Tuesday, February 22, 2011

नारी स्नेहमयी जननी-----मिथिलेश

वर्तमान युगमें सब ओर स्वतन्त्राकी आकाक्षां जाग्रत हो गयी है । नारी ह्रदयमें भी इसका होना स्वाभावीक है । इसमे सन्देह नहीं कि स्वतन्त्रता परम धर्म है और नर तथा नारी दोनों ही स्वतन्त्र होना भी चाहिए । यह भी परम सत्य है कि दोंनो जबतक स्वतन्त्र नहीं होंगे , तबतक यथार्त प्रेम भी नहीं होगा । परन्तु विचारणीय प्रश्न यह है कि दोंनो की स्वतन्त्रताके क्षेत्र तथामार्ग एक हैं या दो ? सच्ची बात यह हैं की नर और नारीका शारीरिक और मानसिक संघटन नैसर्गिक दृष्टिसे कदापि एक-सा नहीं हैं । तो दोंनो की स्वतन्त्रा कें मार्ग भी निश्चय ही दो हैं। दोनों अपने-अपने क्षेत्रमें अपने मार्ग से चलकर ही स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकते हैं । यही स्वधर्म है। जब तक स्वधर्म नहीं समझा जायेगा तबतक कल्याणकी आशा नहीं है । स्त्री घर की रानी है ,साम्रागी है ,घरमें उसका एकछत्र राज्य चलता है , पर वह गर की रानी स्नेहमयी माता और आदर्श गृहिणीके ही रुप में । नारीका यह सनातन मातृत्व ही उसका स्वरुप है । वह मानवता की नित्यमाता है । भगवान राम - कृष्ण , भीष्म-युधिष्ठिर , कर्ण , अर्जु, बुद्ध, महावीर , शंकर , रामानुज , गांधी आदि जगतके सभी बड़े- पुरुषको नारीने ही ने सृजन किया और बनाया है । उसका जीवन क्षणिक वैषयिक आनन्दके लिए नहीं , वह तो जगत् को प्रतिक्षण आनन्द प्रदान करनेवाली स्नेहमयी जननी है । उसमे प्रधानता है प्राणोंकी ह्रदयकी और पुरुषमें प्रधानता है शरीर की।
इसीलिए पुरुषकी स्वतन्त्राका क्षेत्र है शरीर और नारीकी स्वतन्त्रा क्षेत्र है प्राण- ह्रदय़ ! नारी शरीरसे चाहे दुर्बल हो , परन्तु प्राणसे वह पुरुष अपेक्षा सदा ही अत्यन्त सबल है। इसीलिए पुरुष उतने त्यागकी कल्पना नहीं कर सकता , जितना त्याग नारी सहज ही कर सकती है , अर्थात पुरुष और स्त्री सभी क्षेत्रोंमें समान भावसे स्वतन्त्र नहीं है । कोई जोश में आकर चाहे यह न स्वीकार करें , परन्तु होशमें आनेपर तो यह तय ही मानना पड़ेगा कि नारी देहके क्षेत्र में कभी पूर्णतया स्वाधीन नहीं हो सकती । प्रकृति ने उसके मन , प्राण और अवयवोंकी रचना ही ऐसी की है । नारी अपने एक विशिष्ट क्षेत्र में रह कर प्रकारान्तरसे सारे जग की सेवा करती है । यदी नारी अपनी इस विशिष्टता को भूल जाये तो जगत् का विनाश जल्द ही संभव है ।
जिन पाश्चात देशोंमें नारी स्वतन्त्रा के गान गाये जा रहे है वहाँ भी स्त्रियाँ पुरुषकों भांती निर्भिक रुप से विचरण नहीं कर पाती । नारी में मातृत्व है , गर्भ धारण करना ही पड़ता है । प्रकृति नें पुरष को इस दायित्व से मुक्त रखा है । इसलिए स्वतन्त्रा स्वाधिनता सर्वत्र सुरक्षित नहीं है, नारी अपने इस दायित्व से बच नहीं सकती ,जो बचना चाहती हैं , उसमे विकृतरुपसे इसका उदय होता है । यूरोपमें नारी स्वतन्त्र है , पर वहाँ की स्त्रियाँ क्या इस दायित्व से बचती है ? क्या वासनाओं पर उनका नियत्रंण है ? वे चाहे विवाह करे या ना करे परन्तु पुरुष संसर्ग किये बिना रही नहीं सकती । इग्लैंड़ में बीस वर्षकी आयुवाली कुमारीयों में चालीस प्रतिशत विवाहके पहले ही गर्भवती पायी जाती है , क्या देश का ऐसा नैतिक पतन कहीं देखने कि मिल सकता है ?? क्या ऐसी स्वतन्त्रा भारतीय महिलायें चाहती है ?? विदेशियोंका पारिवारिक जिवन भी नष्ट होता जा रहा है ।
लोग कहते है कि वहां की महिलायें शिक्षित हुई उनका विकास हुआ है । इसमें इतना तो सत्य है कि वहाँ स्त्रियोंमें अक्षर-ज्ञानका पर्याप्त विस्तार है ,परन्तु इतने मात्र से कोई सुशिक्षित और विकसित हो जाये , ऐसा नहीं माना जा सकता ।

