Monday, February 14, 2011

प्रेम डे अथवा लूट डे--(एक लेट पोस्ट)----मिथिलेश

बधाई हो आप सबको चोच लड‌ऊल त्योहार । अरे का हुआ भईया समझे नाही का , अरे मेरा मतलब था वेलेंटाइन डे से था। मुझे तो पता ही ना चलता इस प्यार वाले दिन के बारे में शुक्र है उपहार से सजे दुकानों का, विशेष छूट पर मिलने वाले उपहारों का जिन्होंने मुझे जबरदस्ती अवगत कराया कि प्यार वाला दिन आ गया । नही तो मुझे क्या पता कि प्यार करने का कोई दिन भी होता मुझे तो पता था कि प्यार करने का न तो कोई दिन होता है और न ही कोई समय। लेकिन आधुनिक प्यार ने मेरे इस विचार को मेरा भ्रम करार दिया। आधुनिक जमाने में प्यार करना और इजहार करना मात्र पार्क में बैठ कर चोच लड़ाना, अश्शलील हरकते करना और खुलेआम अलिगंन होने तक ही सीमित हो गया जैसा लगता है। इन सबके पीछे विदेशी ताकतों का बड़ा हाथ है। पश्चिम देश अपने प्रयासो में यहॉं की गुमराह युवा पिढ़ी के माध्यम से सफलता अर्जित करने में लगे हैं। जैसा कि वीदित है हमारे देश में युवाओं कि संख्या सबसे ज्यादा है। युवा पिढ़ी अर्थात वह अवस्था जो भावनात्मक वेग में रहता है। इसी भावना का फायदा पाश्चात संस्कृति और वहां कंपनिया बखूबी उठा रही है। भारत में लगातार बढ़ रही वेलेंटाइन डे की लोकप्रियता के पीछे भी विदेशी कंपनियों का ही एक षडयंत्र है, जिसमें युवा पूरी तरह फंसते जा रहे हें। विदेशी कंपनियों के झांसे में आकर युवा प्यार का अर्थ भी पूरी तरह भूलते जा रहे हैं। अमेरिका,जापान या चीन जैसे अन्य तमाम देशों की नजर में भारत सिर्फ एक बाजार है और यहां रहने वाले लोग उनके लिए सबसे अच्छे ग्राहक।
वेलेंटाईन डे जैसे अवसर पर विदेशी सामानो पर विशेष छुट देने का वादा कर भारतीय ग्राहको को बेवकुफ बनाने का कार्य करती हे ये विदेशी कंपनियां। इन चापलुस कंपनियों के झांसे में भारतीय आसानी से फंस जाते है,जिससे ये कंपनियां ऐसे फालतू सामानो को भारत में बेच कर धन कमाने की अपनी रणनीति में कामयाब हो जाती है। भारतीय ग्राहको को ऐसे मौको पर सजक हो जाने की जरूरत है और इन कंपनियों के समानो की बहिष्कार करने की जरूरत है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को पंगू बनाने में ये विदेशी कंपनियां सफल ना हो सके। हमारे देश के युवाओं को ये समझना होगा जिस वेलेनटाईन को लेकर वे इतने उत्साहित रहत हैं वह हमें भावनात्मक शून्य बनाने का मात्र एक शिगुफा है और कुछ भी नहीं। जिस प्यार को ये विदेशी मात्र एक दिंन में बांधना चाहते है वह तो हमारे यहां जिवनपर्यन्त चलता है तो बस एक दिन प्यार, ये प्यार तो हो ही नही सकता। हमारे यहां तो दिन की शुरूआत ही प्यार से होती है, हमें सिखया जाता है कि हर जीव जंतु से प्यार करो। हमें बचपन से ही आपस में प्यार करना बताया जाता है। यह हमारे देश की सभ्यता और परंपरा की ही देन है। यही एक ऐसा देश है जो यहां रहने वाले लोगो के तन मन में और कर्म में हर क्षण प्यार ही रहता हैं यह भारत की भूमि ,वातावरण, संस्कृति, परंपरा और धर्म की देन हे। भारत परंपरा को मानने वाला देश है, तभी विभिन्न वर्गो , भाषाओं , धर्मो और विशाल भूभाग में रहने के बाद भी सभी परंपरा और धर्म के नाम पर अपने त्योहारो मिलजुल कर और पूरी श्रद्वा व आस्था के साथ मनाते हैं। इस सबका मतलब प्यार को बढ़ावा देना ही होता है, फिर हम वेलेंटाइन डे क्यो मनाये ?
प्यार जोड़ना सिखाता है, प्यार मिलजुलकर रहना सिखाता है। प्यार समर्पण का भाव जागृत करता है। प्यार त्याग करने की प्रेरणा देता है। प्यार ईमानदारी और सच्चाई की राह पर चलने की प्रेरणा देता है। लेकिन क्या वेलेंटाईन डे के नाम पर युवा जिस प्यार को दर्शा रहे क्या वह प्यार के इन भावों का अनुकरण कर पा रहे है? आज वेलेंटाइन डे वासना पूर्ति डे मात्र बनकर रह गया है। ऐसे में सेक्स संबंध स्थापित करने की प्रेरणा देनेवाला वेलेंटाइन डे न्यार का संदेश कभी नहीं दे सकता और न ही प्यार के एहसास को जगा सकता है। प्यार जैसे सुंदर एहसास को जिस तरह से कलंकित किया जा रही है वह बहुत ही दुखद है। वेलेंनटाइन डे का बढ़ता दायरा इस बात की ओर ध्यान आकृष्ट करता है कि हमारें देश के युवा पूरी तरह विदेशी संस्कृति के मकड़ जाल में फंस चुके है। देश के युवाओं को ये समझना होगा कि उपहार देने से प्यार मजबूत नही हो जाता उन्हे समझना होगा कि विदेशी उन्हे प्यार का ख्वाब दिखाकर अपनी जेबें भर रही है। मैं प्यार का विरोधी नही हूं लेकिन वह तरीका भारतीय हो और भारत के हित में हो। उपहार देना अगर इतना ही जरुरी हो तो वह भारतीय ही हो । प्यार करे खूब प्यार करे लेकिन वह हमारे संस्कृति और सभ्यता के अनुरुप हो। प्यार में आत्मीय सम्बंध जरुरी है न कि वासना पूर्ति।

