Thursday, July 21, 2011

पर्दा प्रथा: विडंबना या कुछ और---------मिथिलेश दुबे

अपने देश में महिलाओं को (खासकर उत्तर भारत में ज्यादा) पर्दे में रखने का रिवाज है । इसके पीछे का कारण शायद ही कोई स्पष्ट कर पाये फिर भी ये सवाल तो कौंधता ही है कि आखिर क्यों ? मनुष्यों में समान होने के बावजूद भी महिलाओ‍ को ढककर या छिपाकर रखने के पीछे का क्या कारण हो सकता है ? ये सवाल हमारे समाज में अक्सर ही किया जाता रहा है, कुछ विद्वानों का मानना है कि पर्दा प्रथा समाज के लिये बहुत ही आवश्यक है इसके पीछे के कारण के बारे में उनका कहना है कि इस प्रथा से पुरूष कामुकता को वश में किया जा सकता है । लेकिन इस जवाब के संदर्भ में ये सवाल भी खड़ा होता है कि क्या पुरूष की कामुकता इतनी बढ़ गयी है कि उसे अपने ही समकक्ष महिला साथी को कैदियों की तरह रखना पड़ रहा है? तो क्या ये माना जाये कि पर्दा प्रथा से दूराचार रोका जा सकता है ? जहाँ तक मेरा मानना है कि ऐसा सोचना व्यर्थ ही होगा क्योंकि दुनियां में जितने भी गलत काम होते हैं वे चोरी छिपे ही होते हैं । तो इस परिपेक्ष्य में ऐसा सोचना मुर्खता मात्र ही होगा । तन ढकने या पर्दा करने से पुरूषों की या किसी अन्य की प्रवृत्ति या सोच पर अंकुश लगाया जा सकता है ? शायद आपका जवाब नहीं होगा। आपको ये जानकर हैरानी होगी जिन देशों, प्रदेशों या जातियों में पर्दा प्रथा की प्रचलन ज्यादा है वहाँ दुराचार जैसे मामलें सबसे ज्यादा प्रकाश में आते है । इससे ये बात तो साफ हो जाती है कि दुराचार रोकने के मामले में पर्दे का रिवाज का कोई संबंध नहीं है। आज समाज को जरुरत तन को ढकने की नहीं मन को ढकने की जरुरत ज्यादा है । फिर भी कुछ लोग अनाचार की रोकथाम के लिए पर्दा प्रथा को जरुरी समझते है तो इस व्यवस्था को नर पर लागू करने की जरुरत ज्यादा है क्योंकि नारी की अपेक्षा नर ज्यादा उच्छंखल होता है ।नारी की अपेक्षा पुरुष ज्यादा स्वछंद घूमता है ऐसी दशा में उसके पतित होने की आशंका ज्यादा है। महिलाएं तो ज्यादातर घरेलू कामों में व्यस्त रहती हैं और घर में ही रहती हैं, पुरुष काम के चलते बाहर होते हैं इसलिए पर्दे की जरुरत उन्हें ज्यादा है।

इस प्रथा के चलते हम अपने प्रिय संबंधिनी को बेहद निरीह स्थिति में ढकेल देते हैं जिससे वह अपनी योग्यता, क्षमता और के वजूद को भी खो देती है। प्रतिभा संपन्न होने के बावजूद वह नारी अपने परिवार के लिए व अपने हित के लिए कुछ भी नहीं कर पाती और आज की भारभूत स्थिति में अपंग मात्र ही बनकर रह गयी है । इस बात को जितनी जल्दी गंभीरतापूर्वक सोचा जाए जाएगा उतना ही स्पष्ट होता जाएगा कि इस पर्दा प्रथा कुछ और नहीं अपनी कुल्हाणी से अपने ही पैरों को अनवरत रूप से काटने चले जाना है । आज जब हम प्रगति पथ पर बढ रहे हैं, देश विकास कर रहा है ऐसी स्थिति में पर्दा जैसी विडंबनाओ को अपनाने का आग्रह करना, जोर देने का मतलब समझ ही नहीं आता। कारण चाहे जो भी हो इस प्रथा से स्त्री अपने क्षमता को खोती है तथा वह खुद को असहाय समझने लगती है तथा खुद को कायर, निर्बल और भीरूता की कतार में खड़ी पाती है। पर्दे में रखकर उसे कमजोर और अविश्वषनीय होने का अहसास कराया जाता है। पर्दा प्रथा हमारे देश या संस्कृति में कभी भी प्रचलित नहीं रही है । प्राचीनकाल में स्त्रियां सभी क्षेत्रों में काम करती थी और उन्हे विद्याध्ययन योग्यता अभिवर्धन और अपनी प्रतिभा से समाज को लाभ पहुंचाने की खुली छूट थी, उन्हें कहीं किसी प्रतिबंध में नहीं रहना पड़ता था। भारत में पर्दा प्रथा का आगमन विदेशी आक्रमणकारियों के साथ हुआ। सर्वविदित है कि पर्दा प्रथा पहले मुस्लिम दशों मे शरू हुआ था। इस घातक परंपरा को समूल नष्ट करने के लिए किसी स्त्री का घूंघट खुलवा देना पर्दा न करने के लिए तैयार कर देना भर पर्याप्त नहीं है। कितना अच्छा होत कि वर्तमान भारत का समाज अपने घरों के अन्दर से इस बनावटी परदा को हटा कर उस भीषण भूल का प्रतिरोध करे, जिसके कारण हमारे घर ही देवियां एक न एक रोग से पीड़ित रहती हैं । घर के बाहर की दुनियां से अनजान रहकर घूटती रहती हैं ।

कितने ही लोगों का भ्रम अब भी नहीं मिटा कि परदा छोड देने से स्त्रियां स्वतंत्र हो जाती हैं, किंतु यह उनका भ्रम ही नहीं अंधविश्वास है। गुजरात महाराष्ट्र, मद्रास की स्त्रियों ने परदाक न कर कौन से शील धर्म को नष्ट किया है ? वरन यों कहिए कि भारत के नारी धर्म का वास्तविक मान आन इन्ही प्रान्तों ने रख लिया, आज स्त्री अपरहण, बलात्कार की जितनी घटनाएं अपने देश मे घटित होती है क्या उनसे शतांश घटनाएं परदा हटाने वाने देशों में हुआ है। नारी का शोषण उन प्रदेशों में ज्यादा हो रहा है जहां परदा प्रथा हो धर्म तथा संस्कुति से जाड़कर जबरदस्ती इस कुप्रथा को थोपा जा रहा है। यह तो माना हुआ सिद्धांत है कि जो वस्तु जितनी छिपा कर रखी जाएगी बाहरी परिस्थियां उसे प्रकाश में लाने के लिए उतनी ही विशेष उत्कंठा दिखाएगी और भीतरी परिस्थिति उसे छिपाने के लिए उतनी ही संकीर्ण और निर्बल होती रहेगी। ऐसे प्रथा के निर्वहन का बोझ हम अक्सर पुत्रवधू पर डालते हैं, हमे ध्यान रखना चाहिए कि पुत्रवधू बुटी के समान होती है । अब समय आ गया है जब पर्दा प्रथा जैसी कुरीति को हटाए जाए । नर और नारी दोनों एक ही मानव समाज के अभिन्न अंग है। दानो का कर्तव्य और एक हैं । नियत प्रतिबंध और कानून दानों के प्रति एक जेसे होने चाहिए। यदि पर्दा प्रथा शील सदाचार की रक्षा के लिए है तो उसे नर पर लागू किया जाना चाहिए कयोंकि दूराचार में पुरूष हमशा आगे रहता है। यदि यह पुरूष के लिए आवश्यक नही है तो नारी पर भी इस प्रकार का प्रतिबंध नहीं होना चाहिए अवांछनीय हैं। मेरा पर्दा प्रथा के विरोध करने का ये मतलब कतई नहीं है की असंगत कपड़े पहनने की छूट दी जाये मेरा। वस्त्रेणेव वासया मन्मता शुचिम् ऋगवेद 1।140।1 हम उत्तम वस्त्र से गोपनीय अंगो को ढक देते हैं।

जब पशु पक्षी पर्दा नहीं करते, मुंह नही ढकते उनमे ऐसी कोई प्रतिबद्धता नहीं है तो मानव में आजादी का हरण इस तरह क्यों हो रहा है?


Thursday, April 21, 2011

बच्चे की मदर----- मिथिलेश

कई दिनों से घर जाने की तैयारी चल रही थी और अब तो होली बस दो ही दिन दूर था। हमेशा की तरह इस बार भी घर जाने को लेकर मन बहुत ही उत्साहित था । भले ही अब घर जाने के बीच का अंतराल कम हो गया हो लेकिन घर पर एक अलग तरह का ही सुख मिलता है। घर पर न तो काम का बोझ और न ही खाना बनाने की चिंता, बर्तन और कपड़े धोना जो मुझे सबसे ज्यादा दुष्कर लगता है उससे भी छुटकारा मिल जाता है। घर पर बार-बार खाने को लेकर मम्मी का आग्रह उनका प्यार अच्छा लगता है। नहीं तो जब बाहर होते हैं तो खाना खा लें समय पे बड़ी बात है अब ये बात और है कि ये सारे सुख कुछ दिन के ही होते हैं। जब से लखनऊ हूं महीनें दो महीनें में एक चक्कर घर का तो हो ही जाता है। इस बार होली होने के कारण घर जाने का उत्साह दो गुना था। सुबह 7 बजे की ट्रेन थी, साढ़े छः के आस पास स्टेशन पहुंचा। मैं स्टेशन पर अभी ठिक से खड़ा ही हुआ अगले क्षण जो भी देखा मेरी ऑखें खुली की खुली ही रह गईं। जिस ट्रेन से मुझे जाना था वह अभी आउटर पर ही थी, लेकिन ये क्या लोग तो आउटर से ही ट्रेन पर बैठना शुरू कर दिये। थोड़ी देर तक स्थिति समझने में लगा रहा, उसके बाद मैं भी ट्रेन की तरफ भागा। अन्दर जाने के बाद जो स्थिति सामने थी उससे हतप्रभ था । पहली बार इस ट्रेन में इतनी भीड़ थी जबकि गाड़ी अभी आउटर पर ही थी। खैर इतनी भीड़ होने के बावजूद खिड़की के पास वाली सीट ढूंढने में लगा था।

