Monday, February 28, 2011

क्या सच में तुम हो?????....मिथिलेश



देखता लोगों को
करते हुए अर्पित
फूल और माला
दूध और मेवा
और न जाने क्या-क्या
हाँ तब जगती है एक उम्मीद
कि
शायद तुम हो
पर जैसे ही लांघता हूँ चौखट तुम्हारा
तार-तार हो जाता है विश्वास मेरा
टूट जाता है समर्पण तुम्हारे प्रति
जब देखता हूँ कंकाल सी काया वाली
उस औरत को
जिसके स्तनों को मुँह लगाये
उसका बच्चा कर रहा था नाकाम कोशिश
अपनी क्षुधा मिटाने को
हाँ उसी चौखट के बाहर
लंबी कतारे भूखे और नंगो की
अंधे और लगड़ों की.....
वह जो अजन्मी
खोलती आंखे कि इससे पहले
दूर कहीं सूनसान में
दफना दिया जाता है उसे
फिर भी खामोश हो तुम.....
एक अबोध जो थी अंजान
इस दुनिया दारी से
उसे कुछ वहशी दरिंदे
रौंद देते है
कर देते हैं टुकड़े- टुकड़े
अपने वासना के तले
करते हैं हनन मानवता
और तुम्हारे विश्वास का........
तब अनवरत उठती वह चीत्कार
खून क़ी वे निर्दोष छींटे
करुणा से भरी वह ममता
जानना चाहती है
क्या सच में तुम हो ???????????

41 comments:

  1. मिथिलेश जी आपने एक छोटी कविता के माध्यम से गरीबी को दिखाया हे कि आज भी लोग कैसे -कैसे अपना पेट भरते हें ,
    सुंदर रचना

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  2. वाह मिथलेश, जब से मैने तुम्हारा दाढी वाला फ़ोटो देखा तो समझ गया था कि एक नए कवि का उदय हो गया है।

    वाकई में अब तुम बच्चे नहीं रहे। लोगों को मान लेना चाहिए।

    अच्छी कविता।

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  3. मिथलेश भाई अब आंसू निकल आएंगे सच कितना मार्मिक चिंतन है सच मै भी बाल विकास अधिकारी हूं.. ऐसे दृश्य की कल्पना भी न की थी.आहत हूं क्या कर सकता हूं मै यदि सम्भव हो तो मुझे बताएं ये तस्वीर किधर की है.

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  4. पर जैसे ही लांघता हूँ चौखट तुम्हारा
    तार-तार हो जाता है विश्वास मेरा
    टूट जाता है समर्पण तुम्हारे प्रति
    जब देखता हूँ कंकाल सी काया वाली
    उस औरत को
    जिसके स्तनों को मुँह लगाये
    उसका बच्चा कर रहा था नाकाम कोशिश
    अपनी क्षुधा मिटाने को
    हाँ उसी चौखट के बाहर
    लंबी कतारे भूखे और नंगो की
    अंधे और लगड़ों
    marmik chitran jo dil dahla di ,yahi vajah hai jindagi insaaf mangati hai .

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  5. ...संवेदनशील मन में उठने वाले सहज भाव।
    ...बढ़िया।

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  6. गरीबी से बड़ा कोई दुर्भाग्य नहीं है। देश शर्मसार हो जाये।

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  7. बहुत बढ़िया मिथिलेश !
    तुम्हारी संवेदनशीलता अच्छी लगती है ! शुभकामनायें !

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  8. सुंदर कविता .. कविता पढ़कर आखें भर आई

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  9. मार्मिक...
    ललित जी से सहमत...अब तुम वाकयी में बड़े हो गए हो

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  10. प्रश्न वाजिब मालूम पड़ता है!
    आशीष

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  11. ऐसे दृश्य वास्तव में उसके अस्तित्व पर सवालिया निशान लगाते है.

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  12. शायद तुम हो
    पर जैसे ही लांघता हूँ चौखट तुम्हारा
    तार-तार हो जाता है विश्वास मेरा

    bahut hi bhawok aur sanvedansheel rachna ,
    dil k gehraiyo me jaker kahi baith si gayi hai , aur apni dastak se bar-bar chot ker rahi hai ..
    "aankho me nami ...............................

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  13. बहुत मार्मिक रचना...इतने करुण हालात लगा देते हैं प्रश्न चिन्ह हमारी आस्था और विश्वास पर उस सर्वशक्तिमान के प्रति..बहुत व्यथित हो गया मन आपकी रचना को पढ़ कर.

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  14. bahut marmik rachana....क्या सच में तुम हो ???????????

