Sunday, December 26, 2010

नारी उत्थान में निहित भारत विकास-------------मिथिलेश दुबे

नारी के महान बलिदान योगदान के कारण ही भारत प्राचीन में समपन्न और विकसित था . प्राचीन काल में नर-नारी के मध्य कोई भेद नहीं था और नारियां पुरुषों के समकक्ष चला करती थी फिर चाहे वह पारिवारिक क्षेत्र हो या धर्म , ज्ञान विज्ञानं या कोई अन्य , सर्वांगीण विकास और उत्थान में नारी का योगदान बराबर था . नारी न सिर्फ सर्वांगीण विकास में सहायक थी पुरुष को दिशा और बल भी प्रदान करती थी . भारत के विकास में नारी योगदान अविस्मरणीय है. शायद इनके योगदान बिना भारत के विकास का आधार ही न खड़ा हो पता . इतिहास में भी नारी का लम्बा हस्तकक्षेप रहा . प्राचीन भारत को जो सम्मान मिला उसके पीछे नारियों का सहयोग व सहकार कि भावना सन्निहित रही है .वर्तमान समय में भले ही नारी शिक्षा का अवमूल्यन हो रहा हो , अन्धानुकरण के उफान पर भले ही उसकी शालीनता , मातृत्वता को मलीन और धूमिल किया गया हो परन्तु प्राचीन भारत में ऐसा नहीं था . तब चाहे कोई क्षेत्र हो , ज्ञान का हो या समाज का हो, नारी को समान अधिकार प्राप्त थे . नर-नारी को समान मानकर समान ऋषिपद प्राप्त था .

वैदिक ऋचाओं की द्रष्टा के रूप में सरमा , अपाला, शची , लोवामुद्रा , गोधा ,विस्वारा आदि ऋषिकाओं का आदरपूर्वक स्थान था .यही नहीं सर्वोच्य सप्तऋषि तक अरुंधती का नाम आता है. नर और नारी में भेद करना पाप
समझा जाता है . इसी कारण हमारे प्राचीन इतिहास में इसे अभेद मन जाता रहा है.ब्रह्मा को लिंग भेद से परे और पार मन जाता है . ब्रह्मा के अव्यक्त एवं अनभिव्यक्त स्वरुप को सामन्य बुद्धि के लोग समझ सके इसीलिए ब्रह्मा ने स्वयं को व्यक्त्त किया तो वे नर और नारी दोनों के रूप में प्रकट हुए . नर के रूप को जहाँ परमपुरुष कहा गया वाही नारी को आदिशक्ति परम चेतना कहा गया . नर और नारी में कोई भेद नहीं हैं . केवल सतही भिन्नता है और यही भ्रम नारी और पुरुष के बिच भेद कि दीवार खड़ी करती है. शास्त्रों में ब्रह्मा के तीनों रुपों को जहां ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहा गया तो वहीं नारियों को आदिशक्ति, महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली कहा गया । देवासुर संग्राम में जब देवताओं को पराजय का मुँह देखना पड़ा था तब देवीशक्ती के रुप में देवताओं की मदद करना तथा राक्षसों को पराजित करना अध्यात्म-क्षेत्र में नारी को हेय समझने वाली मान्यता को निरस्त करती है ।