डब्बे में काफी देर तक टहलने के बाद जब ये कनर्फम हो गया कि आज तो खिड़की वाली सीट मिलने से , सीटों की मारा मारी देखकर अब तो सीट मिल जाए यही प्राथमिकता शेष थी। काफी मशक्कत करने के बाद अन्ततः सीट मिल ही गई। हॉं इस बार खिड़की वाली सीट नही मिली। मेरे सामने वाले बर्थ पर भी इतनी जगह थी कि एक लोग उसपर बैठ सकते थे। कुछ देर बाद गाड़ी आउटर से प्लेटफार्म पर आ खड़ी हुई। अब काफी राहत महसूस कर रहा था , बैग को रखकर अब थोड़ा आराम के मूड में था। मुझे क्या पता कि मेरा ध्यान कुछ ही देर में भंग होने वाला है। ट्रेन का हार्न हो चुका था , गाड़ी अब चलने को ही थी तभी भागमभाग की स्थिति में एक महिला का मेरे वाले डब्बे में प्रवेश होता है, लोगों की नजरें उस रास्ते की ओर थी जिस ओर से वे सरपट कदम चले आ रहे थे । मैं भी बाट जोहने लगा , मैंने भी सोचा कौन आ रहा देख ही लिया जाए । अभी गर्दन उचका ही रहा था कि वह सुंदर मैडम मेरे पास आ पहुंची और जरा हटने के लिए कहा मैं डर के मारे बगल हो गया और मैडम जी मेरे सामने वाली खाली सीट बैठ गईं । मैडम का चेहरा सौम्य था ,पहनावे से बडे़ घर की लग रही थीं , ब्लू जींस पर ब्लैक टी शर्ट फब रहा था। अभी मैं पहनावे से उनको पढ़ने की कोशिश कर ही रहा था कि बच्चे के राने की आवाज आई , ऊपर सर उठा के देखा तो उनके गोदी में छोटा बच्चा जो करिब पॉंच छे महीनें का लग रहा था । अब तक मैडम जी अपने सीट पर बैठ चुकी थीं, मेरे सामने वाले सीट पर। बच्चा अभी सो रहा था। गाड़ी अब अपने पुरे स्पीड से भाग रही थी। कुछ देर चलने के बाद स्पीड थोड़ी कम हुई , मेरा अनुमान सही निकला , अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकने वाली थी।

बच्चे ने झटके से दूध का बोतल गिरा दिया और दोबारा से रोने लगा। ये सब देखकर बगल में बैठी आंटीने दोबारा अपनी खामोशी तोड़ी, बेटी अपना दूध पिला दो कहते-कहते न जाने क्यों खामोश हो गईं। मैं बहुत देर तक उस खामोशी और चेहरे पर आई सिकन का कारण ढूंढ़ता रहा।


मेरे बगल में बैठे भाई साहब इसी स्टॉप पर उतरने के लिए तैयारी करने लगें, गाड़ी रुकती है भाई साहब उतर जाते हैं । तभी किसी ने मुझसे कहा बेटा जरा साईड हो जाओ ,देखा तो एक महिला साड़ी में जो मेरे दादी की उम्र की लग रहीं थी, एक छोटे बैग के साथ मेरे बगल वाली खाली सीट पर बैंठ गईं । कुछ देर के स्टोपेज के बाद ट्रेन दोबारा से चल पड़ी । सामने वाली मैडम के गोदी में उनका बच्चा सोते हुए बड़ा ही प्यारा लग रहा था। बगल में बैठी महिला ने मुझसे बेटा कहॉं तक जाओगे , मैंने कहा मैं तो वाराणसी तक जाऊंगा ,आप ? आंटी जी ने कहा कि मैं तो प्रतापगढ़ तक जाऊंगी , इस पर मैंने हूं कहते हुए गर्दन हिलाया ।
ट्रेन के कोलाहल के बीच सामनें वाले सीट पर अपनी मां के गोदी में आंचल ना सही किसी प्लास्टिक नुमा लीवास में दुनिया दारी से परे सो रहा मासूम सा बच्चा अचानक उठा और रोने से सबका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। कुछ देर तक मां के पुचकारने से वह चुप तो हुआ लेकिन बहुत देर तक शांत न रहा , रोना चलता रहा। ये सब देख बगल में बैठी आंटी से रहा न गया और उन्होंने बच्चे को दूध पिलाने का इशारा किया। कुछ देर तक सोचने के बाद मैडम ने दूध का पोटली बच्चे के मुंह में लगा दिया। बच्चे ने झटके से दूध का बोतल गिरा दिया और दोबारा से रोने लगा। ये सब देखकर बगल में बैठी आटी ने दोबारा अपनी खामोशी तोड़ी, बेटी अपना दूध पिला दो कहते-कहते न जाने क्यों खामोश हो गईं। मैं बहुत देर तक उस खामोशी और चेहरे पर आई सिकन का कारण ढूंढ़ता रहा।

Wednesday, April 6, 2011

कचरा तो साफ हो गया----------- मिथिलेश

प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अमूमन सारी सुविधाओं के मुकम्मल होने की बात एक आम आदमी सोचता होगा। सोचे भी क्यों नहीं, उसे क्या पता कि हर डाल पर उल्लू बैठे हैं। यदि आप कभी लखनऊ आए हैं तो विधानसभा जरूर देखे होंगे! फिलहाल कोई बात नहीं यदि नहीं आए होगें तो एक बार अवश्य देखिए। यहां का हर आदमी आपको नेता ही दिखेगा, उसकी बातों से ऐसा लगेगा, जैसे कि उसकी पहुंच जरूर सीएम तक होगी। यदि ऐसा नहीं तो एक दो मंत्री अथवा विधायक तक तो जरूर होगी। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, लेकिन उसकी भी कुछ मजबूरियों को तो जानिए। आइए मैं एक समस्या उसकी सुनाए देता हूं जो उसकी बीवी से जुड़ी है और वह वहां पर कोई भी नेतागिरी नहीं दिखा पाया। कारण कि वह सफाईकर्मी से कोई नेतागिरी नहीं कर पाता।
विधानसभा के नौवे द्वार से निकलने वाला रास्ता सीधे दारूलसफा की ओर जाती है। इस चौराहे पर पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने वीरांगना महारानी अवंती बाई लोधी की प्रतिमा का अनावरण किया है। मूर्ति के सामने ही एक वाइन शाप एवं बीयर शाप है। दिनभर जिंदगी की जंग लड़ने के बाद अधिकतर युवा और प्रौढ़ लोगों के साथ हमारे नेता भी पैग मारते नजर आते हैं। वैसे तो पूरे उत्तर प्रदेश में आपको रिटेल प्राइज पर न ही शराब मिलेगी और न ही बीयर। अब कारण क्या है? पता नहीं, लेकिन मेरठ के एक सेल्समैन ने बताया था कि आबकारी वालों को बोतल पीछे 15 रुपये देना पड़ता है। मतलब एक बीयर की बोतल आपको वहां 95 रुपये, वाराणसी में 85 रुपये में उपलब्ध हो सकती है। ऐसा ही अन्य शहरों में भी है। लखनउू में आपको यह 80 रुपये में मिल जाता है। बहरहाल पीने वालों के लिए यह बात मायने नहीं रखती। उन्हें तो तलब होने पर उनकी खुराक चाहिए। यह बात खुलेआम मुनाफाखोरी करने वालों को भी पता है।

हां, तो मैं बात कर रहा था लखनऊ के नेताओं की, जो यहां के स्थायी निवासी हैं। पैग मारते हुए उन्हें बीच में सेल्समैन ने झाड़ू लगाते हुए डिस्टर्ब किया- नेताजी जरा उस बेंच पर बैठ लीजिए! वे भी बिना किसी प्रतिक्रिया के दूसरी बेंच पर अपनी गिलास और बोतल संभाले निकल लिए। सेल्समैन आराम से बोतल और केन को अपनी टोकरी में रखते हुए रैपर और झूठे गिलास को समेटता रहा। फिर शाप के सामने सारे कचरे एकत्रित करके आग के हवाले कर दिया। यह वह जगह है, जिसके ठीक सामने के आवास में विधानसभा का एक विधायक जी का निवास है और तो और कई विधायक अथवा मंत्री यहां शाम की चाय पीने एक बार जरूर तशरीफ लाते हैं। कचरे के जलने से वहां पैग मार रहे लोगों को थोड़ी परेशानी होने लगी। पॉलीथिन जलने से उठ रही बदबू और पोल्यूशन लोगों को बर्दाश्त नहीं हुई तो एक ने टोका- यार इसे कचरावाला उठा ले जाता, जलाने से कितनी परेशानी हो रही है। इस बीच नेताजी तपाक से बोल पड़े- भइया इन्होंने अच्छा किया। कहां सफाई वाला आता है। सफाई वालों का तो सबसे बड़ा बोलबाला है। यदि ये कचरा छोड़ देते तो वह वैसा ही पड़ा रहता। सफाईवाला हमारे मुहल्ले में भी आता है, लेकिन वह सफाई करने नहीं, बल्कि कचरा उठाने के लिए। वह भी कचरा उठाने का हर मकान वालों से 50 रुपये लेता है। उसने आश्चर्य भरी नजर से नेताजी को देखा और कहा कि आपसे भी पैसा लेता है। नेताजी ने अपनी व्यथा सुनाई-भइया इस बात को लेकर बीवी से भी अनबन हो गई। कहती है कि ऐसी नेतागिरी का क्या मतलब जब सफाई करने वाला हमसे भी पैसा मांगे? पर क्या करे बड़ी मेहरबानी के चलते 35 रुपये में बात बनी। वह यह कहकर मान गया कि कभी किसी गाढ़े मुसीबत में काम पड़ जाए। उसने झल्लाकर कहा- जब प्रदेश की राजधानी का यह हाल है तो अन्य शहरों में तो अंधेर रहेगा ही। भई, लेकिन यदि विधानसभा के सामने ही पोलूशन खुलेआम होगा तो आने वाला समय बहुत बुरा गुजरने वाला है। नेताजी ने स्पष्ट किया- परेशान होने की बात नहीं भाई, कचरा तो साफ हो गया। थोड़ी देर की तकलीफ सही है, लेकिन यदि यह कचरा यहां पड़ा रहता तो कितने लोगों को इधर से गुजरने में दिक्कतें उठानी पड़ती। और तो और यहां कचरा पड़ा रहता तो कितने लोगों को यहां बैठने में बुरा लगता। फिर उन्होंने अपने साथ आए पीड़ित व्यक्ति, जिसकी समस्या का वे समाधान कराने वाले थे को सिगरेट लाने का इशारा किया। इस पर वह सामने की दुकान से सिगरेट लाकर पकड़ा दिया और वे लम्बी कश लेने लगे। फिर वे चाव के साथ कश लेते हुए विधानसभा के सामने से गुजर रहे थे। इन्हें न ही सुप्रीमकोर्ट के फैसले का खौफ था और न ही पर्यावरण प्रदूषण का। वहीं सामने कई पुलिस और उनके कई वाहन भी खड़े थे, जिनका न नेताजी को खौफ था और न पुलिस वालों को इसकी फिकर थी कि दो व्यक्ति विधानसभा के सामने धूम्रपान करते हुए गुजर रहे हैं। शायद पुलिस वाले भी यही सोच रहे थे कि धुआं ‘कचरा’ तो वातावरण के माध्यम से गायब हो जा रहा है। मतलब नेताजी की भाषा में कि कचरा तो साफ हो गया।

