Monday, February 28, 2011

क्या सच में तुम हो?????....मिथिलेश



देखता लोगों को
करते हुए अर्पित
फूल और माला
दूध और मेवा
और न जाने क्या-क्या
हाँ तब जगती है एक उम्मीद
कि
शायद तुम हो
पर जैसे ही लांघता हूँ चौखट तुम्हारा
तार-तार हो जाता है विश्वास मेरा
टूट जाता है समर्पण तुम्हारे प्रति
जब देखता हूँ कंकाल सी काया वाली
उस औरत को
जिसके स्तनों को मुँह लगाये
उसका बच्चा कर रहा था नाकाम कोशिश
अपनी क्षुधा मिटाने को
हाँ उसी चौखट के बाहर
लंबी कतारे भूखे और नंगो की
अंधे और लगड़ों की.....
वह जो अजन्मी
खोलती आंखे कि इससे पहले
दूर कहीं सूनसान में
दफना दिया जाता है उसे
फिर भी खामोश हो तुम.....
एक अबोध जो थी अंजान
इस दुनिया दारी से
उसे कुछ वहशी दरिंदे
रौंद देते है
कर देते हैं टुकड़े- टुकड़े
अपने वासना के तले
करते हैं हनन मानवता
और तुम्हारे विश्वास का........
तब अनवरत उठती वह चीत्कार
खून क़ी वे निर्दोष छींटे
करुणा से भरी वह ममता
जानना चाहती है
क्या सच में तुम हो ???????????

Wednesday, February 23, 2011

लौहांगना ब्लॉगर का राग-विलाप----------मिथिलेश










बधाई
दीजिए मुझे किसी लौहांगना ने गुंडे की उपाधि दी, ताली-ताली । आज मैंने दोस्तों को पार्टी दी और लौहंगना के खूब दृश्य बिहार किए । लेकिन सच मानिए दृश्य बिहार करते वक्त न पता क्यों मन भी अकुलित हो रहा है । हाँ आप स्थिति तो समझ ही सकते है मन अकुलाना क्यों होता है । मेरा वहां जाना और दृश्य बिहार करना ऐसे ही थोड़ी न था, बुद्धिजीवियों का जमावड़ा देख मैं भी पहुंचा और अब अंजाम मेरे सामने है । मोहतरमा ने मुझे गुंडा कहा और उपाधि से नवाजा । कितना आसान है ये उपाधि पाना आप भी चाहते हों तो कमेंट करिए, पर हाँ विपक्ष में करना तभी जल्दी उपाधि से नवाजे जायेंगे । गुंडा सुनकर पहले तो हैरानी हुई मैंने सोचा किसी के साथ जबरदस्ती यौनाचार तो नहीं कर दिया । खैर इसे यही छोड़ते हैं और मुद्दे पर दोबारा से आते हैं । मुझपर गुंडई का आरोप लगा है । आरोप लगाने वाला कोई और नहीं ब्लागजगत की एकमात्र स्वयम्भू आयरन लेडी हैं । वे जो दुसरों को भद्रता का पाठ पढा़ रही है, खूद एक झूठी और धूर्त महिला है जिसका उदाहरण आप दिए गये स्नैप शॉट में देख सकते है किस तरह से उस पोस्ट में संशोधन करके उस लाईन को हटा दिया गया है जिसके परिपेक्ष में मैंने वह कमेंट किया था । लेकिन मैडम भूल गयी कि उसी लाईन को लेकर शिव शंकर जी ने भी कमेट किया और अपना सवाल पूछा था जिसे मोहतरमा हटाना भूल गयी , जो आप स्नैप शॉट मे देख सकते हैं । उस लाईंन में महिलाओं को ये हिदायत दे रहीं थी कि महिलाओं को पुरुषों से कोई अपेक्षा नहीं करनी चाहिए । और मेरा कमेंट मात्र यही था कि आप खूद इसपर कितना अमल करती हैं । इस महिला की धूर्तता सामने आ चुकी है ।