नारी शक्ति के बिना भगवान शिव को शव के समान माना जाता है । पार्वती के बिना शंकर अधुरे हैं । इसी तरह विष्णु के साथ लक्ष्मी, राम के साथ सीता को हटा दिया तो वह अधूरा सा लगता है । रामायण से अगर सीता जी को हटा दिया तो वह अधूरा सा लगता है । द्रोपदी, कुंती गांधारी का चरित्र ही महाभारत को कालजयी बनाता है अन्यथा पांडवो का समस्त जीवन बौना सा लगता । नारी कमजोर नहीं है, अबला नहीं है, वह शक्ति पर्याय है । देवासुर संग्राम में शुंभ निशुंभ, चंड-मुंड, रक्तबीज, महिषासुर आदि आसुरी प्रोडक्ट को कुचलने हेतु मातृशक्ति दुर्गा ही समर्थ हुई । इसी तरह अरि ऋषि की पत्नी अनुसूइया ने सूखे-शुष्क विंध्याचल को हरियाली से भर देनें के लिए तपश्चर्या की और चित्रकूट से मंदाकिनी नदी को बहने हेतु विवश किया । यह घटना भागीरथ द्वारा गंगावतरण की प्रक्रिया से कम नहीं मानी जा सकती ।
साहस और पराक्रम के क्षेत्र में भी नारी बढ‌ी-च‌ढी़ । माता सीता उस शिवधनुष को बड़ी सहजता से उठा लेती जिसे बड़े-बड़े योद्धा नहीं उठा पाते थे । इनके अलावा नारियां वर्तमान समय में भी विभिन्न क्षेत्रों, जैसे-- प्रशासनिक क्षत्र में किरण वेदी , खेल में सानिया नेहवाल, सानिया मिर्जा, झूल्लन गोस्वामी, राजनीति में सोनिया गांधी, प्रतिभा देवी सिंह पाटील, मीरा कुमार, विज्ञान के क्षेत्र में कल्पना चावला, सुनिता विलियम्स, आदि सभी अपने क्षेत्रों में अग्रणी रही हैं और भारत स्वाभीमान को बढ़ाया है ।
इस तरह ऐसे बहुत से प्रमाण हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि भारत के विकास के लिए आदर्शवादी नारियों ने अपनी क्षमता योग्यता का योगदान दिया । समाज में नारी के विकास के लिए समुचित व्यवस्थाएं की जाए । नारी के
विकास से ही भारत अपनी प्रतिष्ठा, सम्मान, गौरव को पुनः प्राप्त कर सकता है ।

