Sunday, August 22, 2010

क्योंकि वेश्या है वह ??????--- मिथिलेश दुबे


सहती न जानें कितने जुल्म
करती ग्रहण
पुरुष कुंठाओ को
हर रात ही होती है हमबिस्तर
न जानें कितनों के साथ.............
कभी उसे कचरा कहा जाता
कभी समाज की गंदगी
कभी कलंक कहा गया
कभी बाई प्रोडक्ट
तो कभी सभ्य सफेदपोश
समाज का गटर.........
आखिर हो भी क्यों ना
कसूर है उसका कि वह
इन सफेद पोशों के वासना को
काम कल्पनाओं को
कहीं अंधेरे में ले जाकर
लील जाती है
खूद को बेचा करती है
घंटो और मिनटों के हिसाब से...........
जहाँ इसी समाज में
नारी को सृजना कहा जाता है
पूज्य कहा जाता है
माता कहा जाता है
देवी कहा जाता है
उसी समाज की
शोषित, उपेक्षित
उत्पीडित, दमित
कुल्टा है वह
क्योंकि दोष है उसका
वेश्या है वह।

Saturday, August 21, 2010

लेकिन तुम नहीं आये-------------मिथिलेश दुबे


आज फिर देर रात हो गयी
लेकिन आप नहीं आये
कल ही तो आपने कहा था
आज जल्दी आ जाऊंगा
जानती हूं मैं
झूठा था वह आश्वासन .......
पता नहीं क्यों
फिर भी एक आस दिखती हैं
हर बार ही
आपके झूठे आश्वासन में........
हाँ रोज की तरह आज भी
मैं खूद को भूलने की कोशिश कर रही हूँ
आपकी यादों के सहारे
रोज की तरह सुबह हो जाए
और आपको बाय कहते ही देख लूं..........
आज भी वहीं दिवार सामने है मेरे
जिसमे तस्वीर आपकी दिखती है
जो अब धूंधली पड़ रही है
जो आपके वफा का
अंजाम है या शायद
बढ़ती उम्र का एहसास........
वही बिस्तर भी है
जिसपर मैं रोज की तरह
आज भी तन्हा हूँ
अब तो इसे भी लत लग गई है
मेरी तन्हाई की..............
दिवार में लगा पेंट भी
कुरेदने से मिटनें लगा है
मेरे नाखून भी जैसे
खण्डहर से हो गये है
आसुओं की धार से
तकिए का रंग भी हल्का होने लगा है
सजन लेकिन तुम नहीं आये
तुम नहीं आये ।।

