Thursday, April 3, 2014

वो लड़की


फटे पुराने कपड़े तन पर लिए,
झाड़ियों में घूमती वो,
हाथ में कुल्हाड़ी
और
सर पर लकड़ी का बोझ,
नंगे पांव सर्द हवाओं के बीच,
आंखों से टपकते आंसू उसके
कांटों के बीच टहलती वो,
कटकटाते दांतों की आवाज,
थरथराता उसका बदन,
ठंड ने आगोश में ले लिया था
सांवली सूरत को,
हर रोज नजर आती थी
वो लड़की,
कुछ अर्सा गुजरा
सब कुछ वैसा ही है,
पर वो लड़की नहीं है,
याद है -
उसका चेहरा,
उसके बाल -
जिस पर दो फीते लाल रंग के बंधे थे।
मासूमियत से भरा चेहरा,
अब बहुत दूर जा चुका है ,
जहां उसे सर्द हवाएं छू भी नहीं सकती।

7 comments:

  1. वो गांव की कोई मासूम लड़की याद आने लगे ..मार्मिक रचना ..

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  2. सच्चाई को शब्दों में बांध दिया है आपने

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  3. संवेदनाओं से परिपूर्ण इस कविता के लिए बधाई...

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  4. यादें रुलाती
    आपकी रचना सुंदर है .....

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