आभार ----अलग-अलग किताबों से पढ़ा गया किरदारों के बारे में

Sunday, December 19, 2010

" 19 दिसम्बर की वह सुबह "------------मिथिलेश दुबे

रोज की तरह उस दिन भी सुबह होती है, लेकिन वह ऐसी सुबह थी जो सदियों तक लोगों के जेहन में रहेगी । दिसंबर का वह दिंन तारीख 19 , फांसी दी जानी थी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को । बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फांसी दी जानी थी । रोज की तरह बिस्मिल ने सुबह उठकर नित्यकर्म किया और फांसी की प्रतीक्षा में बैठ गए । निरन्तर परमात्मा के मुख्य नाम ओम् का उच्चारण करते रहे । उनका चेहरा शान्त और तनाव रहित था । ईश्वर स्तुति उपासना मंन्त्र ओम् विश्वानि देवः सवितुर्दुरुतानि परासुव यद्रं भद्रं तन्न आसुव का उच्चारण किया । बिस्मिल बहुत हौसले के इंसान थे । वे एक अच्छे शायर और कवि थे ,जेल में भी दोनों समय संध्या हवन और व्यायाम करते थे । महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती को अपना आदर्श मानते थे । संघर्ष की राह चले तो उन्होंने दयानन्द जी के अमर ग्रन्थों और उनकी जीवनी से प्रेरणा ग्रहण की थी । 18 दिसंबर को उनकी मां से जेल में भेट हुई । वे बहुत हिम्मत वाली महिला थी । मां से मिलते ही बिस्मिल की आखों मे अश्रु बहने लगे थे । तब मां ने कहा कहा था कि " हरीशचन्द्र, दधीचि आदि की तरह वीरता से धर्म और देश के लिए जान दो, चिन्ता करने और पछताने की जरुरत नही है । बिस्मिल हंस पड़े और बोले हम जिंदगी से रुठ के बैठे हैं" मां मुझे क्या चिंतन हो सकती, और कैसा पछतावा, मैंने कोई पाप नहीं किया । मैं मौत से नहीं डरता लेकिन मां ! आग के पास रखा घी पिघल ही जाता है । तेरा मेरा संबंध कुछ ऐसा ही है कि पास आते ही मेरी आंखो में आंसू निकल पड़े नहीं तो मैं बहुत खुश हूँ ।
अब जिंदगी से हमको मनाया न जायेगा।
यारों है अब भी वक्त हमें देखभाल लो, फिर कुछ पता हमारा लगाया न जाएगा । बह्मचारी रामप्रसाद बिस्मिल के पूर्वज ग्वालियर के निवासी थे । इनके पिता श्री मुरली धर कौटुम्बिक कलह से तंग आकर ग्वालियर छोड़ दिया और शाहजहाँपुर आकर बस गये थे । परिवार बचपन से ही आर्थिक संकट से जूझ रहा था । बहुत प्रयास के उपरान्त ही परिवार का भरण पोषण हो पाता था । बड़े कठिनाई से परिवार आधे पेट भोजन कर पाता था । परिवार के सदस्य भूख के कारण पेट में घोटूं देकर सोने को विवश थे । उनकी दादी जी एक आदर्श महिला थी , उनके परिश्रम से परिवार में अच्छे दिंन आने लगे । आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और पिता म्यूनिसपिल्टी में काम पर लग गए जिन्हे १५ रुपए मासिक वेतन मिलता था और शाहजहाँपुर में इस परिवार ने अपना एक छोटा सा मकान भी बना लिया । ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष ११ (निर्जला एकादशी) सम्वत १९५४ विक्रमी तद्ननुसार ११ जून वर्ष १८९७ में रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म हुआ । बाल्यकाल में बीमारी का लंबा दौर भी रहा । पूजारियों के संगत में आने से इन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया । नियमित व्यायाम से देह सुगठित हो गई और चेहरे के रंग में निखार भी आने लगा । वे तख्त पर सोते और प्रायः चार बजे उठकर नियमित संध्या भजन और व्यायाम करते थे । केवल उबालकर साग, दाल, दलिया लेते । मिर्च खटाई को स्पर्श तक नहीं करते । नमक खाना छोड़ दिया था । उनके स्वास्थ्य को लोग आश्चर्य से देखने लगे थे । वे कट्टर आर्य समाजी थे, जबकि उनके पिता इसके विरोधी थे जिसके चलते इन्हे घर छोड़ना पड़ा । वे दृढ़ सत्यवता थे । उनकी माता उनके धार्मिक कार्यों में और शिक्षा मे बहुत मदद करती थी । उस युग के क्रान्तिकारी गैंदालाल दीक्षित के सम्पर्क में आकर भारत में चल रहे असहयोग आन्दोलन के दौरान रामप्रसाद बिस्मिल क्रान्ति का पर्याय बन गये थे । उन्होंने बहुत बड़ा क्रान्तिकारी दल (ऐच आर ए) हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेसन के नाम से तैयार किया और पूरी तरह से क्रान्ति की लपटों के बीच ठ गए । अमरीका को स्वाधीनता कैसे मिली नामक पुस्तक का उन्होनें प्रकाशन किया बाद मे ब्रिटिश सरकार नेजब्त कर लिया । बिस्मिल को दल चलाने लिए धन का अभाव हर समय खटकता था । धन के लिए उन्होंने सरकारी खजाना लूटने का विचार बनाया । बिस्मिल ने सहारनपुर से चलकर लखनऊ जाने वाली रेलगाड़ी नम्बर ८ डाऊन पैसेंन्जर में जा रहे सरकारी खजाने को लूटने की कार्ययोजना तैयार की । इसका नेतृत्व मौके पर स्वयं मौजूद रहकर रामप्रसाद बिस्मिल जी ने किया था । उनके साथ क्रान्तिकारीयों में पण्डित चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खां , राजेन्द्र लाहिड़ी, मन्मनाथ गुप्त , शचीन्द्रनाथ बख्शी, केशव चक्रवर्ती, मुरारी लाल, बनवारी लाल और मुकुन्दीलाल इत्यादि थे । काकोरी ट्रेन डकैती की घटना की सफलता ने जहां अंग्रजों की नींद उड़ा दी वहीं दूसरी ओर क्रान्तिकारियों का इस सफलता से उत्साह बढ़ा । इसके बाद इनकी धर पकड़ की जाने लगी । विस्मिल, ठा़ रोशन सिंह , राजेन्द्र लाहिड़ी, मन्मनाथ गुप्त, गोविन्द चरणकार, राजकुमार सिन्हा आदि गिरफ्तार किए गए । सी. आई. डी की चार्जशीट के बाद स्पेशल जज लखनऊ की अदालत में काकोरी केस चला । भारी जनसमुदाय अभियोग वाले दिन आता था । विवश होकर लखनऊ के बहुत बड़े सिनेमा हाल 'रिंक थिएटर को सुनवाई के लिए चुना गया । विस्मिल अशफाक , ठा़ रोशन सिंह व राजेन्द्र लाहिड़ी को मृयुदंड तथा शेष को कालापानी की सजा दी गई । फाँसी की तारीख १९ दिसंबर १९२७ को तय की गई । फाँसी के फन्दे की ओर चलते हुए बड़े जोर से बिस्मिल जी ने वन्दे मातरम का उदघोष किया । राम प्रसाद बिस्मिल फाँसी पर झूलकर अपना तन मन भारत माता के चरणों में अर्पित कर गए । प्रातः ७ बजे उनकी लाश गोरखपुर जेल अधिकारियों ने परिवार वालो को दे दी । लगभग ११ बजे इस महान देशभक्त का अन्तिम संस्कार पूर्ण वैदिक रीति से किया गया । स्वदेश प्रेम से ओत प्रोत उनकी माता ने कहा " मैं अपने पुत्र की इस मृत्यु से प्रसन्न हूँ दुखी नहीं हूँ ।" उस दिन बिस्मिल की ये पंक्तियां वहाँ मौजूद हजारो युवकों-छात्रों के ह्रदय में गूंज रही थी---------- यदि देशहित मरना पड़े हजारो बार भी , तो भी मैं इस कष्ट को निजध्यान में लाऊं कभी । हे ईश ! भारतवर्ष मे शत बार मेरा जन्म हो कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो
इस महान वीर सपूत को शत्-शत् नमन