Thursday, August 12, 2010

छिनाल कह दिया तो हंगामा क्यो है बरपा-----------मिथिलेश दुबे

आजकल जहां देखिए एक ही शब्द गूंज रहा है छिनाल और छिनाल । हां इससे ये फायदा जरुर रहा कि कम से कम बहुत लोगों को इसका मंतव्य स्पष्ट हो गया । मात्र एक शब्द को लेकर इतना हो हल्ला हुआ कि इसी मुद्दे के तले कामनवेल्थ का मुद्दा कहीं पाताल में जा समाया । लेकिन हाँ एक बात जो समझ नहीं आती मुझे कि अक्सर जब कोई बड़ा मुद्दा तुल लेने वाला होता है, तभी अचानक ऊपर से कोई ऐसा मुद्दा आ गिरता है कि दूसरा मुद्दा तो लापता ही हो जाता है । छिनाल शब्द जैसे क्या बोल दिया विभूति नारायण राय जी ने, नारी वादियों के मुहं में संजीवनी की बुंद डाल दी । इससे पहले नारी वादियों को कुछ सूझ तो रहा नहीं था कि अचानक से देखके मौका मार दो चौका वाली घटना हो गई । महिला संगठन ऊठ - जाग गई अरे ये नारी अपमान । हाँ तो फिर पिपीयाना शुरु क्या हुआ कि बंद होने का नाम ही नही ले रहा । हो भी कैसे जब तक मुद्दा जीवित तब तक दूकान में लोगो की आवाजाही तेज रहेगी साथ दूकान में खरीद परोख्त की घटना भी बढ़ जाएगी । यहाँ तक कि कुछ संगठनें तो मन्नतें मांग रही होंगी कि काश महिनें में एकाक ऐसी घटना होती रहती तो दूकान भी चलती रहती , और हम भी मजे मजें और ओ भी मजे, भगवान भला करे उसका । अब जरा देखिए अगर इस शब्द में नारी विरोधाभास होता तो जाहिर सी बात है सभी महिलाओं को होता, । लेकिन नहीं ऐसा नहीं हुआ इस मुद्दे को लेकर महिलाओं के मत भिन्न-भिन्न हैं, कारण इसके पिछे जो हो । राय जी के साथ काम करने वाली एक महिला लेखक ने उनको सही करार दिया और कहा कि ये उनका नीजि मत है । इतना सबकुछ जानने के बाद भी इतना हंगामा क्यों बरपा । राय जी ने माफी भी मांग ली लेकिन इसका ये मतलब निकालना कि वे गलत थे ठिक ना होगा । किसी के विरोधीयों की संख्या ज्यादा होगी तो जाहिर सी बात है कोई भी झूक सकता है जिसका जीता जागता सबूत राय जी हैं । नारी अपमान को लेकर उस मुद्दे को बेवजह इतना उछाला जा रहा जिसका नारी सम्मान और अपमान से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं । हां हर बार की तरह मीडिया का योगदान इस मुद्दे पर भी हावी दिख रहा ।
एक ऐसे शब्द के लिए तू-तू मैं-मैं हो रहा जिसका हमारे यहाँ खासकर गावों में प्रयोग सामान्य तौर पर न सिर्फ महिलाओं के लिए वरन पुरुष के लिए भी किया जाता रहा है और हो भी रहा है । गांव में अक्सर इस शब्द का प्रयोग भौजाई और मामीं करती हैं, साधारण मजाक के लिए तब इस बात को लेकर कोई अन्यथा नहीं लेता । ,हाँ यहाँ ये जरुर हो सकता है कि जो नारी हाई