पर्यावरण प्रदूषण के बारे में जैसा कि हम प्राथमिक कक्षाओं से शिक्षकों से जानकारी हासिल करते हैं और उस दौरान उन तमाम बातों में से कुछ पर अमल करने के लिए सोचते हैं, लेकिन ऐसा क्या होता है कि हम उन्हे अनदेखा करने लगते हैं’। इस पर हमारा ध्यान भी होता है, लेकिन कहीं न कहीं उस पर चाह कर भी अपना विरोध अथवा विचार नहीं रख पाते। इसके पीछे भी एक लोगों में धारणाएं बनती जा रही है, जो यह है कि कोई अलानाहक परेशानियां मोल नहीं लेना चाहता। कौन इस पचड़े में पड़े? यह सोच आपको जरूर राहत दे सकती है, लेकिन यह भविष्य के लिए घातक है। यदि आप अपनी जिंदगी की खुशियों के लिए जिते हैं तो यह ठीक नहीं है। कारण कि आप सिर्फ अपने लिए तो जी नहीं सकते। आपके साथ आपका परिवार और रिश्ते-नातेदार भी जुड़े हुए हैं।

यदि उनके भविष्य के बारे में जरा भी सोच सकते हैं तो निश्चित तौर पर पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करने वालों को खुलकर विरोध करें। ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियों समेत हमारा भी कल शु़द्ध पर्यावरण में व्यतीत हो सके। यह सच है कि इस काम को अकेले कर पाना संभव नहीं है, लेकिन पहल तो बेहद जरूरी है। देश का नागरिक होने की वजह से हमारा यह परम कर्तव्य बनता है कि हमें इस पर गंभीर होना चाहिए। यदि हम इस सचाई से भागते रहे तो हम इस बात को कहने के अधिकारी नहीं होते हैं कि हमारे देश की सरकारें और अधिकारी भ्रष्टाचार में डूबी हैं अथवा लापरवाही बरत रही हैं। सीधी बात तो यह है कि पहले हम अपने ही गिरेबान में झांक कर देख लें, फिर दूसरे की खामियों को उजागर करें। ताकि कोई भी आरोप लगाते या विरोध करते समय सामने वाला आप पर सवाल न खड़ा कर सके। --

सूचना------- पिछले एक महिने से ब्लागिंग से दूर रहा है । इस दौरन हमारे बड़े भईया सतीश सक्सेना जी ने कई एसएमएस और मेल भी किया कि मैं नदारद क्यों हूं ? और डांट भी लगाई यू गायब होने के लिए । इतने दिंन कहाँ रहा और कैसे रहा ये अगली पोस्ट मे जरुर बताऊंगा । सतीश भईया मैं एक फिर आ गया हूँ ।

Monday, February 28, 2011

क्या सच में तुम हो?????....मिथिलेश



देखता लोगों को
करते हुए अर्पित
फूल और माला
दूध और मेवा
और न जाने क्या-क्या
हाँ तब जगती है एक उम्मीद
कि
शायद तुम हो
पर जैसे ही लांघता हूँ चौखट तुम्हारा
तार-तार हो जाता है विश्वास मेरा
टूट जाता है समर्पण तुम्हारे प्रति
जब देखता हूँ कंकाल सी काया वाली
उस औरत को
जिसके स्तनों को मुँह लगाये
उसका बच्चा कर रहा था नाकाम कोशिश
अपनी क्षुधा मिटाने को
हाँ उसी चौखट के बाहर
लंबी कतारे भूखे और नंगो की
अंधे और लगड़ों की.....
वह जो अजन्मी
खोलती आंखे कि इससे पहले
दूर कहीं सूनसान में
दफना दिया जाता है उसे
फिर भी खामोश हो तुम.....
एक अबोध जो थी अंजान
इस दुनिया दारी से
उसे कुछ वहशी दरिंदे
रौंद देते है
कर देते हैं टुकड़े- टुकड़े
अपने वासना के तले
करते हैं हनन मानवता
और तुम्हारे विश्वास का........
तब अनवरत उठती वह चीत्कार
खून क़ी वे निर्दोष छींटे
करुणा से भरी वह ममता
जानना चाहती है
क्या सच में तुम हो ???????????

Wednesday, February 23, 2011

लौहांगना ब्लॉगर का राग-विलाप----------मिथिलेश










बधाई
दीजिए मुझे किसी लौहांगना ने गुंडे की उपाधि दी, ताली-ताली । आज मैंने दोस्तों को पार्टी दी और लौहंगना के खूब दृश्य बिहार किए । लेकिन सच मानिए दृश्य बिहार करते वक्त न पता क्यों मन भी अकुलित हो रहा है । हाँ आप स्थिति तो समझ ही सकते है मन अकुलाना क्यों होता है । मेरा वहां जाना और दृश्य बिहार करना ऐसे ही थोड़ी न था, बुद्धिजीवियों का जमावड़ा देख मैं भी पहुंचा और अब अंजाम मेरे सामने है । मोहतरमा ने मुझे गुंडा कहा और उपाधि से नवाजा । कितना आसान है ये उपाधि पाना आप भी चाहते हों तो कमेंट करिए, पर हाँ विपक्ष में करना तभी जल्दी उपाधि से नवाजे जायेंगे । गुंडा सुनकर पहले तो हैरानी हुई मैंने सोचा किसी के साथ जबरदस्ती यौनाचार तो नहीं कर दिया । खैर इसे यही छोड़ते हैं और मुद्दे पर दोबारा से आते हैं । मुझपर गुंडई का आरोप लगा है । आरोप लगाने वाला कोई और नहीं ब्लागजगत की एकमात्र स्वयम्भू आयरन लेडी हैं । वे जो दुसरों को भद्रता का पाठ पढा़ रही है, खूद एक झूठी और धूर्त महिला है जिसका उदाहरण आप दिए गये स्नैप शॉट में देख सकते है किस तरह से उस पोस्ट में संशोधन करके उस लाईन को हटा दिया गया है जिसके परिपेक्ष में मैंने वह कमेंट किया था । लेकिन मैडम भूल गयी कि उसी लाईन को लेकर शिव शंकर जी ने भी कमेट किया और अपना सवाल पूछा था जिसे मोहतरमा हटाना भूल गयी , जो आप स्नैप शॉट मे देख सकते हैं । उस लाईंन में महिलाओं को ये हिदायत दे रहीं थी कि महिलाओं को पुरुषों से कोई अपेक्षा नहीं करनी चाहिए । और मेरा कमेंट मात्र यही था कि आप खूद इसपर कितना अमल करती हैं । इस महिला की धूर्तता सामने आ चुकी है ।

आप ब्लोग स्वामी है आपकी स्वइच्छा पर निर्भर करता है कि आप कमेंट प्रकाशित करें या ना करें , लेकिन उस कमेंट को अभद्रता और गाली संज्ञान से जोडना कितना सही है ??? जबकि वह कमेंट आपके सामने है । इनका कहना कि वह कमेंट उस पोस्ट विषय के सापेक्ष नहीं था जबकि मेरा सवाल पोस्ट से जुड़े लाईन से ही था । और वह कमेंट उनके नीजी लाईफ से जुड़ा कैसे हो सकता है जबकि मैं उनके ब्लॉग पर पहली बार गया था शायद । मुझे भद्रता सिखाया जा रहा है मैडम के द्वारा । भाई वाह बहुत खूब अब वारांगनाए भी हमें तहजीब सिखाएंगी । वे हमें सिखा रही हैं जो खूद नीच शब्दो का प्रयोग करती आई हैं देवाताओं यानी पुरुषों के खिलाफ । जिसका एक छोटा सा उदाहरण आप गए स्नैप शॉट मे देख सकते हैं । जिसका खूद का चेहरा न पता कितनी ही बार नग्न हो चुका है वह ढकने की सलाह दे रहा है, बहुत खूब । मै तो इतना परेशान हो गया हूँ कल से कि भद्र और अभद्र में अन्तर ही भूल गया हूँ , समझ नहीं आ रहा कि भद्र और अभद्र की संज्ञा किसे दूँ । ब्लॉग जगत का बुद्धिजीवि लोग भी वहां पहुंचे और अपने विचार से अभद्रता को गलत ठहराया जो कि ठिक भी है । लेकिन किसी ने यह नहीं पुछा कि जिस कमेंट के प्रकाशित ना होने पर ये कमेंट किया गया वह कमेंट कहां गया ?? अब मैं उन ब्लॉग जनों से इस धूर्तता को लेकर उनकी राय जानना चाहूँगा ?? क्या वो कमेंट इतना अभद्र था जितना मोहतरमा ने अपने मुंह से बका है ?? जिसे स्नैप शाट मे देख सकते हैं ।