आप ब्लोग स्वामी है आपकी स्वइच्छा पर निर्भर करता है कि आप कमेंट प्रकाशित करें या ना करें , लेकिन उस कमेंट को अभद्रता और गाली संज्ञान से जोडना कितना सही है ??? जबकि वह कमेंट आपके सामने है । इनका कहना कि वह कमेंट उस पोस्ट विषय के सापेक्ष नहीं था जबकि मेरा सवाल पोस्ट से जुड़े लाईन से ही था । और वह कमेंट उनके नीजी लाईफ से जुड़ा कैसे हो सकता है जबकि मैं उनके ब्लॉग पर पहली बार गया था शायद । मुझे भद्रता सिखाया जा रहा है मैडम के द्वारा । भाई वाह बहुत खूब अब वारांगनाए भी हमें तहजीब सिखाएंगी । वे हमें सिखा रही हैं जो खूद नीच शब्दो का प्रयोग करती आई हैं देवाताओं यानी पुरुषों के खिलाफ । जिसका एक छोटा सा उदाहरण आप गए स्नैप शॉट मे देख सकते हैं । जिसका खूद का चेहरा न पता कितनी ही बार नग्न हो चुका है वह ढकने की सलाह दे रहा है, बहुत खूब । मै तो इतना परेशान हो गया हूँ कल से कि भद्र और अभद्र में अन्तर ही भूल गया हूँ , समझ नहीं आ रहा कि भद्र और अभद्र की संज्ञा किसे दूँ । ब्लॉग जगत का बुद्धिजीवि लोग भी वहां पहुंचे और अपने विचार से अभद्रता को गलत ठहराया जो कि ठिक भी है । लेकिन किसी ने यह नहीं पुछा कि जिस कमेंट के प्रकाशित ना होने पर ये कमेंट किया गया वह कमेंट कहां गया ?? अब मैं उन ब्लॉग जनों से इस धूर्तता को लेकर उनकी राय जानना चाहूँगा ?? क्या वो कमेंट इतना अभद्र था जितना मोहतरमा ने अपने मुंह से बका है ?? जिसे स्नैप शाट मे देख सकते हैं ।