प्रोफईल नहीं है अथवा जो कम पढी लिखी है उसे अपमान ना समझ आता हो । राय जी के व्यकतव्य को लेकर महिला लेखकों ने भी अपनी आपत्ति दर्ज कराई और खूब हो हल्ला कर रही है , आखिर क्यों नहीं पता कैसे चलेगा मैं नारी के भले लिए सोचती हूँ , हां चाहे फिर वे महिलाएं खूद को नारी वादी और नारी संरक्षक कहने वाली अपने बहु को जिंदा जला दें तो कोई बात नहीं , लेकिन अगर ऐसा कुकर्म पुरुष कर दे तो उसपर दहेज के लिए मारने का आरोप तो लगेगा ही साथ महिला उत्पीड़न का भी आरोप भी लगाया जायेगा , और अगले दिन महिलावादी संगठन रोड पर दिखाई देंगी पोस्टरों और बैनरों के साथ । राय जी की टिप्पणी पर महिला लेखक मैत्रेयी पुष्पा ने कहा, "हम महिलाओं के सम्मान के लिए बड़ी लंबी लड़ाई लड़कर यहां पहुंचे हैं, लेकिन इस तरह के पुरुष हमें गालियां देते हैं, एक पत्थर मारते हैं और सब पर कीचड़ फैला देते हैं।" । जरा इनकी बातों पर ध्यान दीजिए ये कैसा विकास ये कैसा आत्मविश्वास,और ये कैसी जीत जो मात्र एक पत्थर मारने से टूट जाए, मतलब सब झूठ । भारतीय ज्ञानपीठ की साहित्यिक पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' ने 'बेवफाई' विषय के शीर्षक के साथ अपने ख़ास अंक में विभूति राय का साक्षात्कार किया था। इसी के कुछ अंश अखबारों ने छापे।विभूति राय ने कहा, "पिछले कुछ वर्षों में कुछ महिला लेखिकाएं ये मान के चल रही हैं कि स्त्री मुक्ति का मतलब स्त्री के देह की मुक्ति है। हाल में कुछ आत्मकथाएं भी आई हैं जिनमें होड़ लगी है कि कौन सबसे बड़ा इन्फेडेल है। मैं अपने साक्षात्कार में इसे गलत बताना चाहता था।"
अब इसमे ऐसा क्या कहर बरपा दिया राय जी ने जिससे नारी अपमान हो गया । अगर पुरुष ऐसा कहता है तब गलत है और जबकि महिला लेखिकाएं एक बिस्तर पर कितनी बार जैसे शिर्षक के साथ आत्मकथाएं लिखती है तो वो ठिक है, ये कैसा सौतेला व्यवहार किया जा रहा है समझ के परे है। हाँ उन्हे ज्यादा मिर्ची लगी जिन्होने अपना एजेण्डा नारी विकास के लिए स्त्री देह को बना रखा है । ये एसे लोग है जो स्त्री देह मुक्ति को नारी मुक्ति मानते है, जिनकी नजरों मे अगर नारी को मनमाफिक कपडे पहनने की आजादी दे दी जाए तो नारी पूणतः मुक्त कही जा सकती है स्त्री , बस जी इसी का विरोध किया राय जी ने । क्या हाल हुआ उनका ये सब को पता है । लेकिन हाँ इससे बहुत से लोगों को फायदा भी हुआ जैसे नारी वादी संगठनों का तो हुआ ही साथ ही बहुत से लोग खूद को नारी का शुभचिंतक बनाने में भी लगे हुए हैं । मतलब अंतिम मै जय हो बाबा राय जी की, बीच-बीच में आते राहियेगा, और आमदनी बढवाते रहियेगा ।

