Wednesday, January 19, 2011

मनोरंजन बनाम अश्लीलता---------मिथिलेश

बाजारवाद वर्तमान समय में सर्वोपरी है । हमें सिर्फ लाभ होना चाहिए चाहे उसके बदले नैतिकता ही क्यों ना दाव पर हो । पूंजीवाद का ऐसा दौर भी आयेगा कभी सोचा ना था । मनोरंजन की शुरुआत की गई मानवजीवन से नीरसता दूर करने के लिए , बाद में इसका स्वरुप थोड़ा बदला । मनोरंजन के साथ.साथ इसका प्रयोग संदेश वाहक के रुप में भी किया जाने लगा । कहानी, नाटक कथा आदि इसके प्रमुख स्त्रोत रहे । धीरे-धीरे विज्ञान ने प्रगति की जिसके चलते सूचना तंत्र का मोह रुपी मकड़जाल घर-घर में पहुँच गया । विज्ञान की प्रगति प्रशस्ति के योग्य है, जिसकी प्रशंसा अवश्य होनी चाहिए लेकिन तब जब वह प्रगति हमारे सांस्कृतिक व पारिवारिक मूल्यों को विकास के पथ की ओर ले जाए ना कि पतन की ओर । आज मनोरंजन के नाम पर घर-घर में अश्लीलता परोसी जा रही है। 1982 में एशियाड के दौरान बड़े-बड़े स्टेडियम बने। उन्ही के साथ भारत में रंगीन टेलीविजन आने लगे। पहले इनके दाम ज्यादा थे किंतु प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने की वजह से इनके दामों में अपार कमी आई और इनकी पहुँच घर-घर में हो गई । शुरूआती दौर में मात्र दो चैनल आते थे और रामायण,महाभारत जैसे महाग्रंथों पर आधारित धारावाहिको का प्रसारण होता था, तब मैं बहुत छोटा था, लोग बताते हैं कि जिस समय रामायण या महाभारत का प्रसारण होता था सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था , क्या हिंदू क्या मुस्लिम क्या ईसाई सब इंतजार में लगे रहते थे कि कब रामायण शुरु हो ।

एक वह युग था और एक आज का दौर हैं । आज धारावाहिक, सिनेमा वह सब दिखा रहा है जो हमारे संस्कृति के विरुद्ध है । धारावहिकों, फिल्मों में खुले यौन संबंध , विवाह से पूर्व यौन संतुष्टि इन सबकी वकालत की जा रही है। सारा समाज ही गंदा नजर आ रहा है। अब जब भारत विकास के पथ पर अग्रसर है जाहिर सी बात है विकास का दौर हर क्षेत्र में चलेगा। अभी हाल ही में एक फ़िल्म आई नो वन किल्ड जेसिका फिल्म ने सारे रिर्काड तोड़ दिए फूहड़ता के। पहले फिल्मों में जब गालियां या कुछ अनुचित शब्दों का प्रयोग होता था तब बीप की आवाज आती थी लेकिन अब ये सूक्ष्म पर्दा भी ना रहा। हमारी युवा पीढ़ी अक्सर इन फिल्मों की नकल करने की कोशिश में रहती है । मनोरंजन के नाम पर टीवी और फिल्मों के माध्यम से जो कुछ परोसा जा रहा है उसपर स्वस्थ चिंतन अतिआश्यक हो गया है । आज की नवजात पीढ़ी समय से पहले जवान हो रही है , उसे हिंसा , अश्लीलता तथा फंटासी में ही चरम आनंद मिल रहा है। पिछले दिनों कई ऐसी घटनाएं घटी जो फिल्मों से प्रेरणा स्वरुप की गई । हमारा देश अपने संस्कृति अपने संस्कारो के लिए जाना जाता है। हमारे यहॉं की संस्कृति परिवारवाद पर टीकी है लेकिन पाश्चात्य सभ्यता के चोचलों ने इसे बाजारवाद ला बिठाया है । जहॉं टीवी पर धरावाहिको और रिएलिटी शो के माध्यम से सुंदरियों की खोज की जी रही है वहीं फिल्मों के माध्यम से लड़कियां पटाने के तौर तरीके सिखाए जा रहे हैं। वाजारवाद चारो तरफ छाया है , सेक्स ही सब कुछ रह गया बाकी सब गौण ।

