Monday, January 24, 2011

कट्टरताओं मत बाँटो देश ---- मिथिलेश

नया युग वैज्ञानिक अध्यात्म का है । इसमें किसी तरह की कट्टरता मूढता अथवा पागलपन है। मूढताए अथवा अंधताये धर्म की हो या जाति की अथवा फिर भाषा या क्षेत्र की पूरी तरह से बेईमानी हो चुकी है । लेकिन हमारें यहां की राजनीति इतनी भ्रष्ट हो गई है कि उन्हे देश को बाँटने के सिवाय कोई और मुद्दा ही नहीं दिखता । कभी वे अलग राज्य के नाम पर राजनीति कर रहे हैं तो कभी जाति और धर्म के नाम पर । जिस दश में लोग बिना खाए सो जा रहे हो , कुपोषण का शिकार हो रहें हो , लड़किया घर से निकलने पर डर रही हो उस देश में ऐसे मुद्दों पर राजनीति करना मात्र मूर्खता ही कही जा सकती है । आज से पाँच-छह सौ साल पहले यूरोप जिस अंधविश्वास दंभ एंव धार्मिक बर्बरता के युग में जी रहा था, उस युग में आज अपने देश को घसीटने की पूरी कोशिश की जा रही है जो किसी भी तरह से उचित नही है। जो मूर्खतायें अब तक हमारे निजी जीवन का नाश कर रही थी वही अब देशव्यापी प्रागंण में फैलकर हमारी बची-खुची मानवीय संवेदना का ग्रास कर रही है । जिनकें कारण अभी तक हमारे व्यक्तित्व का पतन होता रहा है जो हमारी गुलामी का प्रमुख कारण रही, अब उन्ही के कारण हमारा देश एक बार फिर तबाही के राह पर है । धर्म के नाम पर , जाति के नाम पर,क्षेत्र के नाम, और भाषा के नाम पर जो झगड़े खड़े किए जा रहे है उनका हश्र सारा देश देख रहा है । कभी मंदिर और कभी मस्जिद तो कभी जातीयता को रिझाने की कशिश । दुःख तो तब और होता है जब इस तरह के मामलो में शिक्षित वर्ग भी शामिल दिखता है । ये सब किस तरह की कुटिलताएँ है और इनका संचायन वे लोग कर रहे है जो स्वयं को समाज का कर्णधार मानते हैं । इन धर्मो एवं जातियो के झगड़ो को हमारी कमजोरियों दूर करने का सही तरीका केवल यही है कि देश के कुछ साहसी एंव सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन कट्टरताओं की कुटिलता के विरुद्ध एक महासंग्राम छेड़ दें।

जब तक यह मूर्खता नष्ट न होगी, तब तक देश का कल्याण-पथ प्रशस्त ना होगा । समझौता कर लेनें, नौकरियों का बँटवारा कर लेने और अस्थायी सुलह नामों को लिखकर, हाथो में कालीख पोत लेने से ,तोड़फोड़ कर लेने से कभी राष्ट्रीयता व मानवीयता का उपवन नहीं महकेगा । हालत आज इतनी गई-गुजरी हो गई है कि व्यापक महांसंग्राम छेडे बिना काम चलता नहीं दिखता । धर्म , क्षेत्र एवं जाति का नाम लेकर घृणित व कुत्सित कुचक्र रचनें वालों की संख्या रक्तबीज तरह बढ रही है । ऐसे धूर्तो की कमी नहीं रही, पर मानवता कभी भी संपूर्णतया नहीं हुई और न आगे ही होगी, लेकिन बीच-बीच में ऐसा अंधयूग आ ही जाता है , जिसमें धर्म , जाति एवं क्षेत्र के नाम पर झूठे ढकोसले खड़े हो जाते हैं । कतिप्रय उलूक ऐसे में लोगो में भ्रातियाँ पैदा करने की चेष्टा करने लगते है । भारत का जीवन एवं संस्कृति वेमेल एवं विच्छन्न भेदभावों की पिटारी नहीं है । जो बात पहले कभी व्यक्तिगत जीवन में घटित होती थी, वही अब समाज की छाती चिरने लगें । भारत देश के इतिहास में इसकी कई गवाहिँया मेजुद हैं । हिंसा की भावना पहले कभी व्यक्तिगत पूजा-उपक्रमो तक सिमटी थी, बाद में वह समाज व्यापिनी बन गयी । गंगा, यमुना सरस्वती एवं देवनंद का विशाल भू-खण्ड एक हत्याग्रह में बदल गया । जिसे कुछ लोग कल तक अपनी व्यक्तिगत हैसियत से करते थे, अब उसे पूरा समाज करने लगा । उस समय एक व्यापक विचार क्रान्ति की जरुरत महसूस हुई । समाज की आत्मा में भारी विक्षोभ हुआ ।

इस क्रम में सबसे बडा हास्यापद सच तो यह है कि जो लोग अपने हितो के लिए धर्म , क्षेत्र की की दुहाई देते है उन्हे सांप्रदायिक कहा जाता है, परन्तु जो लोग जाति-धर्म क्षेत्र के नाम पर अपने स्वार्थ साधते हैं , वे स्वयं को बडा पुण्यकर्मि समझते हैं । जबकि वास्तविकता तो यह है कि ये दोंनो ही मूढ हैं , दोनो ही राष्ट्रविनाशक है । इनमें से किसी को कभी अच्छा नहीं कहा जा सकता । ध्यान रहे कि इस तरह की मुढतायें हमारे लिए हानिकारक ही साबित होंगी , अंग्रजो ने तो हमारे कम ही टुकडे किय, परन्तु अब हम अगर नहीं चेते तो खूद ही कई टूकडों में बँट जायेंगे, क्या भरोसा है कि जो चन्द स्वार्थि लोग आज अलग राज्य की माँग कर रहे हैं वे कल को अलग देश की माँग ना करे, इस लिए अब हमें राष्ट्रचेतना की जरुरत है, हो सकता है शुरु में हमें लोगो का कोपाभजन बनना पड़े , पर इससे डरने की जरुरत नही है । तो आईये मिलकर राष्ट्र नवसंरचना करने का प्रण लें ।

20 comments:

  1. वैज्ञानिक अध्यात्म, इस शब्द ने मुझे चिन्तन में डाल दिया है।

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  2. बहुत सटीक और सार्थक प्रस्तुति..