Tuesday, February 22, 2011

नारी स्नेहमयी जननी-----मिथिलेश

वर्तमान युगमें सब ओर स्वतन्त्राकी आकाक्षां जाग्रत हो गयी है । नारी ह्रदयमें भी इसका होना स्वाभावीक है । इसमे सन्देह नहीं कि स्वतन्त्रता परम धर्म है और नर तथा नारी दोनों ही स्वतन्त्र होना भी चाहिए । यह भी परम सत्य है कि दोंनो जबतक स्वतन्त्र नहीं होंगे , तबतक यथार्त प्रेम भी नहीं होगा । परन्तु विचारणीय प्रश्न यह है कि दोंनो की स्वतन्त्रताके क्षेत्र तथामार्ग एक हैं या दो ? सच्ची बात यह हैं की नर और नारीका शारीरिक और मानसिक संघटन नैसर्गिक दृष्टिसे कदापि एक-सा नहीं हैं । तो दोंनो की स्वतन्त्रा कें मार्ग भी निश्चय ही दो हैं। दोनों अपने-अपने क्षेत्रमें अपने मार्ग से चलकर ही स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकते हैं । यही स्वधर्म है। जब तक स्वधर्म नहीं समझा जायेगा तबतक कल्याणकी आशा नहीं है । स्त्री घर की रानी है ,साम्रागी है ,घरमें उसका एकछत्र राज्य चलता है , पर वह गर की रानी स्नेहमयी माता और आदर्श गृहिणीके ही रुप में । नारीका यह सनातन मातृत्व ही उसका स्वरुप है । वह मानवता की नित्यमाता है । भगवान राम - कृष्ण , भीष्म-युधिष्ठिर , कर्ण , अर्जु, बुद्ध, महावीर , शंकर , रामानुज , गांधी आदि जगतके सभी बड़े- पुरुषको नारीने ही ने सृजन किया और बनाया है । उसका जीवन क्षणिक वैषयिक आनन्दके लिए नहीं , वह तो जगत् को प्रतिक्षण आनन्द प्रदान करनेवाली स्नेहमयी जननी है । उसमे प्रधानता है प्राणोंकी ह्रदयकी और पुरुषमें प्रधानता है शरीर की।
इसीलिए पुरुषकी स्वतन्त्राका क्षेत्र है शरीर और नारीकी स्वतन्त्रा क्षेत्र है प्राण- ह्रदय़ ! नारी शरीरसे चाहे दुर्बल हो , परन्तु प्राणसे वह पुरुष अपेक्षा सदा ही अत्यन्त सबल है। इसीलिए पुरुष उतने त्यागकी कल्पना नहीं कर सकता , जितना त्याग नारी सहज ही कर सकती है , अर्थात पुरुष और स्त्री सभी क्षेत्रोंमें समान भावसे स्वतन्त्र नहीं है । कोई जोश में आकर चाहे यह न स्वीकार करें , परन्तु होशमें आनेपर तो यह तय ही मानना पड़ेगा कि नारी देहके क्षेत्र में कभी पूर्णतया स्वाधीन नहीं हो सकती । प्रकृति ने उसके मन , प्राण और अवयवोंकी रचना ही ऐसी की है । नारी अपने एक विशिष्ट क्षेत्र में रह कर प्रकारान्तरसे सारे जग की सेवा करती है । यदी नारी अपनी इस विशिष्टता को भूल जाये तो जगत् का विनाश जल्द ही संभव है ।
जिन पाश्चात देशोंमें नारी स्वतन्त्रा के गान गाये जा रहे है वहाँ भी स्त्रियाँ पुरुषकों भांती निर्भिक रुप से विचरण नहीं कर पाती । नारी में मातृत्व है , गर्भ धारण करना ही पड़ता है । प्रकृति नें पुरष को इस दायित्व से मुक्त रखा है । इसलिए स्वतन्त्रा स्वाधिनता सर्वत्र सुरक्षित नहीं है, नारी अपने इस दायित्व से बच नहीं सकती ,जो बचना चाहती हैं , उसमे विकृतरुपसे इसका उदय होता है । यूरोपमें नारी स्वतन्त्र है , पर वहाँ की स्त्रियाँ क्या इस दायित्व से बचती है ? क्या वासनाओं पर उनका नियत्रंण है ? वे चाहे विवाह करे या ना करे परन्तु पुरुष संसर्ग किये बिना रही नहीं सकती । इग्लैंड़ में बीस वर्षकी आयुवाली कुमारीयों में चालीस प्रतिशत विवाहके पहले ही गर्भवती पायी जाती है , क्या देश का ऐसा नैतिक पतन कहीं देखने कि मिल सकता है ?? क्या ऐसी स्वतन्त्रा भारतीय महिलायें चाहती है ?? विदेशियोंका पारिवारिक जिवन भी नष्ट होता जा रहा है ।
लोग कहते है कि वहां की महिलायें शिक्षित हुई उनका विकास हुआ है । इसमें इतना तो सत्य है कि वहाँ स्त्रियोंमें अक्षर-ज्ञानका पर्याप्त विस्तार है ,परन्तु इतने मात्र से कोई सुशिक्षित और विकसित हो जाये , ऐसा नहीं माना जा सकता ।

अस्वतन्त्रा भवेत्रान्त्ररी सलज्जा स्मितभाषिणी ।
अनालस्या सदा स्त्रिग्धा मितवाग्लोभवर्जिता ।। (उत्तराखण्ड ८-२)

"नारी को स्वच्छन्दतासे शून्य , लज्जायुक्त , मन्द मुदकानहीन वाणी बोलनेवाली , सदा प्रेम पूर्वक भाषण करने वाली और लोभसे हीन होनी चाहिए "।
वास्तव में शिक्षा वह है जो मनुष्यमें उसके स्वधर्मानुकूल कर्तव्य जाग्रत करके उसे कर्तव्यका पूरा पालन करने योग्य बना दें। प्रकृति के विरुद्ध शिक्षासे कोई लाभ नहीं हो सकता है ये भी सत्य है । इस युग में जो
शिक्षा महिलाओं को दी जा रही है क्या उनका स्वधर्मोचित विकास हुआ है ?? एक बड़ा सवाल हो सकता है ।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्दिमवाप्रोती न सुखं न परां गतिम् ।

"जो मुनुष्य शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है वह सुख को कभी प्राप्त नहीं कर सकता ।
"
सच पूछिये तो सैकड़ो वर्षोसे चली आ रही है यूरोपकी शिक्षाने वहाँ कितनी महान् प्रतिभाशालिनि जगत की नैसर्गिक रक्षा करने वाली महिलाओं को उतपन्न किया है ? बल्कि यह प्रत्यक्ष है कि इस शिक्षासे वहाँ नारियों में गृहणीत्व तथा मातृत्व हास हुआ है । अमेरिका में 77 प्रतिशत महिलायें घर के कामों मे असफल होती है , । 60 प्रतिशन महिलायें ज्यादा उम्र हो जाने के कारण वैवाहिक योग्यता खो देती हैं । विवाह की उम्र साधारतः 16 से 20 वर्ष की मानी जाती है , इसके बाद ज्यों-ज्यो उम्र बढ़ती जाती है त्यों-त्यों विवाह की योग्यता भी कम होती जाती है । इसी का परिणाम है कि वहाँ स्वेक्षाचार , अनाचार, व्यभिचार और अत्याचार लगातार बढ़ते जा रहे हैं । अविवाहिता माताओंकी संख्या क्रमशः बढती जा रही है । घर का सुख किसी को नहीं । बिमारी तथा बुढापे में कौन किसकी सेवा करें ? वहां की शिक्षिता स्त्रियो में लगभग 50 प्रतिशत कुमारी रहना पड़ता है । क्या यही बहुमुखी विकास है ?????


सूचना--------उम्मीद है कि आपको मेरा विचार पसंद आया होगा । एक सूचना ये है कि पिछले कुछ दिनों से मेरे मित्रों का कहना था कि आप अपने ब्लॉग का नाम बदलिए सो कुछ बदल दिया , साथ ब्लॉग कलेवर भी बदला है उसको भी पसंद करियेगा । शुक्रिया

