Thursday, May 15, 2014

लेकिन माँ नहीं

वो इबादत इबादत नहीं जिसमे माँ का नाम नहीं
वो घर घर नहीं अबस है
जिसमे माँ को जगह नहीं ।

आज सबकुछ तो है मेरे पास
धन दौलत और शोहरत
नहीं है तो ख़ुश होने वाली माँ नहीं ।

देर रात को आता हूं
खाली पेट ही सो जाता हूँ
आँखों में नींद तो है, माँ की डांट का डर नहीं ।

सुबह देर तक सोता हूँ
अब तो हर रोज ही
अलार्म की घंटी तो है पर माँ की प्यारी आवाज़ नहीं ।

दिन -दिन भर रहता हूँ घर से बाहर
उन्मुक्तता है , आजादी है
लेकिन माँ की फटकार नहीं ।

Monday, May 5, 2014

मर कर जीना सीख लिया

अब दुःख दर्द में भी मैने मुस्कुराना सीख लिया
जब से अज़ाब को छिपाने के सलीका सीख लिया।

बेवफाओं से इतना पड़ा पाला कि अब
इल्तिफ़ात से भी किनारा लेना सीख़ लिया।

झूठे कसमें वादों से अब मैं कभी ना टूटूंगा
ग़ार को पहचानने का हुनर जो सीख लिया।

वो कत्लेआम के शौक़ीन हैं तो क्या हुआ
मैंने भी तो अब मर के जीने का तरीका सीख़ लिया।

सुनसान रास्तों पर चलने से अब डर नहीं लगता
मैंने अब इन पर आना-जाना सीख लिया। 

शब्दार्थ :::
इल्तिफ़ात- मित्रता
ग़ार- विश्वासघात
अज़ाब - पीड़ा

Thursday, April 3, 2014

वो लड़की


फटे पुराने कपड़े तन पर लिए,
झाड़ियों में घूमती वो,
हाथ में कुल्हाड़ी
और
सर पर लकड़ी का बोझ,
नंगे पांव सर्द हवाओं के बीच,
आंखों से टपकते आंसू उसके
कांटों के बीच टहलती वो,
कटकटाते दांतों की आवाज,
थरथराता उसका बदन,
ठंड ने आगोश में ले लिया था
सांवली सूरत को,
हर रोज नजर आती थी
वो लड़की,
कुछ अर्सा गुजरा
सब कुछ वैसा ही है,
पर वो लड़की नहीं है,
याद है -
उसका चेहरा,
उसके बाल -
जिस पर दो फीते लाल रंग के बंधे थे।
मासूमियत से भरा चेहरा,
अब बहुत दूर जा चुका है ,
जहां उसे सर्द हवाएं छू भी नहीं सकती।

Sunday, March 23, 2014

वीर जवानों को नमन

लगभग एक साल बाद पुनः ब्लोगिंग की ओर लौट रहा हूँ। ब्लोगिंग से दूर रहने का जो प्रमुख कारण रहा वो जीवन में अस्थिरता की वजह से उत्पन्न हुआ।  अब जब वापसी की कोशिश में लगा हूँ तो भरसक प्रयास करूंगा की इस बार निरंतरता बनी रहे।   आज शहीद दिवस के अवसर वीर जवानों को समर्पित एक कविता से शुरुआत करता हूँ।  उम्मीद करता हूँ कि पहले की तरह इस बार चाहने वालों का साथ और प्यार बना रहेगा

कपकपाती ठण्ड में
जो कभी ठहरा नहीं
चिलचिलाती धूप में
जो कभी थमा नहीं

गोलियों की बौछार में
जो कभी डरा नहीं
बारूदी धमाकों से
जो कभी दहला नहीं

अनगिनत लाशों में
जो कभी सहमा नहीं
फर्ज के सामने
जो कभी डिगा नहीं

आंसुओं के सैलाब से
जो कभी पिघला नहीं
देश के आन ,मान ,शान में
मिटने से जो कभी पीछे हटा नहीं

ऐसे वीर जवानों को
शत -शत नमन ।।