कुकल्पनाओं पर आधारित धारावाहिकों, फिल्मों को तवज्जों दी जा रही है । धारावाहिको में महिलाओं को कुचक्र रचते हुए दर्शाया जा रहा है, फिल्मों में गालियां बकते हुए, जिससे नारी की भाव-संवेदना समर्पण की गरिमा एक ओर एवं विघटनकारी स्वरुप दूसरी ओर हावी हो रहा है। मनोरंजन के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा उससे हमें हैरानी नही होनी चाहिए कि अगर हम अपनी भारतीयता की पहचान खो दे । जरुरी है अश्लीलता को पाबंद किया जाए तथा ललित कलाओं को फिर से पुनर्जीवित कि जाए, टीवी और फिल्मों के माध्यम से सामाजिक नवचेतना का संचार किया जाए।

21 comments:

  1. बिल्कुल सही कहा है आपने।
    अश्लिलता के साथ इन दिनों क्रूरता भी परोसी जा रही है।
    उस दिन मां बदलो वाले सीरियल पर बच्ची के ऊपर ऐसा नियम और अनुशासन दिखाया जा रहा था कि वह रो रही थी, चीख रही थी, और मां बनी नारी अपने नियम के पासे फेके ही जा रही थी।

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  2. बढियां लिखा है -
    मगर एक बात कहूं -
    साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय
    सार सार को गहि रहे थोथा देहि उडाय

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  3. कटु परन्तु सत्य...
    आपने सही कहा कि...जरुरी है अश्लीलता को पाबंद किया जाए तथा ललित कलाओं को फिर से पुनर्जीवित कि जाए, टीवी और फिल्मों के माध्यम से सामाजिक नवचेतना का संचार किया जाए।

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  4. बहुत अच्छा, सामयिक लेख है मिथिलेश ! शुभकामनायें !!

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  5. धारावाहिक न जाने किस समाज का निर्माण करने में लगे हैं।

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  6. बहुत अच्छी पोस्ट मै उस रामायण,महाभारत सीरियल का गवाह हु आज अश्लीलता परोसने का प्रचालन जैसा हो गया है बहुत अच्छा लगा . धन्यवाद.

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  7. मनोरंजन के नाम, अपसंस्कृति के प्रसार पर तथ्यपूर्ण आलेख। वह भी एक युवा की कलम से। अभिनन्दन!!

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  8. प्रकृति का नियम है कि एक पूरा चक्कर सम्पूर्ण हो॥ आदिम जाती भी उससे वंचित नहीं है.... किसी समय आदमी नंगा घूमता था फिर कपडे पहनने लगा फिर नंगा घूमने की ओर अग्रसर है... हुआ ना चक्कर पूरा :)

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  9. प्रिय मिथिलेश जी ,
    धारावाहिकों में लिपे पुते* (*मेकअप और वस्त्र विन्यास के लिए पढ़ें) कुचक्रों में लिप्त किरदार कौन गढता है ? वे व्यवसाय कर रहे हैं उन्हें सामाजिक सरोकारों से क्या लेना देना ? हमारी गलती ये है कि हम इस भोंडपन के नियमित दर्शक हैं ,बाजार का स्थाई हिस्सा हैं और इस अपसंस्कृति के अवलोकन के लिए विधिवत जेबें ढीली करते हैं !

    आपने एक अच्छा लेख लिखा है आपका आभार !