Monday, February 14, 2011

प्रेम डे अथवा लूट डे--(एक लेट पोस्ट)----मिथिलेश

बधाई हो आप सबको चोच लड‌ऊल त्योहार । अरे का हुआ भईया समझे नाही का , अरे मेरा मतलब था वेलेंटाइन डे से था। मुझे तो पता ही ना चलता इस प्यार वाले दिन के बारे में शुक्र है उपहार से सजे दुकानों का, विशेष छूट पर मिलने वाले उपहारों का जिन्होंने मुझे जबरदस्ती अवगत कराया कि प्यार वाला दिन आ गया । नही तो मुझे क्या पता कि प्यार करने का कोई दिन भी होता मुझे तो पता था कि प्यार करने का न तो कोई दिन होता है और न ही कोई समय। लेकिन आधुनिक प्यार ने मेरे इस विचार को मेरा भ्रम करार दिया। आधुनिक जमाने में प्यार करना और इजहार करना मात्र पार्क में बैठ कर चोच लड़ाना, अश्शलील हरकते करना और खुलेआम अलिगंन होने तक ही सीमित हो गया जैसा लगता है। इन सबके पीछे विदेशी ताकतों का बड़ा हाथ है। पश्चिम देश अपने प्रयासो में यहॉं की गुमराह युवा पिढ़ी के माध्यम से सफलता अर्जित करने में लगे हैं। जैसा कि वीदित है हमारे देश में युवाओं कि संख्या सबसे ज्यादा है। युवा पिढ़ी अर्थात वह अवस्था जो भावनात्मक वेग में रहता है। इसी भावना का फायदा पाश्चात संस्कृति और वहां कंपनिया बखूबी उठा रही है। भारत में लगातार बढ़ रही वेलेंटाइन डे की लोकप्रियता के पीछे भी विदेशी कंपनियों का ही एक षडयंत्र है, जिसमें युवा पूरी तरह फंसते जा रहे हें। विदेशी कंपनियों के झांसे में आकर युवा प्यार का अर्थ भी पूरी तरह भूलते जा रहे हैं। अमेरिका,जापान या चीन जैसे अन्य तमाम देशों की नजर में भारत सिर्फ एक बाजार है और यहां रहने वाले लोग उनके लिए सबसे अच्छे ग्राहक।
वेलेंटाईन डे जैसे अवसर पर विदेशी सामानो पर विशेष छुट देने का वादा कर भारतीय ग्राहको को बेवकुफ बनाने का कार्य करती हे ये विदेशी कंपनियां। इन चापलुस कंपनियों के झांसे में भारतीय आसानी से फंस जाते है,जिससे ये कंपनियां ऐसे फालतू सामानो को भारत में बेच कर धन कमाने की अपनी रणनीति में कामयाब हो जाती है। भारतीय ग्राहको को ऐसे मौको पर सजक हो जाने की जरूरत है और इन कंपनियों के समानो की बहिष्कार करने की जरूरत है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को पंगू बनाने में ये विदेशी कंपनियां सफल ना हो सके। हमारे देश के युवाओं को ये समझना होगा जिस वेलेनटाईन को लेकर वे इतने उत्साहित रहत हैं वह हमें भावनात्मक शून्य बनाने का मात्र एक शिगुफा है और कुछ भी नहीं। जिस प्यार को ये विदेशी मात्र एक दिंन में बांधना चाहते है वह तो हमारे यहां जिवनपर्यन्त चलता है तो बस एक दिन प्यार, ये प्यार तो हो ही नही सकता। हमारे यहां तो दिन की शुरूआत ही प्यार से होती है, हमें सिखया जाता है कि हर जीव जंतु से प्यार करो। हमें बचपन से ही आपस में प्यार करना बताया जाता है। यह हमारे देश की सभ्यता और परंपरा की ही देन है। यही एक ऐसा देश है जो यहां रहने वाले लोगो के तन मन में और कर्म में हर क्षण प्यार ही रहता हैं यह भारत की भूमि ,वातावरण, संस्कृति, परंपरा और धर्म की देन हे। भारत परंपरा को मानने वाला देश है, तभी विभिन्न वर्गो , भाषाओं , धर्मो और विशाल भूभाग में रहने के बाद भी सभी परंपरा और धर्म के नाम पर अपने त्योहारो मिलजुल कर और पूरी श्रद्वा व आस्था के साथ मनाते हैं। इस सबका मतलब प्यार को बढ़ावा देना ही होता है, फिर हम वेलेंटाइन डे क्यो मनाये ?
प्यार जोड़ना सिखाता है, प्यार मिलजुलकर रहना सिखाता है। प्यार समर्पण का भाव जागृत करता है। प्यार त्याग करने की प्रेरणा देता है। प्यार ईमानदारी और सच्चाई की राह पर चलने की प्रेरणा देता है। लेकिन क्या वेलेंटाईन डे के नाम पर युवा जिस प्यार को दर्शा रहे क्या वह प्यार के इन भावों का अनुकरण कर पा रहे है? आज वेलेंटाइन डे वासना पूर्ति डे मात्र बनकर रह गया है। ऐसे में सेक्स संबंध स्थापित करने की प्रेरणा देनेवाला वेलेंटाइन डे न्यार का संदेश कभी नहीं दे सकता और न ही प्यार के एहसास को जगा सकता है। प्यार जैसे सुंदर एहसास को जिस तरह से कलंकित किया जा रही है वह बहुत ही दुखद है। वेलेंनटाइन डे का बढ़ता दायरा इस बात की ओर ध्यान आकृष्ट करता है कि हमारें देश के युवा पूरी तरह विदेशी संस्कृति के मकड़ जाल में फंस चुके है। देश के युवाओं को ये समझना होगा कि उपहार देने से प्यार मजबूत नही हो जाता उन्हे समझना होगा कि विदेशी उन्हे प्यार का ख्वाब दिखाकर अपनी जेबें भर रही है। मैं प्यार का विरोधी नही हूं लेकिन वह तरीका भारतीय हो और भारत के हित में हो। उपहार देना अगर इतना ही जरुरी हो तो वह भारतीय ही हो । प्यार करे खूब प्यार करे लेकिन वह हमारे संस्कृति और सभ्यता के अनुरुप हो। प्यार में आत्मीय सम्बंध जरुरी है न कि वासना पूर्ति।

Thursday, January 27, 2011

जरा याद इन्हे भी कर लें-----मिथिलेश

गणतंत्र दिवस के अवसर पर इनके परवानों को तो याद किया ही जा रहा है, लेकिन उन गुमनाम हीरोज़ को भी याद करने की जरूरत है, जिन्होंने अपने तरीके से आजादी की मशाल जलाई।
ऐसे अवसर पर बङे लोगो को याद तो करते हैं, लेकिन इनके बिच कुछ नाम ऐसे भी है जिनको बहुत कम ही लोग जानते है। वहीं देखा जाये तो हमारे आजादी मे इनका योगदान कम नही है। इनका नाम आज भी गुमनाम है, लेकीन इन्होने जो किया वह काबिले तारीफ है। ये वे लोग जिन्होने आजादी के लिए बिगूल फुकंने का काम किया और ये लोग अपने काम मे सफल भी हुये। तो आईये इस गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पे इनको याद करें और श्रद्धाजंली अर्पित करें।

ऊधम सिंह----------ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ। ऊधमसिंह की माता और पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। उनके जन्म के दो साल बाद 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और 1907 में उनके पिता भी चल बसे। ऊधमसिंह और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया। इस प्रकार दुनिया के ज़ुल्मों सितम सहने के लिए ऊधमसिंह बिल्कुल अकेले रह गए। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सन 1919 का 13 अप्रैल का दिन आँसुओं में डूबा हुआ है, जब अंग्रेज़ों ने अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में सभा कर रहे निहत्थे भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलायीं और सैकड़ों बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतार दिया। मरने वालों में माँओं के सीने से चिपके दुधमुँहे बच्चे, जीवन की संध्या बेला में देश की आज़ादी का सपना देख रहे बूढ़े और देश के लिए सर्वस्व लुटाए को तैयार युवा सभी थे।
इस घटना ने ऊधमसिंह को हिलाकर रख दिया और उन्होंने अंग्रेज़ों से इसका बदला लेने की ठान ली। हिन्दू, मुस्लिम और सिख एकता की नींव रखने वाले 'ऊधम सिंह उर्फ राम मोहम्मद आजाद सिंह' ने इस घटना के लिए जनरल माइकल ओ डायर को ज़िम्मेदार माना जो उस समय पंजाब प्रांत का गवर्नर था। गवर्नर के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड, एडवर्ड हैरी डायर, जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग़ को चारों तरफ से घेर कर मशीनगन से गोलियाँ चलवाईं .........ऊधम सिंह ने मार्च 1940 में मिशेल ओ डायर को मारकर जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लिया। इस बाग में 4,000 मासूम, अंग्रेजों की क्रूरता का शिकार हुए थे। ऊधम सिंह इससे इतने विचलित हुए कि उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और एक देश से दूसरे देश भटकते रहे। अंत में वह लंदन में इस क्रूरता के लिए जिम्मेदार गवर्नर डायर तक पहुंच गए और जलियांवाला हत्याकांड का बदला लिया। ऊधम सिंह को राम मोहम्मद सिंह आजाद के नाम से भी पुकारते थे। जो हिंदू, मुस्लिम और सिख एकता का प्रतीक है।

जतिन दास --------- जतिन को 16 जून 1929 को लाहौर जेल लाया गया। जेल में स्वतंत्रता सेनानियों के साथ बहुत बुरा सुलूक किया जाता था। जतिन ने कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार करने की मांग पर भूख हड़ताल शुरू कर दी। जेल के कर्मचारियों ने पहले तो इसे अनदेखा किया, लेकिन जब भूख हड़ताल के 10 दिन हो गए तो जेल प्रशासन ने बल प्रयोग करना शुरू किया। उन्होंने जतिन की नाक में पाइप लगाकर उन्हें फीड करने की कोशिश की। लेकिन जतिन ने उलटी कर सब बाहर निकाल दिया और अपने मिशन से पीछे नहीं हटे। दिनांक 15 जुलाई को जेल सुप्रिंटेन्डेंट ने आई.जी (कारावास) को एक रिपोर्ट भेजी कि 14 जुलाई को भगत सिंह व दत्त को विशेष भोजन प्रस्तुत किया गया था, क्यों कि आई.जी (कारावास) ने ऐसा आदेश टेलीफोन पर दिया था। पर भगत सिंह ने उन्हें बताया कि वे विशेष भोजन तब तक स्वीकार न करेंगे, जब तक विशेष डाइट का वह मानदंड सरकारी गज़ट में प्रकाशित न किया जाएगा कि यह मानदंड सभी कैदियों के लिए है।

