Wednesday, April 6, 2011

कचरा तो साफ हो गया----------- मिथिलेश

प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अमूमन सारी सुविधाओं के मुकम्मल होने की बात एक आम आदमी सोचता होगा। सोचे भी क्यों नहीं, उसे क्या पता कि हर डाल पर उल्लू बैठे हैं। यदि आप कभी लखनऊ आए हैं तो विधानसभा जरूर देखे होंगे! फिलहाल कोई बात नहीं यदि नहीं आए होगें तो एक बार अवश्य देखिए। यहां का हर आदमी आपको नेता ही दिखेगा, उसकी बातों से ऐसा लगेगा, जैसे कि उसकी पहुंच जरूर सीएम तक होगी। यदि ऐसा नहीं तो एक दो मंत्री अथवा विधायक तक तो जरूर होगी। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, लेकिन उसकी भी कुछ मजबूरियों को तो जानिए। आइए मैं एक समस्या उसकी सुनाए देता हूं जो उसकी बीवी से जुड़ी है और वह वहां पर कोई भी नेतागिरी नहीं दिखा पाया। कारण कि वह सफाईकर्मी से कोई नेतागिरी नहीं कर पाता।
विधानसभा के नौवे द्वार से निकलने वाला रास्ता सीधे दारूलसफा की ओर जाती है। इस चौराहे पर पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने वीरांगना महारानी अवंती बाई लोधी की प्रतिमा का अनावरण किया है। मूर्ति के सामने ही एक वाइन शाप एवं बीयर शाप है। दिनभर जिंदगी की जंग लड़ने के बाद अधिकतर युवा और प्रौढ़ लोगों के साथ हमारे नेता भी पैग मारते नजर आते हैं। वैसे तो पूरे उत्तर प्रदेश में आपको रिटेल प्राइज पर न ही शराब मिलेगी और न ही बीयर। अब कारण क्या है? पता नहीं, लेकिन मेरठ के एक सेल्समैन ने बताया था कि आबकारी वालों को बोतल पीछे 15 रुपये देना पड़ता है। मतलब एक बीयर की बोतल आपको वहां 95 रुपये, वाराणसी में 85 रुपये में उपलब्ध हो सकती है। ऐसा ही अन्य शहरों में भी है। लखनउू में आपको यह 80 रुपये में मिल जाता है। बहरहाल पीने वालों के लिए यह बात मायने नहीं रखती। उन्हें तो तलब होने पर उनकी खुराक चाहिए। यह बात खुलेआम मुनाफाखोरी करने वालों को भी पता है।