Tuesday, February 22, 2011

नारी स्नेहमयी जननी-----मिथिलेश

वर्तमान युगमें सब ओर स्वतन्त्राकी आकाक्षां जाग्रत हो गयी है । नारी ह्रदयमें भी इसका होना स्वाभावीक है । इसमे सन्देह नहीं कि स्वतन्त्रता परम धर्म है और नर तथा नारी दोनों ही स्वतन्त्र होना भी चाहिए । यह भी परम सत्य है कि दोंनो जबतक स्वतन्त्र नहीं होंगे , तबतक यथार्त प्रेम भी नहीं होगा । परन्तु विचारणीय प्रश्न यह है कि दोंनो की स्वतन्त्रताके क्षेत्र तथामार्ग एक हैं या दो ? सच्ची बात यह हैं की नर और नारीका शारीरिक और मानसिक संघटन नैसर्गिक दृष्टिसे कदापि एक-सा नहीं हैं । तो दोंनो की स्वतन्त्रा कें मार्ग भी निश्चय ही दो हैं। दोनों अपने-अपने क्षेत्रमें अपने मार्ग से चलकर ही स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकते हैं । यही स्वधर्म है। जब तक स्वधर्म नहीं समझा जायेगा तबतक कल्याणकी आशा नहीं है । स्त्री घर की रानी है ,साम्रागी है ,घरमें उसका एकछत्र राज्य चलता है , पर वह गर की रानी स्नेहमयी माता और आदर्श गृहिणीके ही रुप में । नारीका यह सनातन मातृत्व ही उसका स्वरुप है । वह मानवता की नित्यमाता है । भगवान राम - कृष्ण , भीष्म-युधिष्ठिर , कर्ण , अर्जु, बुद्ध, महावीर , शंकर , रामानुज , गांधी आदि जगतके सभी बड़े- पुरुषको नारीने ही ने सृजन किया और बनाया है । उसका जीवन क्षणिक वैषयिक आनन्दके लिए नहीं , वह तो जगत् को प्रतिक्षण आनन्द प्रदान करनेवाली स्नेहमयी जननी है । उसमे प्रधानता है प्राणोंकी ह्रदयकी और पुरुषमें प्रधानता है शरीर की।
इसीलिए पुरुषकी स्वतन्त्राका क्षेत्र है शरीर और नारीकी स्वतन्त्रा क्षेत्र है प्राण- ह्रदय़ ! नारी शरीरसे चाहे दुर्बल हो , परन्तु प्राणसे वह पुरुष अपेक्षा सदा ही अत्यन्त सबल है। इसीलिए पुरुष उतने त्यागकी कल्पना नहीं कर सकता , जितना त्याग नारी सहज ही कर सकती है , अर्थात पुरुष और स्त्री सभी क्षेत्रोंमें समान भावसे स्वतन्त्र नहीं है । कोई जोश में आकर चाहे यह न स्वीकार करें , परन्तु होशमें आनेपर तो यह तय ही मानना पड़ेगा कि नारी देहके क्षेत्र में कभी पूर्णतया स्वाधीन नहीं हो सकती । प्रकृति ने उसके मन , प्राण और अवयवोंकी रचना ही ऐसी की है । नारी अपने एक विशिष्ट क्षेत्र में रह कर प्रकारान्तरसे सारे जग की सेवा करती है । यदी नारी अपनी इस विशिष्टता को भूल जाये तो जगत् का विनाश जल्द ही संभव है ।
जिन पाश्चात देशोंमें नारी स्वतन्त्रा के गान गाये जा रहे है वहाँ भी स्त्रियाँ पुरुषकों भांती निर्भिक रुप से विचरण नहीं कर पाती । नारी में मातृत्व है , गर्भ धारण करना ही पड़ता है । प्रकृति नें पुरष को इस दायित्व से मुक्त रखा है । इसलिए स्वतन्त्रा स्वाधिनता सर्वत्र सुरक्षित नहीं है, नारी अपने इस दायित्व से बच नहीं सकती ,जो बचना चाहती हैं , उसमे विकृतरुपसे इसका उदय होता है । यूरोपमें नारी स्वतन्त्र है , पर वहाँ की स्त्रियाँ क्या इस दायित्व से बचती है ? क्या वासनाओं पर उनका नियत्रंण है ? वे चाहे विवाह करे या ना करे परन्तु पुरुष संसर्ग किये बिना रही नहीं सकती । इग्लैंड़ में बीस वर्षकी आयुवाली कुमारीयों में चालीस प्रतिशत विवाहके पहले ही गर्भवती पायी जाती है , क्या देश का ऐसा नैतिक पतन कहीं देखने कि मिल सकता है ?? क्या ऐसी स्वतन्त्रा भारतीय महिलायें चाहती है ?? विदेशियोंका पारिवारिक जिवन भी नष्ट होता जा रहा है ।
लोग कहते है कि वहां की महिलायें शिक्षित हुई उनका विकास हुआ है । इसमें इतना तो सत्य है कि वहाँ स्त्रियोंमें अक्षर-ज्ञानका पर्याप्त विस्तार है ,परन्तु इतने मात्र से कोई सुशिक्षित और विकसित हो जाये , ऐसा नहीं माना जा सकता ।

अस्वतन्त्रा भवेत्रान्त्ररी सलज्जा स्मितभाषिणी ।
अनालस्या सदा स्त्रिग्धा मितवाग्लोभवर्जिता ।। (उत्तराखण्ड ८-२)

"नारी को स्वच्छन्दतासे शून्य , लज्जायुक्त , मन्द मुदकानहीन वाणी बोलनेवाली , सदा प्रेम पूर्वक भाषण करने वाली और लोभसे हीन होनी चाहिए "।
वास्तव में शिक्षा वह है जो मनुष्यमें उसके स्वधर्मानुकूल कर्तव्य जाग्रत करके उसे कर्तव्यका पूरा पालन करने योग्य बना दें। प्रकृति के विरुद्ध शिक्षासे कोई लाभ नहीं हो सकता है ये भी सत्य है । इस युग में जो
शिक्षा महिलाओं को दी जा रही है क्या उनका स्वधर्मोचित विकास हुआ है ?? एक बड़ा सवाल हो सकता है ।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्दिमवाप्रोती न सुखं न परां गतिम् ।