इस भूख हड़ताल में जतिन दास की स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। भगत सिंह साथियों से सलाह लेने के बहाने बोर्स्टल जेल जा कर सभी साथियों के स्वस्थ्य का समाचार पूछ लिया करते थे। उन्हें कभी नहीं लगता था कि वे अकेले हैं, बल्कि देश-भक्ति की एक ज्वाला थी, जो सब को सम्पूर्ण रूप से जोड़े रहती थी। इधर चिकित्सा अधिकारी ने रिपोर्ट दी कि दास की स्थिति बहुत चिंताजनक है। वे दवाई लेने तक से इनकार कर रहे हैं। एक डॉ. गोपीचंद ने दास से पूछा भी- आप दवाई तथा पानी क्यों नहीं ले रहे? दास ने निर्भीक उत्तर दिया - मैं देश के लिए मरना चाहता हूँ... और कैदियों की स्थिति को सुधारने के लिए।
21 अगस्त को कांग्रेस के एक अन्य देशभक्त नेता बाबू पुरुषोत्तम दास टंडन ने दास को बहुत मनाया- दवाई ले लो। सिर्फ़ जीवित रहने के लिए। भले ही भूख हड़ताल न तोड़ो। मेरे कहने पर सिर्फ़ एक बार प्रयोग के तौर पर दवा ले लो, और पन्द्रह दिन तक देखो। अगर तुम्हारी मांगें नहीं मानी जाती, तो दवाई छोड़ देना। दास ने कहा - मुझे इस सरकार में कोई आस्था नहीं है। मैं अपनी इच्छा-शक्ति से जी सकता हूँ। भगत सिंह ने दबाव डालना जारी रखा। इस पर दास ने केवल दो शर्तों पर दवाई लेना स्वीकार किया, कि दवाई डॉ. गोपीचंद ही देंगे। और कि भगत सिंह दोबारा ऐसा आग्रह नहीं करेंगे। 26 अगस्त को चिकित्सा अधिकारी ने रिपोर्ट दी कि दास की स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो गई है। वे शरीर के निचले अंगों को हिला डुला नहीं सकते। बातचीत नहीं कर सकते, केवल फुसफुसा रहे हैं। और 4 सितम्बर को उनकी नब्ज़ को कमज़ोर व अनियमित बताया गया, उल्टियाँ हुई। 9 को नब्ज़ बेहद तेज़ हो गई। 12 को उल्टी हुई, नब्ज़ अनियमित... 13 सितम्बर, अपने अनशन के ठीक चौंसठवें दिन, दोपहर एक बज कर दस मिनट पर इस बहादुर सपूत ने भारत माँ की शरण में अपने प्राणों की आहुति दे कर इतिहास के एक पन्ने को अपने बलिदान से लिख डाला।
इस युवा देव-पुरूष के अन्तिम शब्द थे - मैं बंगाली नहीं हूँ। मैं भारतवासी हूँ। जी एस देओल ऊपर संदर्भित पुस्तक में जतिन दास की शहादत पर लिखते हैं -'ब्रिटिश के लिए ईसा मसीह भी शायद एक भूली-बिसरी कथा थे'। जिस प्रकार यीशु सत्य की राह पर सूली चढ़ गए, जतिन दास सत्य के लिए युद्ध करते करते शहीद हो गए। विशाल भारत की तरह आयरलैंड जैसे छोटे-छोटे देश भी ब्रिटिश की पराधीनता का अभिशाप सह चुके थे। आयरलैंड के ही एक क्रांतिकारी युवा पुरूष टेरेंस मैकस्विनी ने भी जतिन दास की तरह ही शहादत दी थी। जतिन दास के जाने की ख़बर विश्व के अखबारों में छपी थी। इसे पढ़ कर मैकस्विनी की बहादुर पत्नी ने एक तार भेज कर लिखा - टेरेंस मैकस्विनी का परिवार इस दुःख तथा गर्व की घड़ी में सभी बहादुर भारतवासियों के साथ है। आज़ादी आएगी। जेल के बाहर कई कांग्रेसी नेताओं के नेतृत्व में असंख्य भीड़ जमा थी। जतिन दास जिंदाबाद ... इन्किलाब जिंदाबाद के नारों से आसमान गूँज उठा। सुभाष चन्द्र बोस ने देश के इस सपूत को अपना सलाम भेजा। जतिन दास को पूरा देश नमन कर रहा था। अख़बार श्रद्धांजलियों से भरे थे। जतिन दास के भाई के.सी दास ने अपने भाई का पार्थिव शरीर प्राप्त किया जिसे लाहौर में एक भारी जुलूस के बीच कई जगहों से होते हुए रेलवे स्टेशन तक लाया गया। लाखों लोगों की आंखों में आंसू थे। आसमान फिर उन्हीं देश-भक्ति से ओत-प्रोत नारों से गूंजा था।

जतिन दास जिंदाबाद ... इन्कलाब जिंदाबाद

भीकाजी कामा-----आजादी की लड़ाई में उन्‍हीं अग्रणियों में एक नाम आता है - मैडम भीकाजी कामा का। इनका नाम आज भी इतिहास के पन्‍नों पर स्‍वर्णाक्षरों से सुसज्जित है। 24 सितंबर 1861 को पारसी परिवार में भीकाजी का जन्‍म हुआ। उनका परिवार आधुनिक विचारों वाला था और इसका उन्‍हें काफी लाभ भी मिला। लेकिन उनका दाम्‍पत्‍य जीवन सुखमय नहीं रहा।

दृढ़ विचारों वाली भीकाजी ने अगस्‍त 1907 को जर्मनी में आयोजित सभा में देश का झंडा फहराया था, जिसे वीर सावरकर और उनके कुछ साथियों ने मिलकर तैयार किया था, य‍ह आज के तिरंगे से थोड़ा भिन्‍न था। भीकाजी ने स्‍वतंत्रता सेनानियों की आर्थिक मदद भी की और जब देश में प्‍लेग फैला तो अपनी जान की परवाह किए बगैर उनकी भरपूर सेवा की। स्‍वतंत्रता की लड़ाई में उन्‍होंने बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लिया। वो बाद में लंदन चली गईं और उन्‍हें भारत आने की अनुमति नहीं मिली। लेकिन देश से दूर रहना उनके लिए संभव नहीं हो पाया और वो पुन: अपने वतन लौट आईं। सन् 1936 में उनका निधन हो गया, लेकिन य‍ह काफी दु:खद था कि वे आजादी के उस सुनहरे दिन को नहीं देख पाईं, जिसका सपना उन्‍होंने गढ़ा था
इन्होंने जर्मनी में रहकर आजादी की अलख जगाई। वहां भीकाजी ने इंटरनैशनल सोशलिस्ट कॉन्फ़रन्स में 22 अगस्त 1907 को भारतीय आजादी का झंडा फहराया। कॉन्फ़रन्स के दौरान झंडा फहराते हुए उन्होंने कहा कि यह झंडा भारत की आजादी का है।

Wednesday, January 26, 2011

एक सवाल देश भक्तों से, देश प्रेमियों से, ब्लॉगरों से ??? मिथिलेश दुबे

जब १००० के नोट पर गाँधी जी की तस्वीर छप सकती है तो ५० के नोट पर शहिद भगत सिंह की तस्वीर क्यों नही छप सकती ???
१०० के नोट पर दलितों के मसीहा ड़ा० अंबेडक की तस्वीर क्यों नहीं ????
५० के नोट पर लक्ष्मीबाई की तस्वीर क्यों नहीं ??????
१० के नोट पर अरविंदों घोष की तस्वीर क्यों नहीं ???
क्या इनकी शहादत देश के लिए नहीं थी या गांधी जी की तुलना में कम थी ?????

Monday, January 24, 2011

कट्टरताओं मत बाँटो देश ---- मिथिलेश

नया युग वैज्ञानिक अध्यात्म का है । इसमें किसी तरह की कट्टरता मूढता अथवा पागलपन है। मूढताए अथवा अंधताये धर्म की हो या जाति की अथवा फिर भाषा या क्षेत्र की पूरी तरह से बेईमानी हो चुकी है । लेकिन हमारें यहां की राजनीति इतनी भ्रष्ट हो गई है कि उन्हे देश को बाँटने के सिवाय कोई और मुद्दा ही नहीं दिखता । कभी वे अलग राज्य के नाम पर राजनीति कर रहे हैं तो कभी जाति और धर्म के नाम पर । जिस दश में लोग बिना खाए सो जा रहे हो , कुपोषण का शिकार हो रहें हो , लड़किया घर से निकलने पर डर रही हो उस देश में ऐसे मुद्दों पर राजनीति करना मात्र मूर्खता ही कही जा सकती है । आज से पाँच-छह सौ साल पहले यूरोप जिस अंधविश्वास दंभ एंव धार्मिक बर्बरता के युग में जी रहा था, उस युग में आज अपने देश को घसीटने की पूरी कोशिश की जा रही है जो किसी भी तरह से उचित नही है। जो मूर्खतायें अब तक हमारे निजी जीवन का नाश कर रही थी वही अब देशव्यापी प्रागंण में फैलकर हमारी बची-खुची मानवीय संवेदना का ग्रास कर रही है । जिनकें कारण अभी तक हमारे व्यक्तित्व का पतन होता रहा है जो हमारी गुलामी का प्रमुख कारण रही, अब उन्ही के कारण हमारा देश एक बार फिर तबाही के राह पर है । धर्म के नाम पर , जाति के नाम पर,क्षेत्र के नाम, और भाषा के नाम पर जो झगड़े खड़े किए जा रहे है उनका हश्र सारा देश देख रहा है । कभी मंदिर और कभी मस्जिद तो कभी जातीयता को रिझाने की कशिश । दुःख तो तब और होता है जब इस तरह के मामलो में शिक्षित वर्ग भी शामिल दिखता है । ये सब किस तरह की कुटिलताएँ है और इनका संचायन वे लोग कर रहे है जो स्वयं को समाज का कर्णधार मानते हैं । इन धर्मो एवं जातियो के झगड़ो को हमारी कमजोरियों दूर करने का सही तरीका केवल यही है कि देश के कुछ साहसी एंव सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन कट्टरताओं की कुटिलता के विरुद्ध एक महासंग्राम छेड़ दें।

जब तक यह मूर्खता नष्ट न होगी, तब तक देश का कल्याण-पथ प्रशस्त ना होगा । समझौता कर लेनें, नौकरियों का बँटवारा कर लेने और अस्थायी सुलह नामों को लिखकर, हाथो में कालीख पोत लेने से ,तोड़फोड़ कर लेने से कभी राष्ट्रीयता व मानवीयता का उपवन नहीं महकेगा । हालत आज इतनी गई-गुजरी हो गई है कि व्यापक महांसंग्राम छेडे बिना काम चलता नहीं दिखता । धर्म , क्षेत्र एवं जाति का नाम लेकर घृणित व कुत्सित कुचक्र रचनें वालों की संख्या रक्तबीज तरह बढ रही है । ऐसे धूर्तो की कमी नहीं रही, पर मानवता कभी भी संपूर्णतया नहीं हुई और न आगे ही होगी, लेकिन बीच-बीच में ऐसा अंधयूग आ ही जाता है , जिसमें धर्म , जाति एवं क्षेत्र के नाम पर झूठे ढकोसले खड़े हो जाते हैं । कतिप्रय उलूक ऐसे में लोगो में भ्रातियाँ पैदा करने की चेष्टा करने लगते है । भारत का जीवन एवं संस्कृति वेमेल एवं विच्छन्न भेदभावों की पिटारी नहीं है । जो बात पहले कभी व्यक्तिगत जीवन में घटित होती थी, वही अब समाज की छाती चिरने लगें । भारत देश के इतिहास में इसकी कई गवाहिँया मेजुद हैं । हिंसा की भावना पहले कभी व्यक्तिगत पूजा-उपक्रमो तक सिमटी थी, बाद में वह समाज व्यापिनी बन गयी । गंगा, यमुना सरस्वती एवं देवनंद का विशाल भू-खण्ड एक हत्याग्रह में बदल गया । जिसे कुछ लोग कल तक अपनी व्यक्तिगत हैसियत से करते थे, अब उसे पूरा समाज करने लगा । उस समय एक व्यापक विचार क्रान्ति की जरुरत महसूस हुई । समाज की आत्मा में भारी विक्षोभ हुआ ।