अस्वतन्त्रा भवेत्रान्त्ररी सलज्जा स्मितभाषिणी ।
अनालस्या सदा स्त्रिग्धा मितवाग्लोभवर्जिता ।। (उत्तराखण्ड ८-२)

"नारी को स्वच्छन्दतासे शून्य , लज्जायुक्त , मन्द मुदकानहीन वाणी बोलनेवाली , सदा प्रेम पूर्वक भाषण करने वाली और लोभसे हीन होनी चाहिए "।
वास्तव में शिक्षा वह है जो मनुष्यमें उसके स्वधर्मानुकूल कर्तव्य जाग्रत करके उसे कर्तव्यका पूरा पालन करने योग्य बना दें। प्रकृति के विरुद्ध शिक्षासे कोई लाभ नहीं हो सकता है ये भी सत्य है । इस युग में जो
शिक्षा महिलाओं को दी जा रही है क्या उनका स्वधर्मोचित विकास हुआ है ?? एक बड़ा सवाल हो सकता है ।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्दिमवाप्रोती न सुखं न परां गतिम् ।

"जो मुनुष्य शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है वह सुख को कभी प्राप्त नहीं कर सकता ।
"
सच पूछिये तो सैकड़ो वर्षोसे चली आ रही है यूरोपकी शिक्षाने वहाँ कितनी महान् प्रतिभाशालिनि जगत की नैसर्गिक रक्षा करने वाली महिलाओं को उतपन्न किया है ? बल्कि यह प्रत्यक्ष है कि इस शिक्षासे वहाँ नारियों में गृहणीत्व तथा मातृत्व हास हुआ है । अमेरिका में 77 प्रतिशत महिलायें घर के कामों मे असफल होती है , । 60 प्रतिशन महिलायें ज्यादा उम्र हो जाने के कारण वैवाहिक योग्यता खो देती हैं । विवाह की उम्र साधारतः 16 से 20 वर्ष की मानी जाती है , इसके बाद ज्यों-ज्यो उम्र बढ़ती जाती है त्यों-त्यों विवाह की योग्यता भी कम होती जाती है । इसी का परिणाम है कि वहाँ स्वेक्षाचार , अनाचार, व्यभिचार और अत्याचार लगातार बढ़ते जा रहे हैं । अविवाहिता माताओंकी संख्या क्रमशः बढती जा रही है । घर का सुख किसी को नहीं । बिमारी तथा बुढापे में कौन किसकी सेवा करें ? वहां की शिक्षिता स्त्रियो में लगभग 50 प्रतिशत कुमारी रहना पड़ता है । क्या यही बहुमुखी विकास है ?????


सूचना--------उम्मीद है कि आपको मेरा विचार पसंद आया होगा । एक सूचना ये है कि पिछले कुछ दिनों से मेरे मित्रों का कहना था कि आप अपने ब्लॉग का नाम बदलिए सो कुछ बदल दिया , साथ ब्लॉग कलेवर भी बदला है उसको भी पसंद करियेगा । शुक्रिया

17 comments:

  1. विचारणीय आलेख ...
    हमारे प्राचीन ग्रंथों में इस बात का जिक्र तो है कि नारी को कैसा होना चाहिए और कैसा नहीं होना चाहिए?...लेकिन क्या उनमें इस बात के भी दिशा-निर्देश हैं कि पुरुषों को कैसा होना चाहिए और कैसा नहीं होना चाहिए?

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  2. दुबे का बेबाक अंदाज पसंद आया।
    पश्चिमी अंधानुकरण के कारण समाज में विकृतियाँ प्रवेश कर चुकी है।

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  3. नाम अच्छा लगा और ब्लॉग कलेवर भी ! प्रोफाइल को ऊपर लागाओ तो और अच्छा लगेगा ! हार्दिक शुभकामनायें !