हां, तो मैं बात कर रहा था लखनऊ के नेताओं की, जो यहां के स्थायी निवासी हैं। पैग मारते हुए उन्हें बीच में सेल्समैन ने झाड़ू लगाते हुए डिस्टर्ब किया- नेताजी जरा उस बेंच पर बैठ लीजिए! वे भी बिना किसी प्रतिक्रिया के दूसरी बेंच पर अपनी गिलास और बोतल संभाले निकल लिए। सेल्समैन आराम से बोतल और केन को अपनी टोकरी में रखते हुए रैपर और झूठे गिलास को समेटता रहा। फिर शाप के सामने सारे कचरे एकत्रित करके आग के हवाले कर दिया। यह वह जगह है, जिसके ठीक सामने के आवास में विधानसभा का एक विधायक जी का निवास है और तो और कई विधायक अथवा मंत्री यहां शाम की चाय पीने एक बार जरूर तशरीफ लाते हैं। कचरे के जलने से वहां पैग मार रहे लोगों को थोड़ी परेशानी होने लगी। पॉलीथिन जलने से उठ रही बदबू और पोल्यूशन लोगों को बर्दाश्त नहीं हुई तो एक ने टोका- यार इसे कचरावाला उठा ले जाता, जलाने से कितनी परेशानी हो रही है। इस बीच नेताजी तपाक से बोल पड़े- भइया इन्होंने अच्छा किया। कहां सफाई वाला आता है। सफाई वालों का तो सबसे बड़ा बोलबाला है। यदि ये कचरा छोड़ देते तो वह वैसा ही पड़ा रहता। सफाईवाला हमारे मुहल्ले में भी आता है, लेकिन वह सफाई करने नहीं, बल्कि कचरा उठाने के लिए। वह भी कचरा उठाने का हर मकान वालों से 50 रुपये लेता है। उसने आश्चर्य भरी नजर से नेताजी को देखा और कहा कि आपसे भी पैसा लेता है। नेताजी ने अपनी व्यथा सुनाई-भइया इस बात को लेकर बीवी से भी अनबन हो गई। कहती है कि ऐसी नेतागिरी का क्या मतलब जब सफाई करने वाला हमसे भी पैसा मांगे? पर क्या करे बड़ी मेहरबानी के चलते 35 रुपये में बात बनी। वह यह कहकर मान गया कि कभी किसी गाढ़े मुसीबत में काम पड़ जाए। उसने झल्लाकर कहा- जब प्रदेश की राजधानी का यह हाल है तो अन्य शहरों में तो अंधेर रहेगा ही। भई, लेकिन यदि विधानसभा के सामने ही पोलूशन खुलेआम होगा तो आने वाला समय बहुत बुरा गुजरने वाला है। नेताजी ने स्पष्ट किया- परेशान होने की बात नहीं भाई, कचरा तो साफ हो गया। थोड़ी देर की तकलीफ सही है, लेकिन यदि यह कचरा यहां पड़ा रहता तो कितने लोगों को इधर से गुजरने में दिक्कतें उठानी पड़ती। और तो और यहां कचरा पड़ा रहता तो कितने लोगों को यहां बैठने में बुरा लगता। फिर उन्होंने अपने साथ आए पीड़ित व्यक्ति, जिसकी समस्या का वे समाधान कराने वाले थे को सिगरेट लाने का इशारा किया। इस पर वह सामने की दुकान से सिगरेट लाकर पकड़ा दिया और वे लम्बी कश लेने लगे। फिर वे चाव के साथ कश लेते हुए विधानसभा के सामने से गुजर रहे थे। इन्हें न ही सुप्रीमकोर्ट के फैसले का खौफ था और न ही पर्यावरण प्रदूषण का। वहीं सामने कई पुलिस और उनके कई वाहन भी खड़े थे, जिनका न नेताजी को खौफ था और न पुलिस वालों को इसकी फिकर थी कि दो व्यक्ति विधानसभा के सामने धूम्रपान करते हुए गुजर रहे हैं। शायद पुलिस वाले भी यही सोच रहे थे कि धुआं ‘कचरा’ तो वातावरण के माध्यम से गायब हो जा रहा है। मतलब नेताजी की भाषा में कि कचरा तो साफ हो गया।

पर्यावरण प्रदूषण के बारे में जैसा कि हम प्राथमिक कक्षाओं से शिक्षकों से जानकारी हासिल करते हैं और उस दौरान उन तमाम बातों में से कुछ पर अमल करने के लिए सोचते हैं, लेकिन ऐसा क्या होता है कि हम उन्हे अनदेखा करने लगते हैं’। इस पर हमारा ध्यान भी होता है, लेकिन कहीं न कहीं उस पर चाह कर भी अपना विरोध अथवा विचार नहीं रख पाते। इसके पीछे भी एक लोगों में धारणाएं बनती जा रही है, जो यह है कि कोई अलानाहक परेशानियां मोल नहीं लेना चाहता। कौन इस पचड़े में पड़े? यह सोच आपको जरूर राहत दे सकती है, लेकिन यह भविष्य के लिए घातक है। यदि आप अपनी जिंदगी की खुशियों के लिए जिते हैं तो यह ठीक नहीं है। कारण कि आप सिर्फ अपने लिए तो जी नहीं सकते। आपके साथ आपका परिवार और रिश्ते-नातेदार भी जुड़े हुए हैं।

यदि उनके भविष्य के बारे में जरा भी सोच सकते हैं तो निश्चित तौर पर पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करने वालों को खुलकर विरोध करें। ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियों समेत हमारा भी कल शु़द्ध पर्यावरण में व्यतीत हो सके। यह सच है कि इस काम को अकेले कर पाना संभव नहीं है, लेकिन पहल तो बेहद जरूरी है। देश का नागरिक होने की वजह से हमारा यह परम कर्तव्य बनता है कि हमें इस पर गंभीर होना चाहिए। यदि हम इस सचाई से भागते रहे तो हम इस बात को कहने के अधिकारी नहीं होते हैं कि हमारे देश की सरकारें और अधिकारी भ्रष्टाचार में डूबी हैं अथवा लापरवाही बरत रही हैं। सीधी बात तो यह है कि पहले हम अपने ही गिरेबान में झांक कर देख लें, फिर दूसरे की खामियों को उजागर करें। ताकि कोई भी आरोप लगाते या विरोध करते समय सामने वाला आप पर सवाल न खड़ा कर सके। --

सूचना------- पिछले एक महिने से ब्लागिंग से दूर रहा है । इस दौरन हमारे बड़े भईया सतीश सक्सेना जी ने कई एसएमएस और मेल भी किया कि मैं नदारद क्यों हूं ? और डांट भी लगाई यू गायब होने के लिए । इतने दिंन कहाँ रहा और कैसे रहा ये अगली पोस्ट मे जरुर बताऊंगा । सतीश भईया मैं एक फिर आ गया हूँ ।

14 comments:

  1. सबको अपनी चिन्ता है बस... अपनी...