इस क्रम में सबसे बडा हास्यापद सच तो यह है कि जो लोग अपने हितो के लिए धर्म , क्षेत्र की की दुहाई देते है उन्हे सांप्रदायिक कहा जाता है, परन्तु जो लोग जाति-धर्म क्षेत्र के नाम पर अपने स्वार्थ साधते हैं , वे स्वयं को बडा पुण्यकर्मि समझते हैं । जबकि वास्तविकता तो यह है कि ये दोंनो ही मूढ हैं , दोनो ही राष्ट्रविनाशक है । इनमें से किसी को कभी अच्छा नहीं कहा जा सकता । ध्यान रहे कि इस तरह की मुढतायें हमारे लिए हानिकारक ही साबित होंगी , अंग्रजो ने तो हमारे कम ही टुकडे किय, परन्तु अब हम अगर नहीं चेते तो खूद ही कई टूकडों में बँट जायेंगे, क्या भरोसा है कि जो चन्द स्वार्थि लोग आज अलग राज्य की माँग कर रहे हैं वे कल को अलग देश की माँग ना करे, इस लिए अब हमें राष्ट्रचेतना की जरुरत है, हो सकता है शुरु में हमें लोगो का कोपाभजन बनना पड़े , पर इससे डरने की जरुरत नही है । तो आईये मिलकर राष्ट्र नवसंरचना करने का प्रण लें ।

Friday, January 21, 2011

मेरी मौत खुशी का वायस होगी ----------मिथिलेश


जिन्दगी जिन्दादिली को जान ए रोशन यहॉं
वरना कितने मरते हैं और पैदा होते जाते हैं।

क्रान्तिकारी रोशन सिंह का जन्म शाहजहॉंपुर जिले के नबादा ग्राम में हुआ था । यह गांव खुदागंज कस्बे से लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर है। इनके पिता का नाम ठाकुर जंगी सिंह था। इस परिवार पर आर्य समाज का बहुत प्रभाव था। उन दिनों आर्य समाज द्वारा चलाए जा रहे देशहित के कार्यों से ठाकुर साहब का परिवार अछूता ना रहा। श्री जंगी सिंह के चार पुत्र ठाकुर रोशन सिंह, जाखन सिंह, सुखराम सिंह, पीताम्बर तथा दो लड़कियॉं थी । आपका जन्म 22 जनवरी को सन् 1892 को हुआ था। ठाकुर साहब काकोरी काण्ड के क्रान्तिकारियों में आयु में सबस बड़े तथा सबसे अधिक बलवान तथा अचूक निशानेबाज थे । असहयोग आन्दोलन में शाहजहॉंपुर तथा बरेली जिले के ग्रामिण क्षेत्र में उन्होने बड़े उत्साह कार्य किया। उन दिनों बरेली में एक गोली कांड हुआ था जिसमें उन्हें दो वर्ष की बड़ी सजा दी गई । वे उन सच्चे देशभक्तों में थे जिन्होने अपने खून की अन्तिम बूद भी भारत मॉं की भेंट चढ़ा दी । रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाक उल्ला खॉं, राजेन्द्र लाहिड़ी की तरह वे भी बहुत साहसी और सच्चे देशभक्त थे। हिन्दी और उर्दू का अच्छा ज्ञान था । बरेली गोली काडं का सजा के बाद उनकी रामप्रसाद बिस्मिल से भेंट हुई जो उन दिनों बड़ी क्रान्तिकारी योजनाओं का खाका तैयार करने में लगे थे। रोशन सिंह के विचारों और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर बिस्मिल ने उन्हें भी अपने दल में शामिल कर लिया । क्षत्रिय होनेके कारण उन्हें तलवार, बन्दूक चलाने, कुश्ती और घुड़सवारी का भी शौक था। अचूक निशानेबाज थे। उनके साथी उन्हें भीमसेन कहा करते थे। ठाकुर रोशन सिंह के दो पुत्र चंन्द्रदेव सिंह तथा बृजपाल सिंह हुए। असहयोग आन्दोलन में भी ठाकुर साहब ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। काकोरी काण्ड में कुल चार डकैतियों को शामिल किया गया जिनमें अन्य डकैतियों मे ठाकुर रोशन सिंह ने बिस्मिल जी का साथ दिया था। काकोरी ट्रेन डकैती काण्ड के करीब डेढ़ महिनें बाद धरपकड़ शुरु हुई और आपको भी अन्य सहयोगियों के साथ गिरफ्तार करके लखनऊ जेल भेजा गया। जेल में क्रान्तिकारियों के साथ अच्छा व्यवहार न होने कारण आपने जेल में अनशन किया । करीब दो सप्ताह तक अनशन पर रहने के बाद भी आपके स्वास्थ्य पर कोई विपरीत असर नहीं पडा़। अंग्रेज सरकार ने उनकी हवेली को ध्वस्त करवा दिया और सारी स़म्पत्ति कुर्क करा ली थी।

अदालती निर्णय के अनुसार अंग्रेज जज हेमिल्टन ने आपको फॉंसी की सजा दी। अदालती निर्णय सुनते ही ठाकुर जी नें ईश्वर का ध्यान किया और ओम का उच्चारण किया। काकोरी केस के सम्बन्ध में वकीलों और उनके साथियों का ख्याल था कि ठाकुर साहब को ज्यादा सजा नहीं मिलेगी उनके यह विचार जानकर ठाकुर साहब को बहुत ठेस लगती थी वे बुत दुखी हो जाते थे। जब जज ने उन्हें भी फॉंसी की सजा सुनाई तो उनके साथी आश्चर्यचकित और दुखी नेत्रों से ठाकुर साहब की ओर देखने लगे परन्तु ठांकुर साहब चेहरा ठाकुरी चमक से खिल उठा। उन्होंने मुस्कुराते हुए फॉंसी की सजा पाए हुए अपने अन्य साथियों का आलिंगन करते हुए कहा क्यों भाई हमें छाड़कर आप अकेले जाना चाहते थे । उनके सभी साथियों ने उनकी वीरता पर गदगद होकर उनके चरण स्पर्श किए । फॉंसी के लिए उन्हें इलाहाबाद जेल भेज दिया गया था।

ठाकुर साहब स्वतन्त्रता की लडाई को भी धर्म युद्व मानते थे। 13 सितम्बर 1927 को उन्होंने अपने एक मित्र को लिख था कि आप मेरे लिए हरगिज रंज न करे मेरी मौत खुशी का बायस होगी, हमारे शास्त्रों में लिखा है कि धर्म युद्व में मरने वालों की वही गति होती है जो तपस्या करने वाले ऋषि मुनियों की हाती है। फॉंसी के एक सप्ताह पूर्व उन्होंने एक मित्र को पत्र भेजा था इसी से साहस और ईश्वर में विश्वास का अनुपात लगाया जा सकता है। इस सप्ताह के अन्दर ही मेरी फॉंसी होगी । प्रभु से प्रार्थना है कि वह आपके मोहब्बत का बदला दे , आप मुझ ना चीज के लिए हरगिज दुखी न हों मेरी मौत खुशी का वायस होगी।
दुनिया में पैदा होकर इन्सान अपने को बदनाम न करे। इसलिए मेरी मौत किसी प्रकार भी अफसास के लायक नहीं है। दो साल से मैं परिवार से और बच्चो से अलग हू। इस बीच वे सब मुझे कुछ भूल गए होंगे। किसी हद तक भूल जाना भी अच्छा है। तन्हाई में ईश्वर भजन का मौका खूब मिला।इससे मेरा मोह कुछ छूट गया और काई वासना बाकी नहीं रही। मेरा पूरा विश्वास है कि दूनिया की कष्टमयी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिंदगी व्यतीत करने के लिए जा रहा हू। फॉंसी से पहले रात ठाकुर साहब कुछ घण्टे सोए देर रात से ही ईश्वर भजन करते रहे। प्रातः निवृत्त होकर गीता का पाठ किया। प्रहरी के आते ही अपनी गीता हाथ में उठाई और फॉंसी की कोठरी को प्रसन्नता के साथ अन्तिम नमस्कार करके फॉंसी के तख्ते की ओर चल दिए। फॉंसी के तख्ते पर वन्दे मातरम् और ओम नाम को गुँजाते हुए भारत का ये नरनाहर अपने नश्वर शरीर को भारत की मिट्टी में मिल गया। आज ठाकुर साहब हमारे बीच नहीं है। परन्तु उनकी अमर आत्मा सजग प्रहरी की भॉंति देश के करोड़ो नवयुवको के दिल में भारत की समृद्वि और सुरक्षा की अलख युगों-युगों तक रहेगी। इलाहाबाद जेल के सामनें हजारों लोग भारत मॉं के इस सपूत की लाश को लेने के लिए खड़े थे। इलाहाबाद में ही भारत माता के इस बहादुर सपूत की अन्तिम संस्कार पूर्ण वैदिक रीति के साथ सम्पन्न हुआ ।

Wednesday, January 19, 2011

मनोरंजन बनाम अश्लीलता---------मिथिलेश

बाजारवाद वर्तमान समय में सर्वोपरी है । हमें सिर्फ लाभ होना चाहिए चाहे उसके बदले नैतिकता ही क्यों ना दाव पर हो । पूंजीवाद का ऐसा दौर भी आयेगा कभी सोचा ना था । मनोरंजन की शुरुआत की गई मानवजीवन से नीरसता दूर करने के लिए , बाद में इसका स्वरुप थोड़ा बदला । मनोरंजन के साथ.साथ इसका प्रयोग संदेश वाहक के रुप में भी किया जाने लगा । कहानी, नाटक कथा आदि इसके प्रमुख स्त्रोत रहे । धीरे-धीरे विज्ञान ने प्रगति की जिसके चलते सूचना तंत्र का मोह रुपी मकड़जाल घर-घर में पहुँच गया । विज्ञान की प्रगति प्रशस्ति के योग्य है, जिसकी प्रशंसा अवश्य होनी चाहिए लेकिन तब जब वह प्रगति हमारे सांस्कृतिक व पारिवारिक मूल्यों को विकास के पथ की ओर ले जाए ना कि पतन की ओर । आज मनोरंजन के नाम पर घर-घर में अश्लीलता परोसी जा रही है। 1982 में एशियाड के दौरान बड़े-बड़े स्टेडियम बने। उन्ही के साथ भारत में रंगीन टेलीविजन आने लगे। पहले इनके दाम ज्यादा थे किंतु प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने की वजह से इनके दामों में अपार कमी आई और इनकी पहुँच घर-घर में हो गई । शुरूआती दौर में मात्र दो चैनल आते थे और रामायण,महाभारत जैसे महाग्रंथों पर आधारित धारावाहिको का प्रसारण होता था, तब मैं बहुत छोटा था, लोग बताते हैं कि जिस समय रामायण या महाभारत का प्रसारण होता था सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था , क्या हिंदू क्या मुस्लिम क्या ईसाई सब इंतजार में लगे रहते थे कि कब रामायण शुरु हो ।