"जो मुनुष्य शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है वह सुख को कभी प्राप्त नहीं कर सकता ।
"
सच पूछिये तो सैकड़ो वर्षोसे चली आ रही है यूरोपकी शिक्षाने वहाँ कितनी महान् प्रतिभाशालिनि जगत की नैसर्गिक रक्षा करने वाली महिलाओं को उतपन्न किया है ? बल्कि यह प्रत्यक्ष है कि इस शिक्षासे वहाँ नारियों में गृहणीत्व तथा मातृत्व हास हुआ है । अमेरिका में 77 प्रतिशत महिलायें घर के कामों मे असफल होती है , । 60 प्रतिशन महिलायें ज्यादा उम्र हो जाने के कारण वैवाहिक योग्यता खो देती हैं । विवाह की उम्र साधारतः 16 से 20 वर्ष की मानी जाती है , इसके बाद ज्यों-ज्यो उम्र बढ़ती जाती है त्यों-त्यों विवाह की योग्यता भी कम होती जाती है । इसी का परिणाम है कि वहाँ स्वेक्षाचार , अनाचार, व्यभिचार और अत्याचार लगातार बढ़ते जा रहे हैं । अविवाहिता माताओंकी संख्या क्रमशः बढती जा रही है । घर का सुख किसी को नहीं । बिमारी तथा बुढापे में कौन किसकी सेवा करें ? वहां की शिक्षिता स्त्रियो में लगभग 50 प्रतिशत कुमारी रहना पड़ता है । क्या यही बहुमुखी विकास है ?????


सूचना--------उम्मीद है कि आपको मेरा विचार पसंद आया होगा । एक सूचना ये है कि पिछले कुछ दिनों से मेरे मित्रों का कहना था कि आप अपने ब्लॉग का नाम बदलिए सो कुछ बदल दिया , साथ ब्लॉग कलेवर भी बदला है उसको भी पसंद करियेगा । शुक्रिया