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  10. बिल्कुल सही कहा है आपने।
    अश्लिलता के साथ इन दिनों क्रूरता भी परोसी जा रही है।

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  11. क्रूरता व अश्लीलता जिस प्रकार से इस माध्यम के द्वारा जन-जन में फैलाई जा रही है लगता तो नहीं है कि विकास के नाम पर चल रही ये यात्रा शीघ्र ही पीछे की ओर जा पावेगी । Shri C M Pershad के मुताबिक प्रकृति अपना ये चक्र भी पूरा कर ले तब की बात बेशक जुदा हो सकती है । वर्ना तो इन परोसगारी करने वालों के मुताबिक यही वो डिमांड है जिसकी पूर्ति ये कर रहे हैं ।

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  12. मनोरंजन के नाम, अपसंस्कृति के प्रसार पर........बहुत अच्छी पोस्ट

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  13. मिथिलेश भाई, यह सच है कि ऐसा नहीं होना चाहिए, पर इसके साथ ही साथ यह भी सच है कि हम में से ज्‍यादातर लोग यही सब चोरी छिपे देखना भी चाहते हैं।

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    ज्‍योतिष,अंकविद्या,हस्‍तरेख,टोना-टोटका।
    सांपों को दूध पिलाना पुण्‍य का काम है ?

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  14. दुबे जी आपकी बेवाक टिप्पणियां अन्य ब्लोगों में पढ़ते आया हूँ शायद आपके इस ब्लॉग में पहली बार आया हूँ , अच्छा लगा ,
    निरंतर हो रहे सामाजिक मूल्यों के पतन को लेकर आप चिंतित है, आपकी उपरोक्त पोस्ट में यह साफ़ झलकता है ,
    विचारणीय पोस्ट लगाई है आपने .
    आभार ..............

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  15. कटु सत्य..सार्थक प्रस्तुति..

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  16. अत्यंत महत्वपूर्ण और सामयिक लेख
    आज जिस तरह से टीवी और फिल्मों के माध्यम से अश्लीलता और हिंसा घर-घर पहुँच रही है वो बेहद चिंतनीय है. इसका खामियाजा भी समाज को ही भुगतना पड़ रहा है.

    बढ़िया पोस्ट
    आभार

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  17. प्रिय बंधुवर मिथिलेश दुबे जी
    सस्नेहाभिवादन !

    मनोरंजन बनाम अश्लीलता बहुत श्रम और लगन से तैयार आलेख है ,
    हमेशा की तरह ।
    … लेकिन जो हो जाए कम है अब ।
    अब तो अभिनय और मॉडलिंग के माध्यम से वेश्यावृत्ति में लिप्त अनेक वारांगनाएं
    सार्वजनिक स्थानों पर बिना अंतःवस्त्रों के
    बेशर्म प्रदर्शन करती भी समाचारों की सुर्ख़ियां बनती हैं ।
    पुराने समय की घोषित वेश्याएं भी सुनते हैं कि बहुत शालीनता रखती थीं ।

    धन्य है नारी जागरण !
    संस्कृति का सर्वनाश करने का बीड़ा उठा रक्खा है बेचारियों ने कोमल कंधों पर …

    होना कुछ नहीं … बस, लिखते रहिए आप भी …

    ~*~हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !~*~
    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  18. आज के इस दुतर्गति समाज में सिर्फ पैसा ही नैतिकता बन कर रहा गया है मिथिलेश जी ! अगर ऐसा नहीं होता तो ऑस्ट्रेलिया के ठेकेदारों की क्या मजाल थी की वे INDIA की फुल फॉर्म इस तरह पेश करते I'll Never Do It Again नाकों में शर्म तो बची ही नहीं !

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  19. पता नहीं हमारे नेता कैसा भारत बननाना चाहते हैं। नैतिकता सिर्फ पुस्तकों में सिमटकर रह गई है जिन्हें बच्चे सिर्फ इंतिहास पास करने के लिए पढ़ते हैं। जबकि यह सत्य है कि दूरदर्शन, सीनेमा का गहरा प्रभाव समाज पर पड़ता है।
    ...उम्दा पोस्ट।

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