एक वह युग था और एक आज का दौर हैं । आज धारावाहिक, सिनेमा वह सब दिखा रहा है जो हमारे संस्कृति के विरुद्ध है । धारावहिकों, फिल्मों में खुले यौन संबंध , विवाह से पूर्व यौन संतुष्टि इन सबकी वकालत की जा रही है। सारा समाज ही गंदा नजर आ रहा है। अब जब भारत विकास के पथ पर अग्रसर है जाहिर सी बात है विकास का दौर हर क्षेत्र में चलेगा। अभी हाल ही में एक फ़िल्म आई नो वन किल्ड जेसिका फिल्म ने सारे रिर्काड तोड़ दिए फूहड़ता के। पहले फिल्मों में जब गालियां या कुछ अनुचित शब्दों का प्रयोग होता था तब बीप की आवाज आती थी लेकिन अब ये सूक्ष्म पर्दा भी ना रहा। हमारी युवा पीढ़ी अक्सर इन फिल्मों की नकल करने की कोशिश में रहती है । मनोरंजन के नाम पर टीवी और फिल्मों के माध्यम से जो कुछ परोसा जा रहा है उसपर स्वस्थ चिंतन अतिआश्यक हो गया है । आज की नवजात पीढ़ी समय से पहले जवान हो रही है , उसे हिंसा , अश्लीलता तथा फंटासी में ही चरम आनंद मिल रहा है। पिछले दिनों कई ऐसी घटनाएं घटी जो फिल्मों से प्रेरणा स्वरुप की गई । हमारा देश अपने संस्कृति अपने संस्कारो के लिए जाना जाता है। हमारे यहॉं की संस्कृति परिवारवाद पर टीकी है लेकिन पाश्चात्य सभ्यता के चोचलों ने इसे बाजारवाद ला बिठाया है । जहॉं टीवी पर धरावाहिको और रिएलिटी शो के माध्यम से सुंदरियों की खोज की जी रही है वहीं फिल्मों के माध्यम से लड़कियां पटाने के तौर तरीके सिखाए जा रहे हैं। वाजारवाद चारो तरफ छाया है , सेक्स ही सब कुछ रह गया बाकी सब गौण ।

कुकल्पनाओं पर आधारित धारावाहिकों, फिल्मों को तवज्जों दी जा रही है । धारावाहिको में महिलाओं को कुचक्र रचते हुए दर्शाया जा रहा है, फिल्मों में गालियां बकते हुए, जिससे नारी की भाव-संवेदना समर्पण की गरिमा एक ओर एवं विघटनकारी स्वरुप दूसरी ओर हावी हो रहा है। मनोरंजन के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा उससे हमें हैरानी नही होनी चाहिए कि अगर हम अपनी भारतीयता की पहचान खो दे । जरुरी है अश्लीलता को पाबंद किया जाए तथा ललित कलाओं को फिर से पुनर्जीवित कि जाए, टीवी और फिल्मों के माध्यम से सामाजिक नवचेतना का संचार किया जाए।

Saturday, January 15, 2011

याद आते हैं वे लम्हे------------- मिथिलेश


याद आते हैं वे लम्हे
धीरे-धीरे पास आना तुम्हारा
हौले से कुछ कह जाना
कुछ दूर साथ चलना
कदम से कदम मिलाना
हया भरी आखों से
मुझको निहारना
फासले घटाना दर्मियां
मेरी आखों में
न जाने क्या तलाशना
और अचानक से दूर छिटक जाना
याद आते हैं वे लम्हे।।

हर बार न चाहते हुए भी
जाने के बहाने ढुढंना
जल्द ही मिलने का वादा करना
और अचानक से रास्ते
बदल लेना
मैं ठगा सा रह जाता
उस मोड़ पर
कदम जैसे कैद से हो जाते
कुछ पल की खुशियां जैसे
मायूसी के चादर तले ढक जाते
तुम्हारे मुड़ने का इन्तजार करना
उस हसीन एहसास को सहेजना
और
दूर कहीं ओझल हो जाना तुम्हारा
याद आते हैं वे लम्हे

Thursday, January 6, 2011

सीबीआई की विश्वसनियता

देश की सबसे बड़ी जांच एंजेसि सीबीआइ की विश्वसनियता पर अब सवालिया निशान लगता दिख रहा है । एक के बाद एक सीबीआई ऐसे फैसले ले रही है जिससे लोगों में सीबीआई की विश्वसनियता कम होती जा रही है । आखिर जब दोषी को सजा सीबीआई ना दिला पाये तो जनता अपनी फरियाद कहां ले के जायेगी । सीबीआई पर उठते सवाल के मुख्यतः दो कारण है । पहला बहुचर्चित मामला आरुषि तलवार तथा दूसरा मामला बोफोर्स है । वर्तमान मे ये दो ऐसे मामले हैं जहाँ सीबीआई को मुंह की खानी पड़ी और चहुं ओर आलोचना झेलना पड़ रहा है । आरुषि कांड पर सीबीआइ ने हार मान ली है और केस को बंद करने तक का फरमान दे दिया है । सवाल यहीं उठता है सीबीआई की विश्वसनियता पर । अगर इसके तह तक जायें तो पता चलता है कि सीबीआई द्वारा बनाये गये क्लोजर रिपोर्ट और जांच पड़ताल से अभी इस मामले को बंद करने का कोई औचित्य ही नहीं है, क्योंकि जांच दल के अधिकारी अब भी इस काम पर लगे हुए है । सीबीआई का कहना है उनके पास अभी एसे कोई सबूत नहीं हैं जिससे वे दोषियों को सजा दिलवा पायें ।

अगर सीबीआई के पास पर्याप्त सबूत नहीं थे तो उन्होनें आरुषि के पिता को गिरफ्तार क्यों किया ? ये समझ के परे है तो क्या इसका ये अनुमान लगाया जाये कि सीबीआई अंधेरे में तीर मारकर दोषी को ढूंढने का काम कर रही है । शायद तब सीबीआई को इसकी भनक नहीं थी कि ये केस इतना पेचिदा हो जायेगा । उस समय जब राजेश तलवार की गिरफ्तारी हुई तो मीडिया में उन्हे कंलकित बाप कहा गया था , इन आरोपों का जिम्मेदार कौन है ?? क्या बिना जांच पड़ताल किए किसी पर इस तरह का घिनौना आरोप लगाना जायज है ? लेकिन क्या अब राजेश तलवार मान हानि का दावा पेश करंगे , अगर हाँ तो जांच कौन समिति करेगी ये भी मायने रखता है । सीबीआई ने न सिर्फ खूद की विश्वसनियता खोई आने वाले समय में खूद के वजूद को भी दाव पर लगा दिया है । सीबीआई का ये कोई पहला मौका नहीं है जब उसने क्लोजर रिपोर्ट लगाई हो । ऐसे और कई मामले रहे है जिसमे सीबीआई पूरी तरह से अपनी जांच प्रक्रिया में और दोषियों तक पहुंचने मे विफल रही है । अभी आरुषि केस के असफलता की सफलता खत्म भी नहीं हुई थी अचानक बोफोर्स मामला एक बार फिर सामने आ गया । सीबीआई ने इस जांच को भी बंद करने का फैसला ले लिया है । ये मामला इतना ज्यादा खिंच चुका है कि मैं इसपर ज्यादा कुछ कह नही कह पाऊंगा , शायद जब ये मामला उजागर हुआ होगा तब मेरी उम्र खेलने-कूदनें वाली रही होगी , इससे आप अंदाजा लगा सकते है । मीडिया में आई रिपोर्टों के अनुसार आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण इस सौदे में तबरीबन ४१ करोड़ रुपये की दलाली खाए जाने की बात कही गई है । सीबीआई का कहना है विन चड्ढा अथवा उसके वारिस को दलाली की रकम का टैक्स चुकता करना चाहिए जबकि सीबीआई के पास इसके खिलाफ कोई सबूत नहीं है ।
केरल में 1992 में एक नन सिस्टर अभया की हत्या हो गई थी, जिसकी जांच सीबीआई को सौंपी गईं। सबूतों के अभाव का हवाला देकर एजेंसी ने चार बार इस मामले को बंद करने की कोशिश की, लेकिन अदालत ने हर बार जांच जारी रखने का आदेश दिया।आखिरकार 17 सालों बाद जून 2009 को सीबीआइ ने इस मामले तीन आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की, जिनपर अदालत में सुनवाई चल रही है।
इसी तरह सीबीआई ने उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव ललित वर्मा के खिलाफ जन्म की तारीख के हेरफेर के मामले में अगस्त 2005 में दिल्ली की तीसहजारी विशेष अदालत में क्लोजर रिपोर्ट लगा दी। अदालत ने इसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया। आखिरकार सीबीआई ने आगे मामले की जांच की और एक साल के भीतर ही ललित वर्मा के खिलाफ सबूतों के साथ चार्जशीट दाखिल कर दी । ‍
पिछले कुछ सालो के दौरान जिस तरह से सीबीआई असफल हो रही हे उकसे विश्वसनियता पर सवालियां निशान लगना लाजीमि है । आखिर जब देश की सबसे बड़ी जांच एंजेसि इस तरज असफल होगी तो जनता किससे न्याय की उम्मीद करे । जरुरत है सीबीआई को अपने काम के प्रति पारदर्शिता लाने की जिससे वह एक बार फी लोगो के विस्वास पटल पर हो ।