Thursday, April 21, 2011

बच्चे की मदर----- मिथिलेश

कई दिनों से घर जाने की तैयारी चल रही थी और अब तो होली बस दो ही दिन दूर था। हमेशा की तरह इस बार भी घर जाने को लेकर मन बहुत ही उत्साहित था । भले ही अब घर जाने के बीच का अंतराल कम हो गया हो लेकिन घर पर एक अलग तरह का ही सुख मिलता है। घर पर न तो काम का बोझ और न ही खाना बनाने की चिंता, बर्तन और कपड़े धोना जो मुझे सबसे ज्यादा दुष्कर लगता है उससे भी छुटकारा मिल जाता है। घर पर बार-बार खाने को लेकर मम्मी का आग्रह उनका प्यार अच्छा लगता है। नहीं तो जब बाहर होते हैं तो खाना खा लें समय पे बड़ी बात है अब ये बात और है कि ये सारे सुख कुछ दिन के ही होते हैं। जब से लखनऊ हूं महीनें दो महीनें में एक चक्कर घर का तो हो ही जाता है। इस बार होली होने के कारण घर जाने का उत्साह दो गुना था। सुबह 7 बजे की ट्रेन थी, साढ़े छः के आस पास स्टेशन पहुंचा। मैं स्टेशन पर अभी ठिक से खड़ा ही हुआ अगले क्षण जो भी देखा मेरी ऑखें खुली की खुली ही रह गईं। जिस ट्रेन से मुझे जाना था वह अभी आउटर पर ही थी, लेकिन ये क्या लोग तो आउटर से ही ट्रेन पर बैठना शुरू कर दिये। थोड़ी देर तक स्थिति समझने में लगा रहा, उसके बाद मैं भी ट्रेन की तरफ भागा। अन्दर जाने के बाद जो स्थिति सामने थी उससे हतप्रभ था । पहली बार इस ट्रेन में इतनी भीड़ थी जबकि गाड़ी अभी आउटर पर ही थी। खैर इतनी भीड़ होने के बावजूद खिड़की के पास वाली सीट ढूंढने में लगा था।

डब्बे में काफी देर तक टहलने के बाद जब ये कनर्फम हो गया कि आज तो खिड़की वाली सीट मिलने से , सीटों की मारा मारी देखकर अब तो सीट मिल जाए यही प्राथमिकता शेष थी। काफी मशक्कत करने के बाद अन्ततः सीट मिल ही गई। हॉं इस बार खिड़की वाली सीट नही मिली। मेरे सामने वाले बर्थ पर भी इतनी जगह थी कि एक लोग उसपर बैठ सकते थे। कुछ देर बाद गाड़ी आउटर से प्लेटफार्म पर आ खड़ी हुई। अब काफी राहत महसूस कर रहा था , बैग को रखकर अब थोड़ा आराम के मूड में था। मुझे क्या पता कि मेरा ध्यान कुछ ही देर में भंग होने वाला है। ट्रेन का हार्न हो चुका था , गाड़ी अब चलने को ही थी तभी भागमभाग की स्थिति में एक महिला का मेरे वाले डब्बे में प्रवेश होता है, लोगों की नजरें उस रास्ते की ओर थी जिस ओर से वे सरपट कदम चले आ रहे थे । मैं भी बाट जोहने लगा , मैंने भी सोचा कौन आ रहा देख ही लिया जाए । अभी गर्दन उचका ही रहा था कि वह सुंदर मैडम मेरे पास आ पहुंची और जरा हटने के लिए कहा मैं डर के मारे बगल हो गया और मैडम जी मेरे सामने वाली खाली सीट बैठ गईं । मैडम का चेहरा सौम्य था ,पहनावे से बडे़ घर की लग रही थीं , ब्लू जींस पर ब्लैक टी शर्ट फब रहा था। अभी मैं पहनावे से उनको पढ़ने की कोशिश कर ही रहा था कि बच्चे के राने की आवाज आई , ऊपर सर उठा के देखा तो उनके गोदी में छोटा बच्चा जो करिब पॉंच छे महीनें का लग रहा था । अब तक मैडम जी अपने सीट पर बैठ चुकी थीं, मेरे सामने वाले सीट पर। बच्चा अभी सो रहा था। गाड़ी अब अपने पुरे स्पीड से भाग रही थी। कुछ देर चलने के बाद स्पीड थोड़ी कम हुई , मेरा अनुमान सही निकला , अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकने वाली थी।

बच्चे ने झटके से दूध का बोतल गिरा दिया और दोबारा से रोने लगा। ये सब देखकर बगल में बैठी आंटीने दोबारा अपनी खामोशी तोड़ी, बेटी अपना दूध पिला दो कहते-कहते न जाने क्यों खामोश हो गईं। मैं बहुत देर तक उस खामोशी और चेहरे पर आई सिकन का कारण ढूंढ़ता रहा।