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  3. जमीं तो बाँट ली हमने अब आसमां की बारी है , भगवान आपकी बात लोगों को समझाए अच्छा आलेख ,बधाई

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  4. चिन्ता जायज़ है, ऐसे तत्वो हमारे बीच ही पसरे है, उन्हें पहचानने की आवश्यक्ता है।

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  5. बड़ा ही प्रासंगिक लिखा है आपने...
    बस कुढन सी होती है यह सब देखकर...
    मिलकर विकास की ओर कदम बढाने के बजे हम एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाने और घृणा फैलाने में ही लगे हैं..
    यहीं पिछड़ जाते हैं हम...

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  6. कौन चाहता है एकीकरण इस देश में...

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  7. हाम, हम राष्ट्र की नवसंरचना का प्रण लेते हैं।

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  8. एक धरती - एक देश. की सोच ही वास्तविक राष्ट्रीय चिंतन हो सकता है । लेकिन राजनीतिज्ञ ही कभी प्रांत, कभी भाषा और कभी संस्कृति के नाम पर देश के टुकडे करवाने में सबसे आगे दिखते हैं ।

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  9. ये तो गज़ब थाट है भई मिथलेश झूठ नही सच्ची तारीफ़ कर रहा हूं

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  10. सटीक...सार्थक एवं प्रासंगिक आलेख...

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  11. वैज्ञानिक आध्यात्म -चिंतन का वैज्ञानिक नजरिया -यही न ?
    चिंतन परख लेख !

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  12. बिलकुल सही कहा अगर हम समय रहते न चेते तो कभी उठ नही पायेंगे। मै भी इस कट्टरवाद से दूर रहने का प्रण लेती हूँ कोई ऐसा काम नही करूँगी जिस से अमन, शान्ति और देश की सुरक्षा, भाईचारे को चोट पहुँचे। बधाई इस आलेख के लिये।

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  13. काश, लोगों को यह बात समझ में भी आती।

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    क्‍या आपको मालूम है कि हिन्‍दी के सर्वाधिक चर्चित ब्‍लॉग कौन से हैं?

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  14. बहुत ही अच्छी एवम विचारणीय प्रस्तुति...

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  15. chintajanak stithi hai aur upaye nikalana jaroori hai ,magar samjhe kaun aur samjhaye kaise ?yahi duvidha badi hai .gantantra divas ki badhai .

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  16. प्रिय मिथिलेश जी ,
    अगर कोई बन्दा नास्तिक ना हो तो उसे वैज्ञानिक आध्यात्म शब्द से परहेज नहीं होना चाहिए!मुझे यह तो पता नहीं कि आपने इस शब्द युग्म को किस मंतव्य से प्रयोग में लिया है पर मुझे आज के समय में ज्यादातर भारतीय इसी 'पालने' के 'लाल'दिखाई देते हैं ! ब्लॉग जगत में भी आपने खूब देखा है कि धार्मिकता/जातीयता/कट्टरता को डिफेंड करने वाले लोग कौन हैं ? अपने धार्मिक विश्वासों को विज्ञान सम्मत और दूसरे के विश्वास को झूठा ठहराने के लिए गिरोह बंदियां कौन कर रहा है ?

    जिन इंसानों को आप शिक्षित कह रहे हैं उनके सम्मान में बस एक ही बात सूझती है कि शायद शिक्षा,सहमतियों और असहमतियों की धार इतनी पैनी कर देती है कि इसके सामने या बगल में खडा हर व्यक्ति बस आहत ही हो सकता है !

    अगर इंसान से इतर शक्तियों के प्रति आसक्ति यूंहीं बनी रहेगी तो शिक्षा की कृपा से प्राप्त बौद्धिक पैनापन भी कट्टरता के रूप में मौजूद रहेगा ! देश हित में हमे अपने जातीय / धार्मिक स्वत्व और उसकी सार्वजनिक स्वीकृति के आग्रह को खोने के लिए तैयार होना ही होगा !

    आपने एक चिंतनपरक आलेख लिखा है कहीं कहीं पर शब्द चयन और वाक्य विन्यास के चलते थोड़ी बहुत भ्रान्ति भी होती है पर इस सब के बावजूद आपका सन्देश हम तक सही सलामत पहुंच पा रहा है ! इसे आलेख की सफलता माना जाए ! आपको बहुत बहुत बधाई !

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  17. बहुत सटीक और सार्थक प्रस्तुति..

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  18. सच में ये बात समझ में आ जाये तो राष्ट्र नवसंरचना होने में मदत हो ....

    गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर आप को ढेरों शुभकामनाये

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  19. बहुत चिंतन परक लेख ..लगता है बहुत विश्लेषण किया है आपने ....वैज्ञानिक आध्यात्म शब्द का प्रयोग बहुत सार्थक है ....आपका आभार

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  20. आज पहली बार आपके ब्लॉग मै आई पर आके बहुत अच्छा लगा फुर्सत मै फिर से आना चाहूंगी !

    बहुत सुन्दर विचार !

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