Monday, February 14, 2011

प्रेम डे अथवा लूट डे--(एक लेट पोस्ट)----मिथिलेश

बधाई हो आप सबको चोच लड‌ऊल त्योहार । अरे का हुआ भईया समझे नाही का , अरे मेरा मतलब था वेलेंटाइन डे से था। मुझे तो पता ही ना चलता इस प्यार वाले दिन के बारे में शुक्र है उपहार से सजे दुकानों का, विशेष छूट पर मिलने वाले उपहारों का जिन्होंने मुझे जबरदस्ती अवगत कराया कि प्यार वाला दिन आ गया । नही तो मुझे क्या पता कि प्यार करने का कोई दिन भी होता मुझे तो पता था कि प्यार करने का न तो कोई दिन होता है और न ही कोई समय। लेकिन आधुनिक प्यार ने मेरे इस विचार को मेरा भ्रम करार दिया। आधुनिक जमाने में प्यार करना और इजहार करना मात्र पार्क में बैठ कर चोच लड़ाना, अश्शलील हरकते करना और खुलेआम अलिगंन होने तक ही सीमित हो गया जैसा लगता है। इन सबके पीछे विदेशी ताकतों का बड़ा हाथ है। पश्चिम देश अपने प्रयासो में यहॉं की गुमराह युवा पिढ़ी के माध्यम से सफलता अर्जित करने में लगे हैं। जैसा कि वीदित है हमारे देश में युवाओं कि संख्या सबसे ज्यादा है। युवा पिढ़ी अर्थात वह अवस्था जो भावनात्मक वेग में रहता है। इसी भावना का फायदा पाश्चात संस्कृति और वहां कंपनिया बखूबी उठा रही है। भारत में लगातार बढ़ रही वेलेंटाइन डे की लोकप्रियता के पीछे भी विदेशी कंपनियों का ही एक षडयंत्र है, जिसमें युवा पूरी तरह फंसते जा रहे हें। विदेशी कंपनियों के झांसे में आकर युवा प्यार का अर्थ भी पूरी तरह भूलते जा रहे हैं। अमेरिका,जापान या चीन जैसे अन्य तमाम देशों की नजर में भारत सिर्फ एक बाजार है और यहां रहने वाले लोग उनके लिए सबसे अच्छे ग्राहक।
वेलेंटाईन डे जैसे अवसर पर विदेशी सामानो पर विशेष छुट देने का वादा कर भारतीय ग्राहको को बेवकुफ बनाने का कार्य करती हे ये विदेशी कंपनियां। इन चापलुस कंपनियों के झांसे में भारतीय आसानी से फंस जाते है,जिससे ये कंपनियां ऐसे फालतू सामानो को भारत में बेच कर धन कमाने की अपनी रणनीति में कामयाब हो जाती है। भारतीय ग्राहको को ऐसे मौको पर सजक हो जाने की जरूरत है और इन कंपनियों के समानो की बहिष्कार करने की जरूरत है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को पंगू बनाने में ये विदेशी कंपनियां सफल ना हो सके। हमारे देश के युवाओं को ये समझना होगा जिस वेलेनटाईन को लेकर वे इतने उत्साहित रहत हैं वह हमें भावनात्मक शून्य बनाने का मात्र एक शिगुफा है और कुछ भी नहीं। जिस प्यार को ये विदेशी मात्र एक दिंन में बांधना चाहते है वह तो हमारे यहां जिवनपर्यन्त चलता है तो बस एक दिन प्यार, ये प्यार तो हो ही नही सकता। हमारे यहां तो दिन की शुरूआत ही प्यार से होती है, हमें सिखया जाता है कि हर जीव जंतु से प्यार करो। हमें बचपन से ही आपस में प्यार करना बताया जाता है। यह हमारे देश की सभ्यता और परंपरा की ही देन है। यही एक ऐसा देश है जो यहां रहने वाले लोगो के तन मन में और कर्म में हर क्षण प्यार ही रहता हैं यह भारत की भूमि ,वातावरण, संस्कृति, परंपरा और धर्म की देन हे। भारत परंपरा को मानने वाला देश है, तभी विभिन्न वर्गो , भाषाओं , धर्मो और विशाल भूभाग में रहने के बाद भी सभी परंपरा और धर्म के नाम पर अपने त्योहारो मिलजुल कर और पूरी श्रद्वा व आस्था के साथ मनाते हैं। इस सबका मतलब प्यार को बढ़ावा देना ही होता है, फिर हम वेलेंटाइन डे क्यो मनाये ?
प्यार जोड़ना सिखाता है, प्यार मिलजुलकर रहना सिखाता है। प्यार समर्पण का भाव जागृत करता है। प्यार त्याग करने की प्रेरणा देता है। प्यार ईमानदारी और सच्चाई की राह पर चलने की प्रेरणा देता है। लेकिन क्या वेलेंटाईन डे के नाम पर युवा जिस प्यार को दर्शा रहे क्या वह प्यार के इन भावों का अनुकरण कर पा रहे है? आज वेलेंटाइन डे वासना पूर्ति डे मात्र बनकर रह गया है। ऐसे में सेक्स संबंध स्थापित करने की प्रेरणा देनेवाला वेलेंटाइन डे न्यार का संदेश कभी नहीं दे सकता और न ही प्यार के एहसास को जगा सकता है। प्यार जैसे सुंदर एहसास को जिस तरह से कलंकित किया जा रही है वह बहुत ही दुखद है। वेलेंनटाइन डे का बढ़ता दायरा इस बात की ओर ध्यान आकृष्ट करता है कि हमारें देश के युवा पूरी तरह विदेशी संस्कृति के मकड़ जाल में फंस चुके है। देश के युवाओं को ये समझना होगा कि उपहार देने से प्यार मजबूत नही हो जाता उन्हे समझना होगा कि विदेशी उन्हे प्यार का ख्वाब दिखाकर अपनी जेबें भर रही है। मैं प्यार का विरोधी नही हूं लेकिन वह तरीका भारतीय हो और भारत के हित में हो। उपहार देना अगर इतना ही जरुरी हो तो वह भारतीय ही हो । प्यार करे खूब प्यार करे लेकिन वह हमारे संस्कृति और सभ्यता के अनुरुप हो। प्यार में आत्मीय सम्बंध जरुरी है न कि वासना पूर्ति।