Thursday, August 5, 2010

तेरा धर्म महान की मेरा धर्म---------मिथिलेश दुबे





तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म
मची है लोगों मे देखो कैसी घमासान
बन पड़ा है देखो कैसा माहौल
लग रहे हैं एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप
क्या हो जायेगा अगर मेरा धर्म नीचा
तेरा धर्म महान
आखिर पिसता तो है इन सबके बीच इंसान
जहाँ खाने के लिए रोटी नहीं
पहनने के लिए वस्त्र नहीं
रहने के लिए घर नहीं
वहां का मुद्दा बन पड़ा है
तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म महान,,,,,,,,,,,
जहाँ फैला है भ्रष्टाचार चहूं ओर
जहाँ नेता बन बैठा है भाग्य बिधाता
जहाँ अशिक्षा हावी है शिक्षा पर
जहाँ देखने वालों की भी गिनती है अंधो में
वहाँ मुद्दा बन पड़ा है
तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म .......
जहां मां तोड‍ देती है दम प्रसव के दौरान
जहाँ बच्चे शिकार होते हैं कुपोषण का
जहाँ लड‍‌कियो को अब भी समझा जाता है बोझ
वहाँ मुद्दा बन पड़ा है
तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म .......

Tuesday, August 3, 2010

पुरुष वेश्या, आधुनिकता की नयी खोज -----------मिथिलेश दुबे


हाँ आपको सुनने में अटपटा जरूर लगा होगा . हाँ होगा भी कैसे नहीं है भी अटपटा .अगर इसे आधुनिकता की नयी खोज कहा जाये तो तनिक भी झूठ न होगा . पहले वेश्यावृत्ति का शब्द मात्र महिलाओं के लिए प्रयोग किया जाता था , लेकिन अब जब देश विकाशसील है तो बदलाव आना तो लाजिमी हैं ना. अगर देखा जाये तो वेश्या मतलब वो जिन्हें पुरुष अपने वासना पूर्ति के लिए प्रयोग करते थें , इन्हे एक खिलौना के माफिक प्रयोग किया जाता था, वाशना शांत होने के बाद इन्हे पैसे देकर यथा स्थिति पर छोड़ दिया जाता था . पुरुष वर्ग महिलाओं प्रति आकर्षित होते थे और ये अपनी वासना पूर्ति के लिए जिन्हें वेश्या कहते हैं, इनके माध्यम से अपनी शारीरिक भूख शांत करते थे . लेकिन अब समय बदल गया है पश्चिम की आधी ऐसी आई वहां की प्रगतिवादी महिलाओं ने कहा कि कि ये क्या बात हुयी , पुरुष जब चाहें अपनी वासना मिटा लें परन्तु महिलाएं कहाँ जाये ???? तत्पश्चात उदय हुआ है जिगोलो या पुरुष वेश्याओं का .
आज ये हमारें यहाँ खासकर बड़े शहरों में इनकी संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही . साथ ही इनकी मांग भी दिन व दिन बढती ही जा रही है . जिगोलो का उपयोग महिलाएं अपनी वासना पूर्ति के लिए करती हैं. जब महिलाएं अपने देह का व्यापार करके पैसे कमा सकती हैं तो पुरुष क्यूँ नहीं, परिणाम वेश्याओं के समाज में नयी किस्म . आखिर हो भी क्यूँ न , इसमे पुरुष वर्ग फायदे में भी तो रहता है , एक तीर से दो निशाना जो हो जाता है, इन्हे आनंद तो मिलता ही है साथ ही पैसे भी वह भी अच्छे खाशे .
पुरुष वेश्याओं का प्रयोग ज्यादातर अकेली रहने वाली ,उम्रदराज महिलाएं या अपने पति से संतुष्ट न रहने वाली महिलाएं करती हैं . इनका चलन मेट्रो शहरों में ज्यादा है कारण इनका वहां आसानी से उपलब्धता .
ये नयी किस्म की गंदगी पश्चिम सभ्यता की देन है, यह वहां के नग्नता का परिचायक है . बङे शहरों में इनकी मांग ज्यदा इसलिए क्योंकि यहाँ की महिलाएं ज्यादा आधुनिक हैं .उन्मुक्त हो चुकी महिलाओं को अपनी वासना की पूर्ति के लिए जिगोलो के रुप में साधन मिला. भारत पश्चिम सभ्यता का हमेशा से ही नक़ल करता आया है, तो यहाँ पिछे रहने के कोई कारण ही नहीं है . हमारे देश के युवा उनके ही पदचिन्हों पर चल रहे हैं और इसका परिणाम किसी को बताने की जरूरत नहीं हैं , इतनी स्त्रियों से संबंध बनाने के बाद अक्सर उनमें से ज्यादातर एड्स या अन्य घातक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं फिर चाहे पैसे कमाने के लिए अपनी मर्यादा ही क्यों न दाव पर लगा देनी पड़े .आज युवा अच्छे पैसे के लिए वह सबकुछ कर रहा है जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. शायद आधुनिकता की अन्धता यही है.समलैंगिक पुरुषों और देह व्यापार से जुड़े पुरुषों के लिए काम कर रहे हमसफ़र ट्रस्ट के अध्यक्ष अशोक राव कवि का मानना है कि "ये जिगोलो भी बाज़ार की वस्तु है जो समाज से आ रही माँग को पूरा कर रहे हैं. ये समाज के उच्चवर्ग की वस्तु बन गई है. समाज में माँग थी, जिसकी भरपाई करने के लिए सप्लाई आ गई है. इसने एक नया बाज़ार तैयार किया जो दोनों ही पक्षों की ज़रूरत को पूरा कर रहा है.
इन सबके आगे इस परीदृश्य को देखा जाये तो ये विकास की ये आधुनिकताहमारे सभ्य समाज को न सिर्फखोखला बल्कि विक्षिप्त भी कर रहा है . युवा पीढ़ी को कहा जाता है कि वह भारत का भविष्य सवारेगा वह अब ऐसे दलदल में फंशा जा रहा है जहाँ से इसकी कल्पना करना इनके साथ बेईमानी होगी . रोजगार की कमी को भी इसका कर्णधार कहा जा सकता है, लेकिन ये क्या जिस पीढ़ी को हमसे इतनी उम्मीद है उसके हौशले इतनी जल्द पस्त हो जाएंगे ऐसा कभी सोचा न था. भारत में समलैंगिकता और वेश्यावृत्ति तथा लिव इन रिलेशनशिप के प्रति दृष्टिकोण बदलने की बात की जा रही है। पहले ही इन मुद्दों पर बहुत विवाद हो चुका है। ऐसे में इस तरह के दूषित मानसिकता को रोकना अतिआवश्यक है । अगर देखा जाए तो मीडिया इनमे महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है और पाश्चात की चमचागिरी मे लगा है,ऐसे में फैसला आपके हाथ में है।