पुस्तक आभार-- युग के देवता

Friday, December 10, 2010

रिश्ते बंद है आज चंद कागज के टुकड़ो में---------मिथिलेश दुबे


रिश्ते बंद है आज
चंद कागज के टुकड़ो में,
जिसको सहेज रखा है मैंने
अपनी डायरी में,
कभी-कभी खोलकर
देखता हूँ उनपर लिखे हर्फों को
जिस पर बिखरा है
प्यार का रंग,
वे आज भी उतने ही ताजे है
जितना तुमसे बिछड़ने से पहले,
लोग कहते हैं कि बदलता है सबकुछ
समय के साथ,
पर
ये मेरे दोस्त
जब भी देखता हूँ
गुजरे वक्त को,
पढ़ता हूँ उन शब्दो को
जो लिखे थे तुमने,
गूजंती है तुम्हारी
आवाज कानो में वैसे ही,
सुनता हूँ तुम्हारी हंसी को
ऐसे मे दूर होती है कमी तुम्हारी,
मजबूत होती है
रिश्तो की डोर
इन्ही चंद पन्नो से,
जो सहेजे है मैंने
न जाने कब से।।

Monday, December 6, 2010

"तुम्हारी बातें ही आईना थी "------------मिथिलेश दुबे

तुम्हारी बातें ही आईना थी

जिंसमे देखता था तुमको मैं

टुकड़ो-टुकड़ो में मिलती थी खुशी

दिन में कई बार।।



उन दिनो यूं ही हम तुम


खुश हुआ करते थे

न तुमने मुझे देखा था और

न ही मैने तुमको

बना ली थी एक तस्विर

तुम्हारी उन बातो से

सजा लिए थे सपनें रातों में

तुम्हारी उन बातो से

महसुस करता था तुमको हर पल

कल्पंनाये न छोड़ती थी साथ

जिसपर बैठ कर तय करता था सफर अपना।।



अच्छ लगता यूँ ही सब कुछ

सोचकर बाते तेरी मुस्कुराहट

उतर आती थी होठो पर

कितना हसीन था वो पल

वो साथ

जब बातें ही हमारी आवाज

हमारें जज्बात बयां करती थी।।



मै प्यार की गहराई तुम्हे समझाता

और प्यार की ऊंचाई

तुम चुपचाप ही सुनती रहती थी सब कुछ

यूं ही तब ये सिलसिला चलता रहता था

देर तक और फिर पूछता था

तुमसे न जाने कितने सवाल

तुम मुस्कुराकर ही टाल देती थी जवाब।।


मैं गुस्साता तो तुम समझाती

मैं रुठता तो तुम मनाती

पल आज फिर से याद आ रहा है

सोचकर बातें मैं

आज अकेले ही मुस्कुराता हूँ

तुमको याद करके।।

Thursday, December 2, 2010

दैहिक प्यास या बलात्कार---------मिथिलेश दुबे

,आधुनिकता की आंधी अपने पूरे उफान पर है , अब यह वहाँ पहुँच चुकी है जहाँ से पिछे की ओर रुख करना बेमानी होगी, और नामुमकिन भी है । आधुनिकता की आड़ में वह सब समय से पहले किया जा रहा जिसे समय से पू्र्व करना कभी हमारे समाज में अपराध माना जाता था, अब वह सब बीक रहा है जो कभी अमूल्य हुआ करता था । अब बाजारो में कौमार्य की बीक्री भी शुरु हो गयी है, दुःखद लेकिन सत्य । अब शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाना आम बात हो गयी और अब तो इसको कानुनी मान्यता भी मिल गयी , शायद बदलते समाज और समय की यही माँग है , इस फैसले से हमारा प्रभूत्व वर्ग बहुत खुश हुआ । पहले कहा जाता था लड़का , लड़की जब जवान हो जायें तो उनकी शादी कर देनी चाहिए , कारण....... ताकि सामाज के साथ-साथ खुद की उनकी शारीरिक जरुरतों की पूर्ती हो सके , लेकिन ये बातें अब तो पुरातन सी लगती हैं ,अब तो लगता है कि ये आदमखोर के जमाने की बात होगी । वर्तमान समय में ना तो समाज की चिंता है और ना ही वर्जनाओं के बिखरने का , जब सारी जरुरतें कम से कम शारीरिक, बिना शादी के ही पूरी हो रही है तो शादी जैसे बंधन में बंधना लोगो को नागवार सा लगने लगा । जिसकी पवित्रता की बातें होती थी उसे अब खुलेआम बे आबरु किया जा रहा है बिना किसी लज्जा और शर्म के ।
पर एक बात जो हमेशा से कही जा रही कि जहाँ अति होता है वहाँ विनाश भी जल्द शुरु हो जाता है , जिसका आरंभ धीमा ही सही परन्तु शुरु हो चुका है । वाकया है मुंबई का , जहाँ एक प्राइवेट एयरलाइंस मे काम करने वाली एक युवती ने अपने सहकर्मी युवक पर बलात्कार का आरोप लगाया है , पुलिस के मुताबिक वरुण नामक युवक उस युवती को शादी का झांसा देकर उसका पिछले दो सालों से बलात्कार कर रहा है , अभी तक जितने भी बलात्कार की घटना हुई है उनमे मुझे ये घटना सबसे हास्यास्पद लगी ,और मजे के बात यह है कि दोनों पिछले कई सालो से एक साथ एक ही फ्लैट मे साथ-साथ रहते थे ,आखिर हो भी क्यों ना जहाँ तक मैं बलात्कार के बारे में जान पाया हूँ वह क्षणीक और जबरन किया जाता है , अब लगातार दो साल बलात्कार करना , अजीब लग रहा है सूनने में, मुझे तो लगता है कि बलात्कार करवाने के केस करना चाहिए उस युवक को । अब आप लोग भी जरा सोचिए कि इतना लंबा बलात्कार हो सकता है क्या ??
दो साल लगातार हवस की आंधी मे बहकर हम विस्तर होने के बाद बलात्कार का आरोप लगाना किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता । शादी युवक ने क्यों नहीं की किस कारण जानलेना भी जरुरी बनता है । जब इतनी ही चिंता थी अपनी इज्जत की तो पहले क्यों नहीं सोचा ? गलती लड़के की भी है परन्तु उसने तो किसी पर बलात्कार का आरोप नहीं लगाया । इस पूरे प्रकरण नें इस बात की गवाही दी है कि लिव इन रिलेशनशिप
किसी भी तरह से जायज नहीं है हमारे समाज के लिए । ऐसे रिश्तो का कोई मानक नहीं होता बल्कि ऐसे रिश्ते दो आत्मओं के मिलन जैसे पवित्र रिश्ते को दागदार करते हैं, ऐसे रिश्तो से मात्र दैहिक शोषण में वृद्धी होगी । , जिसका उदाहरण हम ऊपर देख ही चुके हैं । इसे आधुनिकता की अंधता ही कहा जा सकता है कि रजामंदी से बने बने शारीरिक संबन्ध को बलात्कार जैसे घृणीत कार्य की संज्ञा दी जा रही है । परिवर्तन प्रकृति का नियम है परन्तु ये परिवर्तन नैतिकता के उत्थान की ओर हो ना कि पतन ओर हो ।

दो महिने बाद ब्लोगिंग मे फिर से वापसी हो रही , उम्मिद करता हूँ कि सबकुछ ठिक-ठाक चलेगा । इस मेरे अनुपस्थिति में जिन लोगों ने मुझे याद किया उनका शुक्रगुजार हूं । कोशिश करुंगा कि जहाँ से छोड‌ गया ब्लोगिंग उसके वहीं से शुरुआत करूंगा , खैर एक पुराना लेख पढिये जिसे मैं समय पर पोस्ट नहीं कर पाया ।