22 comments:

  1. ‘मैं प्यार का विरोधी नही हूं लेकिन वह तरीका भारतिय हो और भारत के हित में हो। ’

    आज भारत में भातीयता ढूंढ रहे हो!! यह क्या गुनाह कर रहे हो :)

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  2. बिल्कुल सही. इस वेलण्टाईन डे के माध्यम से विदेशी कंपनियां अपना जाल फैलाने में पूरी तरह से सफल होती जा रही हैं.

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  3. लूट सके तो लूट, बलिटाहन बाबा तड़प गये होंगे।

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  4. इ डे वाला धंधा बड़े आराम का है.

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  5. ये सब डे तो बाजार का ही लूट तन्त्र है.. आठ दिन पहले से ही डे शुरु हो जाते हैं... चाकलेट डे, फलाना डे... ढ़िमकाना डे...

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  6. यह पाश्चात्य सभ्यता का ही प्रभाव है कि अब दिन कोई न कोई दिन होता है । व्यवसाय के लिए इनसे बढ़िया माध्यम और क्या हो सकता है । हमारे पास भी पैसा है लुटाने के लिए । लेकिन फिर भी देश की आधे से ज्यादा आबादी ऐसी है कि दो वक्त की रोटी के भी लाले पड़े रहते हैं ।
    लेकिन इन्हें क्या फर्क पड़ता है ?

    सार्थक लेख ।

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  7. ...आधुनिक जमाने में प्यार करना और इजहार करना मात्र पार्क में बैठ कर चोच लड़ाना, अश्शलील हरकते करना और खुलेआम अलिगंन होने तक ही सीमित हो गया जैसा लगता है।............
    निसंदेह -
    अंग्रेजो की " फूट डालो और राज करो" की नीति से सभी वाकिफ हैं , और आज भी एक नीति के तहत देश को तबाह करने की साजिश चल रही है , देश के युवाओं को गुमराह कर यहाँ की सभ्यता और संस्कृती को ख़त्म करने का प्रयास किया जा रहा है,
    दुर्भाग्य से आधुनिकता की आड़ में इस शाजिस में हमारे युवा भी शामिल होते जा रहे हैं ,
    विचारणीय पोस्ट हेतु आभार .............

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  8. वहुत ही बढ़िया आलेख..

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  9. कुछ बाज़ारवाद और कुछ पश्चिम का प्रभाव , उन्हें एक दिन का प्रेम सुहाता है ! तो क्या किया जाये जो उनके प्रेम की अवधि ३६५ दिन तक लंबी नहीं हो पाती !

    आपने काफी मेहनत से लिखा है यह लेख ! विचारणीय !

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  10. bahut hi sahi chitran aur bilkul sateek baat jo hamare sanskar v-sabhyta ke anurup hona chahiye
    ek prabhavpurn prastuti
    bahut bahut badhai is sundar lekh ke liye .
    poonam

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  11. युवा कलम की यह धार बताती है कि हमारी संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी हैं। इन पर पाश्चात्य संस्कृति के रंग कभी चढ़ने नहीं पायेंगे। चढ़े भी तो हल्की सी बारिश में ही उतर जायेंगे।
    ...सुखद चिंतन।

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  12. देवेन्द्र जी ने कह दिया जो मै कहना चाहती थी। सार्थक पोस्ट के लिये बधाई।

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  13. यह तो लेट नहीं लेटेस्ट है ...प्यार का लिटमस टेस्ट है !

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  14. लेख बहुत अच्छा और विचारणीय है।

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  15. आप का लेख बहुत सुंदर लगा, धन्यवाद

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  16. valentine day पर आपके विचार पढ़कर अच्छा लगा.ये दिन भारतीय सभ्यता को तार तार करने के लिए है.

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  17. prem ki bahar ho na ho magar fijulkharchi aur kharidaari be hisaab ,dikhabe par kahi rishte tikate hai ,sachchai ke andaz me kahi gayi baat bha gayi .

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  18. प्यार में आत्मीय सम्बंध जरुरी है न कि वासना पूर्ति। ... badhiya vichar !

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  19. -------- यदि आप भारत माँ के सच्चे सपूत है. धर्म का पालन करने वाले हिन्दू हैं तो
    आईये " हल्ला बोल" के समर्थक बनकर धर्म और देश की आवाज़ बुलंद कीजिये...
    अपने लेख को हिन्दुओ की आवाज़ बनायें.
    इस ब्लॉग के लेखक बनने के लिए. हमें इ-मेल करें.
    हमारा पता है.... hindukiawaz@gmail.com
    समय मिले तो इस पोस्ट को देखकर अपने विचार अवश्य दे
    देशभक्त हिन्दू ब्लोगरो का पहला साझा मंच
    क्या यही सिखाता है इस्लाम...? क्या यही है इस्लाम धर्म

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