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  4. स्वतन्त्रता व स्वच्छन्दता में भेद है।

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  5. भाई दुबेजी, यह अपनी अपनी संस्कृति और संस्कार पर है कि क्या सही है और क्या गलत, या फिर, क्या अच्छा है और क्या बुरा॥ उसी परिप्रेक्ष्य में ही सही गलत का निर्णय होता है। बढिया बदलाव के लिए बधाई:)

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  6. @ पोस्ट ,
    विचारणीय आलेख !

    @ बदलाव ,
    दोस्तों के सुझाव पर अमल करके अच्छा किया आपने ! प्रोफाइल चित्र भी कई दिन पुराना हो गया है किसी खास कारण से इसमें भी बदलाव का अनुरोध हमारी ओर से स्वीकार कीजियेगा !

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  7. स्वतन्त्रता व स्वच्छन्दता में भेद है। धन्यवाद|

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  8. अच्छा आलेख है मिथिलेश जी -मगर बच्चों को क्या इन जटिल मुद्दों से दूर नहीं रहना चाहिए ?
    अब ये न कहियेगा कि आप बच्चे नहीं रह गए :) जो समय आपकी मौज मस्ती का है अभी उसमें बूढों द्वारा विचारित विषयों को क्यों ले रहे हैं महराज -
    अभी तो आपकी यौन स्वच्छन्दता का भी कोई बुरा नहीं मानने वाला -और नैतिकता आदि का मामला तो महराज दिक्काल सापेक्ष है -क्यों अपनी यौवन ऊर्जा पर बंदिशें लगा रहे हैं :)

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  9. naam achchha hai, klaver me kya rakha??:)

    bahut gambhir vishay...praveen jee ne sahi kaha
    !

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  10. अब आया नाम में जोश, दुनिया हँसे तो हँसे दुबे जी लिखते रहेंगे.

    बहुत बढ़िया ,

    नारी : खुद को पाश्चत्य शैली में डुबोती हुई..............

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  11. आपके आलेख के संदर्भ में मुझे केवल एक बात कहनी है, आपने पश्चिम के नारी स्‍वतंत्रता आंदोलन के बारे में लिखा। मेरा इतना ही कहना है कि पश्चिम में नारी मुक्ति आंदोलन चर्च के खिलाफ उपजा विद्रोह था। क्‍योंकि चर्च और पादरियों ने नारी का शोषण कर रखा था और जो भी नारी उनके हाथ नहीं आ पाती थी तो वे उसे चुड़ैल और डायन की उप‍ाधि देकर उनके विरूद्ध जनमत तैयार करते थे। इसलिए नारी मुक्ति आंदोलन का स्‍वरूप भारत के संदर्भ में ठीक नहीं बैठता। यहाँ तो नारी पहले भी सबल और समर्थ थी और आज भी अपना कर्तव्‍य और समाज में अपनी भूमिका को अच्‍छा प्रकार से पहचान रही है। समाज में और अपने ही परिवार में देखें तो हमें आज पुरुष को संस्‍कारित करने की आवश्‍यकता है इसलिए यदि बार-बार पुरुषों पर ही लिखा जाएंगा तो समाज में सुधार शीघ्र आएगा। महिलाओं पर लिखने से ऐसा लगता है कि कोई बच्‍चा अपनी माँ को उपदेश दे रहा है कि माँ तू चरित्रवान बन। जबकि प्रत्‍येक माँ अपनी संतान को चरित्रवान बनाने में ही लगी रहती है। आज समाज का स्‍वरूप बदल रहा है और महिलाएं परिवार तक ही सीमित नहीं रही हैं इसलिए उनके भी प्रतिस्‍पर्द्धा में आने के कारण कहीं न कहीं पुरुष को कठिनाई हो रही है लेकिन इस कठिनाई का निराकरण दोनों को या यूं कहूं कि समाज को मिलकर करना होगा। कोई भी उपदेश अकेले महिलाओं के लिए लागू नहीं किये जा सकते। इसलिए पुरातन काल में सर्वाधिक ध्‍यान पुरुष को संस्‍कारित करने में ही दिया जाता था। आज नारी ने यदि स्‍वच्‍छंदता भी अपनायी है तब भी उसे अकेले अपराधी घोषित नहीं किया जा सकता क्‍योंकि जब समाज ने उसे पूरे पर्दे में रखा था या आज भी अफगानिस्‍तान जैसे देशों में पर्दे में ही है तब क्‍या अपराध नहीं थे? इसलिए सुधार की आवश्‍यकता पुरुषों को अधिक है और इसी पर ज्‍यादा लिखा जाना चाहिए।

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  12. bahut acchaa aalekh magar itanaa bhee bebaak nahee honaa caahiye ki kisee ko buraa lage. aasheervaad.

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