Thursday, March 22, 2012

वह सांवली सी लड़की---मिथिलेश

तन पर लपेटे

फटे व पुराने कपड़े

वह सांवली सी लड़की,

कर रही थी कोशिश

शायद ढक पाये

तन को अपने,

हर बार ही होती शिकार वह

असफलता और हीनता का

समाज की क्रूर व निर्दयी निगाहें

घूर रहीं थी उसके खुलें तन को,

हाथ में लिए खुरपे से

चिलचिलाती धूप के तले

तोड़ रही थी वह पेड़ो से छाल

और कर रही थी जद्दोजहद जिंदगी से अपने

तन पर लपेटे फटे व पुराने कपड़े

वह सावंली सी लड़की ।

24 comments:

  1. वह तोड़ती पत्थर की याद दिला दी.. सुन्दर.

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  2. बहुत सुंदर कविता लिखी है आपने
    ... मार्मिक !


    बधाई !

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  3. शायद ढक पाये

    तन को अपने,

    हर बार ही होती शिकार वह

    असफलता और हीनता का

    वास्तविक चित्रण

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  4. प्रिय मिथिलेश जी ,
    कठिन परिस्थितियों और समाज की विसंगतियों को उकेरती भावनायें ! धूप / कपडे और सांवलापन ,बेहतर बिम्ब लगे ! काफी दिनों बाद वापसी पर स्वागत !

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  5. देश में हालत तो अभी भी ऐसे ही हैं .
    सच को उजागर करती मार्मिक रचना .

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति| नवसंवत्सर २०६९ की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति| नवसंवत्सर २०६९ की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  8. समाज की कालिमा इसका कारण है।

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  9. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!
    नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  10. मोडरेशन का विकल्प हटाने पर विचार जरूर करें | मोडरेशन का विकल्प कैसे हटाये | इस लिंक पर जाएँ |

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  11. बहुत मार्मिक रचना है.....

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  12. बहुत अच्छी रचना...
    सादर।

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  13. बहुत सुन्दर...
    निराला याद आ गए....

    सादर.
    अनु

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  14. बहुत दिनों बाद आपको पढ़ना हुवा है ...
    वो सांवली से लड़की सच में दिल में उतर गयी ... मासूम सी रचना की तरह ...

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  15. बहुत मार्मिक रचना...

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  16. बहुत सुन्दर...

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  17. निर्दयी निगाहें ..तन ढकती लड़की ..कैसा सत्य ..?अति सुन्दर लिखा है.

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  18. मिथिलेश बाबू, लंबे अंतराल के बाद देखकर अच्छा लगा। कविता पहले पढ़ी हुई लगी, पुनर्ठेलन है क्या?

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  19. Bahut Marmsparshi rachna.........badhai

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  20. बहुत अच्छी कविता है मिथिलेश जी।

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  21. वह तोड़ती पत्थर याद हो आया ......

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  22. बहुत मार्मिक रचना है.....मिथिलेश जी

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