मेरे बगल में बैठे भाई साहब इसी स्टॉप पर उतरने के लिए तैयारी करने लगें, गाड़ी रुकती है भाई साहब उतर जाते हैं । तभी किसी ने मुझसे कहा बेटा जरा साईड हो जाओ ,देखा तो एक महिला साड़ी में जो मेरे दादी की उम्र की लग रहीं थी, एक छोटे बैग के साथ मेरे बगल वाली खाली सीट पर बैंठ गईं । कुछ देर के स्टोपेज के बाद ट्रेन दोबारा से चल पड़ी । सामने वाली मैडम के गोदी में उनका बच्चा सोते हुए बड़ा ही प्यारा लग रहा था। बगल में बैठी महिला ने मुझसे बेटा कहॉं तक जाओगे , मैंने कहा मैं तो वाराणसी तक जाऊंगा ,आप ? आंटी जी ने कहा कि मैं तो प्रतापगढ़ तक जाऊंगी , इस पर मैंने हूं कहते हुए गर्दन हिलाया ।
ट्रेन के कोलाहल के बीच सामनें वाले सीट पर अपनी मां के गोदी में आंचल ना सही किसी प्लास्टिक नुमा लीवास में दुनिया दारी से परे सो रहा मासूम सा बच्चा अचानक उठा और रोने से सबका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। कुछ देर तक मां के पुचकारने से वह चुप तो हुआ लेकिन बहुत देर तक शांत न रहा , रोना चलता रहा। ये सब देख बगल में बैठी आंटी से रहा न गया और उन्होंने बच्चे को दूध पिलाने का इशारा किया। कुछ देर तक सोचने के बाद मैडम ने दूध का पोटली बच्चे के मुंह में लगा दिया। बच्चे ने झटके से दूध का बोतल गिरा दिया और दोबारा से रोने लगा। ये सब देखकर बगल में बैठी आटी ने दोबारा अपनी खामोशी तोड़ी, बेटी अपना दूध पिला दो कहते-कहते न जाने क्यों खामोश हो गईं। मैं बहुत देर तक उस खामोशी और चेहरे पर आई सिकन का कारण ढूंढ़ता रहा।

17 comments:

  1. पोस्‍ट का तात्‍पर्य समझ नहीं आया।

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  2. अंतिम पंक्तियों में वर्तमान परिवेश पर गहरा कटाक्ष है ।
    सुन्दर , भावपूर्ण , संवेदनशील यात्रा संस्मरण ।

    पोस्ट का शीर्षक सारी कहानी कह रहा है ।

    लेकिन लखनऊ वालों से हिंदी भाषा की अशुद्धियाँ अपेक्षित नहीं हैं ।
    कहीं गिरजेश राव जी ने पढ़ लिया तो खैर नहीं भाई ।

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  3. अजित जी ने सही कहा है। वो बेचारी इतनी भीड मे क्या करती? शुभकामनायें।

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  4. @@@@@डॉ साहब@@@
    फांण्ट परिवर्तन करते समय कुछ अशुद्धियाँ रह जाती हैं , आगे से ध्यान दूंगा ।

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  5. जैसी वेशभूषा मे वो थी उसमे फ़ीड देना शायद संभव नही था यही कारण होगा उस खामोशी और शिकन का या फिर वो बच्चा ही उसका नही होगा सिर्फ़ सीट के लिये ये सब किया हो…………आजकल सब कुछ संभव है।

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  6. ट्रेन मे चलती पूरी दुनिया।

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  7. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (23.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:-Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  8. जीवन में हर तरह के रंग होते हैं, उनमें से कई रंग समेट लिए हैं आपने अपनी कहानी में...
    शुभकामनाएं...

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  9. यात्रा संस्मरण ...देखने की एक अलग दृष्टि ...और अंत पाठकों पर छोड़ देना...बहुत अच्छा लगा दूबे जी.....

    आज आँचल की परिभाषाएँ बदल गयी हैं... मां का दूध जो स्वास्थ्य के लियें सर्वोत्तम माना जाता है आज बच्चे उसी से वंचित हैं....एक सही और सुंदर प्रश्न को उकेरा है आपने.....बधाई आपको...

    आभार मेरे ब्लॉग के लियें...

    सस्नेह
    गीता

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  10. आज समय बहुत बदल चूका है. आज शहरों में कितनी माँ अपना दूध पिलाती हैं ? आज के परिवेश में कई बार यह मुश्किल भी होता है. समय और परिस्थति का भी ख्याल रखना होता है..सुन्दर प्रस्तुति..

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  11. अधूरी आधुनिकता...! बच्चा बिचारा दूध को दरस गया।

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  12. कई सवाल छोड़ती हुई पोस्ट। बेहतर है पाठक अपनी मनस्थिति के अनुसार खुद निष्कर्ष निकाले।
    मिथिलेश, पोस्ट शीर्षक ही अपने आप में बहुत कुछ कह गया। बल्कि सच में तो पोस्ट का शीर्षक बहुत अच्छा लगा, बस मिथिलेश हटा देते वहाँ से:) नहीं तो हम जैसे इसे ’बच्चे की मदर मिथिलेश’ पढ़ समझ सकते हैं। मजाक किया है, आशा है बुरा नहीं मानोगे।

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  13. बच्चा को पता नहीं दूध मिला कि नहीं....ट्रेन में कई कहानियां मिल जाती हैं...

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  14. bahut hi prabhavshali prastuti ....sadar abhar.

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