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  2. बहुत ही सुंदर आलेख....कचरा तो साफ होना ही था.....सही कहा आपने।

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  3. वेलकम बैक ... तो इन दिनों सत्ता के गलियारों का प्रदूषण नापा जा रहा है!
    रचनाकारों लेखकों के लिए यह हमेशा ही उर्वर क्षेत्र रहा है ! एक उपन्यास ही लिख डालिए !

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  4. अच्छी पोस्ट .......। शुभकामनाएं

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  5. देखा जाए तो सबसे बड़ी कमी हम में ही है..हमें में से कितने लोग सोचते होंगे इस बारे में|और फिर सिर्फ सोच के ही फायदा क्या है?..ये तो हमारी सरकारों को चाहिए कि कि वो लोगों को इस बारे में जागरूक करे...जगह-जगह कूड़ेदान बनवाए(वो भी चोरी हो जाते हैं)..आबादी हमारे देश की दुनिया में सबसे ज़्यादा है लेकिन कूड़ेदानों का आकार देखिये...सुमात्रा या मालदीव की आबादी के हिसाब से इतने छोटे-छोटे बनाए जाते हैं कि उन्हें ढूंढ पाना रेत में सुई खोजने के बराबर है...
    नामुमकिन कुछ भी नहीं है...सरकार अगर दृढ इच्छाशक्ति से काम ले तो हमारे देश का पूर्ण रूप से कायापलट हो सकता है...इसका एक उदहारण हमारे ही देश में राधा-स्वामी सत्संग ब्यास(पंजाब) है..जो एक एक छोटे शहर के रूप में बसा हुआ है| वहाँ की सडकों के दोनों तरफ हर 100-150 मीटर की दूरी पर 200 लीटर के ड्रमों को कूड़ेदान के रूप में लगाया गया है जिनकी नियमित रूप से दिन में कई दफा सफाई की जाती है| श्रद्धालु या फिर वहाँ से गुजरने वाले हर व्यक्ति कूड़े को उन कूड़ेदानों में ही डालता है और साथ ही इस बात का भी ध्यान रखता है कि सडकों पर कहीं भी कूड़ा ना दिखाई डे|
    ये नहीं है कि आम जनता सफाई पसंद नहीं है लेकिन उसके सामने समस्या है कि वो कूड़े को आखिर कहाँ फैंके...अगर कूड़े को निबटाने के साधन नज़दीक तथा सुलभ होंगे तो मेरे ख्याल से बहुत कम लोग ही ऐसे होंगे जो सफाई से ना रहना चाहें

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  6. कचरा साफ़ होना चाहिए ......

    करेगा कौन.

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  7. छुट्टियों के बाद स्वागत.
    अच्छी सोच के साथ- कचरा साफ होना चाहिये.

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  8. कचरा ज़मीन पर हो या हवा में , बात तो एक ही है ।
    यू पी का तो भगवान ही रखवाला है ।

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  9. मिथलेश जी ,
    यूपी में जो कचरा फैला है वह कचरा साफ़ होना चाहिए .....यू पी का तो भगवान ही रखवाला है ।

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  10. आपकी चिंता वाजिब है. वाकई उ० प्र० का तो बस भगवान् ही रखवाला है.

    आपको रामनवमी की शुभकामनाएँ.

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  11. बहुत अच्छी पोस्ट, शुभकामना, मैं सभी धर्मो को सम्मान देता हूँ, जिस तरह मुसलमान अपने धर्म के प्रति समर्पित है, उसी तरह हिन्दू भी समर्पित है. यदि समाज में प्रेम,आपसी सौहार्द और समरसता लानी है तो सभी के भावनाओ का सम्मान करना होगा.
    यहाँ भी आये. और अपने विचार अवश्य व्यक्त करें ताकि धार्मिक विवादों पर अंकुश लगाया जा सके., हो सके तो फालोवर बनकर हमारा हौसला भी बढ़ाएं.
    मुस्लिम ब्लोगर यह बताएं क्या यह पोस्ट हिन्दुओ के भावनाओ पर कुठाराघात नहीं करती.

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