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  15. जिंदगी की कठोर सच्चाइयों को दर्शाती संवेदनशील रचना ।
    ललित जी का कहना सही है । परिपक्वता आ रही है ।

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  16. बहत सही ... और सार्थक कविता... कई पंक्तियाँ तो बहुत ही अच्छी बन पड़ी हैं...

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  17. नहिं दरिद्र सम दुखी न दीना

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  18. वह मिथलेश जी क्रन्तिकारी लेखन के लिए बधाई ---बहुत-बहुत धन्यवाद.

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  19. गरीबी से बड़ा कोई दुर्भाग्य नहीं है। धन्यवाद|

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  20. biklkul wastvik ghatna pe rachit hai ye...na:)
    aisa har din dikhta hai....aur ham sirf ye kah kar chup rah jate hain...garibi durbhagya hai..!

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  21. बहुत खुबसूरत रचना पर तस्वीरों को देख कर रूह काँप गई क्युकी वास्तविकता तो यही है जिससे हम सब बेखबर बैठे रहते हैं , और असल जिंदगी क्या होती है कोई इनसे पूछे दिल को छुती पोस्ट |

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  22. मिथिलेश जी , आपकी कविता पढ कर लगभग वैसा ही भाव जागा जैसा नवीन जी की कविता जगा देती है --- अरे चाटते झूठे पत्ते जिस दिन मैंने देखा नर को । उस दिन सोचा क्यों न लगा दूँ आग आज इस दुनियाभर को । कैसा ,कौन जगतपति वह तो कब का हुआ राख की ढेरी । वरना समता संस्थापन में लग जाती क्या इतनी देरी ।
    वैसे सच तो यह है कि समाज की इस विषमता के लिये समाज के लोग ही जिम्मेदार हैं ।वास्तव में ईश्वर के बहाने यह कहा समाजके ठेकेदारों से ही जा रहा है । अच्छी कविता है ।

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  23. ह्रदय स्पर्शी प्रविष्टि !

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  24. बहुत मार्मिक रचना है। वाकई उसका प्रश्न वाज़िब है। दिल को छू गयी रचना। बधाई।

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  25. प्रिय बंधुवर मिथिलेश धर दुबे जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !


    बहुत उच्च कोटि की रचना है
    जैसे ही लांघता हूँ चौखट …
    तार-तार हो जाता है विश्वास मेरा
    टूट जाता है समर्पण तुम्हारे प्रति
    जब देखता हूँ कंकाल सी काया वाली
    उस औरत को
    जिसके स्तनों को मुँह लगाये
    उसका बच्चा कर रहा था नाकाम कोशिश
    अपनी क्षुधा मिटाने को

    इतनी उर्जावान लेखनी !
    याद हो आई नज़रुल इस्लाम की , जिनकी लेखनी की चमक अपने समकालीन सुविख्यात से कई गुना अधिक थी , है , और रहेगी … !

    आपके प्रति हार्दिक बधाई , आभार , और शुभेच्छाएं !

    ♥ हार्दिक शुभकामनाएं ! मंगलकामनाएं ! ♥
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  26. mithilesh ji
    bahut bahut gahri abhivyakti jo man ko andar tak hila gai.ek aisa sach likha hai aapne ki vastav me yah sab sun -padh kar kabhi kabhi bhagvan se bhi vishwass uth jaata hai josab kuchh dekhte hue bhi anjan sa bana rahta hai ya shayad waqt ka intjaar karvaata hai.
    kyon ki kahte hai ki uski lathi be-aawaz hoti hai.
    aankho ko nam karti behad marm-sparshi post .
    aapko hardik badhai---
    poonam

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  27. बेबाकी से भावनाओं को संप्रेषित करती अच्छी कविता.

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  28. क्या सारा कसूर उसका ही है ... उसने तो नहीं माँगा मेवा ...
    कभी कभी हम जो करते हैं उसके अनुसार ऊपर वाले को कटघरे में खड़ा कर देते हैं ... जबकि वो तो बार रास्ता दिखाता है ...
    बहुत मार्मिक है आपकी रचना ...

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  29. बहुत ही संवेदनशील रचना.....

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  30. भाई दूबे जी होली की शुभकामनाएं |अच्छी पोस्ट के लिए बधाई |

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  31. कहाँ गायब हो जाते हो मिथिलेश ...नियमित रहो यार ! शुभकामनायें होली की !

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  32. होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  33. रंग-पर्व पर हार्दिक बधाई.

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  34. Mithlesh Bhai,
    Behtareen lekhni....dil ko andar tak chhu gagi.
    Bahut sari Shubhkaamnaayeny.

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  35. sach kahaa....japan me jo hua...use dekh-sunkar to......

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