही थी जद्दोजहद जिंदगी से अपने

तन पर लपेटे फटे व पुराने कपड़े

वह सावंली सी लड़की ।